Saturday, August 8, 2009

Sāhitya Mein Mūlyabodh (साहित्य में मूल्यबोध): Harekrishna Meher

Sāhitya Mein Mūlyabodh
(Sense of Social Value in Literature)  
Hindi Article By : Dr. Harekrishna Meher    
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साहित्य में मूल्यबोध
 * डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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जीवन, साहित्य और समाज - ये तीनों तत्त्व परस्पर अन्तरंग रूप से जुड़े हुए हैं । जीवन की सुख-दुःखभरी नाना अनुभूतियों को लेकर साहित्य में शृंगार, हास्य, करुण आदि नव रसों की अवतारणा की गयी है । साहित्य-शास्त्रियों ने अपनी अपनी रचनाओं में जीवन का तात्त्विक विश्लेषण किया है । साहित्य जब जीवन-धर्मी होता है, तब पाठक और श्रोता के हृदय को विशेष रूप से स्पर्श करता है । काव्य-कविता हो, उपन्यास हो, नाटक हो, कथा हो या अन्य कुछ साहित्यिक रचना हो, हर क्षेत्र में ध्यान देने का विषय है सामाजिक मूल्यबोध । साहित्यिक कृतियों में रचनात्मक तत्त्व यदि सकारात्मक रूप में गर्भित हो, तो समाज पर अनुकूल और स्वस्थ प्रभाव अनुभूत होता है । सारस्वत साधकगण होते हैं समाज के दिग्‌दर्शक एवं असीम-शक्तिशाली व्यक्ति । कुपथ में चलनेवालों को उसीसे निवृत्त करके सत्पथ में आगे बढ़ने के लिये उत्साह और प्रेरणा देना लेखक का धर्म है । प्राणि-जगत् में मंगलकारक तत्त्व-समूह जीवनधर्मी चिन्तन का परिप्रकाश करता है । भारतीय साहित्य में 'उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान् निबोधत', 'असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय' इत्यादि उपनिषदीय वाणी मनुष्य-जीवन को संयत एवं शान्तिमय बनाने में सहायता करती है ।

विधाता की सृष्टि में सारे विश्व में धर्म-अधर्म, सत्य-मिथ्या, सुख-दुःख, आलोक-अन्धकार, भलाई-बुराई, मिलन-विच्छेद और जन्म-मरण आदि कई विरोधी तत्त्व हमेशा परस्पर संघर्ष-रत रहते हैं । मनुष्य के जीवन में धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष - ये चार पुरुषार्थ होते हैं । हर साहित्य में मनुष्य की धर्मशास्त्रीय संहिता या आचरण-पद्धति लिपिबद्ध होती रहती है । सत्कर्मों के फल अच्छे और दुष्कर्मों के फल बुरे होते हैं । ये बातें सर्वत्र भूरि-भूरि प्रतिपादित हुई हैं । इस चिरन्तन चिन्तन-धारा का प्रतिफलन समग्र विश्व-साहित्यों में परिलक्षित होता है । लोक-शिक्षा की दृष्टि से सामाजिक अंगीकार-बद्ध लेखक अपनी रचना में मानव तथा अन्य प्राणियों के जीवन में घटित अच्छाई और बुराई - दोनों दिशाओं का विवेचन करता है । आदिकवि वाल्मीकि-प्रणीत रामायण हो, महामुनि व्यास-कृत महाभारत हो या आधुनिक युग का जो कुछ भी साहित्य हो, सबमें जीवन के कुछ संघर्ष और सफलता का विवरण उपलब्ध होता है । साहित्यशास्त्रियों के मत में 'रामादिवद् वर्त्तितव्यम्, न तु रावणादिवत्' अर्थात् मर्यादा-पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र आदि आदर्श चरित्रों की भाँति अपने को प्रतिष्ठित करना चाहिये, रावण आदि निन्दित चरित्रों की तरह नहीं ।

महाभारतीय वर्णन में खलनायक शकुनि और अभिमानी अहंकारी दुर्योधन आदि कौरव पक्ष के बहुसंख्यक वीर योद्धा थे । परन्तु अन्त में सत्य-धर्म-नीतिवादी युधिष्ठिर आदि पञ्च पाण्डवों की विजय हुई है । असत्य, अन्याय और अधर्म के विरुद्ध संग्राम करके सत्य, न्याय एवं धर्म को प्रतिष्ठित करने में सफल और विजयी हुए हैं धर्म-पक्ष के पञ्च पाण्डव । इसलिये उस महाभारत ग्रन्थ का सार-मर्म है - 'यतो धर्मस्ततो जयः' , जहाँ धर्म है, वहाँ है विजय । यथार्थ में महाभारत के रचयिता वेदव्यास हैं मानव-जीवन के श्रेष्ठ व्याख्याकार । सामाजिक दृष्टि से जीवन में केवल बाह्य संघर्ष नहीं, आभ्यन्तर संघर्ष भी चलता रहता है । काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दुर्गुण मनुष्य को लक्ष्य-भ्रष्ट करके अधोगति की ओर खींच लेते हैं । अच्छाई और बुराई का भेद विचार करके सन्मार्ग में प्रवृत्त होने के लिये समाज को प्रेरणा देती है मूल्यबोध-सम्पन्न साहित्यिक रचना । इसी दृष्टि से साहित्य-सर्जनाकार की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है । नकारात्मक और विनाशात्मक चिन्तन से मनुष्य भली राह से भटक जाता है और अपने लक्ष्य से दूर चला जाता है । इसी कारण साहित्य में आवश्यक हैं सकारात्मक तत्त्व एवं विश्वजनीन उपादेयता ।

साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है । साहित्य-शिल्पी की रचना में कल्पना-विलास एवं वास्तवता का समन्वित चित्रण लेखनी को परिपुष्ट कराता है । केवल वास्तववादी वर्णन करने से कुछ नीरसता आ सकती है । कल्पना में भी वास्तवता का प्रतिफलन मानवीय संवेदना को जगाता है । अग्नि-पुराण में वर्णित है -
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"अपारे काव्य-संसारे कविरेव प्रजापतिः ।
यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्त्तते ॥"

काव्य-जगत् का सर्जक है क्रान्तदर्शी कवि । अपनी रुचि के अनुसार लेखनी-चालना करके वह विश्व में परिवर्त्तन ला सकता है । ऐसी शक्ति है कवि-लेखक के पास । साहित्यकार होते हैं सत्य-शिव-सुन्दर के उपासक, रूपकार एवं उद्‌गाता । तत्त्वज्ञ व्यक्ति इन तीन तत्त्वों को हृदयंगम करता है । जीवन को सरस सुन्दर और मधुमय करना साहित्यकार का सारस्वत कर्त्तव्य है । फलस्वरूप साहित्य-जगत् के प्रति उसकी देन सार्वकालिक और अमर हो जाती है ।

साहित्य, संस्कृति, कला, विज्ञान, वाणिज्य आदि हर विधा की प्रगति देश में जरूरी है । देश का बाह्य कलेवर होता है सभ्यता और अन्तरात्मा है संस्कृति । कला, साहित्य एवं संगीत का आदर सामाजिक जीवन को ऊँचे स्तर पर पहुँचाता है । केवल बाह्य शरीर की स्वच्छता नहीं, आत्मा की भी परिष्कृति और निर्मलता चाहिये । साहित्य में संस्कृति का उपयुक्त समावेश लेखकीय विशेषत्व होता है । सारस्वत साधक की लेखनी में कोमलता के साथ कठोरता भी रहती है । अन्याय का निराकरण और न्य़ाय की प्रतिष्ठा के लिये लेखक सदा चेष्टित रहता है । इसलिये लेखनी के कलात्मक सूक्ष्म चित्रण सहित क्रान्तिकारी चिन्तन जन-समाज को उद्‌बुद्ध और अनुप्राणित करता है । प्राणि-जगत् में मधुरादि षड़्‍ रसों के स्रष्टा हैं विश्वविधाता ब्रह्मा । परन्तु काव्य-जगत् में शृंगारादि नव रसों के स्रष्टा है स्वयं कवि । उस कालजयी सर्जक का महत्त्व वास्तव में प्रणिधान-योग्य है । ‘गरिमा कवि की’ है इसप्रकार –

“विधाता से बढ़कर उसकी सृष्टि-रचना ;
भाती अद्‌भुत उसकी उद्‌भावना ।
गूंगे मुख से बहाता
वाणी-गंगा की अमृत-धार ।
पाषाण के अंग में जगाता
मंजुल संजीवनी अपार ॥

लेखनी में उसकी छा जाती
सहस्र सूर्य-रश्मियों की लालिमा ।
अंशुमाला उज्ज्वलता फैलाती ;
हट जाती तिमिर-पटल की कालिमा ॥

वही कवि तो है क्रान्तदर्शी,
सार्थक उसकी रचना मर्मस्पर्शी ।
अतीन्द्रिय अतिमानस के राज्यों में विहर
भाती उसकी प्रतिभा सुमनोहर ॥

रस-रंगों के संगम की तरंगों से,
जीवन की विश्वासभरी उमंगों से
लिखता रहता कवि निहार चहुँ ओर,
कभी मधुर सरस, कभी तीता कठोर ॥

उसकी कुसुम-सी कोमल कलम
जब करने लगती सर्जना,
निकलती कभी संगीत संग गूँज छमछम,
फिर कभी स्वर्गीय वज्रों की गर्जना ॥" 


हमारे समाज में प्रतिभा की कमी नहीं है । जरूरत है प्रतिभा के विकास के लिये उपयुक्त समय, सुयोग एवं परिवेश की । चारित्रिक उत्कर्ष शिक्षा का प्रधान लक्ष्य और जीवन-चर्या का अत्यन्त आवश्यक तत्त्व है । आज के विज्ञान-युग में मनुष्य असाध्य साधन करने में समर्थ है । परन्तु मानसिक एवं मानविक दृष्टि से वह प्रगति के बदले अधोगति की ओर चल पड़ा है । इसी कारण आध्यात्मिक चेतना का विशेष प्रयोजन अनुभूत हो रहा है । भौतिक और यान्त्रिक शक्ति से उन्मत्त होकर आज का मनुष्य केवल स्वार्थी बन गया है । वह स्वयं मनुष्य-जाति एवं प्रकृति पर अकथनीय अत्याचार करने लगा है । इसके परिणाम-स्वरूप सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण प्रदूषित और विपर्यस्त हो गया है । सारा सन्तुलन बिगड़ गया है । भस्मासुर की भाँति मनुष्य के औद्धत्यभरे आचरणों से प्रतिक्रिया-स्वरूप सुनामी-जैसे प्राकृतिक विपर्ययों की घटना आश्‍चर्यजनक नहीं है । मनुष्य के लिये यह एक गुरुत्वपूर्ण चेतावनी है । मनुष्य के ऊर्ध्व में एक अदृश्य शक्ति है, जो सबको नियन्त्रित कर रही है । महाकाल ही अमित-बलवान् है । प्रकृति की गोद में पले हुए मनुष्य को प्रकृति की सुरक्षा हेतु यत्‍नवान् होना चाहिये । साहित्य-साधक महामनीषियों ने वैदिक युग से ही प्रकृति और मनुष्य के बीच अन्तरंग आत्मिक संबन्ध का सुन्दर वर्णन किया है ।

आज के विशृंखलित और ध्वंसाभिमुखी समाज को सन्मार्ग पर प्रवृत्त और परिचालित करने हेतु लेखनी-शक्ति की विशिष्ट पहचान होनी चाहिये । अपसंस्कृति के दूरीकरण एवं आध्यात्मिक चिन्तन-धारा में कर्मों के आचरण से ही सांस्कृतिक महत्त्व को सुरक्षित रखने में सहायता प्राप्त होगी । दृढ़ मनोबल, आत्म-विश्वास एवं सदाचार द्वारा समाज में स्वच्छ परिवेश की सर्जना की जा सकती है । देश को समृद्ध और सुसंस्कृति-सम्पन्न करने में नारी-पुरुष सभीको राष्ट्रीय कर्त्तव्य निभाना है । भारतवर्ष को एक महनीय महान् देश के रूप में सुप्रतिष्ठित करने के लिये मन, वचन और कर्म का त्रिवेणी-संगम आवश्यक है । केवल वाक्य-वीर न होकर धर्म-वीर एवं कर्म-वीर के रूप में अपने को प्रतिपादन करने से मनुष्य-जन्म की सार्थकता बनी रहेगी ।

वर्त्तमान के कम्प्युटर-युग में सारा विश्व एक परिवार-सा बन गया है । महापुरुषों की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’- भावना साकार होने लगी है । इसी परिवेश में समाज और मातृभूमि के उत्कर्ष हेतु साहित्यकारों के युगानुरूप रचनात्मक अवदान सर्वथा स्वागतयोग्य एवं अपेक्षित हैं । प्रतिभाशाली व्यक्तिगण विविध क्षेत्रों में कृतित्व अर्जन करके देश के गौरव बढ़ायें । कलम और कदम साथ–साथ आगे चलें । विश्व-नीड़ में मानवता का सौरभ वितरण करना जीवन का ध्येय बने । विश्वबन्धुता, मैत्री, प्रेम और शान्ति की पावन धारा सभीके हृदय को रसाप्लुत एवं आनन्दमय करे ।

'शान्ति-मन्त्रो जयतु नितरां सौम्य-गाने,
प्रेम-गङ्गा वहतु सुजला ऐक्य-ताने ।
निवसतु सुखं विश्व-जनता
लीयतां ननु दनुज-घनता ;
चूर्णय त्वं वैर-वर्वर-पर्वतम् ।
प्राणिनां संवेदना  जायतां सद्‌भावना
भातु सत्यं सुन्दरं शिव-शाश्वतम् ।
भारतम्, भ्राजतां नो भारतं प्रतिभा-रतम् ॥'

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1 comment:

dhaval said...

I was searching for mulyabodh and came across your article. Truely inspiring. Thank you.