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Monday, February 14, 2011

भारतीय भाषाओं की सम्पर्क-लिपि देवनागरी (Devanagari Script): Dr. Harekrishna Meher

Bharatiya Bhashaon Ki Sampark Lipi Devanagari
Hindi Article By : Dr. Harekrishna Meher
(Devanagari : The Link-Script of Indian Languages)   
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भारतीय भाषाओं की सम्पर्क-लिपि देवनागरी   
* डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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हमारा भारतवर्ष ऐसा एक विशाल देश है, जिसमें कई प्रकार की विभिन्नता दृष्टिगोचर होती है । आचार-व्यवहार, वेशभूषा एवं भाषा की विवेचना जब की जाती है, तब पता चलता है कि विभिन्न प्रान्तों के अनुसार लोग विभिन्न प्रकार की भाषायें बोलते हैं और अपने जीवनयापन की व्यवस्था में एक स्वतन्त्र मर्यादा रखते हैं । ऐसे देखा जाये तो हर प्रान्त में अलग अलग भाषा के प्रयोग होने पर भी लोगों की चिन्तन-धारा में भारतीयता दृढ़ रूप से व्यवस्थित है । भारत में कई रुचियों और भाषाओं की विभिन्नता होने पर भी भारतीय यानी राष्ट्रीय एकता सभी भारतीयों के मन में बसी है, जो सभी भारतवासियों को एक ही सूत्र में बाँधती है ।

भारतीय संविधान में कई भारतीय भाषाओं को मान्यता प्रदान की गई है आधुनिक भारतीय भाषा के रूप में । इसके अलावा कई भाषायें प्रचलित हैं, जो मानक भाषा के रूप में अबतक स्वीकृतिप्राप्त नहीं हैं । मानक भाषाओं के प्रचार-प्रसार साहित्यिक दिशा से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं । भारत में आर्य-परिवार एवं द्राविड़-परिवार की भाषायें प्रचलित हैं भाषाविज्ञान के दृष्टिकोण से । उत्तर भारत में विशेषतः आर्य-परिवार की भाषायें जैसे हिन्दी, ओड़िआ, बंगाली, असमिया, पञ्जाबी, गुजराटी, मराठी इत्यादि । दक्षिण भारत में प्रचलित भाषायें द्राविड़ परिवार के अन्तर्गत हैं, जैसे तेलगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम इत्यादि । अधिकांश भारतीय भाषाओं का मूल आधार संस्कृत है । इसलिये संस्कृत ‘भाषा-जननी’ के नाम से सुपरिचित है ।

भाषा मुख से बोली जाती है । परन्तु लिखनेके लिये अर्थात्‌ भाषा में व्यक्त किये गये भाव को साकार रूप देने के लिये भाषा की ‘लिपि’ आवश्यक होती है । मुख से उच्चारित वर्ण-ध्वनियों को एक स्पष्ट रूप देने के लिये उस वर्ण-ध्वनि के द्योतक एक स्वतन्त्र वर्ण की आवश्यकता रहती है । वास्तव में देखा गया है कि कुछ भाषाओं की अपनी भाषानुगत स्वतन्त्र लिपि है और कुछ भाषाओं की अपनी स्वतन्त्र लिपि नहीं है । उदाहरण-स्वरूप, संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है, परन्तु इसकी कोई संस्कृत लिपि नहीं है । इसकी लिपि है ‘देवनागरी’ । हिन्दी भाषा की कोई हिन्दी लिपि नहीं है । देवनागरी लिपि को ही हिन्दीभाषा की लिपि के रूप में अपनाया गया है । ओड़िआ, बंगाली, असमिया, गुजराटी, मराठी, पञ्जाबी आदि भाषाओं की अपनी अपनी स्वतन्त्र लिपियाँ हैं एवं देवनागरी लिपि के आधार पर वर्ण निर्धारित किये गये हैं । दक्षिण भारत की तेलगु, कन्नड़, मलयालम प्रभृति भाषाओं की अपनी अपनी स्वतन्त्र लिपियाँ हैं । जिस भाषा की एक स्वतन्त्र लिपि होती है, उसकी एक स्वतन्त्र पहचान होती है । परन्तु ऐसी स्थिति सर्वत्र नहीं है ।

भारत में कई जातियों, वर्णो, धर्मों, भाषा-भाषियों के लोग रहते हैं । अपने हृदय के भावों को प्रकट करनेवाली भाषा की लिपि भी अनेक प्रकार है । फिर भी भारत में एक ऐसी प्राचीन लिपि अबके आधुनिक युग में नित्य-नूतन लिपि के रूप में स्वीकृत है, वह है ‘देवनागरी’ लिपि । भारतवासियों को एक सूत्र में जोड़ने के लिये जैसे ‘भारतीयता’ एक अद्वितीय साधन है, वैसे सभी भारतीय भाषाओं के एक सूत्र में सम्पर्क स्थापन हेतु देवनागरी लिपि एकमात्र उपयोगी साधन है आजके भारतवर्ष में ।

भाषा की उत्पत्ति की तरह लिपि की उत्पत्ति के बारे में पर्याप्त मतभेद पाया जाता है । भावों को पूर्णतया अभिव्यक्त करनेके लिये भाषा सम्पूर्ण समर्थ नहीं रहती । उसी प्रकार लिपि भी सर्वत्र उच्चारित भाषा को पूर्णतया अभिव्यक्त नहीं कर पाती । जैसे काकु आदि के द्वारा उच्चारित ध्वनि-विशेषताओं को लिपि पूर्णतया प्रकाशित नहीं कर सकती । शब्द और अर्थ का सम्बन्ध सर्वत्र यौगिक न होकर रूढ़ होता है । उसी प्रकार ध्वनि या वर्ण (लिपि-संकेत) का सम्बन्ध भी रूढ़ होता है । एक ही ध्वनि के लिये विभिन्न लिपियों में अलग अलग संकेतों या लिपि-चिह्नों का प्रयोग होता है । उदाहरण-स्वरूप, देवनागरी लिपि के ‘क्‌’ व्यञ्जन वर्ण के लिये रोमन लिपि में ‘k’, ‘c’, ‘q’ आदि का प्रयोग देखा जाता है ।

लिपि का प्राचीनतम स्वरूप चित्रलिपि माना जाता है । चित्रलिपि में प्रत्येक स्थूल वस्तु के लिये उस वस्तु-जैसा चित्र बनाने के कारण उसमें अनगिन संकेतों की आवश्यकता रहती थी । लिपि-संकेतों की पृथक्‌ता, अधिक स्थान एवं समय की आवश्यकता रहती थी । परन्तु प्रेम, उत्साह, दुःख, आनन्द आदि सूक्ष्म भावों को व्यक्त करने में चित्रलिपि असमर्थ थी । चित्रलिपि के दोषों का निराकरण करने के लिये बाद में ऐसी एक लिपि का प्रयोग हुआ, जिसमें कुछ निश्‍चित चिह्नों द्वारा, जैसे कुछ बिन्दुओं या रेखाओं द्वारा निश्‍चित भावों को व्यक्त किया जा सके । मनुष्य ने उसी दिशा में आगे चलकर ध्वनि-लिपियों का व्यवहार किया, जो आज भी प्रचलित होती हैं । भाषा में व्यवहृत ध्वनियों के लिये ध्वनि-चिह्नों या वर्णो का प्रयोग किया जाता है और उन वर्णों द्वारा भावों को व्यक्त किया जाता है । देवनागरी, रोमन, अरबी आदि लिपियाँ ध्वनि-लिपि के अन्तर्गत हैं ।

भारत की प्राचीन लिपियाँ दो हैं , ब्राह्मी और खरोष्ठी । भाषाविज्ञानियों का मत है कि ब्राह्मी लिपि मूलरूप से भारतीय है । इस लिपि का अस्तित्व ख्रीष्टपूर्व ५०० से ख्रीष्टाब्द ३५० तक माना जाता है । उत्तरी शैली और दक्षिणी शैली के रूप में इस लिपि का द्विविध विकास हुआ था । विद्वानों का मत है कि ब्राह्मी लिपि से ही आधुनिक देवनागरी लिपि की उत्पत्ति हुई है । ब्राह्मी की उत्तरी शैली की अन्तर्गत गुप्त-लिपि और कुटिल-लिपि क्रमशः देवनागरी लिपि के रूप में विकसित हो गई हैं । इसका प्रयोग भारत में प्राय दशवीं शताब्दी से स्वीकृत है । प्रारम्भ में इसके वर्णों पर शिरोरेखा नहीं लगती थी । प्राचीन नागरी लिपि को सम्मान देने के लिये बाद में इसका नाम ‘देवनागरी’ दिया गया है ।

‘नागरी’ नाम के बारे में भी कुछ मतभेद हैं । नगर में प्रयुक्त होनेके कारण ‘नागरी’ लिपि का नामकरण कुछ मानते हैं । कुछ विद्वानों का मत है कि नागर ब्राह्मणों में प्रचलित होनेके कारण लिपि का नाम नागरी हुआ है । और कुछ विद्वानों का मत है कि तान्त्रिक यन्त्र देवनगर की आकृति से इस लिपि के वर्णों का साम्य होनेके कारण देवनागरी नाम हुआ है । ‘नागरी’ या ‘देवनागरी’ जो भी हो, आजकल की वैज्ञानिक भाषा-पद्धति में इस लिपि की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है ।

देवनागरी लिपि में लिपिगत उत्कृष्टता सभी प्रकार से विद्यमान है । किसी भी उपादेय और उत्कृष्ट लिपि में ध्वनि और वर्ण में सामञ्जस्य होना चाहिये । भाषा की ध्वनियों में और उन्हें अभिव्यक्त करनेवाले लिपि-चिह्नों में जितनी अधिक समानता होती है, वही लिपि उतनी ही अधिक उत्कृष्ट मानी जाती है । देवनागरी में यह विशेषता पूर्णतया उपलब्ध है । उच्चारण के अनुरूप ही वर्ण-निर्धारण किया जाता है । जो बोला जाता है, वह लिखा जाता है, और जो लिखा जाता है, वह बोला जाता है । देवनागरी की यही एक विशिष्ट पहचान है । दूसरा महत्त्वपूर्ण लक्षण है एक ध्वनि के लिये एक ही संकेत । एक ध्वनि के लिये अनेक संकेत या अनेक ध्वनियों के लिये एक ही संकेत लिपि का बड़ा दोष माना जाता है । रोमन्‌ आदि लिपि में ऐसा दोष दृष्टिगोचर होता है । जैसे रोमन्‌ लिपि में एक ही ‘क्‌’ ध्वनि उच्चारण करने के लिये एकाधिक संकेत हैं । उदाहरण–स्वरूप k (king), c (call), ck (cuckoo), ch (chemical), q (quick) इत्यादि । एक संकेत ‘u’ कहीं ‘अ’ रूप में उच्चारित होता है, जैसे ‘but’ (बट्‌), ‘cut’ (कट्‌), और कहीं कहीं ‘उ’ रूप में, जैसे ‘put’ (पुट्‌) । फिर एक संकेत ‘o’ कहिं ‘अ’ रूप में (pot, पट्‌) तो कहीं ‘उ’ के रूप में (to, टु), कहीं ‘ओ’ रूप में (note, नोट्‌) उच्चारित होता है । ऐसे अन्य अनेक उदाहरण मिल सकते हैं । परन्तु देवनागरी लिपि में यह दोष बिलकुल नहीं ।

उत्कृष्ट लिपि का और एक विशेष गुण है लिपि-संकेतों द्वारा समस्त ध्वनियों की अभिव्यक्ति । देवनागरी में यह सम्पूर्ण विद्यमान है । लिपि का और एक गुण है असन्दिग्‌धता । एक ध्वनि-संकेत में अन्य किसी ध्वनि का सन्देह नहीं होना चाहिये । अन्य लिपियों की अपेक्षा देवनागरी में ये उत्कृष्टतायें सर्वाधिक उपलब्ध होती हैं । इसमें कोई भ्रान्ति या संशय का अवकाश नहीं होता । इसप्रकार अनुशीलन से यह निष्कर्ष निकलता है कि देवनागरी वास्तव में एक उत्कृष्ट लिपि है । व्यावहारिक एवं भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह सर्वथा युगोपयोगी रूप में स्वीकृत है ।

भाषा एक प्रवहमान धारा है । समयानुसार नदी-जल की तरह इसमें परिवर्त्तन होता रहता है । लिपियों में भी आवश्यकतानुसार परिवर्त्तन होता है । परन्तु देवनागरी ऐसी एक भव्य सुन्दर और उत्तम लिपि है जो समस्त भारतीय भाषाओं के सम्पर्क-सूत्र के रूप में प्रयुक्त हो सकती है । उत्तरभारत में हिन्दी का विशेष प्रचलन है, लेकिन दक्षिण भारत में हिन्दी को ग्रहण करने के लिये सर्वसम्मति प्राय नहीं है, चूँकि दक्षिण में प्रचलित तमिल, कन्नड़ आदि द्रविड़ भाषाओं की स्वतन्त्र लिपियाँ तथा प्रयोग हैं ।

आज की परिस्थिति में भाषा-जननी संस्कृत जैसे सभी भाषाओं को जोड़नेवाला एक सम्पर्क-सूत्र रूप में उपयोगी है, उसी प्रकार देवनागरी लिपि सभी भारतीय भाषा-लिपियों को जोड़नेवाला सम्पर्क-सूत्र के रूप में अत्यन्त उपादेय है । आर्य परिवार एवं द्रविड़ परिवार की अन्तर्गत सभी भाषाओं की लिपियों की अभिव्यक्ति एक महाभारतीय लिपि देवनागरी में प्रस्तुत की जा सकती है । आजकल आन्तर्जातिक स्तर पर रोमन्‌ लिपि के साथ सम्पर्क स्थापन करनेमें देवनागरी लिपि का ही ग्रहण किया जा रहा है । इससे किसी भी भाषा-भाषी को भ्रम या सन्देह का अवसर नहीं रहता । देवनागरी में लिखनेसे भारतीय स्तर पर एक स्वतन्त्र पहचान होती है, जो सभी भाषा-भाषियों के लिये सरल है और प्रान्तीय स्तर पर अपनी ही लिपि रहनेसे व्यवहार में सौकर्य होता है । इसप्रकार देवनागरी लिपि भारतीय स्तर पर सभी भाषाओं की लिपियों का सर्वोत्कृष्ट सम्पर्क सूत्र बनकर अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है । आधुनिक वैज्ञानिक युग में अन्तर्जाल पर देवनागरी लिपि का व्यापक प्रयोग उसकी विशेषता का एवं सार्थकताका सुपरिचायक है । इण्टर्नेट्‌ के अतिरिक्त कम्प्युटर और मोबाइल्‌ फोन्‌ आदि में भी देवनागरी लिपि की स्थिति एवं प्रयोग इस लिपि के महत्त्व को बढ़ानेमें बहुत सहायक सिद्ध हैं ।
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Courtesy : Published in 
Srijangatha (Hindi E-Magazine) Feb. 2011 Issue

Saturday, October 30, 2010

Utkal-Gaurav Madhusudan Das: Dr.Harekrishna Meher

Utkal-Gaurav Madhusudan Das : Ek Swaabhimaani Vyaktitva
Hindi Article By : Dr. Harekrishna Meher
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उत्कल-गौरव मधुसूदन दास : एक स्वाभिमानी व्यक्तित्व
* डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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भारतवर्ष में ओड़िआ-भाषा-आन्दोलन की भित्ति पर स्वतन्त्र ओड़िशा राज्य का गठन हुआ १ अप्रैल १९३६ को । अंग्रेज शासन में पराधीन अञ्चलों में ओड़िआ भाषा का अस्तित्व जब संकट में था, उसी समय कुछ महानुभाव व्यक्तियों के निःस्वार्थ उद्यमों से ओड़िशा राज्य को स्वतन्त्र रूप से अपना कलेवर प्राप्त हुआ । अंग्रेज-शासन में बंगाल, बिहार, केन्द्र प्रदेश और मद्रास के भीतर खण्ड-विखण्डित होकर ओड़िशा विपर्यस्त अवस्था में थी । ओड़िआ-भाषी लोगों को एकत्र करके एक स्वतन्त्र प्रदेश निर्माण के लिये अनेक चिन्तक, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक एवं देशभक्त व्यक्तियों ने बहुत प्रयत्‍न किये । उन नमस्य महान् व्यक्तियों में उत्कल-गौरव मधुसूदन दास अन्यतम हैं । वे ‘मधुबाबु’ नाम से सर्वत्र लोकादृत हैं । 

पूर्व भारत के अधिवासियों की राजनयिक, सामाजिक , आर्थनीतिक एवं सांस्कृतिक प्रगति हेतु मधुबाबु सदैव तत्पर रहे । विशेष रूप से ओड़िशा-गगन में पूर्व क्षितिज पर नवोदित सूर्य समान मधुबाबु ने ओड़िआ लोगों के मन से नैराश्य- अन्धकार को दूर करके नूतन आशा और उत्साह का सञ्चार किया । उनके नेतृत्व में ओड़िआ भाषा एवं ओड़िशा प्रदेश दोनों की प्राण-प्रतिष्ठा हुई । उस समय कुछ चक्रान्तकारी बंगाली लोग कहते थे –‘उड़िया एक स्वन्त्र भाषा नय; उड़िया बांग्लार एक उपभाषा ।‘ परन्तु ओड़िशा के विशिष्ट लोगों की सफल प्रचेष्टा से ओड़िआ एक स्वतन्त्र भाषा के रूप में मान्यता-प्राप्त हुई । फलस्वरूप भारत में भाषा-भित्तिक सर्वप्रथम प्रदेश बनकर ओड़िशा उभर आयी । 

ओड़िआ भाषा की सुरक्षा एवं स्वतन्त्र ओड़िशा प्रदेश गठन हेतु मधुबाबु ने उत्कल-सम्मिलनी की प्रतिष्ठा की । इसमें खल्लिकोट-राजा हरिहर मर्दराज, पारला-महाराज कृष्णचन्द्र गजपति, कर्मवीर गौरीशंकर राय, कविवर राधानाथ राय, भक्तकवि मधुसूदन राव, पल्लीकवि नन्दकिशोर बल, स्वभावकवि गंगाधर मेहेर और कई विशिष्ट व्यक्तिगणों का सक्रिय योगदान सतत स्मरणीय रहेगा । मधुबाबु ने उत्कल सम्मिलनी में योगदान के लिये अपनी कविता में लोगों का आह्वान किया था :- 

‘एहि सम्मिळनी जाति-प्राण-सिन्धु कोटि प्राण -बिन्दु धरे,
तोर प्राण-बिन्दु मिशाइ दे भाइ डेइँ पड़ि सिन्धु-नीरे ॥'
‘तात्पर्य है : यह उत्कल सम्मिलनी है जाति-प्राण का सिन्धु, जो कोटि प्राण-बिन्दुओं को धारण करती है । उस सिन्धु-जल में कुद कर, अरे भाई ! तेरा प्राण-बिन्दु को मिला ले । अपनी मातृभूमि-प्रीति अनल्प है मधुबाबु की । स्वार्थ त्याग कर मातृभूमि की सेवा में अपनेको नियोजित करने उनकी उत्साहमयी कविता थी :- 

‘जाति-नन्दिघोष चळिब कि भाइ स्वार्थकु सारथि कले,
टाणे कि रे गाड़ि दानार तोबड़ा घोड़ा- मुहेँ बन्धा थिले ॥‘
तात्पर्य है - जाति-रूप नन्दिघोष रथ कैसे चलेगा भाई, अगर स्वार्थ को सारथि बना दिया जाये ? घोड़े के मुहँ पर दाना की भरी थैली यदि बन्धी है, तो घोड़ा गाड़ी खींचता है क्या ? 

१९०३ में मधुबाबु द्वारा प्रतिष्ठित उत्कल सम्मिलनी से ओड़िआ-आन्दोलन आगे बढ़ा । उसी वर्ष वे कांग्रेस छोड़कर ओड़िआ-आन्दोलन में स्वयंको नियोजित किया । उसी समय श्रेय जाता है अंग्रेज शासक सर स्टाफोर्ड नर्थ को जिन्होंने ओड़िशा और असम को बंगाल से पृथक् करने हेतु १८६८ में सरकार को प्रस्ताव दिया । इस विषय से मधुबाबु को बहुत प्रेरणा मिली और ओड़िआ-आन्दोलन का सूत्रपात हुआ । उन्नीसवीं सदी के अन्तिम भाग में तत्कालीन आयुक्त मि. कूक के प्रस्ताव से सम्बलपुर और गञ्जाम ओड़िशा-खण्ड में सम्मिश्रित हुए । ओड़िआ-भाषी अंचलों को एकत्र करके उत्कल सभाका आयोजन किया गया । मयूरभञ्ज महाराज सभापति बने और मधुबाबु सम्पादक । उत्कल सभा की ओर से मधुबाबु सितम्बर १८९७ को लन्दन गये । अंग्रेज सरकार के आगे दावा किया कि ओड़िआ-भाषी सारे अंचल एक शासन के अधीन रहें । ओड़िआ लोगों की दुर्दशा दूर करने फिर अंग्रेजों के समर्थन पाने १९०७ में इंग्लण्ड यात्रा की । बाद में बिहार-ओड़िशा प्रदेश १ अप्रैल १९१२ को गठित हुआ । मधुबाबु बिहार-ओड़िशा बिधान परिषद के एक मन्त्री बने जनवरी १९२१ को और ओड़िशा के निर्विवादीय नेता के रूप में उनको बहुत प्रतिष्ठा मिली । 

मधुबाबु स्वाभिमान एवं आत्ममर्यादा को विशेष प्राधान्य देते थे । धन-सम्पत्ति भले ही नष्ट हो जाये, परवाय नहीं, परन्तु आत्म-सम्मान सदा अक्षुण्ण बना रहे । उनका कहना था :
'आलो सखि ! आपणा महत आपे रखि ।'
इसका अर्थ है - अरी सखी ! अपने सम्मान की रक्षा स्वयं ही करनी चाहिये । एक सच्चे राष्ट्रीयतावादी नेता के रूप में मधुबाबु ने बहुत आदर एवं सम्मान प्राप्त किये । 

कटक जिल्ला के सत्यभामापुर गाँव में मधुबाबु का जन्म हुआ था २८ अप्रैल १८४८ में । उनके पूज्य पिता थे चौधरी रघुनाथ दास और माता पार्वती देवी । प्राय ८६ वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ ४ फरवरी १९३४ को । विधि का विधान कौन भला टाल सकता ? बहुत दुःख की बात है कि ओड़िआ माटी के ये सुपुत्र मधुबाबु १९३६ में गठित स्वतन्त्र ओड़िशा प्रदेश को अपना चाक्षुष करने नहीं रहे । मधुबाबु प्रथम ओड़िआ हैं कलकत्ता से एम्.ए. डिग्री और बी.एल्. (बार् एट् ल’) प्राप्त करने । वे विधान परिषद के सदस्य होने में भी प्रथम ओड़िआ हैं । वे अपनी वकालत (बैरिष्टरी) के कारण ओड़िशा में “मधु बारिष्टर” के नाम से सुपरिचित हैं । इस विषय पर ओड़िआ में एक लोकोक्ति प्रचलित है :
“पाठ पढ़िबि, काळिआ घोड़ारे चढ़िबि,
मधु बारिष्टर संगे लढ़िबि ॥“
(तात्पर्य है - पाठ पढ़ूँगा, काले घोड़े पर चढ़ूँगा , मधु बारिष्टर के साथ लड़ूँगा ।) 

अपनी देशभक्ति, सच्चे नीति-संपन्न नेतृत्व एवं स्वाभिमानी मर्यादा-सम्पन्न गुणों के कारण बारिष्टर श्री मधुसूदन दास सदैव स्मरणीय हैं । कटक–स्थित मधुसूदन आइन् महाविद्यालय उनके नाम से नामित हुआ है । उनकी जन्मतिथि २८ अप्रैल को समग्र ओड़िशा राज्य में ‘वकील दिवस’ एवं 'स्वाभिमान दिवस' के रूप में पालन की जाती है । वे महान् व्यक्तित्व सभीके नमस्य हैं ।
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Ref : Hindi E-Magazine Srijangatha: Article of Harekrishna Meher :  

Friday, September 17, 2010

समन्वय के देवता श्रीजगन्नाथ (Sri-Jagannath): Dr. Harekrishna Meher

Samanvaya Ke Devata Sri-Jagannath
Hindi Article By: Dr. Harekrishna Meher
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समन्वय के देवता श्रीजगन्नाथ
* डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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'शुभं सुभद्रा-बलभद्र-सङ्गतं
नमामि नाथं जगतां वरेण्यम् ।
ओंकार-रूपं भुवि दारु-दैवतं
वेदान्त-वेद्यं महतां शरण्यम् ॥'


श्रीजगन्नाथ ओड़िशा के परम आराध्य देवता के रूप में सर्वत्र संपूजित हैं । 'पुरुषोत्तम' - नाम से उनकी विशेष प्रसिद्धि रही है । उनका पुण्य पुरी धाम 'पुरुषोत्तम क्षेत्र' नाम से सुपरिचित है । वे हैं आर्त्तत्राण, दीनबन्धु, दयासिन्धु, पतित-पावन, मान-उद्धारण, शरण-रक्षण, भावग्राही, प्रेम-भक्ति-प्रीत महामहिम देवेश्वर । दारुब्रह्म के रूप में वे नीलकन्दर में विराजित हैं । स्कन्द पुराण, ब्रह्म पुराण, नीलाद्रि-महोदय, पुरुषोत्तम-माहात्म्य आदि ग्रन्थों में पुरुषोत्तम क्षेत्र और जगन्नाथ महाप्रभु की महिमा विशेषरूप से प्रतिपादित है । राजा इन्द्रद्युम्न द्वारा प्रतिष्ठित शाबर देवता श्रीजगन्नाथ की कीर्त्ति अनन्त है । पहले से ही शाबर संस्कृति में विश्वावसु द्वारा समाराधित नीलमाधव महाप्रभु परवर्त्ती काल में विश्‍वजनीन देवता श्रीजगन्नाथ के रूप में पूजित हो रहे हैं । वे हैं पूर्ण परंब्रह्म सच्चिदानन्द परम-पुरुष । श्रीजगन्नाथ का दारुविग्रह नाना धार्मिक सम्प्रदायों की एकता प्रतिष्ठा करने की दिशा में मुख्य भूमिका निभाता रहा है । ऋग्‌‍वेद के दशम मण्डल में वर्णित है :
'अदो यद्‍ दारु प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम् । 
तदारभस्व दुर्हणो तेन गच्छ परस्तरं‍म् ॥' ( १२/१५५/३) 
इसका तात्पर्य है : 'ये जो दिव्य अपुरुष दारु (काष्ठ) समुद्र-तट जल में वहता जा रहा है, उसीके आश्रय से तुम परम गति लाभ करो ।' इस ऋग्‍वेदीय मन्त्र में दारुब्रह्म का उल्लेख रहा है । पावन क्षेत्रराज पुरी में विष्णु दारुब्रह्म मूर्त्ति रूप में विराजमान हैं । उनके कमनीय रूप का दर्शन करके प्राणी सारे पापों से मुक्ति प्राप्त होता है, ऐसा धार्मिक विश्वास रहा है । 

परमेश्‍वर महाप्रभु के कुछ अंगों की अपूर्णता के बारे में उपनिषद्‍ का वाक्य स्मरणीय है :
‘अपाणि-पादो जवनो ग्रहीता
पश्यतुअचक्षुः स शृणोत्यकर्णः ।
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति बेत्ता
तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥' (श्‍वेताश्‍वतर उपनिषद्‍ ३/१९) 
तात्पर्य यह है कि उन महनीय श्रेष्ठ परमपुरुष के हाथ नहीं हैं, फिर वे भी सभीको धारण करते हैं । उनके पैर नहीं, फिर भी वे चलते हैं । उनके नेत्र नहीं, फिर भी देखते हैं । उनके कान नहीं, फिर भी सुनते हैं । वे सर्वज्ञ हैं, परन्तु उनको जाननेके लिये किसीका सामर्थ्य नहीं ।

निगम-वाक्य के आधार पर भक्तकवि गोस्वामी तुलसीदास ने राम-ब्रह्म के बारे में लिखा है :
'बिनु पद चल‍इ सुन‍इ बिनु काना,
बिनु कर कर‍इ करम विधि नाना ।
आनन-रहित सकल रस-भोगी,
बिनु वानी बकता बड़ जोगी ।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा,
ग्रह‍इ घ्रान बिनु बास असेखा ।
असि सब भाँति अलौकिक करनी,
महिमा जासु जाइ नहीं बरनी ॥' (श्रीरामचरित-मानस, बालकाण्ड, ११७/३-४)

वही परंब्रह्म पैरहीन होकर भी चलते हैं, कान बिना भी सुनते हैं, हाथ बिना भी नाना कार्य करते हैं, मुख या जिह्वा बिना भी सभी रसों का आस्वादन करते हैं, वाणी बिना भी कहते हैं, शरीर बिना भी स्पर्श करते हैं, नेत्र बिना भी देखते हैं, नासिका बिना भी सारा गन्ध आघ्राण करते हैं । ऐसे परंब्रह्म की लीला अलौलिक है और महिमा अवर्णनीय । वे इन्दिय-रहित एवं इन्द्रियातीत परम आत्मतत्त्व हैं । वे साकार हैं और निराकार भी । भक्तकवि तुलसीदास ने श्रीराम-रूपी हरि का माहात्म्य बयान करके कहा है :
'वन्देऽहं तमशेष-कारणपरं रामाख्यमीशं हरिम् ।' करुणा-निधान वही पुरुषोत्तम सचराचर विश्व में लीलामय, बहुरूपधारी एवं सर्वव्यापी हैं । भावग्राही श्रीजगन्नाथ महाप्रभु को अपने इष्टदेव श्रीरामचन्द्र के रूप में दर्शन करके भक्तवर तुलसीदास का हृदय भक्ति-पुलकित हो उठा था । उनके मुख से भावभरी वाणी उच्चरित हुई थी : "जो ही राम सो ही जगदीशा ।" जो भक्त जिस रूप में भगवान् की उपासना करता है, वह उसी रूप से भगवान् को दर्शन करता है । वास्तव में सच ही है :  
'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु-मूरति देखि तिन तैसी ।'

संसार में रहकर मानव अपनी रुचि के अनुसार धार्मिक और सामाजिक आस्था पोषण करता है । प्रभु श्रीजगन्नाथ सर्वधर्म-समन्वय के रूप में प्रतिपादित हैं । अपाणि-पादादि-स्वरूप वर्णित परम ब्रह्म के प्रतीक हैं वे । भक्तों के भगवान् हैं वे विचित्रकर्मा एवं अद्‍भुत-विग्रहधारी । विभिन्न धर्म-सम्प्रदायों के उपासकगण दुःखहारी उन हरि को भिन्न भिन्न रूप में दर्शन करते हैं । इस विषय पर एक लोकप्रिय श्‍लोक है : 
‘यं शैवाः समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वेदान्तिनो
बौद्धा बुद्ध इति प्रमाण-पटवः कर्त्तेति नैयायिकाः ।
अर्हन्नित्यथ जैन-शासन-रताः कर्मेति मीमांसकाः
सोऽयं वो विदधातु वाञ्छित-फलं त्रैलोक्य-नाथो हरिः ॥' 

उक्त प्रचलित श्‍लोक में विभिन्न भारतीय दर्शनों का मूल आत्म-तत्त्व सूचित हुआ है । 'एकं सद्‍ विप्रा बहुधा वदन्ति' - इस वेद-वाणी की सार्थकता सर्वत्र परिलक्षित होती है । शैवलोग उन परमेश्वर त्रिलोकपति को शिव के रूप में आराधना करते हैं, वेदान्तीगण ब्रह्म के रूप में, बौद्धलोग बुद्ध के रूप में, नैयायिकगण कर्त्ता के रूप में, जैनगण ‘अर्हत्' के रूप में एवं मीमांसक लोग कर्म के रूप में उपासना करते हैं । जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा – इन त्रिमूर्त्ति को भारतीय परम्परा में सत्त्व-रज-तम त्रिगुण का प्रतीक कहा जाता है । बौद्धधर्म और जैनधर्म का 'त्रिरत्‍न' (सम्यक्‌ ‍ ज्ञान, सम्यक् दर्शन एवं सम्यक् चारित्र) भी इस त्रिमूर्त्ति में सन्निहित है । भक्तप्रवर चैतन्य प्रमुख वैष्णवगण श्रीजगन्नाथ को कृष्ण-रूप मानते हैं । श्रीजगन्नाथ के वैष्णवीय लक्षणो का निदर्शन वर्णित है ‘जगन्नाथाष्टकम्' में । यनुना-तटपर वनविहार करने वाले संगीतमय-वंशीवदन गोपिका-वल्लभ और ब्रह्मादि-देवगण द्वारा पूज्यपाद कृष्णरूपी श्रीजगन्नाथ मेरे नेत्र-पथ में आकर दर्शन दें, भक्त यही कामना करता है । इस पद्य में :
'कदाचित्‌ कालिन्दी-तट-विपिन-सङ्गीतक-वरो
मुदाभीरी-नारी-वदन-कमलास्वाद-मधुपः ।
रमा-शम्भु-ब्रह्मामरपति-गणेशार्चित-पदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥' (श्‍लोक- १) 
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वाम हस्त में वंशी धारण करते हुए, मस्तक में मयूर-पुच्छ सजाते हुए, सुन्दर वस्त्र-शोभित, नेत्रकोण में साथी की भ्रूभंगी दरशाते करते हुए वृन्दावन-विहारी लीलामय भगवान् कृष्ण-स्वरूप श्रीजगन्नाथ हैं । उनके दर्शनाभिलाषी भक्त की प्रार्थना है :
‘भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते ।
सदा श्रीमद्‍-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥‘ (श्‍लोक -२) 

फिर परंब्रह्म-स्वरूप नाग-शयन नीलगिरिवासी नीलपद्म-नयन श्रीजगन्नाथ की कृष्ण-मूर्त्ति और श्रीराधा-प्रीति की वर्णना है इस पद्य में :

परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्‍फुल्ल-नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि ।
रसानन्दो राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥‘ (श्‍लोक- ६)

दाक्षिणात्य के भक्त गणपति-भाट्ट ने श्रीजगन्नाथ को गजानन-वेश में दर्शन किया था । उनकी स्मृति में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन स्नानयात्रा में महाप्रभु का गजानन वेश अनुष्ठित होता है । शाक्त धर्म के उपासकगण प्रभु जगन्नाथ को भैरव के रूप में पूजा करते हैं । ओड़िआ साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि उपेन्द्र भञ्ज की वर्णना में प्रभु जगन्नाथ एवं बलभद्र हैं हस्तीयुगल । जगन्नाथ हैं दक्षिण दिशा के हस्ती कृष्णवर्ण ‘वामन’ और उनके अग्रज बलभद्र हैं पूर्वदिशा के हस्ती धवल-वर्ण ‘ऐरावत’ । जनसाधारणों में प्रभु जगन्नाथ ‘कालिआ हाती’ के रूप में सुपरिचित हैं । इसीसे गजानन-वेश का माहात्म्य स्पष्ट प्रदिपादित होता है । जगन्नाथ-तत्त्व में विविध नामों की एकात्मता प्रतिष्ठित हुई है । कवि उपेन्द्र भञ्ज के मत में ‘जगन्नाथ’ शब्द में वैष्णवीय तत्त्व गुप्तरूप में समाया है । कवि का कहना है :
'भक्तिदेवा गुप्त होइअछि य़ुक्ताक्षरे । 
वैष्णव बिहुने केबा जाणिब संसारे ॥' 


‘जगत्'-शब्द का अर्थ है 'राधा' और ‘नाथ’-शब्द का अर्थ है ‘कृष्ण' । प्रकृति-रूपिणी राधा एवं पुरुष-रूप कृष्ण, ये दोनों परम तत्त्व 'जगन्नाथ'-शब्द में सन्निवेशित हैं । मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, बलराम, बुद्ध एवं कल्कि - ये विष्णु के दशावतार श्रीजगन्नाथ में समाविष्ट हैं । कवि उपेन्द्र भञ्ज की लेखनी में जगन्नाथ, विष्णु, कृष्ण एवं राम अभिन्न देवता के रूप में भावित हैं । सर्वदेवमय विग्रह जगन्नाथ हैं संसार के आदिमूल । ओड़िआ साहित्य के आदिकवि सारला दास ने जगन्नाथ को बुद्धावतार के रूप में चित्रित किया है । उनके मत में ब्रह्मा सुभद्रा-स्वरूप पूजित हैं । भक्तकवि बलराम दास ने जगन्नाथ को कृष्ण मानकर अपना लिया है । कवि दीनकृष्ण दास के मत में जगन्नाथ ही दशावतारी परम पुरुष हैं । सुदर्शन सहित चतुर्धा मूर्त्ति शङ्खक्षेत्र पुरी धाम में समाराधित हैं । अष्ट शम्भुरूपी महादेव पुरी क्षेत्र के रक्षक हैं । इस क्षेत्र में चण्डाल के हाथ से भी ब्राह्मण अन्न भोजन करके सौ जन्मों का पाप मिटा देते हैं । इस विषय पर स्कन्द-पुराण में वर्णित है :
'सुधोपमं पचत्यन्नं भुङ्‍क्ते नारायणः प्रभुः ।
तदुच्छिष्टोपभोगो हि सर्वाघ-क्षय-कारकः ॥' (उत्कल खण्ड)

कवि उपेन्द्र भञ्ज ‘कोटिब्रह्माण्ड-सुन्दरी’ काव्य में श्रीजगन्नाथ का विशेष वर्णन किया है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र – ये चार वर्णों के लोगों को धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चतुर्वर्ग प्रदान करने में जगन्नाथ महाप्रभु निपुण हैं । कवि की उक्ति में :

'से कम्बु-कटक- राजा नाम जगन्नाथ ।
चारि बर्णे च‍उबर्ग देबाकु समर्थ ॥' (को.ब्र. सु. १/१२) 

अचिन्तनीय है श्रीजगन्नाथ की महिमा । उनके पास जाति, धर्म, छोटा, बड़ा आदिका कोई भेदभाव नहीं । भाव ही उनके लिये प्रधान तत्त्व है । वे भक्तवत्सल दीनबन्धु दयासागर हैं, भक्ति से ही प्रीत और प्रसन्न होते हैं । दासिआ बाउरी के हाथ से भक्तिपूत हृदय में अर्पित नारियल स्वीकार करते हैं । पुरी में रथयात्रा के समय यवन भक्त सालबेग की बिनति सुनकर उनके पहुँचने तक रथ में अटल हो बैठकर भक्त की प्रतीक्षा करते हैं । कभी भक्तकवि बलराम दास के बालुका-रथ पर विराजित होते हैं । कभी छुपछुपकर माल्याणी के मुख से कवि-जयदेवकृत गीतगोविन्द की मधुर पङ्‍क्तियाँ सुनते हैं । कभी बन्धु-महान्ति को स्वर्ण थाली में अन्न-व्यञ्जन परोस देते हैं । औपचारिक रूप से स्नानयात्रा के बाद महाप्रभु को अतिस्नान-जनित ज्वर से आरोग्य करने के लिये औषध देकर चिकित्सा की जाती है । ये सब प्रभु के मानवीय आचरण या दिव्य मर्त्त्य लीला हैं । इसलिये श्रीजगन्नाथ मानवायित परम-पुरुष के रूप में भक्त जनों की आन्तरिक भक्ति और सश्रद्ध सेवा स्वीकार करते हैं । श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा या घोषयात्रा का महत्त्व सर्वजन-विदित है । ओड़िशा के सर्वत्र पुरपल्लियों में भी इस महोत्सव की परिव्याप्ति रही है । आजकल केवल भारत में ही नहीं , बल्कि विदेशों में जगन्नाथ महाप्रभु की रथयात्रा महासमारोह में अनुष्ठित होती है । आकाशवाणी-दूरदर्शनादि विभिन्न माध्यमों से विशेष प्रसार के कारण श्रीजगन्नाथ का माहात्म्य आज के वैज्ञानिक युग में विश्वव्यापी बन चुका है । ओड़िशा की सांस्कृतिक एवं धार्मिक चेतनाओं का उत्कर्ष-स्वरूप श्रीजगन्नाथ-तत्त्व सारे संसार में जन-मानस को सदा आह्लादित और भक्तिरसाप्लुत करता आ रहा है और करता रहेगा । रथयात्रा के पावन अवसर पर उन भावग्राही महाप्रभु के लिये हमारी वन्दना है : 

'तुलसी-लसित-सीतावरम्,
चैतन्य-नुत-मुरलीधरम् ।
भैरवं भजे गजाननम्,
खग-वाहनं ससुदर्शनम् । 
इन्दिरेशं विश्‍व-वेशं बुद्ध-रूपमनिन्दितम्,
प्रणमामि तं भुवि वन्दितम्,
जन-हृदय-मन्दिर- नन्दितम्, प्रणमामि तम् ॥' 
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'रथ-महोत्सवे जगत्पते !
त्वयि मन्दिराद्‍ बहिरागते ।
जन-लोचनं गोविन्द ! ते,
शुभ- दर्शन-रसं विन्दते ।
नन्दिघोष- स्यन्दन-गतं शङ्ख-घण्टा-नादितम्,
प्रणमामि तं भुवि वन्दितम्,
जन-हृदय- मन्दिर- नन्दितम् ।
जगन्नाथं परात्मानं सर्व-तनुषु स्पन्दितम्,
प्रणमामि तम् ॥' (पुरुषोत्तम-गीतिका)

अन्त में, श्रीजगन्नाथ महाप्रभु के चरणारविन्द में प्रार्थना करते हैं कि उनके पावन नाम के स्मरण से
परस्पर भ्रातृत्व, मैत्री और श्रद्धा सदैव विकशित रहें एवं सबका जीवन सुख-शान्तिमय हो ।

'मैत्रीं प्रशान्तिं सुखदां चिरन्तनं
तनोतु विश्वे तव नाम-चिन्तनम् ।
आत्मीयता-रूप-रसो महीयतां
प्रभो जगन्नाथ ! कृपा विधीयताम् ॥' 

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Ref : Article Published in  Hindi e-Magazine 'Srijangatha' : 
'Samanvaya ke Devata Daru-Brahma SriJagannath' 
On the holy occasion of Rathayatra on 13 July 2010. 

Link : http://www.srijangatha.com/prasangvash2_13jul2k10
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Srijangatha : Harekrishna Meher : Search : 
http://www.srijangatha.com/searchtag_Args_%E0%A4%A1%E0%A5%89.%C2%A0%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3%C2%A0%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%B0
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Thursday, June 17, 2010

Vyasakavi Fakir Mohan Senapati (व्यासकवि फकीरमोहन सेनापति): Dr. Harekrishna Meher

Vyasakavi Fakir Mohan Senapati 
Hindi Article By : Dr. Harekrishna Meher 
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व्यासकवि फकीरमोहन सेनापति (१८४३- १९१८)
 डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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ओड़िआ साहित्य में फकीरमोहन सेनापति कथा-सम्राट्‍ के रूप में परिचित हैं । ओड़िआ कहानी एवं उपन्यास रचना में उनकी बिशिष्ट पहचान रही है । इन महान् सारस्वत साधक का जन्म हुआ था बालेश्वर जिल्ला के मल्लिकाशपुर गाँव में, १४ जनवरी १८४३ ई. मकर-संक्रान्ति के दिन । फिर विचित्र संयोग की बात है कि इनका देहान्त हुआ था १४ जून १९१८ ई. रजसंक्रान्ति के दिन । इनका आविर्भाव हुआ था संक्रान्ति में और तिरोभाव भी संक्रान्ति में । इसी कारण ओड़िआ साहित्य-जगत् में फकीरमोहन ‘”संक्रान्ति-पुरुषके रूप में चर्चित हुए हैं । इस संक्रान्ति के कारण से ही संभवतः इनकी लेखनी से साहित्य-क्षेत्र में एक विशेष क्रान्ति आई और एक नव्य युग का सूत्रपात हुआ । बाल्य काल में उनके पिता-माता के अकाल निधन के बाद वृद्धा पितामही द्वारा फकीरमोहन का लालन-पालन हुआ । बाल्य में इनका नाम था ब्रजमोहन । परन्तु पितृमातृहीन पौत्र को फकीर वेश में सजाकर उनका जीवन सम्हाला था शोक-संतप्ता पितामही ने । तदनन्तर ब्रजमोहन सेनापति फकीरमोहन सेनापतिके नाम से परिचित हुए ।

शैशव में पितृमातृहीन, यौवन में पत्नी-हीन और परिणत उम्र में पुत्र से बिच्छिन्न होकर फकीरमोहन भगवत्‌‍-करुणा के पात्र थे और असाधारण प्रतिभा के अधिकारी भी । गाँव की पाठशाला में पढ़कर उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अध्ययन जारी रखा । समयक्रम से बालेश्वर मिशन्‌ स्कूल में प्रधानशिक्षक बने । धीरे धीरे अपनी सारस्वत साधना से प्रतिष्ठित हुए । मातृभाषा ओड़िआ की सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने साहित्य में एक विप्लवात्मक पदक्षेप लिया । उनके जीवन-काल में अनेक जंजाल और संघर्ष आये । परन्तु वे अविचलित होकर सब झेल गये । सबल आशावादी होकर उन्होंने अपना जीवन निर्वाह किया । बालेश्वर में उनका गृह-उद्यान “शान्ति-कानन” आज भी साहित्यप्रेमी जनों के लिए एक पबित्र स्थल के रूप में दर्शनीय है ।

फकीरमोहन की विद्यालय-शिक्षा अल्प थी; लेकिन अपनी चेष्टा और दृढ़ मनोबल से उन्होंने शास्त्रादि अध्ययन पूर्वक अधिक ज्ञान अर्जन किया था । अंग्रेज शासन में बालेश्वर के जिल्लाधीश जन्‌ बीम्‌स् बड़े साहित्यानुरागी थे । उनको पढ़ानेके लिये संस्कृत, बंगाली और ओड़िआ- इन तीन भाषाओं के एक ज्ञानी पण्डित की आवश्यकता होने पर फकीरमोहन बीम्‌स्‌‍ के साथ भाषा-चर्चा करते थे । फकीरमोहन का अंग्रेजी-ज्ञान साहित्यानुरूप विशेष नहीं था । फिर भी स्वपठित सामान्य ज्ञान गडजातों में दीवान और मैनेजरी कार्य़ करते समय कुछ उपयोगी हुआ था । ज्ञानार्जन की उच्चाकांक्षा ने फकीरमोहन को एक महनीय साहित्यकार बनाकर प्रतिष्ठित किया । महामुनि व्यास-कृत संस्कृत ‘महाभारत’ ग्रन्थ को ओड़िआ में अनुवाद करनेके कारण फकीरमोहन सेनापति “व्यासकवि” नाम से प्रसिद्ध हैं । उन्होनें रामायण, गीता, उपनिषद्‍ आदि ग्रन्थों का भी ओड़िआनुवाद किया है । वे एक कहानीकार, उपन्यासकार, कवि एवं अनुवादक के रूप में लोकप्रिय रहे हैं ।

फकीरमोहन प्रथम ओड़िआ साहित्यकार हैं, जिनकी कहानियों और उपन्यासों में तत्कालीन समाज के अति नगण्य, दीन हीन चरित्र सारिआ, भगिआ आदि दृष्टिगोचर होते हैं । उनकी लिखी कहानियों में ‘रेवती’, 'पैटेण्ट्‍‍ मेडिसिन्‌‍’, ‘डाक-मुन्सी’, ‘सभ्य जमीदार’ प्रमुख उल्लेखनीय हैं । ‘रेवती’ उनकी पहली कहानी है, जहाँ तत्कालीन समाज में नारी-शिक्षा एवं नारी-जागरण के लिये प्रथम उन्मेष का सूत्रपात हुआ । 'पैटेण्ट् मेडिसिन्‌' कहानी के नायक मद्यप स्वामी चन्द्रमणिबाबु को सही रास्ते में लाने के लिये पत्नी ने इस्तेमाल किया झाडू का, जो 'पैटेण्ट् मेडिसिन्‌' बन गया है । 'डाक-मुन्सी' में एक अंग्रेजी-पढ़ा युबक गोपाल अपने वृद्ध ग्रामीण रुग्ण पिता हरिसिंह को अपने आवास मे निकाल देता है । इनके अलावा फकीरमोहन ने अनेक कहानियाँ लिखीं, जो पाठक-मन में समादृत हुईं ।
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उनके उपन्यासों में ‘छमाण आठ गुण्ठ’, ‘मामुँ’, ‘प्रायश्चित्त’, 'लछमा’, आदि प्रमुख हैं । प्रसिद्ध उपन्यास ‘छ माण आठ गुण्ठ’ ओड़िआ सिनेमा के रूप में लोकप्रिय बन चुका है । इस उपन्यास का नायक गाँव का टाउटर रामचन्द्र मंगराज धन-लोलुपता के कारण दिलदार मियाँ की जमीदारी और सारिआ-भगिआ की छह माण आठ गुण्ठ किसानी जमीं को कैसे हड़पने की चेष्टा करता है, उसका वास्तव चित्रण हृदयस्पर्शी है । 'मामुँ' उपन्यास में शहरी दुर्वृत्त नाजर नटवर अत्यन्त स्वार्थी और लोभी बनकर भगिनी की सम्पत्ति को अधिकार करने षडयन्त्र में प्रबृत्त होता है । 'प्रायश्चित्त' उपन्यास में सारे शिक्षित, सभ्य और भद्र लोगों के आधुनिक दर्शन और रुचि के बारे में चित्रण हुआ है । कहानीकार सारे खल चरित्रों के कुकर्मों की कुपरिणति के बारे में भी सचेतन हैं और वैसी कुफलों की वर्णना भी की है । चम्पा, चित्रकला आदि खल-नायिकाओं का चित्रण भी स्वाभाविक एवं जीवन्त प्रतीत होता है । नारी-पात्रों के मार्मिक चित्रण करने में भी फकीरमोहन की निपुणता प्रशंसनीय है । 'रेवती', 'राण्डिपुअ अनन्ता' प्रमुख कुछ कहानियाँ भी दूरदर्शन में प्रसारित हुई हैं । उनकी रचनाओं में विषयवस्तु, चरित्रचित्रण, भावनात्मक विश्लेषण एवं वर्णन-चातुरी अत्यन्त आकर्षणीय हैं । भाव और भाषा का उत्तम समन्वय परिलक्षित होता है । प्रकृति-जगत्‌ की सुरक्षा के साथ पर्यावरण में परिष्कृति और स्वच्छता लाने हेतु भी उनका सारस्वत प्रयास सराहनीय है ।
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कवि के रूप में उन्होंने 'अबसर-बासरे', 'बौद्धावतार काव्य' आदि लिखे, जिसमें कवि की भावात्मकता एवं कलात्मकता का रम्य रूप दृश्यमान होता है । 'उत्कलभ्रमणं' काव्य में हास्य-व्यंग्य वर्णन सहित ओड़िशा के तत्‍कालीन साहित्य-साधकों की बहुत उत्साहभरी प्रशंसा की है । 'आत्मजीवनचरित' में उन्होंने अपने संघर्षमय जीवन की विशद अवतारणा की है । सांवादिकता-क्षेत्र में भी उनका विशेष अवदान रहा है । 'संवादबाहिनी' और 'बोधदायिनी' पत्रिकाओं के प्रकाशन की दिशा में ओड़िआ सांस्कृतिक संग्राम के एक प्रवीण सेनापति रहे । वास्तविक कर्मक्षेत्र में भी उन्होंने विचक्षणता के साथ कर्त्तव्य संपादन किया था । जमीदार के विरुद्ध केन्दुझर में घटित 'प्रजा-मेलि' (भूयाँ जाति का आन्दोलन) में अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से परिस्थिति को सम्हाल लिया था ।

उनकी रचनाओं में समसामयिक समाज मे प्रचलित अन्धविश्वास, कुसंस्कार, दुर्बलों के प्रति धनियों का अन्याय-अत्याचार, बाल्यविवाह की कुपरिणति आदि तत्त्व दृग्गोचर होते हैं । इन सबके विरुद्ध फकीरमोहन ने क्रान्तिकारी लेखनी जोरदार चालना की । उनकी लालिका (पैरोडी) रचनाओं में सांस्कृतिक भित्ति, हास्य परिवेषण और मनोरञ्जन के कई उपादान सन्निवेशित हुए हैं । विदग्ध तथा साधारण पाठक दोनों के लिये ये लालिकायें भावभरी और आनन्ददायिनी अनुभूत होती हैं । शैशव से लेकर जीवन की आखरी साँस तक कई दुःख, पीड़ा, लाञ्छना, प्रवञ्चना आदि से जञ्जालभरी राहों पर फकीरमोहन के पैर क्षताक्त रहे । पीड़ा और कारुण्य़ से उनका जीवन गाम्भीर्यपूर्ण था । परन्तु दूसरों के मुख में उन्होंने ऐसी हास्य-भंगी निखार दिखलायी, जिसकी कोई तुलना नहीं । वास्तव में फकीरमोहन एक युगप्रवर्त्तक, समाज-संस्कारक, जनजीवन के यथार्थ चित्रकार, नवीनता के वार्त्तावह और कथासाहित्य के उन्नायक 
थे 

वास्तव जगत् के कर्मक्षेत्र में ओड़िआ साहित्य के फकीरमोहन एवं हिन्दी साहित्य के प्रेमचन्द - ये दोनों प्रसिद्ध कथाकार परस्पर तुलनीय़ हैं । इनकी कहानियों में तत्कालीन समाज में अनुभूत भारतकी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थनीतिक और सांस्कृतिक अवस्थाओं का सम्यग् रूपायन किया गया है । सामाजिक द्वन्द्व का समाधान, न्याय-अन्याय-विचार, आदर्शवाद, नैतिकता, परस्पर सद्‍भाव प्रतिष्ठा आदि दोनों कहानीकारों का अभीष्ट है । भारतीय भावधारा दोनों की रचना में परिप्लुत है । पाश्चात्य शिक्षा-सभ्यता के प्रति व्यंग्य और कटाक्ष सहित स्वकीय भाषा-साहित्य के प्रति गभीर अनुराग दोनों में अनुभूत होता है । दोनों गाँव में जन्मे थे निम्न मध्यवित्त परिवार में । दुःख- जञ्जाल संघर्षों से भरा था दोनों का जीवन । तत्कालीन सामाजिक स्थिति में व्यापक थे अनेक तत्त्व, जैसे ग्रामीण जीवन में आई जातिप्रथा, धनी-गरीब का भेदभाव, नारी-जाति प्रति अत्याचार और शोषण, बाल्यविधवा समस्या, कुसंस्कार, अन्धविश्वास आदि । इन सबका निराकरण हेतु दोनों का सारस्वत प्रयास अदम्य रहा । किसानों की दुर्दशा दूर करने दोनों की लेखनी तत्पर रही । पुञ्जिपतियों की शोषणक्रिया से किसानों की मुक्ति के लिये उनका सारस्वत उद्यम जारी रहा । प्रेमचन्द का किसान होरी और फकीरमोहन का भगिआ - इन दोनों में अनेक समानता परिलक्षित होती है । भारतीय साहित्य-जगत्‌‍ में फकीरमोहन एवं प्रेमचन्द - ये दोनों स्वाधीनचेता महान् कथाकार वास्तव में चिरस्मरणीय एवं अमर हैं । (फकीरमोहन -जन्म १८४३, निधन १९१८, रचनासृष्टि १८९७ । प्रेमचन्द - जन्म १८८०, निधन १९३६, रचना १९०५ के आसपास ) ।

आधुनिक ओड़िआ कथासाहित्य के जनक फकीरमोहन सेनापति के जीवन और रचनाओं के बारे में अब तक बहुत शोधग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं । विशेष बात यह है कि लन्दन विश्वविद्यालय के पूर्वतन प्रोफेसर डॉ. जे. वी. बौल्‍टन्‌ महोदय ने फकीरमोहन सेनापति के जीवन एवं कथा के बारे में गवेषणा करके १९६७ में उसी विश्वविद्यालय से पीएच्‌. डी. उपाधि प्राप्त की है । (Dr. J. V. Boulton, Professor of Oriental Learning, London University. Ph.D. Thesis : Phakirmohana Senapati : His Life and Prose-Fiction, 1967). । फकीरमोहन के महनीय नाम के सम्मानार्थ बालेश्वर में प्रतिष्ठित हैं 'फकीरमोहन स्वयंशासित महाविद्यालय' एवं 'फकीरमोहन विश्वविद्यालय', व्यास-विहार ।
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Reference : सृजनगाथा : 

Srijan-gatha (E-Magazine): Article Link: Published in June 2010 : 
Ref : http://www.srijangatha.com/hastakshar_16jun2k10 
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Saturday, August 8, 2009

Sāhitya Mein Mūlyabodh (साहित्य में मूल्यबोध): Harekrishna Meher

Sāhitya Mein Mūlyabodh
(Sense of Social Value in Literature)  
Hindi Article By : Dr. Harekrishna Meher    
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साहित्य में मूल्यबोध
 * डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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जीवन, साहित्य और समाज - ये तीनों तत्त्व परस्पर अन्तरंग रूप से जुड़े हुए हैं । जीवन की सुख-दुःखभरी नाना अनुभूतियों को लेकर साहित्य में शृंगार, हास्य, करुण आदि नव रसों की अवतारणा की गयी है । साहित्य-शास्त्रियों ने अपनी अपनी रचनाओं में जीवन का तात्त्विक विश्लेषण किया है । साहित्य जब जीवन-धर्मी होता है, तब पाठक और श्रोता के हृदय को विशेष रूप से स्पर्श करता है । काव्य-कविता हो, उपन्यास हो, नाटक हो, कथा हो या अन्य कुछ साहित्यिक रचना हो, हर क्षेत्र में ध्यान देने का विषय है सामाजिक मूल्यबोध । साहित्यिक कृतियों में रचनात्मक तत्त्व यदि सकारात्मक रूप में गर्भित हो, तो समाज पर अनुकूल और स्वस्थ प्रभाव अनुभूत होता है । सारस्वत साधकगण होते हैं समाज के दिग्‌दर्शक एवं असीम-शक्तिशाली व्यक्ति । कुपथ में चलनेवालों को उसीसे निवृत्त करके सत्पथ में आगे बढ़ने के लिये उत्साह और प्रेरणा देना लेखक का धर्म है । प्राणि-जगत् में मंगलकारक तत्त्व-समूह जीवनधर्मी चिन्तन का परिप्रकाश करता है । भारतीय साहित्य में 'उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान् निबोधत', 'असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय' इत्यादि उपनिषदीय वाणी मनुष्य-जीवन को संयत एवं शान्तिमय बनाने में सहायता करती है ।

विधाता की सृष्टि में सारे विश्व में धर्म-अधर्म, सत्य-मिथ्या, सुख-दुःख, आलोक-अन्धकार, भलाई-बुराई, मिलन-विच्छेद और जन्म-मरण आदि कई विरोधी तत्त्व हमेशा परस्पर संघर्ष-रत रहते हैं । मनुष्य के जीवन में धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष - ये चार पुरुषार्थ होते हैं । हर साहित्य में मनुष्य की धर्मशास्त्रीय संहिता या आचरण-पद्धति लिपिबद्ध होती रहती है । सत्कर्मों के फल अच्छे और दुष्कर्मों के फल बुरे होते हैं । ये बातें सर्वत्र भूरि-भूरि प्रतिपादित हुई हैं । इस चिरन्तन चिन्तन-धारा का प्रतिफलन समग्र विश्व-साहित्यों में परिलक्षित होता है । लोक-शिक्षा की दृष्टि से सामाजिक अंगीकार-बद्ध लेखक अपनी रचना में मानव तथा अन्य प्राणियों के जीवन में घटित अच्छाई और बुराई - दोनों दिशाओं का विवेचन करता है । आदिकवि वाल्मीकि-प्रणीत रामायण हो, महामुनि व्यास-कृत महाभारत हो या आधुनिक युग का जो कुछ भी साहित्य हो, सबमें जीवन के कुछ संघर्ष और सफलता का विवरण उपलब्ध होता है । साहित्यशास्त्रियों के मत में 'रामादिवद् वर्त्तितव्यम्, न तु रावणादिवत्' अर्थात् मर्यादा-पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र आदि आदर्श चरित्रों की भाँति अपने को प्रतिष्ठित करना चाहिये, रावण आदि निन्दित चरित्रों की तरह नहीं ।

महाभारतीय वर्णन में खलनायक शकुनि और अभिमानी अहंकारी दुर्योधन आदि कौरव पक्ष के बहुसंख्यक वीर योद्धा थे । परन्तु अन्त में सत्य-धर्म-नीतिवादी युधिष्ठिर आदि पञ्च पाण्डवों की विजय हुई है । असत्य, अन्याय और अधर्म के विरुद्ध संग्राम करके सत्य, न्याय एवं धर्म को प्रतिष्ठित करने में सफल और विजयी हुए हैं धर्म-पक्ष के पञ्च पाण्डव । इसलिये उस महाभारत ग्रन्थ का सार-मर्म है - 'यतो धर्मस्ततो जयः' , जहाँ धर्म है, वहाँ है विजय । यथार्थ में महाभारत के रचयिता वेदव्यास हैं मानव-जीवन के श्रेष्ठ व्याख्याकार । सामाजिक दृष्टि से जीवन में केवल बाह्य संघर्ष नहीं, आभ्यन्तर संघर्ष भी चलता रहता है । काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दुर्गुण मनुष्य को लक्ष्य-भ्रष्ट करके अधोगति की ओर खींच लेते हैं । अच्छाई और बुराई का भेद विचार करके सन्मार्ग में प्रवृत्त होने के लिये समाज को प्रेरणा देती है मूल्यबोध-सम्पन्न साहित्यिक रचना । इसी दृष्टि से साहित्य-सर्जनाकार की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है । नकारात्मक और विनाशात्मक चिन्तन से मनुष्य भली राह से भटक जाता है और अपने लक्ष्य से दूर चला जाता है । इसी कारण साहित्य में आवश्यक हैं सकारात्मक तत्त्व एवं विश्वजनीन उपादेयता ।

साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है । साहित्य-शिल्पी की रचना में कल्पना-विलास एवं वास्तवता का समन्वित चित्रण लेखनी को परिपुष्ट कराता है । केवल वास्तववादी वर्णन करने से कुछ नीरसता आ सकती है । कल्पना में भी वास्तवता का प्रतिफलन मानवीय संवेदना को जगाता है । अग्नि-पुराण में वर्णित है -
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"अपारे काव्य-संसारे कविरेव प्रजापतिः ।
यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्त्तते ॥"

काव्य-जगत् का सर्जक है क्रान्तदर्शी कवि । अपनी रुचि के अनुसार लेखनी-चालना करके वह विश्व में परिवर्त्तन ला सकता है । ऐसी शक्ति है कवि-लेखक के पास । साहित्यकार होते हैं सत्य-शिव-सुन्दर के उपासक, रूपकार एवं उद्‌गाता । तत्त्वज्ञ व्यक्ति इन तीन तत्त्वों को हृदयंगम करता है । जीवन को सरस सुन्दर और मधुमय करना साहित्यकार का सारस्वत कर्त्तव्य है । फलस्वरूप साहित्य-जगत् के प्रति उसकी देन सार्वकालिक और अमर हो जाती है ।

साहित्य, संस्कृति, कला, विज्ञान, वाणिज्य आदि हर विधा की प्रगति देश में जरूरी है । देश का बाह्य कलेवर होता है सभ्यता और अन्तरात्मा है संस्कृति । कला, साहित्य एवं संगीत का आदर सामाजिक जीवन को ऊँचे स्तर पर पहुँचाता है । केवल बाह्य शरीर की स्वच्छता नहीं, आत्मा की भी परिष्कृति और निर्मलता चाहिये । साहित्य में संस्कृति का उपयुक्त समावेश लेखकीय विशेषत्व होता है । सारस्वत साधक की लेखनी में कोमलता के साथ कठोरता भी रहती है । अन्याय का निराकरण और न्य़ाय की प्रतिष्ठा के लिये लेखक सदा चेष्टित रहता है । इसलिये लेखनी के कलात्मक सूक्ष्म चित्रण सहित क्रान्तिकारी चिन्तन जन-समाज को उद्‌बुद्ध और अनुप्राणित करता है । प्राणि-जगत् में मधुरादि षड़्‍ रसों के स्रष्टा हैं विश्वविधाता ब्रह्मा । परन्तु काव्य-जगत् में शृंगारादि नव रसों के स्रष्टा है स्वयं कवि । उस कालजयी सर्जक का महत्त्व वास्तव में प्रणिधान-योग्य है । ‘गरिमा कवि की’ है इसप्रकार –

“विधाता से बढ़कर उसकी सृष्टि-रचना ;
भाती अद्‌भुत उसकी उद्‌भावना ।
गूंगे मुख से बहाता
वाणी-गंगा की अमृत-धार ।
पाषाण के अंग में जगाता
मंजुल संजीवनी अपार ॥

लेखनी में उसकी छा जाती
सहस्र सूर्य-रश्मियों की लालिमा ।
अंशुमाला उज्ज्वलता फैलाती ;
हट जाती तिमिर-पटल की कालिमा ॥

वही कवि तो है क्रान्तदर्शी,
सार्थक उसकी रचना मर्मस्पर्शी ।
अतीन्द्रिय अतिमानस के राज्यों में विहर
भाती उसकी प्रतिभा सुमनोहर ॥

रस-रंगों के संगम की तरंगों से,
जीवन की विश्वासभरी उमंगों से
लिखता रहता कवि निहार चहुँ ओर,
कभी मधुर सरस, कभी तीता कठोर ॥

उसकी कुसुम-सी कोमल कलम
जब करने लगती सर्जना,
निकलती कभी संगीत संग गूँज छमछम,
फिर कभी स्वर्गीय वज्रों की गर्जना ॥" 


हमारे समाज में प्रतिभा की कमी नहीं है । जरूरत है प्रतिभा के विकास के लिये उपयुक्त समय, सुयोग एवं परिवेश की । चारित्रिक उत्कर्ष शिक्षा का प्रधान लक्ष्य और जीवन-चर्या का अत्यन्त आवश्यक तत्त्व है । आज के विज्ञान-युग में मनुष्य असाध्य साधन करने में समर्थ है । परन्तु मानसिक एवं मानविक दृष्टि से वह प्रगति के बदले अधोगति की ओर चल पड़ा है । इसी कारण आध्यात्मिक चेतना का विशेष प्रयोजन अनुभूत हो रहा है । भौतिक और यान्त्रिक शक्ति से उन्मत्त होकर आज का मनुष्य केवल स्वार्थी बन गया है । वह स्वयं मनुष्य-जाति एवं प्रकृति पर अकथनीय अत्याचार करने लगा है । इसके परिणाम-स्वरूप सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण प्रदूषित और विपर्यस्त हो गया है । सारा सन्तुलन बिगड़ गया है । भस्मासुर की भाँति मनुष्य के औद्धत्यभरे आचरणों से प्रतिक्रिया-स्वरूप सुनामी-जैसे प्राकृतिक विपर्ययों की घटना आश्‍चर्यजनक नहीं है । मनुष्य के लिये यह एक गुरुत्वपूर्ण चेतावनी है । मनुष्य के ऊर्ध्व में एक अदृश्य शक्ति है, जो सबको नियन्त्रित कर रही है । महाकाल ही अमित-बलवान् है । प्रकृति की गोद में पले हुए मनुष्य को प्रकृति की सुरक्षा हेतु यत्‍नवान् होना चाहिये । साहित्य-साधक महामनीषियों ने वैदिक युग से ही प्रकृति और मनुष्य के बीच अन्तरंग आत्मिक संबन्ध का सुन्दर वर्णन किया है ।

आज के विशृंखलित और ध्वंसाभिमुखी समाज को सन्मार्ग पर प्रवृत्त और परिचालित करने हेतु लेखनी-शक्ति की विशिष्ट पहचान होनी चाहिये । अपसंस्कृति के दूरीकरण एवं आध्यात्मिक चिन्तन-धारा में कर्मों के आचरण से ही सांस्कृतिक महत्त्व को सुरक्षित रखने में सहायता प्राप्त होगी । दृढ़ मनोबल, आत्म-विश्वास एवं सदाचार द्वारा समाज में स्वच्छ परिवेश की सर्जना की जा सकती है । देश को समृद्ध और सुसंस्कृति-सम्पन्न करने में नारी-पुरुष सभीको राष्ट्रीय कर्त्तव्य निभाना है । भारतवर्ष को एक महनीय महान् देश के रूप में सुप्रतिष्ठित करने के लिये मन, वचन और कर्म का त्रिवेणी-संगम आवश्यक है । केवल वाक्य-वीर न होकर धर्म-वीर एवं कर्म-वीर के रूप में अपने को प्रतिपादन करने से मनुष्य-जन्म की सार्थकता बनी रहेगी ।

वर्त्तमान के कम्प्युटर-युग में सारा विश्व एक परिवार-सा बन गया है । महापुरुषों की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’- भावना साकार होने लगी है । इसी परिवेश में समाज और मातृभूमि के उत्कर्ष हेतु साहित्यकारों के युगानुरूप रचनात्मक अवदान सर्वथा स्वागतयोग्य एवं अपेक्षित हैं । प्रतिभाशाली व्यक्तिगण विविध क्षेत्रों में कृतित्व अर्जन करके देश के गौरव बढ़ायें । कलम और कदम साथ–साथ आगे चलें । विश्व-नीड़ में मानवता का सौरभ वितरण करना जीवन का ध्येय बने । विश्वबन्धुता, मैत्री, प्रेम और शान्ति की पावन धारा सभीके हृदय को रसाप्लुत एवं आनन्दमय करे ।

'शान्ति-मन्त्रो जयतु नितरां सौम्य-गाने,
प्रेम-गङ्गा वहतु सुजला ऐक्य-ताने ।
निवसतु सुखं विश्व-जनता
लीयतां ननु दनुज-घनता ;
चूर्णय त्वं वैर-वर्वर-पर्वतम् ।
प्राणिनां संवेदना  जायतां सद्‌भावना
भातु सत्यं सुन्दरं शिव-शाश्वतम् ।
भारतम्, भ्राजतां नो भारतं प्रतिभा-रतम् ॥'

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Srijan-Gatha : Article Link : 
http://www.srijangatha.com/?pagename=Alekh6_Mar2k10#.WIXi5FN97Dc
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Reference : सृजनगाथा : 

Monday, August 3, 2009

स्वभावकवि गङ्गाधर मेहेर (Poet Gangadhara Meher: An Immortal Genius): Dr. Harekrishna Meher

Swabhava-Kavi Gangadhar Meher : Ek Amar Pratibha 
Hindi Article By: Dr. Harekrishna Meher 
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स्वभावकवि गङ्गाधर मेहेर : एक अमर प्रतिभा 
* डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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(२००९ श्रावण पूर्णिमा कवि गङ्गाधर मेहेर जयन्ती के उपलक्ष्य में) 
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     भारतीय साहित्य के प्रतिभाशाली सफल निर्माताओंमें से स्वभावकवि गङ्गाधर मेहेर अन्यतम हैं । ओड़िआ साहित्य-गगन के एक समुज्ज्वल ज्योतिष्क के रूप में वे चर्चित हैं । कवि का आविर्भाव हुआ था ९ अगस्त १८६२, श्रावण पूर्णिमा, रक्षा बन्धन के दिन तत्कालीन सम्बलपुर-जिल्लान्तर्गत बरपालि गाँव में और तिरोभाव ४ अप्रैल १९२४, चैत्र अमावस्या में । उनकी साहित्यिक कृतियों में 'तपस्विनी', 'प्रणय-वल्लरी', 'कीचक-वध', 'उत्कल-लक्ष्मी', 'अयोध्या-दृश्य', 'पद्मिनी', 'अर्घ्यथाली' और 'कृषक-संगीत' इत्यादि प्रमुख हैं । अपनी पैनी कलात्मक दृष्टि से उन्होंने सारे विश्‍व को मधुमय और अमृतमय रूप में दर्शन किया है और कराया है । पंक से पंकज के विकास की भाँति संघर्षभरे परिवेश में रहकर भी उन्होंने अपनी महान् प्रतिभा की सुरभि फैला दी । वे हैं जीवन-शास्त्र के सार्थक कवि, मानवता के कवि, अमृत के कवि, आलोक के कवि एवं मानव-समाज के एक महनीय सारस्वत दिग्‌दर्शक । भारतीय संस्कृति की पावन पृष्ठभूमि पर उनकी कवितायें विकसित हुई हैं ।
*
     अन्धकार के गहन मार्ग से आलोक की ओर अग्रसर होने के लिये भारतीय महामनीषियों ने परमेश्वर से प्रार्थना की है : 'असतो मा सद्‌ गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय ।' कवि गङ्गाधर ने वैदिक भारतीय परंपरा के मूल्यबोध को लेकर काव्य-कविताऒं का प्रणयन किया है । औचित्यपूर्ण आचरण, जीवन का विमल आदर्श और सामाजिक मूल्यबोध उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से प्रतिफलित हुए हैं । दुःख-सुख की अनुभूतियाँ जीवन-ग्रन्थ में लिपिबद्ध हुई हैं । विधाता की सर्जना में अच्छे-बुरे, अन्धेरे-उजाले, मिलन-विच्छेद की भाँति कई द्वन्द्वमय तत्त्व हर समय प्राणी-जीवन को प्रभावित करते रहते हैं । ऐसी स्थिति में सद्‌गुणावली का अभ्युदय मानव-जीवन के लिये अत्यन्त आवश्यक है । अनेक दुष्प्रवृत्तियों की व्यापकता से मनुष्य पथभ्रष्ट हो जाता है । हर युग में मनीषीगण की साधना समाज के लिये विशेष उपादेय होती है । कवि गंगाधर जंजालभरे जीवन में कई दुःख-क्लेशों को झेल कर कभी विचलित नहीं हुए हैं । उनका धैर्य है असीम एवं मनोबल अत्यन्त सुदृढ़ । नैतिक आदर्शबोध और मानववाद की प्रतिष्टा उनकी लेखनी का काम्य है । क्षमा, सहनशीलता, सत्कर्म की ओर तत्परता एवं परोपकार उनके जीवन का ध्येय है । सांसारिक दुःखों के अन्दर कवि ने पारमार्थिक सुख का सन्धान किया है । जीवन-ज्योति और भी दीप्तिमती हो उठी है वेदना की अनुभूति के माध्यम से । विनय, नम्रता, शिष्टता आदि सदाचार उनके सामाजिक  जीवन के श्रेष्ठ गुण हैं, जो उनकी रचनाओं में भी रूपायित हुए हैं । उनके हृदय में अहमिका अथवा गर्व का स्थान नहीं है । निश्छल एवं सरल व्यक्तित्व उनके जीवन का उत्कर्ष है । उनके उच्चारण और आचरण में परस्पर निष्ठापर सामञ्जस्य अनुभूत होता है ।
*
    संस्कृत के महाकवि कालिदास और अंग्रेजी के वाड्‍स्‍वार्थ की भाँति गंगाधर मेहेर ओड़िआ साहित्य के 'प्रकृति-कवि' माने जाते हैं । कवि गंगाधर ने अपनी प्रतिभा की आँखों से प्रकृति के अन्तःस्वरूप का सूक्ष्म तथा गहरा निरीक्षण किया है । कवि की समस्त कृतियों में बाह्य प्रकृति और अन्तःप्रकृति का रोचक मनोरम चित्र अंकित हुआ है । प्रकृति के अनन्य रूपकार और व्याख्याकार हैं रंगाजीव कवि गंगाधर । उनकी रचनावली में श्रेष्ठ है "तपस्विनी" महाकाव्य । रामायण उत्तरकाण्ड में वर्णित सीता-वनवास की करुण गाथा इस काव्य का उपजीव्य है । महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में सौम्य शान्त कान्त उषाकाल का वर्णन कवि की भावुकता की एक विशिष्ट पहचान है । मानवीय सूक्ष्म भावों के सच्चे विश्‍लेषक एवं प्रकृति के एक निपुण सफल चित्रकार के रूप में कवि गंगाधर चिर-स्मरणीय हैं । चतुर्थ सर्ग में उषावर्णन का माधुर्य विशेष आस्वादनीय है । कवि की लेखनी में :

'समंगल आई सुन्दरी
प्रफ़ुल्ल-नीरज-नयना उषा,
हृदय में ले गहरी
जानकी-दर्शन की तृषा ।
नीहार-मोती उपहार लाकर पल्लव-कर में
सती-कुटीर के बाहर
आंगन में खड़ी होकर
बोली कोकिल-स्वर में :
'दर्शन दो सती अरी !
बीती विभावरी ॥'
*
'अरुणिमा कषाय परिधान,
सुमनों की चमकीली मुस्कान
और प्रशान्त रूप मन में जगाते विश्वास :
आकर कोई योगेश्वरी
बोल मधुर वाणी सान्त्वनाभरी,
सारा दुःख मिटाने पास
कर रही हैं आह्वान ।
मानो स्वर्ग से उतर
पधारी हैं धरती पर
करने नया जीवन प्रदान ॥'
*
    अपनी अन्तर्दृष्टि से कवि ने प्रकृति और मनुष्य के बीच संवेदनशील गहरा अन्तरंग सम्बन्ध स्थापित किया है । तपस्विनी-काव्य के चतुर्थ सर्ग में तमसा-नदी के मुख में कवि ने जो कुछ अभिव्यक्त किया है, उसमें जीवन-दर्शन का सार-तत्त्व प्रतिफलित हुआ है । जल- दान-रूप सत्कार्य से नदी का जीवन सार्थक और धन्य हो जाता है । तमसा-नदी की स्वार्थहीन सेवा के वर्णन में मनुष्य-जीवन का साफल्य गर्भित हुआ है । जीवन में कई प्रकार के बाधा-विघ्न आते हैं; फिर भी दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास एवं धैर्य के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिये कवि की वाणी में प्रेरणा भरी है । प्रकृति के सारे विभाव प्रकृति-कवि की लेखनी में सजीव, सरस और मानवायित हैं । चतुर्थ सर्ग का और एक उदाहरण उल्लेखनीय है, सीता के प्रति वनलक्ष्मी का सख्यपूर्ण आदर । आश्रम के उपवन में कवि-कल्पिता वनलक्ष्मी सीता के समक्ष अपना आन्तरिक भाव व्यक्त करती है इस प्रकार :-

'जा रही थी जब लौट चली
पुष्पकारूढ़ तू गगन-मार्ग पर,
खड़ी मैं तब ले पुष्पाञ्जली
हरिण-नयनों में शोकभर
ऊपर को निहार
तुझे मयूरी की बोली में पुकार
रही थी बड़ी चाह से,
लम्बी राह से ।
अरी प्यारी !
सहेली की बात मन में करके याद
क्या तू आज पधारी
इतने दिनों बाद ?'

   वास्तव दुनिया में निन्दुक और दोषदर्शियों की संख्या कम नहीं । फिर भी सज्जनों के सुकर्म और उत्कर्ष के सामने दुर्जनों का धैर्य टूट जाता है । सज्जनों के सद्‌गुण-रूप दिव्य अलंकार की दीप्ति के प्रभाव से दुर्जनों की निन्दुकता और बुरी नज़र सब मूल्यहीन हो जाती है । कवि गंगाधर हैं सारस्वत कलाकार, निष्ठापरायण साधक, समाज-संस्कारक, कर्मयोगी, भाग्यवादी, ईश्वर-विश्वासी और आशावादी; परन्तु नैराश्यवादी कभी नहीं । आशावाद की ज्योति से उनकी वर्णावली अत्यन्त उज्ज्वल और उद्‌भासित हुई है । भारतीय दर्शन में भाग्य और कर्मफल की भूमिका विशेष महत्वपूर्ण है । हर प्रकार की चेष्टाओं के बावजूद यदि सफलता की प्राप्ति नहीं होती, तब मनुष्य भाग्य को स्वीकार कर लेता है । कवि का मत है कि सौभाग्य के बिना सुफल प्राप्त नहीं होता । मन की भावना और चिन्तन-धारा उन्नत है तो कर्म और परिणाम भी उन्नत होते हैं । ऐसी ऊँची भावना की प्रक्रिया मानव-समाज और देश के लिये मान-मर्यादा एवं गौरव को बढ़ाती है । कवि के विचार में हीनमन्यता को प्रश्रय देना अपनी दुर्वलता है एवं वास्तव जीवन में सदा ऊँची भावना का पोषण करना चाहिये ।
*
     असत्य, अन्याय और अधर्म के विरुद्ध कवि गंगाधर ने हमेशा संग्राम किया है । अपने जीवन में उसे चरितार्थ भी किया है । शासक-रूपी शोषकों को एवं रक्षक-रूपी भक्षकों को ‘धर्मावतार’ कहकर व्यंग्य चित्रण किया है और समाज में जन-सचेतनता की सृष्टि हेतु सहायता की है । कवि का कहना है :

'जिसकी विद्या धर्म-नीति का शीश मरोड़ती,
बुद्धि जिसकी सौ सत्यों को चूर डालती,
धन से खरीदा जाता जिसका विचार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥'

     गंगाधर की कवितायें करुणा की विमल भाव-सुरभि से महिमान्वित हैं । उनकी भाषा हृदय को सीधा स्पर्श कर लेती है । भावानुरूप अभिव्यक्ति से उनकी रचनावली रसोत्तीर्ण हुई है । उनकी लेखनी का प्रकाश अन्तर के कोने-कोने में फैल जाती है । कविता का भाव और हृदय का भाव हो जाते हैं अभिन्न एकाकार । इसी कारण जाग उठती है अन्तर की कारुणिकता, समवेदना, सहानुभूति, जीवों में दया, नारी-समाज के प्रति सम्मान- भावना एवं विश्व-बन्धुता की भावधारा-जैसी महनीय मानवता के संग सद्‍गुणावली की आत्मीयता । सामाजिक परिवेश में नारी-जाति की मर्यादा-वृद्धि के लिये कवि का सारस्वत प्रयास सदैव प्रशंसनीय है । पत्नी के आदर्श एवं चारित्रिक तेजोराशि से विमण्डित हुई हैं कवि की लेखनी-नायिका सीता, द्रौपदी, शकुन्तला और पद्मिनी आदि महीयसी महिलायें । 

     देशभक्ति-परक कविताओं में कवि की 'भारती-भावना' उल्लेखनीय है । यहाँ श्‍लेषालंकार में अंग्रेज शासन के विरुद्ध और महात्मा गान्धी आदि स्वतन्त्रता-संग्रामी के अनुकूल पद्य-रचना की गयी है । "मातृभूमि" कविता में अपने देश की भाषा के लिये कवि की उक्ति स्मरणीय है इसप्रकार :-
'मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति 
जिसके हृदय में अपनापन जन्मा नहीं,
करेंगे जब ज्ञानियों में उसकी गिनती
तो कहाँ रहेंगे अज्ञानी ?'

      'भक्ति' कविता गंगाधर के जीवन-दर्शन की एक बड़ी उपलब्धि है । विभु-प्रीति की अमृत-धारा उनकी रचना में निरन्तर प्रवाहित है । ब्रह्माण्ड की सारी वस्तु परमेश्वर का दिआ हुआ प्रसाद है । कवि के मत में, उन महान् दाता परमेश्वर के लिये प्रतिदान में उनका प्रसाद अर्पण करना अपराध होगा । इसी कारण कवि ने अपनी निजस्व वस्तु "मुँकार" अर्थात् अहंभाव को परमेश्वर के चरणों में सविनय समर्पित किया है । आनन्द एवं अमृत के निधान हैं प्रभु परमेश्वर । उसीसे सब की सर्जना, उसीमें सब की स्थिति एवं उसीमें ही सब का विलय । कवि गंगाधर ने अपने को अमृत-सागर के एक बिन्दु के रूप में चित्रित किया है । आध्यात्मिकता के साथ प्राणीजीवन की तत्त्वावली को महिमामयरूप में अभिव्यक्त किया है । अपनी  'अमृतमय' कविता में कवि ने कहा है : 

'मैं तो बिन्दु हूँ
अमृत-समुन्दर का,
छोड़ समुन्दर अम्बर में
ऊपर चला गया था ।
अब नीचे उतर
मिला हूँ अमृत-धारा से ;
चल रहा हूँ आगे
समुन्दर की ओर ।
पाप-ताप से राह में
सूख जाऊँगा अगर,
तब झरूँगा मैं ओस बनकर ।
अमृतमय अमृत-धारा के संग
समा जाऊँगा समुन्दर में ॥' 

  *ओड़िआ साहित्य के प्रसिद्ध समालोचक मायाधर मानसिंह ने स्वभावकवि गंगाधर के व्यक्तित्व एवं साहित्य का सामग्रिक अनुशीलन करके यथार्थ में उन्हें एक 'साहित्यिक वीर' के रूप में प्रतिपादित किया है । सत्कर्म और उच्च कर्म से ही मनुष्य का जीवन गौरवमय बनता है । अपनी काव्य-माधुरी के साथ गंगाधर अर्पण कर गये हैं मानवीय सूक्ष्म-अनुभूति-संवलित अनेक काव्य-कवितायें, जो जन-समाज के संस्कार और उपकार की दिशा में एक एक महनीय अनमोल रत्‍न-रूप हैं । जीवन एवं साहित्य का मधुर समन्वय उनकी कृतियों में सुपरिलक्षित होता है । आज के कलुषित और प्रदूषित वातावरण में कवि का तात्त्विक चिन्तन विशेष प्रणिधान-योग्य है । सत्य-शिव-सुन्दर के परम उपासक और अनन्य व्याख्याकार यशस्वी सारस्वत शिल्पी गंगाधर मेहेर वास्तव में सभी सहृदयों और साहित्य-प्रेमियों के आदरणीय हैं ।
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 (इस लेख में उद्धृत कवि गंगाधर मेहेर की पंक्‍तियाँ डॉ. हरेकृष्ण मेहेर द्वारा अनूदित हैं ।)
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Svabhavakavi Gangadhar Meher : Ek Amar Pratibha
Published in ‘Srijangatha’ (Hindi E-Magazine), June 2009.
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Srijan-Gatha (Hindi E-Journal): Link : 
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Related Links: 
Biodata : Dr. Harekrishna Meher :
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