Monday, May 5, 2008

Conjugal Love of Sita-Rama (सीता-रामङ्क दाम्पत्य प्रेम) : Tapasvini Kavya

Conjugal Love of Sītā-Rāma
Extracted from
TAPASVINĪ Mahākāvya
of Poet Gańgādhara Meher

[A Great Classic of Oriya Literature]

*
English-Hindi-Sanskrit Translations
By : Dr. Harekrishna Meher
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(Original Oriya shown in Devanāgarī Script.)
सीता-रामङ्क दाम्पत्य प्रेम
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स्रोतस्वती-गति सहज थाए सागर आशे,
लङ्घे शिळा शैळ-सङ्कट य़ेबे बिरुद्धे आसे ।
बारिधि-सङ्गमे बिस्मरे सबु बिगत क्लेश,
उभय जीबने न रहे आउ प्रभेद लेश ॥

बिधि बशे उठि मध्यरे य़ेबे ऊर्द्ध्वकु भेदि,
बालि-स्तूप दिए सरित-सिन्धु- हृदय छेदि ।
सरित मरि त न पारे, तार जीबन भार,
हृदय प्रसारि रख‌इ होइ ह्रद आकार ॥
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आउ एक कथा कहुछि, एकता
बान्धि तुम्भे मन सङ्गे,
चाल हृद-सरे अनन्त बासरे
बिळसिब रस रङ्गे ॥

मो प्राण-सङ्गिनी नब कमळिनी
फुटि रहिअछि तहिँ,
स्मरण-भास्कर चिर-तेजस्कर
अस्त तार नाहिँ य़हिँ ॥
*
(तपस्विनी-काव्य द्वितीय-तृतीय-सर्गरु)
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Oriya 's Transliteration in Roman Script :
Sītā-Rāmańka Dāmpatya Prema
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Srotasvatī-gati sahaja thāe Sāgara-āśe /
Lańghe śīļā-śaiļa-sańkaţa yebe biruddhe āse //
Bāridhi-sańgame bismare sabu bigata kleśa /
Ubhaya jībane na rahe āu prabheda leśa //

Bidhi-baśe uţhi madhyare yebe ūrddhvaku bhedi /
Bāli-stūpa die Sarita- Sindhu- hrudaya chedi //
Sarita mari ta na pāre, tāra jībana bhāra /
Hrudaya prasāri rakhai hoi hrada-ākāra //
* *
Āu eka kathā kahuchi, ekatā
bāndhi tumbhe mana sańge /
Cāla hruda-sare ananta bāsare
biļasiba rasa-rańge //

Mo prāņa-sańginī naba kamaļinī
phuţi rahi achi tahin /
Smaraņa-bhāskara cira-tejaskara
asta tāra nāhin yahin //
*

( From Tapasvini. Canto-II and III )
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My English Translation :
Conjugal Love of Sītā and Rāma

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Spontaneous is the flow of River
to mingle with Sea, her own lover.
She firmly crosses pass and rock
that appear on the way to block.

With Sea, when she enjoys union,
her all previous pains plunge into oblivion.
Between the lives of the two thence
really remains not a jot of difference.

Perchance piercing up in the mid,
any huge mound of sands there
if raises high
and severs the hearts of the loving pair,
River cannot die.
Burthen of her life she bears indeed
by expanding own heart to take
the shape of a large lake.
* *
One thing more I like to tell,
Be united with mind and hasten to dwell
in the lake of heart where bliss sublime,
you all will sportively enjoy for endless time.

There abides my life-mate
new Lotus-maiden in full efflorescence.
Ever-scintillating and never-set
remains the Sun of reminiscence.

*
( From Tapasvini. Canto-II , III )
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My Hindi Translation :
सीता-राम का दाम्पत्य प्रेम
*
सागर के प्रति
सरिता की गति
रहती स्वभाव से ।
जब शिला-गिरिसंकट
सामने विघ्न-रूप हो जाते प्रकट,
उन्हें लाँघ जाती ताव से ॥

भूल जाती सब
पिछली व्यथाएँ सागर से मिलकर ।
दोनों के जीवन में तब
रहता नहीं तनिक-भी अन्तर ॥

संयोग-वश यदि बीच में उभर
ऊपर को भेदकर
छिन्न कर डालता बालुका-स्तूप
सरिता और सागर के हृदय को किसी रूप ;
वह स्रोतस्वती
मर तो नहीं सकती ।
सम्हालती अपना जीवन-भार
ह्रद-रूप बन हृदय पसार ॥
* *
कहता हूँ और एक बात,
तुमलोग मन के साथ
सब सम्मिलित होकर
चलो हृदय-सरोवर ।
उधर अनन्त दिनों तक
रमते रहोगे रस-रंग में अथक ॥

वहाँ खिली है नयी पद्मिनी
मेरी जीवन-संगिनी ।
स्मरण का सूरज वहीं सदा जगमगाता,
अस्त कभी नहीं जाता ॥
*
[तपस्विनी-काव्य. द्वितीय-तृतीय सर्ग से]
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My Sanskrit Translation :
सीता-रामयोः दाम्पत्य-प्रेम

*
स्वत एव गति-र्भवति
स्रोतस्वत्याः सागरं प्रति ।
लङ्घति सा शिला-शैल-सङ्कट-सकलम्
आयाति मार्गे यद् विरुद्धमर्गलम् ॥

पूर्व-क्लेश-समस्तं विस्मर्यते
तया तोयनिधे-र्मिलने ;
भेद-लेशोऽपि पुन-र्नावशिष्यते
तयोरुभयो-र्जीवने ॥

मध्ये दैव-वशात् समुत्थाय सपदि
ऊर्द्ध्वं भित्त्वा यदि
छिनत्ति वालुका-स्तूपस्तयोः
हृदयं ह्रादिनी-समुद्रयोः ,
कल्लोलिनी तु न म्रियते ;
प्रियतमस्य कृते
वहति सा जीवन-भारं स्वयम्
ह्रदाकारं प्रसार्य स्व-हृदयम् ॥
* *
ब्रवीमि विषयमेकमपरम्,
यूयं स्वान्तेन सार्धम्
ऐक्य-बद्धाः सर्वे निर्बाधम्
व्रजत हृदय-सरोवरम् ।
अशेष-दिवसान्यथ
रस-रङ्गेषु विलसिष्यथ ॥

तत्र वर्त्तते मम जीवन-सङ्गिनी
प्रफुल्ला नवीना राजीविनी ।
यस्मिन् सुचिर-ज्योतिष्मान्
स्मरण-विवस्वान्
अविरतं विराजते,
कदापि नास्तं भजते ॥
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(तपस्विनी-काव्यस्य द्वितीय-तृतीय-सर्गतः)
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[All Extracts of Translations are from Published Works
of Dr. Harekrishna Meher]
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