Tuesday, September 26, 2017

Sanskrit Poem ‘नमस्ते हे दुर्गे !’ (Namaste He Durge): Dr.Harekrishna Meher

'Namaste He Durge !' (Sanskrit Poem)
By : Dr. Harekrishna Meher 
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‘नमस्ते हे दुर्गे !’  
रचयिता : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः 
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नमस्ते हे स्वस्तिप्रद-वरद-हस्ते ! सुहसिते ! 
महासिंहासीने !  दर-दुरित-संहारण-रते  ! 
सुमार्गे मां दुर्गे !  जननि ! तव भर्गान्वित-कृपा
दहन्ती दुश्चिन्तां  दिशतु विलसन्ती प्रतिदिशम् ॥ (१)
*
अनन्या गौरी त्वं  हिमगिरि-सुकन्या सुमहिता
पराम्बा हेरम्बाकलित-मुखबिम्बा मधुमती ।
स्वभावै-र्भव्या त्वं  मुनि-मनुज-सेव्या जनहिता
ममान्तः-सन्तापं  हृदयगत-पापं हर शिवे ! ॥ (२)
*
अपर्णा त्वं स्वर्णाधिक-मधुर-वर्णा सुनयना   
सुहास्या सल्लास्या  भुवन-समुपास्या सुलपना ।   
जगद्धात्री पात्री  प्रगति-शुभदात्री भगवती  
प्रदेहि त्वं हार्दं  परम-समुदारं प्रियकरम्  ॥ (३)
*
धरा दुष्टै-र्भ्रष्टैः  परधन-सुपुष्टैः कवलिता
दुराचार-द्वारा  खिल-खल-बलोद्‍वेग-दलिता ।
महाकाली त्वं वै  कलुष-कषणानां प्रशमनी
महेशानी हन्त्री  महिष-दनुजानां विजयिनी ॥ (४)
*
इदानीं मेदिन्या  हृदयमतिदीनं प्रतिदिनं
विपद्-ग्रस्तं त्रस्तं  निगदति समस्तं जनपदम् ।
महाशङ्कातङ्कै-र्व्यथित-पृथिवीयं प्रमथिता
नराणामार्त्तिं ते  हरतु  रणमूर्त्तिः शरणदा ॥ (५)
*
समग्रे  संसारे  प्रसरतु तवोग्रं गुरुतरं 
स्वरूपं संहर्त्तुं  दनुज-कुल-जातं कलिमलम् । 
पुनः सौम्या रम्या  निहित-ममता-स्नेह-सुतनु-
र्मनोव्योम्नि व्याप्ता  जनयतु जनानां हृदि मुदम् ॥ (६)
*
अनिन्द्या त्वं वन्द्या  जगदुरसि वृन्दारकगणैः
प्रशान्ते मे स्वान्ते  विकशतु नितान्तं तव कथा ।
दया-दृष्टि-र्देया  सकल-मनसां शोक-हरणी
सदुक्त्या मे भक्त्या  तव चरण-पद्मे प्रणतयः ॥ (७)
*
भवेद् गुर्वी चार्वी  चिरदिवसमुर्वी गतभया   
सदन्ना सम्पन्ना  सरस-सरणी ते करुणया ।
समुत्साहं हासं  प्रिय-दशहरा-पर्व-सहितं   
सपर्या ते पर्यावरण-कृतकार्या वितनुताम्  ॥ (८) 
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(Published as आवाहनी Slokas in
‘Bartika’  Famous Odia Literary Quarterly,
Dasahara Special Issue, October-December 2017,
Page-(iii), Dasarathapur, Jajpur, Odisha.)
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Related Links :
Stavarchana-Stavakam :
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Contributions of Dr. Harekrishna Meher to Sanskrit Literature:  
Link :
Translated Kavyas by : Dr.Harekrishna Meher :
Link :
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Monday, September 25, 2017

Complete Odia Version: ‘Meghaduta’ Kavya : मेघदूत काव्य : Dr. Harekrishna Meher

‘Meghaduta’
Original Sanskrit Kavya by : Poet Kalidasa
*
Complete Odia Metrical Translation by : 
Dr. Harekrishna Meher
*
Published in ‘Bartika’, Odia Literary Quarterly,
October-December 2017, Dashahara Puja Special Issue, 
Pages 690-728, Dasarathapur, Jajpur, Odisha.
*
(Translation done in 1973)
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* मेघदूत * 
मूल संस्कृत काव्य : महाकवि कालिदास
ओड़िआ पद्यानुवाद (म-आद्यानुप्रास): डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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Complete Meghaduta Odia Version : 
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Meghaduta : Part-1: Purva-Megha :
Link:
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Meghaduta : Part-2: Uttara-Megha :
Link :
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Complete Odia ‘Meghaduta’ on Web :
Link :
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Related Links :
Complete ‘Kosali Meghaduta’ :
(Honoured with ‘Dr. Nilamadhab Panigrahi Samman’
conferred by Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Odisha in 2010)
Link :
* * *
Translated Kavyas by : Dr.Harekrishna Meher :
Link :
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Complete Odia Version: Meghaduta: Uttara-Megha (2): Dr. Harekrishna Meher

‘Meghaduta’
Original Sanskrit Kavya by : Poet Kalidasa
*
Complete Odia Metrical Translation by :
Dr. Harekrishna Meher
*
Published in ‘Bartika’, Odia Literary Quarterly,
October-December 2017, Dashahara Puja Special Issue, 
Pages 690-728, 
Dasarathapur, Jajpur, Odisha.
*
(Translation done in 1973)
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Complete Meghaduta Odia Version :
Link :
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मेघदूत
मूल संस्कृत काव्य : महाकवि कालिदास
ओड़िआ पद्यानुवाद (म-आद्यानुप्रास): डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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मेघदूत : उत्तरमेघ 
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Meghaduta : Part-2: Uttara-Megha (2): 
Verses 104 - 121 Last
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(१०४)
  मन्दे चळाइ          तुमरि सलिळ-
बिन्दु-शीतळ पबन,
मत्तकाशिनी        प्रियाकु मोहर
जगाइब तुमे हे घन !
माळती-मुकुळ         केते सङ्गते
फुटि उठिबे,
मानबती मोर उठिब तेबे ୤
मटक न मारि  सुनयने,
मम प्रियतमा       चाहिँब सेकाळे
रहिथिब तुमे बातायने ।
मेघ ! आपणार         अपघने तुमे
चपळाकु रखि गुपते,
मन्द्र मधुर              गिर आरम्भ
करिब प्रियार पुरते ॥
*
(१०५)
‘मेघ बोलि मोते   सौभागिनि गो !
जाण निकर,
मुँ अटइँ प्रिय            मित्र तुमरि
स्वामीङ्कर ।
मङ्गळमय            बारता पठाइ
अछन्ति तुम कतिकि,
मर्मबचन              घेनि ताङ्कर
आसिअछि मुहिँ एथिकि ୤
मार्गचारी य़े           प्रबासी दुःखे
रहिथाआन्ति सुदूरे,
मानिनीङ्कर            बेणीबन्धन
मोचन इच्छि आतुरे ୤
मन्द्रमुखर            निनादे ताङ्कु
करिथाए मुहिँ त्वरान्वित,
मिळन अर्थे           प्रिया सङ्गते
सदनरे होइ उपस्थित ॥’ 
*
(१०६)
मेघ ! ए बचन शुणि तुमर,
मुहँ टेकि निज     व्याकुळ चित्ते
चाहिँब तुमकु
प्रिया मोहर ।
मिथिळानरेश-प्रिय-दुलणी,
मारुतिकि य़था     ऊर्द्ध्व-बदने
अनाइँथिले ता
बाक्य शुणि ।
मुग्धा प्रेयसी          तुमरे आदर
करिब,
मन देइ तुम            मुखुँ सन्देश
शुणिब ।
मित्र-आनीता     स्वामीर बार्त्ता
पत्नी लागि आपणा,
मिळन-जनित        सुखरु अटइ
अळ्‍प-मातर ऊणा ॥
*
(१०७)
मेघ हे आयुष्मान !
मङ्गि मोहरि     मिनतिभरा ए
कथारे बर्त्तमान ।
  मङ्गळ पर-       उपकार साधि  
एपरि,
मणिबा अर्थे         आपणाकु तुमे
कृतार्थ बोलि आहुरि ।
मोहरि प्रेयसी       पाशरे कहिब
ए गिर ।
‘मृदु अबळा गो !    तुमरि जीबन-
साथी एबे रामगिरिर,
मठे अछन्ति            पचारुछन्ति
तुमरि कुशळ सेनेही,
मृत नुहन्ति          जीबित से दूरे
रहिअछन्ति बिरही ୤’
मित्र घन हे !         बिपदे पतित
थाआन्ति य़ेउँ पराणीगण,
मर्मर कथा           ताङ्करि पाइँ
एहि त आद्य सम्भाषण ॥ 
*
(१०८)
 मन्द दइब              बइरीभाबरे
एकाळे तुमरि पतिङ्कर,
 मार्ग सकळ           अबरोध करि
अछि निकर ।
मळीमस दीन कळेबर,
महाबिषादरे          दूरे अछन्ति
प्रियबर ।
मरम-तापित            अश्रुपूरित
ताङ्क देही,
मुञ्चे उषुम             दीर्घ शुआस
दुःख बहि ।
मने कळ्‍पना          केते करन्ति
तहिँ बसि,
मिळन-सुख से        अनुभबन्ति
तुम सङ्गते प्रेमे रसि ।
मित्र पराये           परकाश करे
प्रिय-बिरहिणी तुमर,
 मृदु क्षीण तनु    लोतकोच्छ्‌वास  
आकुळ अतीब कातर ॥
*
(१०९)
मुकत-कण्ठे          सखीङ्क आगे
कथनीय मधुबाणी सरब,
मुख परशिबा          लोभे चञ्चळ
कहुथिले काने काने य़े तब ୤
मङ्गळरूप            तुम पतिङ्क
देखा नाहिँ,
मिठाकथा एबे        श्रबणरे आउ
शुभुनाहिँ ।
मुह्यमान से मानसे,
मुखरे मोहरि          पेषिछन्ति ए
सन्देश तुम सकाशे ॥
*
(११०)
‘मञ्जुळ तुम        अङ्ग-छबि मुँ
देखे सङ्गिनि !
प्रियङ्गु लता-गात्ररे,
मुख-दीप्तिकि       मृगाङ्क पाशे
चाहाँणी तुमरि
  चञ्चळ एणी-नेत्ररे ୤
मयूर-पुच्छ-       भारे रहिअछि
कान्ति तुमरि कुन्तळर,
मधुरिमा भूरु-      भङ्गीर दिशे
कृश तरङ्गे नदीङ्कर ୤
मात्र आहा ! ए केउँ बिधान,
मानिनि ! तुमरि   साम्य काहिँ बि
एकठाबे नुहे बिद्यमान ॥
*
(१११)
मानरुषाभरा   तुमरि छबिकि
आङ्कि पाषाणे
धातुरसरे,
मनाइबा आशे    तुम पादतळे
पड़िबा इच्छा
कले मनरे ।
मो नयन-य़ुग   आच्छादि रखे
बारबार बहु
 लोतक बहि,
मेळ तुम मोर       दारुण दैब
चित्रपटे बि
   न पारे सहि ॥
*
(११२)
मिळन तुमरि          कौणसिमते
स्वप्नरे लभि 
प्रिये ! अचिर,
मर्मे जागि मुँ       आलिङ्गिबाकु
शून्ये प्रसारि 
दिए मो कर ୤
मन्युभरा मो         ए दशा तहिँर
देबताबृन्द अनाइँ,
मुकुतातुल्य          पृथुळ लोतक  
झराइ ।
महीरुहङ्क उदित,
मृदु पल्लब-        राजिरे सजनि !
बरषिथान्ति अमित ॥ 
*
(११३)
मिहिकागिरिर     बायु देबदारु
तरुराजिर,
मृदुळ नबीन        पल्लब शिख
भेदि सधीर ।
महक प्रसारि ता रसझरे,
मन्दे बहइ  दक्षिणरे ।
मणइँ तुमरि       तनुकु परशि
पूरुबे,
मरुत आसिछि एठाबे ।
मुहिँ एथिलागि   आगो गुणबति !
प्रसारि कर,
महासुख पाए     ताकु आलिङ्गि
बारम्बार ॥
*
(११४)
मानिनि ! तुमरि      बिरहे दीर्घ-
प्रहरा सकळ राति,
मुहूर्त्त परि              कौणसिमते
य़ाआन्ता हेले बिति ।
मन्दे मन्दे               दिबस मध्य
देउथाआन्ता
ताप समस्त ऋतुरे,
मज्जि एभळि        कळ्‍पनाभाब-
राज्यरे निति आतुरे ।
मनोरथ केबे            पूर्ण्ण हेबार
नाहिँ त सम्भाबना,
मर्मभेदक                 तीब्र तपत
तुम बिरह-य़ातना ।
मन मोहर ए सकाशे,
मञ्जु-चपळ-        नेत्रि ! एकाळे
अनाथ लागुछि निराशे ॥
*
(११५)
मति कौणसि       मते आश्वासि
सम्भाळिछि मुँ
प्राण मोहर,
मङ्गळमयि !    सङ्गिनि ! तुमे
न होइब केबे
  अति कातर ୤
 मज्जि के अबा  रहे नियत सुखरे,
 मरे केबा झुरि  नियत दुःखभरे ?
 मर्त्त्ये प्राणीर        दशारे पतन
 उत्‌थान बेनि
 आसइ भ्रमि,
 माड़िय़ाए नीचे       चळइ उच्चे
क्रमे य़ेउँपरि
चक्रनेमि ॥
*
(११६)
मुहिँ अभिशापुँ राजाङ्कर,
मुक्त होइबि           अहि-शयनरु
उठिले श्रीहरि शार्ङ्गधर ।
मुदि आपणार बेनि नयन,
मास चारि बाकी      कौणसिमते
कर य़ापन ।
मिळन तापरे घटिब,
मानिनि गो ! आमे सरब
मनस्कामना     पूराइबा प्रीति-
दोळारे,
मर्मे य़ेतेक         भाबिछुँ बिरह
बेळारे ।
मज्जि शरद ऋतुर,
मधु चान्दिनी-       भरा सुन्दर
रजनीराजिरे निकर ॥
*
(११७)
मित्र आहुरि          कहिअछन्ति
‘प्रिये ! मो कण्ठ
भिड़ि उषते,
मज्जि निदरे           तुमे केबे थरे
चेइँल सहसा
कान्दि केते୤
मुरुकि भितरे             उत्तर देल
बहुबार पचारिला परे,
‘मातिछ अपरा      रामा सह परा
 निरेखिलि छळि ! स्वप्नरे ॥’ 
*
(११८)
मोहरि बिषये          अभिज्ञान त
देलि तुमपाशे एहिपरि,
मङ्गळे मुहिँ       रहिछि जाणिब
सुनीळ-नयना सुन्दरि !
मोठारे सजनि !    कदापि न य़िब
अपरते,
मिथ्यापबाद         न घेनिब केबे
हृदगते ୤
ममता सेनेह            प्रेमीजनङ्क
बिरहकाळरे लोके,
मरिय़ाए बोलि   काहिँकि केजाणि
कहिथाआन्ति थोके ।
मातर ए सत  नुहे बास्तबे,
   मत रहिअछि  भिन्न ए भबे ୤
मने य़े बस्तु बाञ्छित,
मिळन बिना से        सेनेह सर्ब
ताठारे हुअइ सञ्चित,
मिशि रस बहुगुणरे,
 मधुर प्रणय रूपरे ॥ 
*
(११९)
मोहरि आद्य         बिरहे असीम
दुःखमना,
मृदुळ-हृदया        सखीकि तुमरि
देइ समुचित आश्वासना ।
महीधर सेहि            कैळासुँ तुमे
फेरि आसिब हे मुदिर !
मृड़-बृष-खुर            घाते बिक्षत
होइअछि यार शिखर ।
मळिनता भजे           कुन्द येपरि
प्रभातरे,
मृतकळ्‍प मो         पराण रहिछि
सेरूपरे ।
मेघ ! तुमे एका       करिब ताहार
परित्राण,
मनोरमा पाशुँ        घेनि जणाइब
बार्त्ता समेत अभिज्ञान ॥
*
(१२०)
मित्रर एहि            कार्य्य़ साधने
तुमे तत्पर होइब कि ?
मोहरि प्रियार           प्रतिसन्देश
आणि मो आगरे कहिब कि ?
मणिबि नाहिँ मुँ     तुमे ए कार्य़्य 
कले य़ाइ,
महानता तुम       रहिब बोलि हे
मेघभाइ !
मागिले चातक तुमठारे,
मौन भाबरे         नीर दान करि
थाअ तारे ।
महत जनर         ए त अटे प्रति-
उत्तर,
मनस्कामना          पूर्ण्ण करिबा
य़ाचकर ॥
*
(१२१)
 मैत्रीबशे बा      बिरही बोलि बा
करुणा हेतु बा
मोहरि प्रति,
मने सुबिचारि     मुदिर ! ए प्रिय
कार्य़्य पूरण
 कर झटति ।
मागुणि रहिछि मोर एते,
मात्र तुमरि        आगे जणाइलि
अनुचिते ।
मनोबाञ्छित  देशे देशे य़ाइ
 मुदित हृदये  बिहर हे भाइ !
मधुर बर्षा            ऋतुर आगमे
बहिथाअ रूप
सौम्य चारु,
मुहूर्त्तक बि           नोहु बिच्छेद
तुम प्रियतमा
 शम्पाठारु ॥”
* * * * * 
(Uttara-Megha Ends)
* * * * *
 (उपसंहार) 
(१२२)
महाकबि काळिदास,
मनीषीगणरे          चिर-बरणीय
कबिता बहिछि सुबिळास ।
महनीय प्रिय         लेखनी ताङ्क
निखिळ भुबने अद्‌भुत,
मधुमय गिरे            शृङ्गार रसे
रचिले काव्य मेघदूत ।
मेघ-मुखे य़ुबा          बिरही  य़क्ष
प्रिया पाशे बहुदूररु,
मार्मिक भाब-           भरा सन्देश
पेषिथिला रामगिरिरु ।
मानबधर्मा         जाणिपारि सेहि
प्रेमीय़ुगळर प्रेमकथा,
मुक्त करिले            शापरु ताङ्क
 य़क्षय़ुबाकु सर्बथा ।
मोहिब ए गीति    कामीजन-मति
प्रकाशि आहुरि सांसारिक,
मानब-जीबने           अनुभबनीय
अनेक तत्त्व बास्तबिक ।
मानबिकतार         चिन्तन-धारा
बिबिध धरम-शास्त्रगत,
मधुर सरस           बाणी माध्यमे
होइछि काव्ये सुव्यकत ।
मेहेर श्रीहरे-           कृष्ण रचिले
ओड़िआ पद्य अनुबाद,
मज्जाउ मन           काव्य-रसिक-
जनरे बितरि आह्लाद ॥
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Meghaduta Kavya
Odia Version by Dr. Harekrishna Meher  
Complete Here
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Meghaduta : Part-1: Purva-Megha :

Related Links :
Complete ‘Kosali Meghaduta’ :
(Honoured with ‘Dr. Nilamadhab Panigrahi Samman’
conferred by Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Odisha in 2010)
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Translated Kavyas by : Dr.Harekrishna Meher :
Link :
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