Wednesday, September 30, 2009

Chitrakut Aur Mahanadi (चित्रकूट और महानदी : तपस्विनी)


Chitrakut Aur Mahanadi

(Extracted from ' Tapasvini-Kavya' of Poet Gangadhara Meher)
From Original Oriya,
Hindi Translation By : Dr. Harekrishna Meher


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चित्रकूट और महानदी
(स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत 'तपस्विनी' काव्य, अष्टम सर्ग से)
मूल ओड़िआ से हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण
मेहेर

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उसी समय समक्ष आ चिन्ता-सुन्दरी
बोली वाणी विनयभरी :
'देवीजी ! कुछ लोग द्वार पधारे
प्यासे हैं दर्शन पाने तुम्हारे ।
यात्रा कर चुके राह बहुत लम्बी;
धन्य वह दर्शन-कामना
प्रखर आतप से नहीं दबी ।
बन जाता हृदय अपना
अपार प्रीति का भण्डार,
उनके कमनीय रूप निहार ॥'

बोलीं देवी : ' सखी मेरी !
ले आओ उन्हें न कर देरी ।
भाग्य मेरा धन्य,
मुझ पर इतने आदर हैं अनन्य ।
अवश्य पाप-ताप मिटा देंगे मेरे नयन
पाकर उनके दर्शन ॥'

देवी की आज्ञा मान
पहले आकर
एक ने मधुर मुस्कान
धीरे बिखराकर,
कई दिनों से परिचित बन्धु समान
कहा प्यारी बातों में अमृत सान ॥

'देवीजी ! स्मृति में है क्या घटना पिछली ?
किया था पदार्पण
तुमने मेरे घर ।
पाई है मेरी काया ने उसी क्षण
तुम्हारी तनु-ज्योति से सुन्दर
यह स्वर्गीय प्रभा की संपदा उजली ॥

मेरे निर्झर उस प्रभा के व्याज
आनन्द-विभोर झर्झर बहते आज ।
प्रफुल्ल-वदन पुष्प-समुदाय हास्य निखार
नन्दन-कानन का करते तिरस्कार ॥

सरिता-सलिल महकाकर सदा सुगन्ध मन्द
तटवासियों के मन में जगाता आनन्द ।
तुम्हारे प्यार-पले मयूर सारे
उच्च स्वर नित्य गाते गुण तुम्हारे ॥

प्रतिक्षण वारिद आकर बारी-बारी से
अटल अभिलाषा रख तुम्हारे दर्शन की,
ढूँढते घूम-घूम दरी-दरी से
'कहाँ है सुन्दरी जानकी' ।
पूछते मुझसे गंभीर स्वर में सभी,
'नहीं है' उत्तर से मानते नहीं कभी ।
ले उजाला बिजली का खोजते पुनर्बार
'निश्‍चित है सीता सुन्दरी' यही विचार ॥

देवीजी ! आज पहचाना क्या
इस हतभाग्य को तुमने ?
बहुत दिनों बाद आया
तुम्हारे सामने ।
तुम्हारी चरण-धूलि से सुन्दर
अपना मुकुट सजाकर
बन चुका हूँ भाग्यवान्
मैं चित्रकूट सानुमान् ॥'

तदुपरान्त पधारी एक शुभांगी रंगीली नयी
विमल-समुज्ज्वल- कान्तिमयी
प्रखर-आतप-ताप-दर्प-हारिणी,
वन-सुन्दरी की चिर-सहचारिणी,
गिरिमल्लिका- माला से कण्ठ है सज्जित हुआ,
ललाट पर रमणीय शिरोमणि महुआ ।
जम्बु-नीलरतन कर्णाभरण,
शुक्‍ति-पंक्‍ति जिसका कटि-भूषण ।
वनवासी मुनिजनों का अन्तःकरण मोहती,
सुन्दर कुटिल नील वेणी से सुहावनी लगती ॥

प्रफुल्ल प्रसन्न-वदन
उसने व्यक्‍त किया प्रत्यक्ष,
सुकुमार धीर मधुर वचन
सती के समक्ष :

'अयि सुशीले !
कृतज्ञता मेरी स्वीकार ले सादर,
तेरे स्नेह-ऋण से ऋणी हूँ निरन्तर ।
ऋण कहाँ चुका पाउँगी ? नहीं मेरी शक्‍ति ।
मुझे कृतार्थ कर, सति !
आन्तरिक भक्‍ति मेरी ले ॥

दुनिया में मेरे-जैसे हैं नहीं कितने ?
इतनी कृपा तेरी पाई है कहाँ किसने ?
पाकर तेरी शुभ दृष्टि पावनी,
मेरी बालुका है स्वर्ण-रेणु बनी ।
क्रीड़ा से रम गये जब दिव्य नयन तेरे,
तूने हीरा-क्षेत्र बना दिया वक्ष-स्थल को मेरे । (१)
विद्यमान नगेन्द्र-नन्दिनी श्रीविष्णुपदी;
फिर भी तेरी प्रदत्त उपाधि से मैं हूँ 'महानदी' ॥ '

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पादटीका (१) :
सम्बलपुर के पास महानदी-गर्भ में 'हीराकुद' नाम का क्षुद्र द्वीप है ।
वहाँ हीरा मिलने की जनश्रुति है ।
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[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, बुर्ला, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]

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