Friday, February 17, 2012

‘Matrubhumi’(मातृभूमि: गंगाधर मेहेर) Harekrishna Meher

‘Matrubhumi’
Original Oriya Poem By :
Swabhava-Kavi Gangadhara Meher (1862-1924)
Hindi Translation By : Dr. Harekrishna Meher
(Taken from the Book ‘Arghya-Thaali’)


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मातृभूमि
(‘अर्घ्यथाली’ पुस्तक से)
मूल ओड़िआ कविता : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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जब बालक घूमने चलता है
घर पड़ोसियों के,
तब वह जान पाता है
अन्य सारे घर उसके साथियों के ॥
*
बाद में जब अपने मुहल्ले से
दूसरे मुहल्ले घूमता,
तब पड़ोसियों के मुहल्ले को
वह अपना समझता ।
*
अपने गाँव से निकलकर
फिर अन्य गाँव में जब चलता,
तब वह जानता,
वही गाँव है उसका, जहाँ है अपना घर ॥
*
अपने गाँव में हैं जो नदी,
तालाब, उद्यान आदि,
उन सभीको अपना मानकर कहता,
फिर उन सभीको अच्छा समझता ॥
*
बड़ा होकर वह समयानुसार
जब अन्य राज्य में करता विहार,
उधर बखानता रहता
अपने राजा और राज्य के लोगों की श्रेष्ठता ॥
*
हाथी घाड़े से बकरी भेड़ तक सारे
उसके राज्य के अच्छे हैं सभी प्यारे ।
खान है सारे सुखों की
केवल उसका राज्य ही ॥
*
फिर बड़ा होकर
जब चलता कोई कभी देशान्तर,
तब समझता वह देश स्वर्ग से है बड़ा,
जहाँ अपना घर है खड़ा ॥
*
ज्ञान-बल से जब जान पाता
जगत्पति हैं सबके जन्मदाता,
तभी सहोदर-ज्ञान करता है सही
धरती के मानव-समाज के प्रति वही ॥
*
तब वह जानता है, जो कोई भी
करता है लोगों का उपकार जितना,
विश्वपति के विश्व-गृह में वही
सन्तान है योग्य उतना ॥
*
इसी भाँति गाँव की बातें,
राज्य की, देश की और विश्व की बातें
होती हैं प्रतीत मनुष्य-जीवन में,
यह दृश्य होता है सभी रूप में ॥
*
मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति
जिसके हृदय में अपनापन जन्मा नहीं,
करेंगे जब ज्ञानियों में उसकी गिनती
तो कहाँ रहेंगे अज्ञानी ? *
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Ref : ‘Nawya’ Hindi e-magazine : http://www.nawya.in/hindi-sahitya/item/मातृभूमि.html


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Wednesday, January 4, 2012

Kosali Song 'Maati Maa’r Baasanaa' on DoorDarshan National Odia Channel: Dr. Harekrishna Meher

Kosali Song  'माटि  माआँर्  बासना'
Maati Maa’r Baasanaa ('Fragrance of Mother Earth')
Lyrics and Tuning By : Dr. Harekrishna Meher

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Kosali Song (Maati Maa’r Baasanaa) accompanied with Folk Dance
In male-female-tone and chorus was telecast on DD Odia

(DoorDarshan Channel-1, National Odia, Bhubaneswar)  
in the morning of 31 December 2011 at 6 AM
On the occasion of HAPPY NEW YEAR – 2012.

Further it was telecast on Bhawanipatna DoorDarshan Kendra

on 2 January 2012 at 5.05 PM.
This song was included as the first item in the Program entitled ‘ULGI-2012’  
Produced by Bhawanipatna DoorDarshan Kendra. Kalahandi, Odisha.
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DD Kosali Song Maati Maa'r Baasanaa’ (माटि  माआँर्  बासना) : 
YouTube VIDEO Link :
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Updated New Post  (Sept. 2017): YouTube Link : 
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Maati Maa’r Baasanaa ('Fragrance of Mother Earth')
Lyrics and Tuning By : Dr. Harekrishna Meher
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[Maa’r paade bandanaa,
Maa’r paade paarthanaa,
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r basanaa..
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r basanaa.]
*
Purub dige suruj ude helaanaa, helaanaa, helaanaa re …
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r baasanaa,
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r baasanaa,
Maati Maa’r basanaa, Maati Maa’r saadhanaa,
Maati Maa’r chetanaa, Kalaabatir bhaabanaa …
Jagate mahakijibaa Kalaabatir bhaabanaa,
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r bhaasanaa,
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r saadhanaa
Jagate mahakijibaa Maati maa’r baasanaa. (0)
*
Kharaa barshaa sheet,
Ee jibanar reet,
Sukhar dukhar saathi aame Gaaemu khusir geet.
Dhol nishaan ghumraa,
Hajei desi jhumraa,
Bhaaba-rangar phule gungun Karsi man-bhamraa.
Kede shobhaa naed dangar jharanaa ..
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r chetanaa.
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r saadhanaa,
Jagate mahakijibaa Kalaabatir bhaabanaa,
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r baasanaa. (1)
*
Utha bhaai bhaen,
Dei man dhien,
Milimisi bhal kaame Jiban karmu dhaen.
Nuaa sakaalar kiran,
Karbaa andhaar haran,
Desar hite sebaa karmu Aashaa hebaa puran.
Bhaarat Maati Maa’r paade bandanaa..
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r chetanaa.
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r saadhanaa,
Maa Maanikeswarir paade paarthanaa..
Jagate mahakijibaa Kalaabatir bhaabanaa,
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r baasanaa. (2)

Purub dige suruj ude helaanaa, helaanaa, helaanaa re ..
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r baasanaa,
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r baasanaa,
Maati Maa’r basanaa, Maati Maa’r saadhanaa,
Maati Maa’r chetanaa, Kalaabatir bhaabanaa …
Jagate mahakijibaa Kalaabatir bhaabanaa,
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r bhaasanaa,
Jagate mahakijibaa Maati Maa’r saadhanaa,
Jagate mahakijibaa Maati maa’r baasanaa.

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‘माटि  माआँर्  बासना’
कोसली गीत एवं स्वर रचना : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर  
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माआँर् पादे बन्दना, माआँर् पादे पार्थना,
जगते महकिजिबा  माटि माआँर् बासना …  
*
पूरुब् दिगे  सूरुज् उदे हेलाना, हेलाना, हेलाना रे…;   
जगते महकिजिबा  माटि माआँर् बासना ।
माटि माआँर् बासना, माटि माआँर् साधना,
माटि माआँर्  चेतना, कलाबतीर् भाबना …  
जगते महकिजिबा  कलाबतीर् भाबना,
जगते महकिजिबा  माटि माआँर् बासना ।
जगते महकिजिबा  माटि माआँर् साधना,  
जगते महकिजिबा  माटि माआँर् बासना  ॥ (०)
*
खरा बर्षा शीत्,  इ जीबनर् रीत्,
सुखर्  दुखर्  साथी आमे,  गाएमुँ खुसिर् गीत् ।
ढोल् निसान्  घुम्‍रा,  हजेइ देसि झुम्‍रा,
भाब-रङ्गर्  फुले गुन्-गुन्  कर्सि मन्-भम्‍रा ।  
केड़े शोभा  नएद् डङ्गर् झरना …
जगते महकिजिबा  माटि माआँर्  चेतना,  
जगते महकिजिबा  माटि माआँर् साधना ।   
जगते महकिजिबा  कलाबतीर् भाबना ।
जगते महकिजिबा  माटि माआँर बासना  ॥(१)
*
उठ भाइ भएन्,  देइ मन् धिएन्,
मिलिमिशि  भल् कामे,  जीबन् कर्मुँ धएन् ।
नूआ सकालर् किरन्, कर्बा अन्धार् हरन्,
देशर् हिते  सेबा कर्मुँ ,  आशा हेबा पूरन् ।
भारत् माटि माआँर् पादे बन्दना…,
जगते महकिजिबा  माटि माआँर् चेतना,
जगते महकिजिबा  माटि माआँर् साधना ।   
माँ माणिकेश्वरीर्  पादे पार्थना…,
जगते महकिजिबा  कलाबतीर् भाबना,   
जगते महकिजिबा  माटि माआँर् बासना ।
जगते महकिजिबा  माटि माआँर् साधना,   
जगते महकिजिबा  माटि माआँर् बासना  ॥(२)
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‘Fragrance of Mother Earth’
English Translation by the Author Dr. Harekrishna Meher:
Link : PoemHunter :
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VIDEOS of Dr. Harekrishna Meher :
* (On YouTube)
Dr. Harekrishna Meher’s Videos (Search): Youtube Link:
* * * 
Biodata : Dr. Harekrishna Meher:  
Link :  http://hkmeher.blogspot.com/2012/06/brief-biodata-english-dr-harekrishna.html
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A Simple Homemade Video of the Song * Maati Maar Baasanaa* :
In the Voice of Lyricist Dr.Harekrishna Meher :(Made in 2008): 
YouTube Link : 
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Patriotic Koshali Song ‘Māţi Māār Bāsanā’ (Fragrance of the Mother Earth)
This song was presented as chorus in Kalahandi Utsav-2005
celebrated at Bhawanipatna and was live telecast on local TV channels.
It was also published in the Souvenir ‘Kalā-Jharan’.

Lyrics, Tuning and Direction by : Dr. Harekrishna Meher. 
Link:
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Related Links :
कोशली गीतमाला : Kosali Geeta-Mala (Anthology of Original Kosali Songs)  
By : Dr. Harekrishna Meher
Link :
*
Literary Works of Dr. Harekrishna Meher :
Link :
* * *
Contributions of Dr. Harekrishna Meher to Sanskrit Literature:  
*
*
Translated Works of Dr. Harekrishna Meher : 

Friday, December 30, 2011

Three Poems of Mahendra Bhatnagar (Oriya: Harekrishna Meher)

डॉ. महेन्द्र भटनागर की तीन कवितायें
मूल हिन्दी से ओड़िआ भाषान्तर : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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Three Hindi Poems of Dr. Mahendra Bhatnagar
Oriya Translation By : Dr. Harekrishna Meher
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१. बिजलियाँ गिरने नहीँ देंगे :
विद्युत्‌पात हेबाकु देबुँ नाहिँ :

http://hkmeher.blogspot.in/2011/12/mahendra-bhatnagars-poem-oriya-version_28.html
*
२. अदम्य :
अदम्य :
http://hkmeher.blogspot.in/2011/12/mahendra-bhatnagars-poem-oriya-version.html
*
३. ओ भवितव्य के अश्वो ! :
हे भबितव्यर अश्वगण ! :

http://hkmeher.blogspot.in/2011/12/hindi-poem-of-mahendra-bhatnagar-oriya.html
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Biography of Poet Dr. Mahendra Bhatnagar : http://www.srijangatha.com/profiles_Args_34


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Thursday, December 29, 2011

Indradhanu & Aamrakuta (Kosali Meghaduta: Harekrishna Meher)

Indradhanu & Aamrakuta
From ‘Kosali Meghaduta’
of Dr. Harekrishna Meher:
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इन्द्रधनु एवं आम्रकूट पर्वत
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इन्दर् धनु केते सुन्दर् दिशुछे इ साम्‌ने,
बिनोमुँड़िर् टिपिनुँ से उठिछे जतने ।
गुटे ठाने मिशि गले
रतन् केते बानि,
तेज् झल्‌मल् करुछे सते
मन्‌के नेसि टानि ।
इ धनु त तोर् साम्‌ला देहिके,
सजेइ देबा केते रंगे
अएन् दिश्‌बु सेनुँ ।
खोच्‌ले य़ेन्ति रङ्ग्‌रङ्गिआ मजूर्-चूल्,
गोपाल्-बेशे सुन्दर् देही
नन्दनन्दन् काह्नु ॥

[15]

*
आम्रकूटे तिहिड़ि देइ मुषल् धारा बिषम्,
जंग्‌ली जूएर् उत्पात्‌के करि देबु खतम् ।
बाट् चालिचालि तुइ त थाकि
य़ाइथिबु केते,
आदर् करि शुर्‌ङ्गे निजर्
ठान् देबा से तोते ।
आस्‌रा लागि पाशे बन्धु आएले
सेतार् आघर् उप्‌कार्‌के इ बेले,
हेतेइ करि कृपण् घले
अनादर् करे नाइँ ।
देखुछु त आम्रकूट पर्बत
केड़े उँचा बहिछे मान् महत,
इतार् सरि साधुर् कथा
काणा कहेमि मुइँ ॥

[17]
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( कोशली मेघदूत : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर )
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Wednesday, December 28, 2011

Mahendra Bhatnagar’s Poem विद्युत्‌पात हेबाकु देबुँ नाहिँ (Oriya Version : Harekrishna Meher
























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मूल हिन्दी कविता : बिजलियाँ गिरने नही देंगे
रचयिता : डॉ. महेन्द्र भटनागर
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कुछ लोग
चाहे जोर से कितना
बजाएँ युद्ध का डंका
पर, हम कभी भी
शान्ति का झंडा
जरा झुकने नहीं देंगे ।
हम कभी भी
शान्ति की आवाज को
दबने नहीं देंगे ।

क्योंकि हम
इतिहास के आरम्भ से
इन्सानियत में,
शान्ति में
विश्वास रखते हैं,
गौतम और गान्धी को
हृदय के पास रखते हैं ।
किसीको भी सताना
पाप सचमुच में समझते हैं,
नहीं हम व्यर्थ में पथ में
किसी से जा उलझते हैं ।

हमारे पास केवल
विश्व-मैत्री का,
परस्पर प्यार का सन्देश है,
हमारा स्नेह
पीड़ित ध्वस्त दुनिया के लिए
अवशेष है ।

हमारे हाथ
गिरतों को उठाएंगे,
हजारों
मूक, बंदी, त्रस्त, नत,
भयभीत, घायल औरतों को
दानवों के क्रूर पञ्जों से बचाएंगे ।

हमें नादान बच्चों की हँसी
लगती बड़ी प्यारी,
हमें लगतीं
किसानों के
गडरियों के
गलों से गीत की कड़ियाँ मनोहारी ।
खुशी के गीत गाते इन गलों में
हम
कराहों और आहों को
कभी जाने नहीं देंगे ।


हँसी पर खून की छींटें
कभी पड़ने नहीं देंगे ।
नये इनसान के मासूम सपनों पर
कभी भी बिजलियाँ गिरने नहीं देंगे ।
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Hindi Poem of Dr. Mahendra Bhatnagar
Oriya Translation By : Dr. Harekrishna Meher
(Bidyutpaata hebaaku debun naahin)
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विद्युत्‌पात हेबाकु देबुँ नाहिँ
(मूल हिन्दी कविता –
बिजलियाँ गिरने नहीँ देंगे : डॉ. महेन्द्र भटनागर)

ओड़िआ भाषान्तर : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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किछि लोक य़ेते जोर्‌रे
य़ुद्धर डिण्डिम पिटुथान्तु पछे,
आमे केबेहेले
शान्तिर वैजयन्तीकु
टिकिए बि नइँबाकु देबुँ नाहिँ ।
आमे केबे बि
शान्तिर उदात्त उच्चारणकु
दमित हेबाकु देबुँ नाहिँ ॥

कारण हेउछि,
आमे इतिहासर प्रारम्भरु
विश्वास रखिछुँ
मानविकतारे
आउ शान्तिरे ।
गौतम आउ गान्धीङ्कु
आमे रखिछुँ
आपणार हृदय निकटरे ।
काहारिकि पीड़ा देबा
आमे बास्तबरे पाप बोलि बुझुँ ।
काहारि सङ्गे
तुच्छाटारे रास्तारे
आमे कळिद्वन्द्व करुँना ॥

आमठारे रहिछि
बार्त्ता केबळ विश्वमैत्रीर,
परस्पर प्रेमर ।
पीड़ित ध्वस्त दुनिआ लागि
अबशिष्ट रहिछि
आमरि आन्तरिक स्नेह ॥

आमरि हात
कराइब निश्चित
पतितमानङ्कर उत्थान ।
हजार हजार
मूक बन्दी त्रस्त नत
भयभीत आहत
महिळामानङ्कु सुरक्षा करिब
दानबमानङ्कर क्रूर पञ्झारु ॥

निरीह निष्कपट
शिशुमानङ्कर हस
आमकु बहुत भल लागे ।
कृषकमानङ्कर
आउ मेषपाळकमानङ्कर कण्ठरु
निर्गत गीत-पङ्क्ति
आमकु लागे
बहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी ।
आनन्दर गीत गाउथिबा
एइ कण्ठमानङ्करे
दुःखर उच्छ्वास आउ य़न्त्रणाकु
केबेहेले प्रबेश कराइ देबुँ नाहिँ ॥

हस उपरे रक्तर छिटा पड़िबाकु
केबेहेले देबुँ नाहिँ ।
नूतन मणिषर निश्छळ स्वप्न उपरे
केबेहेले बिद्युत्पात
हेबाकु देबुँ नाहिँ ॥

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Mahendra Bhatnagar’s Poem अदम्य (Oriya Version: HK Meher)

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मूल हिन्दी कविता : अदम्य
रचयिता : डॉ. महेन्द्र भटनागर
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दूर-दूर तक छाया सघन कुहर,
कुहरे को भेद
डगर पर बढ़ते हैं हम ।

चट्टानों ने जब-जब पथ अवरुद्ध किये,
चट्टानों को तोड़ नयी राहें गढ़ते हैं हम ।

ठंडी तेज हवाओं के वर्तुल झोंके आते हैं,
तीव्र चक्रवातों के सम्मुख सीना ताने
पग-पग अड़ते हैं हम ।

सागर-तट पर टकराता भीषण ज्वारों का पर्वत,
उमड़ी लहरों पर चढ़ पूरी ताकत से लड़ते हैं हम ।

दरियाओं की बाढ़ें तोड़ किनारे बहती हैं,
जल-भँवरों, आवेगों को थाम
सुरक्षा-यान चलाते हैं हम ।

काली अंधी रात कयामत की
धरती पर घिरती है जब-जब,
आकाशों को जगमग करते
आशाओं के विश्वासों के
सूर्य उगाते हैं हम ।
मणि-दीप जलाते हैं हम ।

ज्वालामुखियों ने जब-जब
उगली आग भयावह,
फैले लावे पर
घर अपना बेखौंफ बनाते हैं हम ।

भूकम्पों ने जब-जब
नगरों गावों को नष्ट किया,
पत्थर के ढेरों पर
बस्तियाँ नयी हर बार बसाते हैं हम ।

परमाणु-बमों उद्जान-शस्त्रों की
मारों से
आहत भू-भागों पर
देखो कैसे
जीवन का परचम फहराते हैं हम ।
चारों ओर नयी अँकुराई हरियाली
लहराते हैं हम ।

कैसे तोड़ोगे इनके सिर ?
कैसे फोड़ोगे इनके सिर ?
दुर्दम हैं,
इनमें अद्भुत खम है ।
काल-पटल पर अंकित है -
‘जीवन अपराजित है ।’

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Hindi Poem of Dr. Mahendra Bhatnagar
Oriya Translation By : Dr. Harekrishna Meher

(Adamya)
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अदम्य
मूल हिन्दी कविता - अदम्य : डॉ. महेन्द्र भटनागर .
ओड़िआ भाषान्तर : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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बहु दूर य़ाए छाइ य़ाइछि
गहन कुहेळिका ।
सेइ कुहेळिका भेदि
आमे आगेइ चालिछुँ रास्तारे ॥
*
बड़ बड़ पथर-खण्डगुड़िक
य़ेबे य़ेबे रास्ता अबरुद्ध करे,
सेइ पथर-खण्डगुड़िकु भाङ्गिदेइ
नूतन मार्ग निर्माण करुँ आमे ॥
*
शीतळ प्रखर पबनर घूर्णि झड़ आसे,
तीब्र चक्र-बात सम्मुखरे
बक्ष प्रसारित करि
अटळ रहुँ आमे प्रति पद-क्षेपरे ॥
*
सिन्धु-तटरे आघात दिए
भीषण जुआरर पर्बत ।
प्रबळ ढेउ उपरे चढ़ि
समस्त शक्ति लगाइ
आमे तत्पर होइथाउँ घोर संग्रामरे ॥
*
स्रोतस्विनी-समूहर बन्या
कूळ भाङ्गि बहि चाले ।
जळ-भउँरी आउ आबेगकु स्थिर रखि
आमे चाळना करुँ सुरक्षार य़ान ॥
*
प्रळयर कळा अन्धकार रात्री
य़ेबे य़ेबे पृथिबीकु घेरिय़ाए,
ब्योम-परिसरकु उज्ज्वळतारे भरिदेइ
आमे कराइथाउँ सूर्य्य़ोदय
आशार आउ बिश्वासर ।
कराइथाउँ आमे
मणि-प्रदीप प्रज्वळित ॥
*
आग्नेय-गिरिराजि य़ेबे य़ेबे
भयङ्कर अग्निर उद्गिरण करे,
बिस्तृत लाभा उपरे
निज भबन निर्माण करुँ
आमे निर्भयरे ॥
*
भूमिकम्प य़ेबे य़ेबे
नगर आउ ग्राम-समूहकु नष्ट करे,
ध्वस्त प्रस्तर-स्तूप उपरे
नूतन बसति
निर्माण करुँ आमे प्रति थर ॥
*
परमाणु बोमार, उद्जान शस्त्रराशिर
प्रबळ प्रहार य़ोगुँ
आहत भूखण्ड उपरे
देख केमिति
उड़ाइथाउँ आमे
जीबनर बैजयन्ती ।
चतुर्दिगरे आमे दोळायित करुँ
नब अङ्कुरराजिर सबुजिमा ॥
*
केमिति भाङ्गिब तुमे सेमानङ्क मस्तक ?
केमिति फटाइब तुमे सेमानङ्क मुण्ड ?
सेमाने अत्यन्त दुर्द्दम;
सेमानङ्क निकटरे अछि अद्भुत साहस ।
काळ-पटळ उपरे अङ्कित होइ रहिछि
“ जीबन अपराजित ” ॥
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Tuesday, December 27, 2011

Hindi Poem of Mahendra Bhatnagar (Oriya Rendering: Harekrishna Meher


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मूल हिन्दी कविता : ओ भवितव्य के अश्वो !
रचयिता :
डॉ. महेन्द्र भटनागर
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ओ भवितव्य के अश्वो !
तुम्हारी रास
हम
आश्वस्त अंतर से सधे
मजबूत हाथों से दबा
हर बार मोड़ेंगे ।

वर्चस्वी,
धरा के पुत्र हम
दुर्धर्ष,
श्रम के बन्धु हम
तारुण्य के अविचल उपासक
हम तुम्हारी रास
ओ भवितव्य के अश्वो !
सुनो
हर बार मोड़ेंगे ।

ओ नियति के स्थिर ग्रहो !
श्रम-भाव तेजोदृप्त
हम
अक्षय तुम्हारी ज्योति
ग्रस कर आज छोड़ेंगे ।

तितिक्ष अडिग
हमें दुर्ग्रह नहीं अब
अन्तरिक्ष अगम्य ।
निश्चय
ओ नियति के
पूर्व निर्धारित ग्रहो !
हम ..
हम तुम्हारी ज्योति
ग्रस कर आज छोड़ेंगे ।

ओ अदृष्ट की लिपियो !
कठिन प्रारब्ध हाहाकार के
अविजेय दुर्गो !
हम उमड़
श्रम-धार से
हर हीन होनी की
लिखावट को मिटाएंगे ।

मदिर मधुमान
श्रम संगीत से
हम
हर तबाही के
अभेदे दुर्ग तोड़ेंगे ।
ओ भवितव्य के अश्वो !
तुम्हारी रास मोड़ेंगे ।


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Hindi Poem of Dr. Mahendra Bhatnagar
Oriya Translation By : Dr. Harekrishna Meher

(He Bhavitavyara Aśvagaņa ! )

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हे भबितव्यर अश्वगण !
मूल हिन्दी कविता - ओ भवितव्य के अश्वो ! : डॉ. महेन्द्र भटनागर.
ओड़िआ भाषान्तर : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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हे भबितव्यर अश्वगण !
तुमरि लगाम्
आमे समस्ते
आश्वस्त चित्तरे प्रवृत्त
शक्तिशाळी हातरे दबाइ
प्रति थर मोड़ि चालिबुँ स्वेच्छारे ॥
*
महाबळशाळी आमे,
बसुन्धरार सन्तान ।
दुर्द्धर्ष समस्ते,
श्रमर बन्धु आमे,
तरुणिमार अबिचळित उपासक आमे ।
हे भबितव्यर अश्वगण !
शुण,
तुमरि लगाम् आमे स्वेच्छारे
मोड़ि चालिबुँ प्रति थर ॥
*
हे नियतिर स्थिर ग्रहगण !
श्रम-भाब तेजोदृप्त
आमे अक्षय
तुमरि ज्योतिकु
आजि ग्रास करिबुँ निश्चय ॥
*
तितिक्षु अचळ आम पाइँ
आजि आउ दुर्ग्रह नुहे
अन्तरीक्ष अगम्य ।
हे नियतिर पूर्ब-निर्द्दिष्ट ग्रहगण !
आमे,
आमे तुमरि ज्योतिकु
ग्रास करिबुँ निश्चय ॥
*
हे अदृष्टर लिपिगण !
कठिन प्रारब्ध हाहाकारर
अपराजेय दुर्गराजि !
श्रम-धारारे उच्छळ होइ
प्रत्येक हीन घटणार लेखाकु
आमे लिभाइदेबुँ ।


मदिर आउ मधुमान् श्रम-सङ्गीत य़ोगे
आमे प्रत्येक ध्वंसर
अभेद्य दुर्गकु भाङ्गिदेबुँ ।
हे भबितव्यर अश्वगण !
आमे तुमरि लगाम्
मोड़ि चालिबुँ निज इच्छामते ॥
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