Saturday, November 10, 2018

Kumara-Sambhava (Canto-1): Odia Version: Odia Script Scanned Pages: Dr.Harekrishna Meher

Kumara-Sambhava Mahakavya * 
Original Sanskrit Epic Poem : Mahakavi Kalidasa 
Odia Metrical Translation : Dr. Harekrishna Meher
*
Canto-1 (Prathama Sarga):
Depiction of Himalaya Mountain and Parvati's Birth
(Taken from Complete Odia Version)
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Published in BARTIKA (बर्त्तिका), Literary Odia Quarterly,
Dashahara Special Issue, October-December 2005, Pages 533-552.
Saraswata Sahitya Sanskrutika Parishad, Dasharathpur, Jajpur, Odisha.
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कुमारसम्भव महाकाव्य *
मूल संस्कृत काव्य : महाकवि कालिदास *
ओड़िआ पद्यानुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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प्रथम सर्ग : हिमालय-वर्णना एवं पार्वती-जन्म * 
ओड़िआ छन्दरे अनूदित : राग रामकेरी  
अनुवाद काल : १९७१ ख्रीष्टाब्द
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 Total Canto-1 : Devanagari Script : Blog Link :
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FaceBook Link :

Related Links :
Kumara-Sambhava : Odia Version by Dr. Harekrishna Meher : 
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Translated Works of Dr. Harekrishna Meher : 
(Tapasvini, Niti-Sataka, Sringara-Sataka, Vairagya-Sataka, 
Kumara-Sambhava, Raghuvamsha, Ritusamhara, Naishadha, 
Gita-Govinda, Meghaduta etc.) 
Link: 
http://hkmeher.blogspot.in/2016/08/translated-works-of-dr-harekrishna-meher.html
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October-December 2005 :
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Saturday, October 27, 2018

Kumara-Sambhava (Canto-1): Odia Version: Dr. Harekrishna Meher

Kumara-Sambhava Mahakavya
Original Sanskrit Epic Poem : Mahakavi Kalidasa 
Odia Metrical Translation : Dr. Harekrishna Meher
*
Canto-1 (Prathama Sarga):
Depiction of Himalaya Mountain and Parvati's Birth
(Taken from Complete Odia Version)
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Published in BARTIKA (बर्त्तिका), Literary Odia Quarterly,
Dashahara Special Issue, October-December 2005, Pages 533-552.
Saraswata Sahitya Sanskrutika Parishad, Dasharathpur, Jajpur, Odisha.
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कुमारसम्भव महाकाव्य
मूल संस्कृत काव्य : महाकवि कालिदास *
ओड़िआ पद्यानुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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प्रथम सर्ग : हिमालय-वर्णना एवं पार्वती-जन्म
समुदाय श्लोक संख्या : ६० * 
ओड़िआ छन्दरे अनूदित : राग रामकेरी  
अनुवाद काल : १९७१ ख्रीष्टाब्द
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(१)
उत्तर दिगरे गिरीन्द्र     दिशे कि अभिराम,
महिमामय से देवात्मा  हिमाळय ता नाम ।
परबेशि पूर्ब पश्चिम      पाराबार मध्यरे,
धरा-मापदण्ड पराये    शोभा धारण करे ॥
*
(२)
परबत मिळि सरब     ताकु बत्सा बिचारि,
रतन-सानुकु  य़तने     कले  दोहनकारी ।
पृथुङ्क आदेशे पृथिबी-  गाभीरु दीप्तिमान,
रत्नराजि सह  दुहिँले    महाऔषधिमान  ॥
*
(३)
खणि अगणित रत्नर      हेबारु हिमाळय,
करि न पारिला तुषार   तार चारुता क्षय ।
अनेक गुणरे एक‍इ        दोष दृश्य नुह‍इ,
शशाङ्क-किरणे कळङ्क   य़था लुचि रह‍इ ॥
*
(४)
निज शिखे धातुमत्ताकु    बहे गिरि-उत्तम,
खण्डमेघमाळे लालिमा    प्रसरे मनोरम ।
असमये मध्य सन्ध्यार     भ्रम लभि अप्‍सरा,
शृङ्गार रचन्ति अङ्गरे   घेनि शोभा पसरा ॥
*
(५)
हिमगिरि-कटि भागरे    अभ्रमाळा भ्रमन्ति,
सिद्धबृन्द तळ शृङ्गरे    मेघछाया सेबन्ति ।
बर्षा आगमने सेमाने     बिचळित अन्तरे,
तापभरा तुङ्ग शृङ्गकु   चळिय़ान्ति तत्परे ॥
*
(६)
दन्ताबळ-हन्ता सिंहर    पद-रुधिर चिह्न,
हिम-झरे धौत होइले     मध्य ता नखे छिन्न ।
मोति-फळ पोति न होइ   रहिथिबारु ताहा,
बनेचरगण बिलोकि    जाणिथाआन्ति राहा ॥
*
(७)
बिद्याधरङ्कर सुन्दरी-     बृन्द परबतरे,
करी-बिन्दु परि रक्तिम    रम्य भूर्ज पतरे ।
धातुरस य़ोगे आतुर     चित्ते लेखि झटति,
प्रेरन्ति  प्रणय-पतर     प्रिय प्रेमिक प्रति ॥
*
(८)
फम्पा निज गुम्फा-मुखर   बायु अचळेश्वर,
कीचक-रन्ध्ररे पूराइ      रचि मधुर स्वर ।
किन्नरङ्क मुखुँ निर्गत    मधु गान सकाशे,
तान देबा लागि सते बा  निज इच्छा प्रकाशे ॥
*
(९)
गण्डुँ मळि-कण्डु बारण    पाइँ बारणपन्ति,
लाखि देबदारु शाखीरे   निज अङ्ग घषन्ति ।
तरु-बल्कळरु सेकाळे     झरि आस‍इ दुग्ध,
शृङ्गरे प्रसरि सुगन्ध    तहिँ कराए मुग्ध  ॥
*
(१०)
गुहा-गृह-कोळे य़ामिनी   काळे देदीप्यमान,
ओषधिपन्ति य़े करन्ति    धीर आलोक दान ।
शैळपुरे तैळ-बिहीने      साजि रति-प्रदीप,
बिराजन्ति निति किरात-   मिथुनङ्क समीप ॥
*
(११)
स्तर-स्तर हिम-प्रस्तर      परे बाजन्ते अळ्‍पे,
खिन्न हेले मध्य किन्नरी-   गण अङ्गुळि गुळ्‍फे ।
उच्च पीन कुच नितम्ब     भार सम्भाळिबारे,
तेजि न थाआन्ति निजर   मन्द गति सेठारे  ॥
*
(१२)
गुहा मध्ये रुहे अन्धार    दिबाभीत समान,
भानु समक्षरु ता रक्षा     करे ए सानुमान ।
उच्च जन ठारे शरणा-   पन्न  मानब य़था,  
नीच हेलेहेँ  ता समीपे   जनम‍इ ममता  ॥
*
(१३)
हिमालय मध्ये हिमांशु-   रश्मि परि धबळ,
पुच्छ चामरकु  चमरी      मृगी तोषे सकळ ।
बिञ्चि मन्दे मन्दे सुसञ्च    मण्डिथान्ति से धाम,
चरितार्थ करि थाआन्ति   गिरिराज ता नाम  ॥
*
(१४)
सुरते किन्नरे पुरते        हरिले प्रिया-बास,
तुरङ्ग-मुखीए शृङ्गार  लाजे लुचान्ति आस्य ।
इच्छामते सेहि समये     गुहा-गृह दुआरे,
लम्बि रह‍इ कादम्बिनी   जबनिका आकारे  ॥
*
(१५)
समीरण तहिँ मयूर-     कळाप उल्लसाइ,  
देबदारु तरुराजिकि     बारम्बार दोळाइ ।
नीर-बिन्दु मन्दाकिनीर    घेनि बह‍इ मन्दे,
किरातबृन्द ता सेबन्ति   मृगयारे आनन्दे  ॥
*
(१‍६)
सप्तऋषि निज हस्तरे    तोळि सारिबा परे,
अबशेष थिले सरोज     ऊर्द्ध्व भागर सरे ।
तहिँ अधोभागे भ्रमण    बेळे  ऊर्द्ध्व-बदन,
स्वकर-तेजे बिकस्वर    करिथान्ति तपन  ॥
*
(१७)
अध्वर-साधन द्रव्यर     जनकत्व आबर,
धरणी-धारणे सामर्थ्य   देखि हिमाळयर ।
य़ाग-भाग-भोगी नगङ्क  मध्ये कराइ प्रभु,
उच्चस्थाने स्थापि अछन्ति   ताकु निजे स्वयम्भु  ॥
*
(१८)
गिरिबर से त गौरब-     ज्ञाता सुमेरु-मित,
कुळरक्षा पाइँ बिबाह     कले मेना सहित ।
सुय़ोग्या से पितृगणङ्क   प्रिय मानस-कन्या,
मुनिमानङ्कर मध्य से    माननीया सुधन्या  ॥
*
(१९)
ए अन्ते अतीत हुअन्ते     क्रमे केते दिबस,
पति सङ्गे रति-प्रसङ्गे   मज्जिबारु मानस ।
कमनीय नबय़ौबना     प्रिया रामाबर से,
करिले गरभ धारण    गिरिबर-औरसे  ॥
*
(२०)
जनमिला मेना-उदरुँ     सुत मैनाक नामे,
नागकन्यार से नागर    हेला समय-क्रमे ।
पक्षछेदी सहस्राक्षङ्क    जात हेलेहेँ क्रोध,
अशनि-जनित य़ातना   अङ्गे न कला बोध ।
सिन्धु सङ्गे य़ेणु बन्धुता   करि गिरि-नन्दन,
जळराशि मध्ये आश्रय     नेला निर्भय-मन  ॥
*
(२१)
दक्षसुता सती थिले य़े     शिब-बामलोचना,
सहि न पारि से पिअर-   कृत पति-भर्त्सना ।
कळेबर य़ोगबळरे         देइथिलेटि झासि,
सुश्री एबे नेले आश्रय    मेना-गरभे आसि  ॥
*
(२२)
उत्साह सहित मिळिता   शुद्ध-आचारबती,
उत्तम-प्रय़ुक्ता नीतिरु     य़था जन्मे सम्पत्ति ।
स्वामीसङ्ग-रता मङ्गळ-   ब्रता पर्बत-राणी,
मेनाङ्क उदरु जन्मिले   तथा सती कल्याणी  ॥
*
(२३)
निर्मल दिशिला सकळ     दिग जन्म-बासरे,
प्रबहिला पांशु-बिहीन      समीरण विश्वरे ।
कम्बुस्वन परे प्रसून-       बृष्टि हेला आबर,
उल्लसिले सुखे संसारे     सर्ब चळ स्थाबर  ॥
*
(२४)
नब जळधर-शबदे         जात रत्न-प्रभारे,
शोभ‍इ बिदूर पर्बत-       भूमि य़ेउँ प्रकारे ।
ज्योतिर्मयी चारु-बदना   तनुजाङ्कु निजरि,
लभि कोळे शैळ-बल्लभी   बिराजिले सेपरि  ॥
*
(२५)
शुकल पक्षरे नक्षत्र-       ईश-कळा य़ेसन,
शोभिले नगेन्द्र-नन्दिनी   दिनुँ दिन तेसन  ।
चन्द्रिका-बर्द्धने चन्द्रमा-  कळा  बढ़िबा प्राय,
सुढळे बढ़िला लाबण्य-   मय नबीन काय  ॥
*
(२६)
पर्बत बंशरे जनम        य़ोगुँ आदरे अति,
बन्धुमाने ताङ्कु सम्बोधि   नाम देले पार्बती ।
उ, मा, बोलि ताङ्कु पश्चाते   तपश्चरणुँ माता,
मना करिबारु हेले से   उमा नामे बिख्याता  ॥
*
(२७)
तनुज निजर थिलेहेँ      नग-राजन कति,
ता पाशे आपणा नयन   न लभिला तृपति ।
बिकशन्ते मध्य बसन्ते   नानाबिध सुमन,
रस‍इ रसाळ-कुसुमे      एका भ्रमर-मन  ॥
*
(२८)
प्रदीप शोभ‍इ य़ेमन्त    दीप्तिमन्त शिखारे,
स्वर्गमार्ग य़था सुभग   त्रिपथगा गङ्गारे  ।
मार्जित भाषारे य़ेसन   ज्ञानीजन शोभन्ति,
सुता य़ोगुँ पूत भूषित    हेले भूधर-पति  ॥
*
(२९)
स्वर्णदी-पुळिने से बाळा   बाल्यक्रीड़ार बेळे,
बालुका-बेदिका निर्माणि    केबे कन्दुक खेळे ।
कृत्रिम-पुत्रक घेनि बा      सखीगण सङ्गरे,
श‍इळजा सते मज्जिले      केळिरस रङ्गरे  ॥  
*
(३०)
शरदे मिळन्ति मराळ-   माळा मन्दाकिनीकि,
निशीथरे य़था लभ‍इ      प्रभा महौषधिकि ।
पूर्बजन्म-बिद्या पर्बत-     सुता पाशे समस्त,
अनायासे बिद्या अभ्यास   काळे हेले प्रापत  ॥
*
(३१)
बाल्यान्ते य़ौबन आसिला   क्रमे शैळसुतार,
अय़तन-सिद्ध भूषण       से त अङ्ग-लतार ।  
मद्य न होइले मध्य से    जने करे मोहित,
कन्दरप-अस्त्र सेहि त     मात्र पुष्प-रहित  ॥
*
(३२)
तूळिकारे बर्ण्ण-खचित    चित्र य़था उज्ज्वळ,
रबि-कर य़ोगे बिकच      य़ेह्ने नब कमळ  ।
मनलोभा हेला सेभळि    ताङ्क सर्बापघन,
लभिबारु चारु मोहन     अभिनब य़ौबन  ॥
*
(३३)
भूमिरे चळन्ते उमाङ्क    सुकुमार चरण,
उच्चाङ्गुळि-नख-तेजरे     दिशे रक्त-बरण  ।
पूरुब-सेबित अलक्त        रस उद्‍गारि कि से,  
स्थळ-अरबिन्द पराय     सते सुन्दर दिशे  ॥
*
(३४)
लीळामयी भाबे बिळासे   उमा य़ेउँ समये,
गमन करन्ति सेकाळे        प्रते हुए हृदये  ।
राजहंसगण नूपुर-      सिञ्जा शिखिबा पाइँ,
प्रथमरु लीळा-गमन    ताङ्कु देले शिखाइ  ॥
*
(३५)
गिरिजा-शरीर सर्जना   पाइँ बिधाताङ्कर,
पुञ्जीभूत थिला मञ्जुळ   द्रव्य य़ेते मातर ।
पार्बतीङ्क पृथु बर्त्तुळ    बेनि जङ्घ रचने,
समाप्त हेबारु सते बा     प्रजापति य़तने  ।
अबशेष अबयबर        निरिमाण निमित्त,
लाबण्य-संग्रह दिगरे    श्रम कले अमित  ॥
*
(३६)
चर्मभागे अति कर्कश     शुण्ड गजराजर,
नितान्त शीतळ हुअन्ते   रम्भा-स्तम्भ आबर  ।
दिशेलेहेँ  बिश्वे बर्त्तुळा-   कार  शोभायमान,
होइ न पारिला ग‍उरी-    उरुर उपमान  ॥
*
(३७)
परिणय परे आपणा     अङ्क-देशे  शङ्कर,
निबेशिले चारु नितम्ब    शैळ-तनुजाङ्कर  ।
अन्य नारी पक्षे दुर्लभ     थिला सेहि अङ्कटि,
अनुमित हुए नितम्ब-     शोभा एथुँ प्रकटि  ॥
*
(३८)
नीबीबन्ध ठारु  गभीर   नाभि-रन्ध्र पर्य़्यन्त,  
नब रोमराजि सुरम्य     दिशुथिला एमन्त  ।
काञ्ची-मध्यगत सुसञ्च   नीळमणिर प्रभा,
नीबी लङ्घि सते प्रबेश   करे नाभिरे अबा  ॥
*
(३९)
बेदी सम कृश-मध्यमा      अद्रि-दुहिताङ्कर,
त्रिबळी बिराजि एभळि    दिशुथिला सुन्दर  ।
काम आरोहिबा निमन्ते    सते नब य़ौबन,
निर्माण करिछि सोपान-    त्रय  केड़े शोभन  ॥
*
(४०)
सरोज-नेत्रीङ्क उरोज     नीळमुख ग‍उर,
परस्पर पीड़ि एरूपे      बढ़िथिले रुचिर  ।
बेनिङ्क मध्ये शतपत्र-   नाल सूत्र प्रबेश,
करिबा सकाशे तहिँरे    स्थान न थिला शेष  ॥
*
(४१)
मो बिचारे चारु य़ुगळ    बाहु थिला उमार,
शिरीष कुसुमरु मध्य      अधिक सुकुमार  ।
पुरारिङ्क पाशे कन्दर्प    परास्त हेबा परे,
प्रयोग कले से बेनिङ्कि   कण्ठपाश रूपरे  ॥
*
(४२)
गिरिजेमाङ्कर उरज    य़ोगुँ उन्नतानत,
कण्ठदेश पुणि बर्त्तुळ    मुक्ताहार नियत ।
सम रूपे परस्परर      शोभा बढ़ाइबारु,
एक अपरर  भूषण    भूष्य हेले सुचारु  ॥
*
(४३)
कमळर गुण न मिळे     चन्द्रे आश्रय कले,
बिधु-मधुरिमा आहरि    नुहे पद्मे रहिले ।
किन्तु गौरी-मुखे रहन्ते    एबे पद्म चन्द्रमा,
दुहिँङ्क प्रीतिकि एकत्र    अनुभबिले उमा  ॥
*
(४४)
उमाङ्कर ताम्र अधर -    दळे धबळ स्मित,
प्रकाश हेले ए प्रकार      शोभा लभे निश्चित  ।
रक्तिम नबीन पल्लबे       राजे श्वेत सुमन,
अथबा प्रबाळे य़ुकत      मुक्ता दिशे शोभन  ॥
*
(४५)  
अद्रिबाळाङ्कर आळापे    अमृत-स्वर झर,
मधुर बचन सम्मुखे         प्रिय स्वर पिकर  ।
कर्कश प्रतीत होइला       श्रोताङ्कर कर्ण्णरे,
अज्ञ-ताड़ित बीणा-तन्त्री   य़था शबद करे  ॥
*
(४६)
मन्द अनिळरे दोळित     नीळ कमळ परि,
आपणा चञ्चळ चाहाँणि   राजपुत्री सुन्दरी ।
मृगीगण ठारु आणिले     अबा मृगीए ठाणि,
पार्बतीङ्क ठारु आणिले    एहा नुह‍इ जाणि  ॥
*
(४७)
कज्जळ-तूळिका-रचित    चित्ररेखा य़ेसन,
थिला पार्बतीङ्क य़ुगळ   दीर्घ भूरु शोभन  ।
से भूरु-लतार चारुता    अबलोकि अतनु,
फुलधनु-शोभा-गरब     बरजिले स्व मनुँ  ॥
*
(४८)
य़दि मानबङ्क पराये     पशु-पक्षी-हृदये,
लज्जा थान्ता तेबे चमरी-   गण बिना संशये  ।
शैलनन्दिनीङ्क सुन्दर    चूर्ण्ण-कुन्तळ चाहिँ,
आपणा केशर बिशेष     य़त्न करन्ते नाहिँ  ॥
*
(४९)
बिश्व-सरजन-करता     सते एक स्थानरे,
समस्त सुषमा दर्शन     इच्छा रखि मनरे  ।
सरब  उपमा-दरब     घेनि पार्बती-अङ्गे,
उपय़ुक्त स्थाने संय़ुक्त    करि रचिले रङ्गे  ॥
*
(५०)
भ्रमुँ भ्रमुँ दिने नारद        अद्रिपतिङ्क पाशे,
पार्बतीङ्कु देखि भबिष्य  बाणी कले बिश्वासे ।
'निज प्रेमबळे ए जेमा     संय़मी  शिबङ्कर,
हेब अर्द्धतनु-हारिणी     पत्नी एकमातर  ॥'  
*
(५१)
य़ुबती हेलेहेँ पार्बती      पाइँ नग-राजन,
अन्य बर अन्वेषणरे      आउ न देले मन  ।
घेनिबा निमन्ते मन्तरे    परिपूत आहुति,
बैश्वानर बिना बिश्वरे    केहि क्षम नुहन्ति  ॥
*
(५२)
न करन्ते रुद्र य़ाचना     अद्रि कौणसि मते,
समर्थ नोहिले दुहिता    अरपिबा निमन्ते  ।
निबेदन भङ्ग हेबार      भये सज्जनगण,
कार्य़्यसिद्धि लागि करन्ति  मध्यस्थता ग्रहण ॥
*
(५३)
पिता दक्ष प्रजापतिङ्क   कोपे दुःखिता अति,
तेजिथिले निज शरीर     पूर्ब जनमे सती  ।
सेहि समयरु बरजि        सर्ब काम-बासना,
परिणय करि न थिले    शिब अन्य अङ्गना  ॥
*
(५४)
जितेन्द्रिय चन्द्रशेखर     तपे निबेशि मति,
रचिथिले हिमाचळर     एक शृङ्गे बसति ।
देबदारु बृक्षसमूह        तहिँ  क्षणकु क्षण,
सुर-सरितार स्रोतरे      लभुथिला प्रोक्षण  ।
बिस्तारित थिला कस्तूरी-   गन्ध मृग-य़ूथर,
किन्नर-निकर प्रसन्ने       थिले गान-तत्पर  ॥
*
(५५)
सुरम्य नमेरु-सुमन     शृङ्गे मण्डि सकळ,
मनःशिळा य़ोगे रञ्जित   मृदु भूर्ज-बल्कळ ।
परिधान करि शरीरे    तहिँ  प्रमथ-बृन्द,
शैळेय-सेबित पाषाणे    बसुथिले सानन्द  ॥
*
(५६)
महाबळीयान बाहन      बृष महेशङ्कर,
सिंहनाद सहि पारु न    थिला पाशे निकर ।
सेठारे खुराग्रे कठोर      हिम-शिळा तत्क्षण,
बिदारि सदर्प गर्जन      करुथिला भीषण  ।
उद्‍बेग न भजि गबय-   गण सेहि बेळारे,
लक्ष्य करुथिले निक्षेपि   निज दृष्टि ताहारे  ॥
*
(५७)
सर्बतप-इष्ट फळद           अष्टमूर्त्ति सुय़ति,
समिध य़ोगे समेधित       निज अन्य मूरति ।
अग्निङ्कर क्रिया आचरि    बाञ्छा रखि मनरे,
रत थिले तपोबरते           परबत -शिखरे  ॥  
*
(५८)
बृन्दारक-बृन्द-बन्दित       प्रभु देब शङ्कर,
ताङ्कु तोषे अर्घ्ये  अर्च्चना    करि अचळेश्वर  ।
संय़मशीळा स्व जेमाङ्कु     सखीगण सङ्गते,
आज्ञा देले गङ्गाधरङ्क    आराधना निमन्ते  ॥
*
(५९)
घोर तपे बिघ्नरूपिणी      हेले मध्य पार्बती,
ताङ्करि सेबाकु स्वीकार    कले प्रमथपति ।
समीपे बिकार-कारक     तत्त्व थिले हेँ चित्त,
बिकृत नुहे य़ा, से एका    धीर बोलि बिदित  ॥
*
(६०)
बिधिमते पूजा करिबा      पाइँ प्रतिदिबस,
तोळि आणुथिले कुसुम     उमा नोहि अळस  ।
परिष्कार करि बेदीकि     कुश सङ्गते बारि,
आणुथिले कर्माचरण        अर्थे राजकुमारी ।
सेबाकाळे देबदेबङ्क      शिर-शोभी शशीर,
कान्ति हरुथिला क्लान्तिकि   सेहि चारुकेशीर  ॥
* *
(६१)
महाकबि काळिदासङ्क    कुमारसम्भबर,
हरेकृष्ण-मेहेर-कृत     ओड़िआ भाषान्तर  ।
षाठिए श्लोकर बर्ण्णने       पूर्ण्ण सर्ग प्रथम,
सुन्दरी गिरीन्द्र-नन्दिनीङ्कर  शुभ जनम  ॥
* * *
(कुमारसम्भब महाकाव्यर प्रथम सर्ग समाप्त *)
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