Included in
Kavitavali-Madhuri (Anthology of Odia Poems) : କବିତାବଳୀ-ମାଧୁରୀ :
https://hkmeher.blogspot.com/2026/04/l-kavitavali-anthology-of-odia-poems-by.html
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Saturday, July 16, 2011
Tumaku Mu Dekhe {तुमकु मुँ देखेँ) भक्तिगीत- Oriya Script Image
Friday, December 31, 2010
Tumaku Mu Dekhe Niti (तुमकु मुँ देखेँ निति): Oriya Devotional Song: Dr. Harekrishna Meher
(I behold You everyday)
[Oriya Devotional Song]
Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher
* * *
गीति एवं स्वर-रचना : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
प्रणति मो घेन
* ତୁମକୁ ମୁଁ ଦେଖେଁ ନିତି *
(ମୈାଳିକ ଭକ୍ତି ଗୀତ)
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ରଚନା ଏବଂ ସ୍ୱର-ସଂଯୋଜନା :
ଡକ୍ଟର୍ ହରେକୃଷ୍ଣ ମେହେର
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ତୁମକୁ ମୁଁ ଦେଖେଁ ନିତି କବିତାରେ,
ଅନନ୍ତ ମହିମା ନାହିଁ ଯାର ସୀମା
ବହିପାରଇ କି ତୂଳୀ-ଛବି ତାରେ ।
ତୁମକୁ ମୁଁ ଦେଖେଁ ନିତି କବିତାରେ ।। (୦)
*
ହୃଦୟର ଭାବ ଏକା ତୁମ ପାଇଁ ସବୁ କିଛି,
ଭକତିର ଡୋରେ ବନ୍ଧା ତୁମ କୀର୍ତ୍ତି ରହିଅଛି ।
ତୁମେ ଶ୍ୟାମ ଘନ
ମୟୂର ମୋ ମନ
ନାଚିଯାଏ ମଜ୍ଜି ପ୍ରେମ-ସରିତାରେ ।
ତୁମକୁ ମୁଁ ଦେଖେଁ ନିତି କବିତାରେ ।। (୧)
*
ମୋ କିଞ୍ଚିତ ଭାବ ଘେନ ଭାବଗ୍ରାହୀ ତୁମେ ଯେଣୁ,
ବିଞ୍ଚିଦିଅ ଜ୍ୟୋତିରୂପ କରୁଣା-କିରଣ-ରେଣୁ ।
ବିତରି ଆନନ୍ଦ
ବିରାଜ ଗୋବିନ୍ଦ !
ମୋ ହୃଦ-ମନ୍ଦିରେ ଦୀପ-ସଳିତାରେ ।
ତୁମକୁ ମୁଁ ଦେଖେଁ ନିତି କବିତାରେ ।। (୨)
*
ହରି ସର୍ବଦୁଃଖହାରୀ ଜଗତର ନାଥ ତୁମେ,
ମାନବ ବେଭାରେ ଦିବ୍ୟ ଲୀଳାମୟ ମର୍ତ୍ତ୍ୟଭୂମେ ।
ବିଶ୍ୱଜନ-ପ୍ରୀତି-ମୈତ୍ରୀ ବାରତାରେ ।
ତୁମକୁ ମୁଁ ଦେଖେଁ ନିତି କବିତାରେ ।। (୩)
*
ନଉକା ତୁମେ ତ ଏକା ତରିବାକୁ ଭବ-ସିନ୍ଧୁ,
ମୁକତି-ଦାୟକ ବିଭୁ ଦୀନଜନ-ପ୍ରାଣବନ୍ଧୁ ।
ପ୍ରଣତି ମୋ ଘେନ
ଦୁରିତ-ନାଶନ !
ପ୍ରଣତି ମୋ ଘେନ
ହେ ବିଶ୍ୱପାବନ !
ଶରଧା ବଳିଛି ନାମ-ମୁକୁତାରେ ।
ତୁମକୁ ମୁଁ ଦେଖେଁ ନିତି କବିତାରେ ।
ତୁମକୁ ନିରେଖେଁ ନିତି ସବିତାରେ ।। (୪)
Included in
Kavitavali-Madhuri (Anthology of Odia Poems) : କବିତାବଳୀ-ମାଧୁରୀ :
https://hkmeher.blogspot.com/2026/04/l-kavitavali-anthology-of-odia-poems-by.html
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Biodata: Web Version:
https://hkmeher.blogspot.com/2012/06/brief-biodata-english-dr-harekrishna.html?m=0
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Saturday, October 30, 2010
अमर कवि (Amara Kabi): Oriya Poem: Dr. Harekrishna Meher
By : Dr. Harekrishna Meher
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अमर कवि (ओड़िआ कविता)
रचयिता : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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लेखिय़ाए य़ेते अमर कबि,
अपूरुब भाब
अनुपम तार दिव्य छबि ॥
*
बिधातारु बळि
अद्भुत तार उद्भाबनी,
मूक-मुखे भाषा-
पाषाण-अङ्गे सञ्जीबनी ॥
*
काव्याकाशे ता
बिमळ-बर्ण्ण बिबस्वान,
द्रबिय़ाए हेळे
आसि हेले ताहा सन्निधान ॥
*
अति-मानबर
अतीन्द्रियर राष्ट्रपरे,
अबिरत सेइ
आत्मा बिहरे हर्षभरे ॥
*
सहज शकति
क्रान्त-दरशी कबिर मन,
तार अनल्प
ए त आदर्श निदर्शन ॥
*
से शकति घेनि
नब्य भब्य काब्य-कळा,
तेणु बरेण्य-
कृति ता निरत पुण्य-फळा ॥
*
जगते सत्य़
उपासना करे रूपाङ्कने,
प्राणे भरिदिए
सम्मोहि रस- उद्बेळने ॥
*
लेखिय़ाए केते अमर कबि,
कुसुम- कोमळ
निनादइ शत दिव्य पबि ॥
= = = = = =
(Included in ‘BANĀNĪ’, Anthology of Oriya Poems,
Published by Kalahandi Lekhak Kala Parishad,
Bhawanipatna, Orissa, India. 2009)
* * * *
Included in
Kavitavali-Madhuri (Anthology of Odia Poems) : କବିତାବଳୀ-ମାଧୁରୀ :
https://hkmeher.blogspot.com/2026/04/l-kavitavali-anthology-of-odia-poems-by.html
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Biodata: Web Version:
https://hkmeher.blogspot.com/2012/06/brief-biodata-english-dr-harekrishna.html?m=0
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Thursday, February 4, 2010
मुक्त बिहङ्ग आमे (Mukta Bihańga Āme: Patriotic Odia Song): Dr.Harekrishna Meher
(Oriya Patriotic Song)
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For Homemade Video Song,
* * * * *
*
(ओड़िआ देशात्मबोधक गीत)
गीत एवं स्वर-रचना : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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शुभ्र आकाशर मुक्त बिहङ्ग आमे,
महासागरर तुङ्ग तरङ्ग आमे ।
शुभ्र हिमालय उन्नत शृङ्ग आमे,
महासागरर तुङ्ग तरङ्ग आमे,
तुङ्ग तरङ्ग आमे ।
मुक्त बिहङ्ग आमे, तुङ्ग तरङ्ग आमे ॥ (0)
*
आम हाते रहिछि
देश आउ जातिर प्रगति,
आम साथे रहिछि
मानब जन्मर सुगति ।
जन-उपकारे नियोजित हेबारे
बीर सैनिक शक्त अङ्ग आमे ।
तुङ्ग तरङ्ग आमे ।
मुक्त बिहङ्ग आमे, तुङ्ग तरङ्ग आमे ॥ (१)
*
हसि उठु हरषे
सूर्य़्योदयर लालिमा,
दूर हेउ मनरु
गहन अन्धार काळिमा ।
जीबन-बीणारे सजाइबा सरसे
सुन्दर मधुर राग रङ्ग आमे ।
तुङ्ग तरङ्ग आमे ।
मुक्त बिहङ्ग आमे, तुङ्ग तरङ्ग आमे ॥ (२)
*
भरि य़ाउ हृदये
भारतीय भाबर सुरभि,
उल्लसित हेउ
सबुरि अन्तर ता लभि ।
एक परिबार ए भारत-भूइँरे
सन्तान सरबे अन्तरङ्ग आमे ।
तुङ्ग तरङ्ग आमे ।
मुक्त बिहङ्ग आमे, तुङ्ग तरङ्ग आमे ॥ (३)
Mukta Bihańga Āme
(Oriya Patriotic Song)
Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher
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Śubhra ākaśara Mukta bihańga āme,
Mahasāgarara Tuńga tarańga āme,
Tuńga tarańga āme.
Śubhra Himāļaya unnata śruńga āme,
Mahasāgarara tuńga tarańga āme.
Tuńga tarańga ame.
Mukta bihańga ame, Tuńga tarańga āme // (0)
Āma hāte rahichhi
Deśa āu jātira pragati,
Āma sāthe rahichhi
Mānaba janmara sugati.
Jana-upakāre niyojita hebāre
Bīra sainika śakta ańga āme,
Tuńga tarańga āme.
Mukta bihańga ame, Tuńga tarańga āme // (1)
Hasi uţhu harashe
Sūryyodayara lālimā,
Dūra heu manaru
Gahana andhāra kāļimā.
Jībana-bīņāre sajāibā sarase
Sundara madhura rāga rańga āme,
Tuńga tarańga āme.
Mukta bihańga ame, Tuńga tarańga āme // (2)
*
Bhari jāu hrudaye
Bhāratīya bhābara surabhi,
Ullasita heu
Saburi antara tā labhi.
Eka paribāra E Bhārata-bhūinre
Santāna sarabe antarańga āme,
Tuńga tarańga āme.
Mukta bihańga ame, Tuńga tarańga āme // (3)
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"Kavitavali"
of Dr. Harekrishna Meher)
(This was chorally presented with music as Opening Song
in the Inaugural Function of 6-Day Golden Jubilee Celebration
(1-6 February 2010)
of Government Autonomous College, Bhawanipatna, Orissa
on February 1, 2010.
Convenor of Cultural Program and Lyricist-cum-composer
Dr. Harekrishna Meher
along with students of the College participated in singing.)
* * * * *
Saturday, January 2, 2010
नववर्षर सद्भावना (Nava-Varshara Sadbhāvanā): HKMeher
(Best Wishes for New Year)
Oriya Poem by : Dr. Harekrishna Meher
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नववर्षर सद्भावना (ओड़िआ कविता)
रचना : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
(राग- शङ्कराभरण)
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स्वागत घेन सादर हे नब बरष !
बितर आशिष सर्ब हृदये हरष ।
दिअ नब उद्दीपना,
कर्त्तव्ये रत हुअन्तु सर्बे शुद्धमना ॥ (१)
*
काळचक्रर घूर्ण्णने समस्त जगत,
लभइ परिबर्त्तन सत्य ए सतत ।
नब नब उद्भाबना,
जन-हिते हेउ रचि समृद्धि कामना ॥ (२)
*
उद्भासित हेउ हृदे दिव्य प्रेम-ज्योति,
मानबिकतार माळे भ्रातृभाब-मोति ।
हेउ चिर बिभ्राजित,
सदाचार य़ोगुँ सदा मनुष्य पूजित ॥ (३)
*
सर्ब मुखे हेउ शान्ति-मन्त्र उच्चारण,
देशात्मबोध- भावना लभु जागरण ।
दुःख य़ाउ अपसरि,
हृदय-सिन्धुरे खेळु आनन्द-लहरी ॥ (४)
*
हिंसा द्वेष ईर्ष्या द्वन्द्व दूर हेउ मनुँ,
उत्साह-तत्पर सुस्थ रहु सर्ब तनु ।
मन्द कर्म तेजि नरे,
हुअन्तु सुनियोजित मङ्गळ कर्मरे ॥ (५)
*
देशे देशे प्रतिष्ठित हेउ सुसम्पर्क,
सत्कर्मे प्रेरणा देउ सहस्रांशु अर्क ।
साम्य-आलोक बितरि,
परिबेश सन्तुळित रहिब य़ेपरि ॥ (६)
*
बन्य जन्तु पशु पक्षी सुरक्षित भाबे,
बितान्तु जीबन निज प्रबृत्ति स्वभाबे ।
जळे स्थळे नभे दूर,
हेउ नित्य मनुष्यर अत्याचार क्रूर ॥ (७)
*
हसि उठु तरु-लता प्रकृति-प्रसादे,
धन-धान्यभरा देश रहु अप्रमादे ।
मनुँ दूर हेउ भय,
सकळे रहन्तु सौख्यमय निरामय ॥ (८)
*
प्रकृति-मानब मध्ये शाश्वत सम्बन्ध,
अबिच्छिन्न रहु निति बितरि सुगन्ध ।
हेउ दुर्नीतिर क्षय,
सत्य धरम न्यायर सदा हेउ जय ॥ (९)
*
बिकाशु हृदे मनुष्य मङ्गळ लक्षण,
बिबेक-चक्षुरे करु आत्म-समीक्षण ।
जागतिक प्रगतिर,
सर्बभूते सद्भाबना चिन्तन आजिर ॥ (१०)
* *
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Presented in 'Banānī Kavi Sammilanī'
and included in the Book “Banānī -2010” (Collection of Oriya Poems)
Published by :
On the occasion of New Year’s Day Celebration 2010.)
* * *
Included in
Kavitavali-Madhuri (Anthology of Odia Poems) :
Link : କବିତାବଳୀ-ମାଧୁରୀ :
https://hkmeher.blogspot.com/2026/04/l-kavitavali-anthology-of-odia-poems-by.html
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Biodata: Web Version:
https://hkmeher.blogspot.com/2012/06/brief-biodata-english-dr-harekrishna.html?m=0
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Wednesday, December 30, 2009
Mahakabi Kalidasa (महाकबि काळिदास):HKMeher
By : Dr. Harekrishna Meher
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महाकबि काळिदास (ओड़िआ कबिता)
रचना : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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हे भारती-बरपुत्र ! कबिकुळ-इन्दु !
धन्य काळिदास तब प्रकृति- सुषमा ।
बितरिल जन-मुखे काव्य-सुधा-बिन्दु
बिश्वे बिरचिल रम्य अमिय उपमा ॥ (१)
दिलीप-गोसेबा नृप अज-बिळपना
जणाए तब अपूर्ब काव्य-सुमाधुरी ।
सीता-बनबास राम- बिरह-बेदना
करुण रस झराए हृदये सबुरि ॥ (२)
स्मर-भस्मे घोर तपे गिरीश-हृदरे
करे परबत-सुता प्रणय उदय ।
कुमार जनमे षड़ कृत्तिका-उदरे
भजइ तारकासुर- पराण बिलय ॥ (३)
ऋतुपतिरे तरुणी- चन्द्रास्य अबश्य
जगाए प्रेमिक-हृदे मोहन स्पन्दन ।
काम-रसायन-राशि प्रकाशि रहस्य
आलोड़इ सर्बकाळे कामी जन-मन ॥ (४)
धनपति-शापे राम- गिरि मध्ये य़क्ष
रहे बरषे समय प्रेयसी-बिरहे ।
जीमूतकु दूत रूपे पेषइ प्रत्यक्ष
दारुण कारुण्ये प्रेमी जन-हृद दहे ॥ (५)
नृपति अप्सराङ्कर मधुर मिळन
मुनि-अभिशापे मर्त्त्ये उर्बशी आगमे ।
शापान्ते चळइ स्वर्गे चाहिँ पुत्रानन
शोक-कल्लोळ उछुळे पुरुरबा-मर्मे ॥ (६)
नर्त्तकी-बिरहे बीर अग्निमित्र भूप
ब्यकत करन्ति भाब सखी-सन्निधाने ।
चरितार्थ हुए प्रेमे माळबिका-रूप
जागे अपूरुब भाब सुकृति बिधाने ॥ (७)
कण्व-तापस-नन्दिनी शकुन्तळा चारु
दुष्मन्त नरेश सङ्गे स्वर्गीय प्रणय ।
मुनि-शापे काळबशे बिच्छेद हेबारु
तब नब भाबनार दिए परिचय ॥ (८)
बिश्व-साहित्य-उद्याने काब्यर प्रसूने
सतत महके तब उपमा-सुरभि ।
हेल कबिकुळ-गुरु सुलेखनी-मुने
मर धामे अलौकिक काब्य-कळा लभि ॥ (९)
लोक-मुखे समुज्ज्वळ कीरति तुमरि
काळे काळे रहिथिब आहे कबीश्वर !
जने तब प्रिय बाणी गाइबे सुमरि
अमृत सन्तान तुमे अनन्त बिश्वर ॥ (१०)
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(This Poem was written on Date 5-6-1973)
* * *
Included in
'Kavitavali-Madhuri' (Anthology of Odia Poems) : କବିତାବଳୀ-ମାଧୁରୀ :
https://hkmeher.blogspot.com/2026/04/l-kavitavali-anthology-of-odia-poems-by.html
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Biodata: Web Version:
https://hkmeher.blogspot.com/2012/06/brief-biodata-english-dr-harekrishna.html?m=0
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Monday, December 28, 2009
Kalamayi Kalahandi (कळामयी कळाहाण्डि) : କଳାମୟୀ କଳାହାଣ୍ଡି * Odia Poem by Dr.Harekrishna Meher
By : Dr. Harekrishna Meher
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कळामयी कळाहाण्डि
रचयिता : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
कळाहाण्डि माटि एइ कळार भण्डार,
बिराजे गौरब य़हिँ
कळाश्री माणिकेश्वरी- बिजय- झण्डार ॥
ख्यात्ति रहिछि ए भूमि
नाम महाकान्तारक अथबा कारुण्ड,
सुकुमार कळा य़हिँ
उत्कर्ष आहरि होइअछि एका रुण्ड ॥
बीर-बाद्य बिदित घुमुरा,
श्रुति- सुख देइ य़ाहा
दूर करे नयन- झुमुरा ॥
व्यक्त करे गिरि-गह्वरादि,
प्रकृति चारु सम्पद
रखिअछि यतने सम्पादि ॥
कळाहाण्डि स्वर्णप्रसू रतन-गरभा,
बिकशित य़हिँ कबि-प्रतिभा- सुप्रभा ।
साहित्य कळा ऐतिह्य
संस्कृति एहार,
भारत-मातार कण्ठे
रम्य़ पुष्प-हार ।
कळार माधुरी घेनि अभिनन्दनीया,
कळाबती कळाहाण्डि चिर बन्दनीया ॥
सहिछि य़े दुःख दैन्य
दारिद्र्य कषण,
लोके ता अपप्रचार
असह्य भीषण ।
बास्तबे महत्त्व तार प्रशंसार य़ोग्य,
निसर्ग सौन्दर्य़्य तार सदा उपभोग्य ॥
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(रचना : ता: १४-१-२००४)
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* କଳାମୟୀ କଳାହାଣ୍ଡି *
(ଓଡ଼ିଆ କବିତା)
ରଚୟିତା : ଡକ୍ଟର୍ ହରେକୃଷ୍ଣ ମେହେର
=====
କଳାହାଣ୍ଡି ମାଟି ଏଇ କଳାର ଭଣ୍ଡାର,
ବିରାଜେ ଗୌରବ ଯହିଁ
କଳାଶ୍ରୀ ମାଣିକେଶ୍ଵରୀ-ବିଜୟ-ଝଣ୍ଡାର ।।
ଖ୍ୟାତି ରହିଛି, ଏ ଭୂମି
ନାମ ମହାକାନ୍ତାରକ ଅଥବା କାରୁଣ୍ଡ,
ସୁକୁମାର କଳା ଯହିଁ
ଉତ୍କର୍ଷ ଆହରି ହୋଇଅଛି ଏକା ରୁଣ୍ଡ ।।
କଳାମୟୀ ଭୂମିର ଯେ
ବୀରବାଦ୍ୟ ବିଦିତ ଘୁମୁରା,
ଶ୍ରୁତି-ସୁଖ ଦେଇ ଯାହା
ଦୂର କରେ ନୟନ-ଝୁମୁରା ।।
ଐତିହାସିକ ବୈଶିଷ୍ଟ୍ୟ
ବ୍ୟକ୍ତ କରେ ଗିରି-ଗହ୍ବରାଦି,
ପ୍ରକୃତି ଚାରୁ ସଂପଦ
ରଖିଅଛି ଯତନେ ସଂପାଦି ।।
କଳାହାଣ୍ଡି ସ୍ବର୍ଣ୍ଣପ୍ରସୂ ରତନ-ଗରଭା,
ବିକଶିତ ଯହିଁ କବି-ପ୍ରତିଭା-ସୁପ୍ରଭା ।
ସାହିତ୍ୟ କଳା ଐତିହ୍ୟ
ସଂସ୍କୃତି ଏହାର,
ଭାରତ-ମାତାର କଣ୍ଠେ
ରମ୍ୟ ପୁଷ୍ପ-ହାର ।
କଳାର ମାଧୁରୀ ଘେନି ଅଭିନନ୍ଦନୀୟା,
କଳାବତୀ କଳାହାଣ୍ଡି ଚିର-ବନ୍ଦନୀୟା ।।
ସହିଛି ଯେ ଦୁଃଖ ଦୈନ୍ୟ
ଦାରିଦ୍ର୍ୟ କଷଣ,
ଲୋକେ ତା ଅପପ୍ରଚାର
ଅସହ୍ୟ ଭୀଷଣ ।
ବାସ୍ତବେ ମହତ୍ତ୍ବ ତାର ପ୍ରଶଂସାର ଯୋଗ୍ୟ,
ନିସର୍ଗ-ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ତାର ସଦା ଉପଭୋଗ୍ୟ ।।
====
(ରଚନା : ତା: ୧୪-୧-୨୦୦୪)
******
Included in
Tuesday, June 2, 2009
Ādhunika Bhāshā-Sanskāra (Oriya Hāsya Vyangya Poem)
(Original Oriya Hāsya Vyangya Kavitā)
By : Dr. Harekrishna Meher
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(This Poem bears a sense of humour and satire regarding
some unnecessary and futile attempts made by some so-called scholars
for reformation of Oriya alphabet, language and usage.)
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आधुनिक भाषा संस्कार
(ओड़िआ हास्य व्यङ्ग्य कविता)
· डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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(For convenience of general readers, Oriya letters
have been shown in Devanāgarī script.)
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श्रीहरिङ्क जिज्ञासारे उत्तरिले देबऋषि
सप्रणति बिनय बचने,
“हे प्रभो ! तुम निर्देशे सबुबेळे
तत्पर मुँ ए बिश्व-भुबने ।
भ्रमुँ भ्रमुँ पहञ्चिलि सुप्रसिद्ध उत्कळ राइजे,
तुमे य़हिँ जगन्नाथ दारुब्रह्म
श्रीपुरुषोत्तम रूपे करिअछ बिजे ॥
उत्कृष्ट कळा साहित्य संस्कृतिर देश ए बिराट,
आधुनिकतार नामे एबे किन्तु अनेक बिभ्राट ।
बाजनीतिर डिण्डिम बाजे निति, गर्जे घड़घड़,
कळा नामे कळा कार्य़्य केते केते,
रहिछन्ति कळाकार एथि बड़ बड़ ॥
चालिअछि अपरूप साहित्यर महारस केळि ;
हातीर पिठिरे बाघ बसिअछि गर्बे,
बाघर पिठिरे बसि मेएँ मेएँ करुअछि छेळि ।
भाषार संस्कार नामे दळे महापण्डित अतर्च्छा,
बिकृत छाञ्चे ओड़िआ लेखिबाकु भिड़ि निज कच्छा
मध्ये मध्ये टुङ्गारन्ति मुण्ड,
देखाइ बड़पण्डाङ्क सदर्प पाहुण्ड ।
बाटमारणा चालिछि अर्थ सह पदार्थर
आश्चर्य़्यर कथा नुहे बहु कार्य़्याळये,
भाषा-बिभागरु पुणि बर्ण्णर बाट-मारणा
देखि मन मज्जिला बिस्मये ॥
‘ य़ुक्ताक्षर केते पूर्ण्ण लुप्त करि बर्ण्ण-माळिकारु,
शून्य अनुस्वार य़ोगे ता भरणा करिबा सुचारु ।
तालब्य ‘श’ मूर्द्धन्य ‘ष’ बहिष्कृत करि तार स्थाने,
दन्त्य ‘स’ लेखिबा एबे आधुनिक संस्कार बिधाने ।
‘ब’ ‘व’ दुइ बर्ण्ण मध्युँ ‘व’ कु निर्बासे पठाइ
केबळ बर्ग्य ‘ब’ रखि चळाइबा काम ;
‘जाग’ ‘य़ाग’ सम करि रखिय़िबा कीरति सुनाम ।
पाणिनिङ्कु पाणि पिआइबा
ब्याकरण अकारण ता नियम सबु गुळि मार,
समस्ते लेखिबे आम्भे य़ेमन्त लेखिबा,
बर्ण्णधार आम्भे परा भाषा-कर्ण्णधार ॥’ –
एमन्त बिचारि थोके सम्बादपत्र-मानङ्के
लम्बा लेखा कुन्थिले अनेक ;
किन्तु आउ दळे तहिँ चिन्ता करि
य़थासाध्य मन्थिले बिबेक ।।
लोके एहिपरि निज भाषा प्रति कले ब्यभिचार,
‘दाश’ ‘दास’, ‘आशु’ ‘आसु’, ‘बश’ ‘बस’
न थिबटि भेदर बिचार ।
‘अश्व' माने ‘अस्व’ हेबे, ‘ज्वर’माने ‘ज्बर' हेबे,
‘शङ्कर’ ‘सङ्कर’ हेबे, ‘श्वजन' ‘स्वजन’ हेबे,
‘अक्ष’माने ‘अक्स’ हेबे, ‘बक्ष’माने ‘बक्स’ हेबे,
‘इंलण्ड’ परि ‘पण्डा’माने ‘पङ्ग्ड़ा’ हेबे,
‘लण्डा’माने ‘लङ्ग्ड़ा’ हेबे,
शून्यमाने घूरुथिबे नयन आगरे ;
ए दशारे बर्ण्णराशि ‘भाषि भाषि’ ‘भासि भासि’
झासिबे निज सर्बाङ्ग बङ्गोपसागरे ।
साहित्य-भण्डारे देखि भाण्डामि एमन्त,
स्थान तेजि अर्थमाने हेबे हन्तसन्त ॥’
एहा चिन्ति लक्ष्य भेदि
भाषार सुरक्षा लागि सफळाबकाशे,
बहु प्रतिबाद-पक्षी टाण थण्टे
उड़िले से ओड़िशा-आकाशे ।
देखि ताहा उद्दाम से आधुनिक-संस्कारी पण्डिते,
अपचेष्टा पण्ड जाणि बसिगले
मुण्ड जाकि य़ेसने लण्डिते ॥”
*
प्रश्न कले बिष्णु पुणि,
“ हे भकत-शिरोमणि !
एइटा त भारतीङ्क व्यापार बिभाग;
ताङ्क दायित्वरे ताहा थिला किन्तु
कले कि से पद परित्याग ?”
निबेदिले सुर-मुनि,
“ कि बर्ण्णिबि आहे बिश्वप्राण !
रक्षक भक्षक हेले समाजर हेब कि कल्याण ?
भारती-देबीङ्क गढ़ि अशालीन आधुनिका मूर्त्ति
आधुनिक भक्त केते करुछन्ति फुर्त्ति,
नाम-मात्र पूजा समारोहे ;
चिन्तित होइले तहिँ देबी स्वयं मोहे ।
बोइले – ‘छाड़िलि एहि भाषार ब्यापार,
बिशृङ्खळा सबु क्षेत्रे हेला सीमा पार ।
आजि सबु कळुषित अहमिका-भरा कुसंस्कारे,
बस्तुबादी ए मणिष निज रूप चिह्नि बि न पारे ।
भाषा साहित्य संस्कृति देशर गौरब ;
ताहारि दूषण पाइँ अपचेष्टा करुछि मानब ।
ओड़िआ अण-ओड़िआ थिले केते ओड़िशार सुय़ोग्य सन्तान,
स्वतन्त्र प्रदेश गढ़ि भाषार सुरक्षा करि
रखिगले ओड़िआ सम्मान ।
आजि किन्तु ओड़िआङ्क दायाद कि नेइछन्ति दीक्षा,
भाषा-मर्य़्यादा हरणे
निज राज्ये दिअन्ति कि शिक्षा ?
साहसी कळिङ्ग बीरे नुहन्ति बाळुङ्गा;
बिकळाङ्ग करुछन्ति मातृभाषा किपाँ
ए कि नीति निज घर-भङ्गा ?
तथापि मो उपासके रहिछन्ति,
म्लान हेब नाहिँ केबे भाषार महत्त्व ।
सेमानङ्क हस्ते कलि न्यस्त सेहि साहित्यर तत्त्व’ ॥”
देबर्षि-बदनुँ शुणि स्वस्ति-बाणी एते
आश्वस्ति लभिले तहिँ प्रभु भगबान ।
ब्यकत कले सुमने, “ हे भकत-बर !
य़ाहा हेउ उत्कळर रहिछि सम्मान ।
शिक्षित सभ्य बोलाइ आजिर ए मणिष-समाज,
अनेक अकार्य़्य पछे करुथाउ
मानसरु तेजि सर्ब लाज ।
मो नामे अण्डा-दोकान, मद्याशाळा, चपल-बिपणी
इच्छामते खोलु पछे,
तार किछि गुरुत्व न गणि,
सहिय़िबि सकळ दुर्नाम ।
पप्-नामे पाप-नृत्ये डिआँडेइँ
थोके किछि करन्तु ब्यायाम ॥
राधाकृष्ण-प्रेम नामे
मनइच्छा नाना अशाळीन
गीत प्रसारि हुअन्तु
आउ केते महानन्दे लीन ।
पुरस्कार आशे बहु चालिथाउ साहित्यिक हाट,
देखि ए घटणामान हेउथाउ मानस उच्चाट ।
तथापि बिद्यार्थीबृन्द न हुड़न्तु बाट,
भाषा साहित्य रक्षणे दक्ष थाउ सारस्वत थाट ॥
भाषार मर्य़्यादा क्षुण्ण न हेउ ए
आधुनिक मानव जगते,
उत्कळरे भारतीय संस्कृतिर
सुप्रतिष्ठा रहिब निरते ।
कळिय़ुगर महिमा देखि देखि
दारु-देहे करुछि प्रतीक्षा ।
य़थासमये नेबि मुँ महाकाळ अबतार दीक्षा ॥”
तहुँ श्रीमुखे उच्चारि
‘जय नारायण जय’ बाणी,
प्रणमि प्रभु-चरणे
नेले मुनि उल्लासे मेलाणि ॥
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(This Poem was presented in ‘Hasya –Vyangya Kavi SammilanI’
of Kalahandi Utsav on 15-1-2003 and Included in the Book
“Hāsya Vyangya Kavitā Sankalana”, Kalahandi Utsav-2003, Bhawanipatna.
Also Published in “Rutambharā”, Kavita Special- 4, January-June 2005, Jajpur, Orissa.)
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Included in
Kavitavali-Madhuri (Anthology of Odia Poems) : କବିତାବଳୀ-ମାଧୁରୀ :
https://hkmeher.blogspot.com/2026/04/l-kavitavali-anthology-of-odia-poems-by.html
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Biodata: Web Version:
https://hkmeher.blogspot.com/2012/06/brief-biodata-english-dr-harekrishna.html?m=0
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Wednesday, May 27, 2009
Oriya Poem ‘Surabhita Pushpa Prati’ (सुरभित पुष्प प्रति): Dr. Harekrishna Meher
(To the Fragrant Flower)
*
By : Dr. Harekrishna Meher
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(For convenience of general readers,
Oriya letters have been shown here in Devanagari script)
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सुरभित पुष्प प्रति (ओड़िआ कविता)
* रचना : डक्टर् हरेकृष्ण मेहेर
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अनुराग-भरा मुग्ध नयने
थरे तोते देले चाहिँ रे,
अन्तरे य़ेउँ हरष जनमे
पटान्तर ता नाहिँ रे ॥ (१)
*
क्षण-भङ्गुर सकळ बस्तु
बोलि तु शिक्षा बितरु,
बुझिबे मानबे संशय तेजि
आपणा चित्त भितरु ॥ (२)
*
बहु काळ य़ाए निर्गुण होइ
बञ्चिबा अटे बिफळ,
क्षणक सुद्धा सुगुण थिले त
बिकशे कीर्त्ति बिमळ ॥ (३)
*
समय-कबळे सबु लाबण्य
ढळिब अङ्गुँ तोहरि,
माधुर्य़्य आउ न थिबटि आहा !
थिला ता पूर्बे य़ेपरि ॥ (४)
*
चिरदिन लागि तिष्ठि पारे कि
तुच्छ बड़िमा गरब ?
सम्पद-मदे अन्तिम काळे
शिरीहीन हुए सरब ॥ (५)
*
दुनिआकु देउ क्षणक हेले बि
सुबासित गुण तोहरि,
सहृदय-मन पुलकि उठइ
रसमय भाबे बिहरि ॥ (६)
*
तोहरि कोमळ सुन्दर-पणे
नाहिँ तिळे छळ कपट,
पर-उपकारे परमेश्वर -
सृष्टि होइछि प्रकट ॥ (७)
*
बिबेकी बुझइ तोर महत्त्व
परकाशे निज आदर,
खळ जन सिना निन्दे ए भबे
न सहि बित्त परर ॥ (८)
*
धरा-उद्याने तो चारु शुभ्र
छबिरे मुग्ध मरम,
भाबुक कबि त लेखनी चळाए
पाइ उल्लास परम ॥ (९)
*
मोहुछि रुचिर दिब्य छबि तो
जगते सर्ब जीबन,
तोर मधुरिमा झराउ निरते
पीयूष बिन्दु पाबन ॥ (१०)
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Written on Date 5-10-1985.
Published in “Bindu”, November 1985,
Upanta Sahitya Sansad, Badbil, Keunjhar, Orissa.
*
Revised Poem Published in ‘Chaiti Chadhei',
October-December 2003, Jaipatna, Kalahandi, Orissa
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Included in
Kavitavali-Madhuri (Anthology of Odia Poems) : କବିତାବଳୀ-ମାଧୁରୀ :
https://hkmeher.blogspot.com/2026/04/l-kavitavali-anthology-of-odia-poems-by.html
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Biodata: Web Version:
https://hkmeher.blogspot.com/2012/06/brief-biodata-english-dr-harekrishna.html?m=0
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Oriya Poem ‘Manisha O Kaala’ : Dr. Harekrishna Meher
By : Dr. Harekrishna Meher
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Oriya letters have been shown here in Devanagari script)
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मणिष ओ काळ (ओड़िआ कविता)
रचना : डक्टर् हरेकृष्ण मेहेर
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मणिष कहे :
" बञ्चि रहिथिबि एहि पृथिबीरे
य़ेतेक दिबस,
चरितार्थ करिबि मो जीबनर
मधुमय रस ।
असाध्य पारइँ साधि हेले मध्य
अबाध्य मुँ आजि,
निबारिबि दुर्निबार दुःख दैन्य़
बिभीषिका-राजि ॥
अशेष जगते शेष रहिअछि
मरण बरण,
तथापि करिबि मोर शक्तिमते
ज्ञान आहरण ।
मानब मो नब नब बस्तु परे
रहिछि बिश्वास,
लङ्घिबि अलङ्घ्य दुर्ग तेबे य़ाइ
लभिबि आश्वास ॥"
काळ कहे :
“स्रष्टाङ्क बिचित्र सृष्टि
अद्भुत ए धरणी सुन्दर,
उद्धत न होइ य़ोद्धा
कर्म-मार्गे हुअ अग्रसर ।
निज सुकर्म दुष्कर्म
फळ पाइँ तुहि एका दायी,
सुकीर्त्ति अरज मर्त्त्ये
सत्य धर्म न्याय पन्था ध्यायि ॥
बिश्व-प्रीति भाबे तोर
प्रेममय स्वरग ए मही,
पुणि तोर अत्याचारे
नरकर स्रोत य़ाए बहि ।
स्वकरे सर्जुछु केते
ध्वंसकारी नानाबिध ब्याधि,
आपणार जिह्वा छेदि
रचुअछु अकाळ समाधि ॥
निज बश करिपारु
अबश्य तु ए बिश्व संसार,
बर-जीब मानबर
सर्बधर्मे कर्म एका सार ।
पृष्ठा पृष्ठा लेखुथिबु
केते केते नब्य इतिहास,
दृष्टान्त केते अधर्म
धर्म य़ुद्ध शान्ति अश्रु हास ॥
आध्यात्मिक बैज्ञानिक
बहुबिध बिन्यासे पबित्र,
बाहुथिबु कर्ण्णधार
भबार्ण्णबे तो कर्म-बहित्र ।
राजा प्रजा धनी निःस्व
उच्च नीच भेद नाहिँ किछि,
गुणी मानी सबु सम
मो समीपे बिलय भजिछि ॥
मोर एक तन्तु बळे
क्रीड़नक जीबजन्तुमान,
मोहरि गभीर गर्भे
लय लभे सकळ सन्तान ।
बिध्वस्त हेलेहेँ नाना
बिपर्य़्यये बिपुळा पृथिबी,
अक्षय अमर मुहिँ
सर्बग्रासी काळ चिरञ्जीबी ॥
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(Published in “Vyāsanagar”, Vol.-1, March 2005, Vyasanagar, Jajpur Road, Orissa )
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(In Odia Script)
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* ମଣିଷ ଓ କାଳ *
(ଓଡ଼ିଆ କବିତା)
ରଚୟିତା : ଡକ୍ଟର୍ ହରେକୃଷ୍ଣ ମେହେର
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ମଣିଷ କହେ :
"ବଞ୍ଚି ରହିଥିବି ଏହି ପୃଥିବୀରେ
ଯେତେକ ଦିବସ,
ଚରିତାର୍ଥ କରିବି ମୋ ଜୀବନର
ମଧୁମୟ ରସ ।
ଅସାଧ୍ୟ ପାରଇଁ ସାଧି ହେଲେ ମଧ୍ୟ
ଅବାଧ୍ୟ ମୁଁ ଆଜି,
ନିବାରିବି ଦୁର୍ନିବାର ଦୁଃଖ ଦୈନ୍ୟ
ବିଭୀଷିକାରାଜି ।।
ଅଶେଷ ଜଗତେ ଶେଷ ରହିଅଛି
ମରଣ ବରଣ,
ତଥାପି କରିବି ମୋର ଶକ୍ତିମତେ
ଜ୍ଞାନ ଆହରଣ ।
ମାନବ ମୋ ନବ ନବ ବସ୍ତୁପରେ
ରହିଛି ବିଶ୍ବାସ,
ଲଙ୍ଘିବି ଅଲଙ୍ଘ୍ୟ ଦୁର୍ଗ ତେବେ ଯାଇ
ଲଭିବି ଆଶ୍ବାସ ।।"
କାଳ କହେ :
"ସ୍ରଷ୍ଟାଙ୍କ ବିଚିତ୍ର ସୃଷ୍ଟି
ଅଦ୍ଭୁତ ଏ ଧରଣୀ ସୁନ୍ଦର,
ଉଦ୍ଧତ ନ ହୋଇ ଯୋଦ୍ଧା
କର୍ମ-ମାର୍ଗେ ହୁଅ ଅଗ୍ରସର ।
ନିଜ ସୁକର୍ମ କୁକର୍ମ
ଫଳ ପାଇଁ ତୁହି ଏକା ଦାୟୀ,
ସୁକୀର୍ତ୍ତି ଅରଜ ମର୍ତ୍ତ୍ୟେ
ସତ୍ୟ ଧର୍ମ ନ୍ୟାୟ ପନ୍ଥା ଧ୍ୟାୟି ।।
ବିଶ୍ବପ୍ରୀତି ଭାବେ ତୋର
ପ୍ରେମମୟ ସ୍ବରଗ ଏ ମହୀ,
ପୁଣି ତୋର ଅତ୍ୟାଚାରେ
ନରକର ସ୍ରୋତ ଯାଏ ବହି ।
ସ୍ବକରେ ସର୍ଜୁଛୁ କେତେ
ଧ୍ବଂସକାରୀ ନାନାବିଧ ବ୍ୟାଧି,
ଆପଣାର ଜିହ୍ୱା ଛେଦି
ରଚୁଅଛୁ ଅକାଳ ସମାଧି ।।
ନିଜ ବଶ କରିପାରୁ
ଅବଶ୍ୟ ତୁ ଏ ବିଶ୍ବ ସଂସାର,
ବର-ଜୀବ ମାନବର
ସର୍ବଧର୍ମେ କର୍ମ ଏକା ସାର ।
ପୃଷ୍ଠା ପୃଷ୍ଠା ଲେଖୁଥିବୁ
କେତେ କେତେ ନବ୍ୟ ଇତିହାସ,
ଦୃଷ୍ଟାନ୍ତ କେତେ ଅଧର୍ମ
ଧର୍ମ ଯୁଦ୍ଧ ଶାନ୍ତି ଅଶ୍ରୁ ହାସ ।।
ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ବୈଜ୍ଞାନିକ
ବହୁବିଧ ବିନ୍ୟାସେ ପବିତ୍ର,
ବାହୁଥିବୁ କର୍ଣ୍ଣଧାର
ଭବାର୍ଣ୍ଣବେ ତୋ କର୍ମ-ବହିତ୍ର ।
ରାଜା ପ୍ରଜା ଧନୀ ନିଃସ୍ବ
ଉଚ୍ଚ ନୀଚ ଭେଦ ନାହିଁ କିଛି,
ଗୁଣୀ ମାନୀ ସବୁ ସମ
ମୋ ସମୀପେ ବିଲୟ ଭଜିଛି ।।
ମୋର ଏକ ତନ୍ତୁବଳେ
କ୍ରୀଡ଼ନକ ଜୀବଜନ୍ତୁମାନ,
ମୋହରି ଗଭୀର ଗର୍ଭେ
ଲୟ ଲଭେ ସକଳ ସନ୍ତାନ ।
ବିଧ୍ବସ୍ତ ହେଲେହେଁ ନାନା
ବିପର୍ଯ୍ୟୟେ ବିପୁଳା ପୃଥିବୀ,
ଅକ୍ଷୟ ଅମର ମୁହିଁ
ସର୍ବଗ୍ରାସୀ କାଳ ଚିରଞ୍ଜୀବୀ ।।"
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(ଆକାଶବାଣୀ ଭବାନୀପାଟଣା ଦ୍ବାରା ତା: ୨୯-୧-୧୯୯୬ ରେ ପ୍ରସାରିତ ।)
ପ୍ରକାଶିତ : "ବ୍ୟାସନଗର", ସଂଖ୍ୟା-୧, ମାର୍ଚ୍ଚ ୨୦୦୫. ବ୍ୟାସନଗର, ଯାଜପୁର ରୋଡ଼, ଓଡ଼ିଶା
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Broadcast by Akashvani 'Bhawanipatna' on 29 January 1996.
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Included in "KAVITAVALI-MADHURI"
(Anthology of Odia Poems)
By Dr. Harekrishna Meher
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Link : Kavitavali-Madhuri : କବିତାବଳୀ-ମାଧୁରୀ :
https://hkmeher.blogspot.com/2026/04/l-kavitavali-anthology-of-odia-poems-by.html
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Manisha O Kaala :
ମଣିଷ ଓ କାଳ (ଓଡ଼ିଆ କବିତା) :
https://hkmeher.blogspot.com/2009/05/oriya-poem-manisha-o-kala-hkmeher.html
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