Friday, November 6, 2009

Manohar Meher :Jāīphula Rāmāyaņa (जाईफुल रामायण)

जाईफुल रामायण : कवि मनोहर मेहेर
*
Jāīphula Rāmāyaņa'

By : Poet Manohar Meher
(Included in 'Manohar Daņđa-Nāţa' Section of 'Manohar Granthāvalī'.)
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'Jāīphula Rāmāyaņa' is an Oriya Lyrical composition written by Poet Manohar Meher (1885- 1969). The Poet is regarded as 'Gaņa-Kavi' or 'Pallī-Kavi' of Western Orissa. This small book is based on the story of Rāmāyaņa with a brief presentation in 'Daņđa-Nāţa’ style. It concisely describes all the subject matter of Rāmāyaņa starting from the birth of Rāma till his ascending throne of Ayodhyā after killing of demon-king Rāvaņa. The story ends with the happy reign of King Rāma.

Here the word 'Jāīphula' (Jātī Flower) has been used as the symbol of Mundane Soul. The story is a conversation between Goddess Pārvatī and God Śiva and Śiva narrates the Rāmāyaņa story before Pārvatī .

Originally this Book has been named as 'Daņđa-Nāţa Jāīphula Rāmāyaņa' .
It has gained wide popularity in Orissa in the Oriya Folk Dance called
'Daņđa-Nāţa'. It has been discussed by several critics and litterateurs of Oriya literature.

Written in 1929, this book had its First Edition published by Arunodaya Press, Cuttack in the same year 1929. Its 6th Edition was in 1947. Later on many editions have come through different publishers of Cuttack and Brahmapur in 1965, 1967, 1973, 1974, 1976,1977, 1978, 1980, 1982, 1985 and some later years also.

Some other books of the poet have also seen the light of the day through several publications.


(Efforts are being made to publish 'Manohar Granthāvalī', Collection of all the writings of Poet Manohar Meher, My revered Grandfather.)

Now 'Jāīphula Rāmāyaņa' is completely presented below in Devanāgarī script
for convenience of the general readers.
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दण्डनाट जाईफुल रामायण (ओड़िआ गीत)
रचयिता : कवि मनोहर मेहेर

('मनोहर ग्रन्थावळी'र 'मनोहर दण्डनाट' विभागरे अन्तर्गत)
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बन्द‌‍इँ श्रीगणनाथ, सदाशिब य़ार तात ।
कुङ्कुम घटिरु निज श्रीअङ्गरु, दुर्गादेबी कले जात ॥
जाईफुल रे ॥ (१)

आहे देव गणपति, घेन मोहर बिनति ।
सुप्रसन्न होइ पद दिअ कहि, मुहिँ अटेँ मूर्खमति ॥
जाईफुल रे ॥ (२)

बन्द‌इँ देबी शारळा, मम कण्ठे कर खेळा ।
न आसिला पदमान कहि दिअ, पद आसु अनर्गळा ॥
जाईफुल रे ॥ (३)

बन्द‌इँ काळी कपाळी, गळारे मन्दार-माळी ।
रणे मतुआळी रक्‍त पान करि, रङ्गे नाचु ढळि ढळि ॥
जाईफुल रे ॥ (४)

बन्द‌इँ सिंह-बाहिनी, महिषासुर-मर्द्दिनी ।
अभय-दायिनी बिपद-भञ्जनी, घेन मोहर दयिनी ॥
जाईफुल रे ॥ (५)

बन्द‌इँ मा मङ्गळाई, तो पादे जणाएँ मुहिँ ।
अमङ्गळ काळे तो नाम ध‍इले, सर्ब मङ्गळ हुअ‍इ ॥
जाईफुल रे ॥ (६)

च‌इत्र आश्‍विन मास, पड़‍इ तो उपबास ।
एकमने नारी तोते पूजा कले, गर्भे देउ बाळ शिष्य ॥
जाईफुल रे ॥ (७)

कहे दीन मनोहर, मङ्गळा मा दया कर ।
दण्डनाट गीत कहिबाकु चित्त, बळिला आसि मोहर ॥
जाईफुल रे ॥ (८)

माल्याणी य़ेपरि फुल, गुन्थि निए माळ माळ ।
सेहिपरि मोर गळे उपहार, लम्बिथाउ सदाकाळ ॥
जाईफुल रे ॥ (९)

महादेब उमासाइँ, ताङ्कु जणाउछि मुहिँ ।
मोहर बिपद थिले सदानन्द, अबश्य करिबे त्राहि ॥
जाईफुल रे ॥ (१०)

बड़ देउळरे हरि, सङ्गे बिजे हळधारी ।
मध्यरे सुभद्रा बिजे करिछन्ति, श्रीमुख चन्द्रमा परि ॥
जाईफुल रे ॥ (११)

ब्रह्मा बिष्णु महेश्‍वर, य़ेते दश दिगपाळ ।
सर्ब देबताङ्कु बन्दना करुछि, शिरे य़ोड़ि बेनि कर ॥
जाईफुल रे ॥ (१२)

अजणा अपढ़ा मुहिँ, लेखिबाकु शक्ति नाहिँ ।
सात काण्ड रामायणर चरित, ठिके ठिके कहिब‍इँ ॥
जाईफुल रे ॥ (१३)

पार्वती आगे शङ्कर, कहे रामायण सार ।
सरय़ू गङ्गार तटरे अय़ोध्या, नामे अछि एक पुर ॥
जाईफुल रे ॥ (१४)

तहिँ दशरथ राजा, सुखे पाळन्ति परजा ।
कौशल्या कैकेयी सुमित्रा सहिते, ताङ्क तिनिटि भारिजा ॥
जाईफुल रे ॥ (१५)

अपुत्रिक राजा थिले, प्रभुङ्क करुणा बळे ।
ऋष्यशृङ्ग मुनि बरि आणि पुणि, य़ज्ञ बिधि आरम्भिले ॥
जाईफुल रे ॥ (१६)

य़ज्ञ चरु राजा घेनि, बाण्टि देले तिनि राणी ।
तिनि राणी ठारु चारि मूर्त्ति धरि, जन्मिले कोदण्ड-पाणि ॥
जाईफुल रे ॥ (१७)

बाल्य काळे चापधारी, ताड़का असुरी मारि ।
शिब धनु भाङ्गि सीता बिभा हेले, पर्शुराम दर्प हरि ॥
जाईफुल रे ॥ (१८)

मन्थरा बोले कैकेया, राजा आगे कला माया ।
दशरथ आगे सत्य कराइला, नृप न जाणिले ताहा ॥
जाईफुल रे ॥ (१९)

राम राजा हेबा शुणि, रुषिला कैकेयी राणी ।
भ्रत राजा हेउ राम बन य़ाउ, एतिकि मोर मागुणि ॥
जाईफुल रे ॥ (२०)

राजा सनमत कले, भरतकु राज्य देले ।
श्रीराम लक्ष्मण सीता तिनि जण, बनबासे चळिगले ॥
जाईफुल रे ॥ (२१)

य़हुँ राम गले बन, राजा कले दुःख मन ।
पुत्र न देखिले पराण तेजिले, दशरथ नृपराण ॥
जाईफुल रे ॥ (२२)

पञ्चबटी करि कुटी, राम दिन नेले काटि ।
सूर्पणखा नारी देखि चापधारी, नाक कान देले काटि ॥
जाईफुल रे ॥ (२३)

तहुँ से असुरी गला, खर दूषणे कहिला ।
जाणि तिनि भाइ आसिलेक धाइँ, राम-हस्ते प्राण गला ॥
जाईफुल रे ॥ (२४)

अति बेगे चळि गला, लङ्का गड़े प्रबेशिला ।
श्रीराम चरित सकळ बृत्तान्त, राबण आगे कहिला ॥
जाईफुल रे ॥ (२५)

सुबर्ण्ण मृग देखाइ, य़ति बेशे लङ्कासाइँ ।
पर्ण्णकुटी द्वारुँ सीता घेनि गला, पुष्पक रथे बसाइ ॥
जाईफुल रे ॥ (२६)

श्रीराम लक्ष्मण दुइ, मृगभार कन्धे थोइ ।
पर्ण्णकुटी द्वारे अस्सि प्रबेशिले, सीतादेबी मठे नाहिँ ॥
जाईफुल रे ॥ (२७)

सीता-गुण गुणि राम, करन्ति अति कारुण्य ।
सङ्गे स‌उमित्रि प्रबोधि कहन्ति, न कान्द न कान्द राम ॥
जाईफुल रे ॥ (२८)

बन लता गिरि चाहिँ, पचारन्ति रघुसाइँ ।
के चोराइ नेला प्राणर बल्लभी, देखिथिले दिअ कहि ॥
जाईफुल रे ॥ (२९)

तहुँ किछि दूर गले, जटायु पक्षी देखिले ।
सीताङ्क बारता कहिला से जटा, शुणि राम तोष हेले ॥
जाईफुल रे ॥ (३०)

श्रीराम लक्ष्मण दुइ, धीरे गले पथ बाहि ।
बाटरे शबरी देखिले श्रीहरि, तहिँ आम्ब फळ पाइ ॥
जाईफुल रे ॥ (३१)

चखा आम्ब फळ खाइ, केते दूर गले तहिँ ।
बाटरे कुक्कुट पक्षीकि भेटिले, सीता-बार्त्ता देला कहि ॥
जाईफुल रे ॥ (३२)

पम्पा सरोबर कूळे, राम लक्ष्मण मिळिले ।
चहुआ चकोइ शाप देइ राम, तहुँ बेनि भाइ गले ॥
जाईफुल रे ॥ (३३)

ग‌उड़ गोष्ठरे य़ाइ, प्रबेशिले रघुसाइँ ।
बोइले गोपाळ दुध किछि दिअ, रत्‍न मुदि बन्धा नेइ ॥
जाईफुल रे ॥ (३४)

ग‌उड़े कहन्ति हसि, ए केउँ बृक्षे फळिछि ।
दुध देबुँ नाहिँ मुदि य़ाअ नेइ, स्वर्ण्ण कि अपूर्ब अछि ॥
जाईफुल रे ॥ (३५)

कहुछन्ति सीतापति, ग‌उड़ बाउड़ जाति ।
गाई रखि बने बुल अनुक्षणे, न जाण धर्मर रीति ॥
जाईफुल रे ॥ (३६)

क्षुधारे मागिलुँ क्षीर, तुम्भे कल अनादर ।
आम्भ शाप घेन नोहिबटि आन, दुध होइब रुधिर ॥
जाईफुल रे ॥ (३७)

तुम्भ नारीमाने य़ाइ, मुण्डे दधि-भाण्ड बहि ।
बेश्या प्राय होइ बिकि बुलुथिबे, ए ग्राम से ग्राम होइ ॥
जाईफुल रे ॥ (३८)

गोपाळे य़ोड़िले कर, आहे देब दया कर ।
देउअछुँ क्षीर सुकल्याण कर, घेन बिनति आम्भर ॥
जाईफुल रे ॥ (३९)

शुणि राम तोष हेले, गोपाळ-मुख चाहिँले ।
द्वापर य़ुगरे तुम्भर मन्दिरे, जन्म होइबुँ बोइले ॥
जाईफुल रे ॥ (४०)

राम माल्यबन्त परे, बरषा काळे मिळिले ।
बक पक्षी ठारु बारता पाइण, ऋष्यमूके प्रबेशिले ॥
जाईफुल रे ॥ (४१)

बाळी डरे सुग्रीबर, लुचिथिला गिरि पर ।
पबनर सुत नाम हनुमन्त, सङ्गते अछ‌इ तार ॥
जाईफुल रे ॥ (४२)

सुग्री हनुमान गले, राम लक्ष्मण भेटिले ।
सीताङ्क सङ्केत श्रीरामङ्कु देइ, पादे पड़ि जणाइले ॥
जाईफुल रे ॥ (४३)

कहन्ति प्रभु श्रीराम, काहिँकि लुचिछ बन ।
शुणि सुग्रीबर बाळी सामाचार, कहिला बाळीर गुण ॥
जाईफुल रे ॥ (४४)

सुग्री सङ्गे हले मित, काण्डे बाळी कले हत ।
किष्किन्ध्या कटक अङ्गदकु देइ, धराइले पाट छत्र ॥
जाईफुल रे ॥ (४५)

किष्किन्ध्या काण्ड चरित, एहिठारे समापत ।
दीन मनोहर मेहेर कह‌इ, राम-पादे देइ चित्त ॥
जाईफुल रे ॥ (४६)

कैळास-शिखरे बसि, कहुछन्ति काशीबासी ।
सामबेदुँ जात रामायण ग्रन्थ, सुमने शुण सुकेशी ॥
जाईफुल रे ॥ (४७)

सुन्दरा काण्डर बाणी, शुण गो देबी भबानी ।
शुणिले मुकत होइब पबित्र, काळ न बाधिब प्राणी ॥
जाईफुल रे ॥ (४८)

बरषा काळ बञ्चिले, कपि-बळ सज कले ।
चारि दिगे दूत पठाइले राम, हनु लङ्कागड़ गले ॥
जाईफुल रे ॥ (४९)

देखि ताकु लङ्कादेबी, बोइला तोते खाइबि ।
काहिँर मर्कट पशु ए कटक, तोते बाट न छाड़िबि ॥
जाईफुल रे ॥ (५०)

कोपे अञ्जनार बळा, चापोड़ाघात माइला ।
बर देला देबी श्रीराम-बान्धबी, य़ाइ खोज रे बाइला ॥
जाईफुल रे ॥ (५१)

अशोक बने मिळिला, सीता सती ठाब कला ।
रत्‍न मुदि देइ सीताङ्क चरणे, पड़ि प्रबोधि कहिला ॥
जाईफुल रे ॥ (५२)

कहे बीर हनुमान, मागो ! स्थिर कर मन ।
राबणकु मारि तुम्भङ्कु उद्धरि, नेबे प्रभु रघुराण ॥
जाईफुल रे ॥ (५३)

तहुँ महाबीर गला, मधुबने प्रबेशिला ।
रम्भा-बने य़ेह्‍ने गज थिले तारे सेहिपरि मन्थिदेला ॥
जाईफुल रे ॥ (५४)

य़हुँ से पबन-बळा, मधुबन भाङ्गिदेला ।
राबणर आगे चार जणाइला, भो देब शिरी सरिला ॥
जाईफुल रे ॥ (५५)

माङ्कड़ गोटिए आसि, मधुबने अछि पशि ।
निमिष मात्रके एते बड़ बन, टाण करे देला नाशि ॥
जाईफुल रे ॥ (५६)

कोपे राबण प्रज्वळि, इन्द्रजितकु हकारि ।
बोइला काहिँर माङ्कड़ आसिछि, आण ताकु बेगे धरि ॥
जाईफुल रे ॥ (५७)

शुणि इन्द्रजित गला, हनुकु बान्धि आणिला ।
अनेक प्रकारे माड़ मारि ताकु, लङ्कागड़े बुलाइला ॥
जाईफुल रे ॥ (५८)

लाञ्जे बसन गुड़ाइ, तैळ ढाळि देले तहिँ ।
सकळ असुर एक ठाब होइ, लाञ्जे लगाइले जूइ ॥
जाईफुल रे ॥ (५९)

य़हुँ से अग्नि जळिला, हनु य़े उठि बसिला ।
राबण-जगती उपरे मारुति, ब्रह्म अग्नि लगाइला ॥
जाईफुल रे ॥ (६०)

ए घर से घर होइ, हनु गला डेइँ डेइँ ।
शए क्रोश लङ्का सुबर्ण्णर पुर, तत्क्षणे देला पोड़ाइ ॥
जाईफुल रे ॥ (६१)

य़ेते पुत्र नाति घेनि, पळाइला बिंशपाणि ।
बोइला बिधाता कि दण्ड बिहिलु, माङ्कड़ हस्तरे आणि ॥
जाईफुल रे ॥ (६२)

कहे बीर हनुमान, शुण रे चोर राबण ।
सीता य़ोगुँ तोर सम्पत्ति सरिला, निश्‍चे लभिबु मरण ॥
जाईफुल रे ॥ (६३)

हनु लङ्कारु आसिला, श्रीराम पाशे भेटिला ।
भो प्रभु जगत-करता सीताङ्कु, देखिलि बोलि कहिला ॥
जाईफुल रे ॥ (६४)

सीताङ्क सन्देश आणि, कहिला से कपिमणि ।
शुणि रघुनाथ राइ कपि-य़ूथ, सेतुबन्ध बान्धिलेणि ॥
जाईफुल रे ॥ (६५)

सुबळया परबते, बिजे प्रभु रघुनाथे ।
तेड़े बड़ गिरि कम्पि य़ाउअछि, माङ्कड़-मानङ्क घाते ॥
जाईफुल रे ॥ (६६)

य़ूथ कपि-बळ पूरि, शाळ शिळ तरु धरि ।
खि खि खुँ खुँ राब शुभ‍इ शबद, कम्पिय़ाए बसुन्धरी ॥
जाईफुल रे ॥ (६७)

कपि-बळ सङ्गे घेनि, चळिगले रघुमणि ।
लङ्कागड़े य़ाइ प्रबेश होइले, हनु अङ्गदङ्कु आणि ॥
जाईफुल रे ॥ (६८)

धर धर मार मार, काहिँ गला सीता-चोर ।
सिंहर घरणी शृगाळ कि आणि, जीबन थिब कि तार ॥
जाईफुल रे ॥ (६९)

चार जणाइला य़ाइ, शुण देब लङ्कसाइँ ।
कपि-बळ राइ य़ुझिबार पाइँ, आसुछन्ति य़ति दुइ ॥
जाईफुल रे ॥ (७०)

शुणि राबण उठिला, इन्द्रजितकु राइला ।
बोइला कुमर सैन्य सज कर, शत्रुकु न कर हेळा ॥
जाईफुल रे ॥ (७१)

असुरे शुणि धाइँले, श्रीराम सङ्गे य़ुझिले ।
महाघोर रण होइला संग्राम, राम-हस्ते केते मले ॥
जाईफुल रे ॥ (७२)

देखि कोपे मेघनाद, कला महाघोर नाद ।
श्रीराम लक्ष्मण आगरे य़ाइण, लगाइला महाय़ुद्ध ॥
जाईफुल रे ॥ (७३)

केते मते कला रण, जिणि न पारिला पुण ।
नागफाश नेइ राबण-तनय, बान्धिला राम लक्ष्मण ॥
जाईफुल रे ॥ (७४)

श्रीराम लक्ष्मण दुइ, नागफाशे बन्दी थाइ ।
बिनता-नन्दन गरुड़ङ्कु मने, सुमरणा कले तहिँ ॥
जाईफुल रे ॥ (७५)

गरुड़ य़हुँ अ‌इले, नाग-गण पळाइले ।
फिटिला बन्धन श्रीराम लक्ष्मण, पुणि उठि य़ुद्ध कले ॥
जाईफुल रे ॥ (७६)

इन्द्रजित कुम्भकर्ण्ण, य़ेते थिले दुष्ट-गण ।
सकळ असुर गले य़मपुर, माइले राम लक्ष्मण ॥
जाईफुल रे ॥ (७७)

राबणर दश मुण्ड, काटि कले खण्ड खण्ड ।
स्वर्गे देबगणे जयध्वनि कले, कम्पिला चौद ब्रह्माण्ड ॥
जाईफुल रे ॥ (७८)

बसुमती तोष हेला, देबताङ्क दुःख गला ।
लङ्का जय करि सीताङ्कु लभिले, प्रभु दशरथ-बळा ॥
जाईफुल रे ॥ (७९)

राम-पादे बिभीषण, पशिला य़ाइ शरण ।
राबणर नारी नाम मन्दोदरी, आणि कले समर्पण ॥
जाईफुल रे ॥ (८०)

बिभीषण-शिरे पाट, बान्धिले कौशल्या-चाट ।
चन्द्र सूर्य़्य थिबा परिय़न्ते सुखे, भोग य़ा लङ्का-सम्राट ॥
जाईफुल रे ॥ (८१)

रामचन्द्र सीता बेनि, कपि अङ्गद पाबनि ।
लङ्का कटकरु बाहुड़िले राम, भाइ भारिजाङ्कु घेनि ॥
जाईफुल रे ॥ (८२)

अय़ोध्या नगरे आसि, प्रबेशिले रघुशिषि ।
मातागणे पुत्र बधू देखि तोष, प्रजागण हेले खुसि ॥
जाईफुल रे ॥ (८३)

अय़ोध्यारे राम राजा, सुखे पाळिले परजा ।
भ्रत शत्रुघन लक्ष्मण सहिते, राम-पादे कले पूजा ॥
जाईफुल रे ॥ (८४)

हनु अङ्गद सुग्रीब, सुषेण आदि जाम्बब ।
मेलाणि मागिण किष्किन्ड्याकु गले, कहिलेटि सदाशिब ॥
जाईफुल रे ॥ (८५)

पार्बती बोलन्ति नाथे, कथाए पड़िला चित्ते ।
जाईफुल बोलि काहाकु कहन्ति, एहा कहिदिअ मोते ॥
जाईफुल रे ॥ (८६)

शुण देबी शाकम्भरी, कहिलुँ तोते बिचारि ।
जीब परमर भिन्नाभिन्न नाहिँ, तुम्भे आम्भे य़ेउँपरि ॥
जाईफुल रे ॥ (८७)

जीबकु य़े जाईफुल, सङ्गतरे कर तुल ।
साधुए जाणन्ति मूर्खे न बुझन्ति, पिण्ड ब्रह्माण्ड बिचार ॥
जाईफुल रे ॥ (८८)

उड़िले परम हंस, जीब गले तार पाश ।
पुरुणाकु छाड़ि नूआ गृह लोड़ि, आनन्दे कर‌इ बास ॥
जाईफुल रे ॥ (८९)

रामायण सुधा-बारि, पिइ तोष शाकम्भरी ।
श्रीराम-चरित परम पबित्र, शुणि नरे य़ाअ तरि ॥
जाईफुल रे ॥ (९०)

खड़िआळ राज्य-बासी, सिनापालि-ग्रामबासी ।
उदन्ती नदीर पिइ सुधा-नीर, दिन सरु नाहिँ बसि ॥
जाईफुल रे ॥ (९१)

शुण साधु सुज्ञ नर, मो दोष थिले न धर ।
बैश्य मनोहर मेहेर कह‌इ, राम-पादे य़ोड़ि कर ॥
जाईफुल रे ॥ (९२)

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( इति श्रीमनोहर मेहेर -बिरचित जाईफुल रामायण सम्पूर्ण्ण )
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(Here ends 'Jāīphula Rāmāyaņa' of Poet Manohar Meher.)

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Sunday, November 1, 2009

Poet Manohar Meher : बृन्दाबनरे गो ! (Brundābanare Go)


Brundābanare Go ! (Rāsa Sańkīrttana).
Oriya Song by : Poet Manohar Meher (1885 -1969)
[The Poet is regarded as 'Gaņa-Kavi' or 'Pallī-Kavi' of Western Orissa.]
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बृन्दाबनरे गो ! (रास संकीर्त्तन)
ओड़िआ गीत : कवि मनोहर मेहेर (१८८५- १९६९)

(प्रस्तुत गीत 'मनोहर पद्यावळी ' पुस्तकरु गृहीत ।
कवि मनोहर मेहेर पश्‍चिम ओड़िशार 'गण-कवि ' बा 'पल्ली-कबि ' भाबरे ओड़िआ साहित्यरे चर्चित ।)
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बृन्दाबनरे गो ! कृष्ण कले रास केळि,
देखि पुलकित तनु ..हुए मही-आळि ॥ (घोषा)

तुळ मास हरि बास ..दिने बनमाळी,
भानु-सुता सङ्गे कले ..निकुञ्जरे मेळि ॥
बृन्दाबनरे गो ! .... (१)

लळिता बिशाखा आदि .घेनि अर्घ्य्यथाळी,
आनन्दरे बन्दाइण .देले हुळहुळि ॥
बृन्दाबनरे गो ! .... (२)

आलट चामर धरि .केते ब्रजबाळी,
कर्पूर चूआ चन्दन .अङ्गे देले बोळि ॥
बृन्दाबनरे गो ! .... (३).

के बर्ण्णि पारिब मुखे .राधा-कृष्ण-केळि,
भिआइछन्ति य़े प्रभु .के पारिब कळि ॥
बृन्दाबनरे गो ! .... (४)

षोळ सस्र गोप-कन्या .रचिले मण्डळी,
दीन मनोहर माखे .चरणर धूळि ॥
बृन्दाबनरे गो ! .... (५)

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('Kārttika Pūrņimā' well-known as 'Rāsa Pūrņimā' is a famous Indian festival in which The Pair of Goddess Rādhā and God Krishņa is worshipped by the devotees. On this holy occasion, this Song is musically presented in chorus 'Sańkīrttan' with worship of Rādhā-Krishņa in several villages of Orissa.)
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Source : 'Manohar Padyāvalī'
(Anthology of Oriya Lyrical Compositions of Poet Manohar Meher.)
Edited by : Dr. Harekrishna Meher.
First Edition : 1985 Śrī-Rāma-Navamī.
Published by : Sri Narayan Bharasa Meher, Manohar Kavitā Vās, Sināpāli, Orissa, India.
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Ref : Manohar Padyavali :
*http://www.worldcat.org/search?q=au%3AHarekr%CC%A5shn%CC%A3a+Mehera&qt=hot_author

*http://www.worldcat.org/oclc/40053452&referer=brief_results

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Saturday, October 31, 2009

Reference to Naishadhacharita (Ph.D. Thesis)


(My Ph.D. Thesis done in Banaras Hindu University, Varanasi in 1981).

“PHILOSOPHICAL REFLECTIONS IN THE NAISADHACARITA”,
By : Dr. HAREKRISHNA MEHER

Published by : Punthi Pustak, 136 / 4B, Bidhan Sarani, Calcutta-4,
First Edition 1989, ISBN: 81-85094-21-7.
(Copyright Reserved by Author.)
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Reference to Naishadhacharita (As available till today)

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* Musepaper : Poet Sriharsha is a deep-delved philosopher.
http://themusepaper.blogspot.com/2007/10/poet-sriharsa-is-deep-delved.html

* Delhi University M.A. Sanskrit Syllabus ( Paper - 103 , Ref. Book, Naisadha) :
http://www.du.ac.in/course/syllabi/M.A.%20_Sanskrit_%20syllabi-09.pdf
(Meher, Harekrishna - Philosophical Reflections in the Naisadhacarita,
Punthi-Pustak, Calcutta, 1989)

*

http://www.eurobuch.com/buecher/isbn/8185094217/Harekrishna-Meher-Philosophical-reflections-in-the-Naisadhacarita.html

*http://www.worldcat.org/oclc/20996039&referer=brief_results

*

http://www.a1books.com/catalog/8185094217

http://www.a1books.co.in/searchdetail.do?itemCode=8185094217

http://www.abebooks.com/products/isbn/9788185094212

http://www.alibris.com/search/books/subject/riharsa

http://www.alibris.com/booksearch?qwork=5102480&matches=6&browse=1&subject=riharsa&cm_sp=works*listing*title

http://www.allbookstores.com/book/9788185094212/Harekrshna_Mehera

http://www.amazon.co.uk/Philosophical-reflections-Naisadhacarita-Harekrishna-Meher/dp/8185094217

http://www.bokfynd.nu/8185094217.html

http://www.bookfinder.com/dir/i/Philosophical_Reflections_in_the_Naisadhacarita/8185094217/

http://www.bookmaps.de/lib/ruc/p/h/phi_43.html

http://www.chapters.indigo.ca/used-books/Philosophical-reflections-in-the-Naisadhacarita-Harekrshna-Mehera/grp5102480-rare.html

http://www.criticadelibros.org/8185094217

http://www.criticaliteraria.com/8185094217

http://www.flipkart.com/philosophical-reflections-naisadcharita-meher/8185094217-bw23f6zgbd

http://www.indus-intl.com/bookdetails.cfm?bookid=IN-10687

http://www.mrmlonline.com/ap_dr_harekrishna_meher.html

http://morris.mcmaster.ca/ipac20/ipac.jsp?session=1N21CX4666292.1164842&profile=lib&uri=link=3100007~!846720~!3100001~!3100002&aspect=basic_search&menu=search&ri=1&source=~!morris&term=Mehera%2C+Harekrsh%E1%B9%87a.&index=AUTHO#focus

http://openlibrary.org/b/OL1832524M/Philosophical-reflections-in-the-Nais%CC%A3adhacarita

http://product.half.ebay.com/_W0QQprZ5254175QQtgZinfo

http://books.rediff.com/bookshop/buyersearch.jsp?lookfor=H.k.%20Meher&search=1

http://www.reviewscout.co.uk/8185094217

http://www.tomfolio.com/bookdetailsmem.asp?book=021948&mem=839
*
[University of Michigan] : http://books.google.com/books?id=uZILbL3QGkIC&q=philosophical+reflections+in+the+naisadhacarita&dq=philosophical+reflections+in+the+naisadhacarita&ei=evB4SOKmLo2AsgPXvuzfBw&pgis=1

(National Library of Australia) :
http://catalogue.nla.gov.au/Search/Home?lookfor=author:%22Mehera,%20Harekrshna%22&iknowwhatimean=1

http://nla.gov.au/nla.cat-vn1772019

* * *

श्रीरामरक्षा-स्तोत्रम् (Śrī-Rāma-Rakshā-Stotram) Oriya : H K Meher


Śrī-Rāma-Rakshā-Stotram
Original Sanskrit By : Sage Budha-Kaushika.
Oriya Translation By : Dr. Harekrishna Meher
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श्रीरामरक्षा-स्तोत्रम्
मूल-संस्कृत-रचना : बुध-कौशिक मुनि.
(ओड़िआ अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर)
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ॐ श्रीगणेशाय नमः ।

श्रीरामरक्षा-स्तोत्रम् ।

अस्य श्रीरामरक्षा-स्तोत्र-मन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः ।
श्रीसीता-रामचन्द्रो देवता । अनुष्टुप् छन्दः ।
सीता शक्तिः । श्रीमान् हनुमान् कीलकम् ।
श्रीरामचन्द्र-प्रीत्यर्थे रामरक्षा-स्तोत्र-जपे विनियोगः ॥

( ध्यानम् )
ध्यायेदाजानु-बाहुं धृत-शर-धनुषं बद्ध-पद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नव-कमल-दल-स्पर्द्धि-नेत्रं प्रसन्नम् ।
वामाङ्कारूढ़-सीता-मुख-कमल-मिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कार-दीप्तं दधतमुरु-जटा-मण्डलं रामचन्द्रम् ॥

( स्तोत्रम् )
चरितं रघुनाथस्य शत-कोटि-प्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातक-नाशनम् ॥ (१)

ध्यात्वा नीलोत्पल-श्यामं रामं राजीव-लोचनम् ।
जानकी-लक्ष्मणोपेतं जटा-मुकुट-मण्डितम् ॥ (२)

सासि-तूण-धनुर्वाण-पाणिं नक्‍तंचरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत् त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥ (३)

रामरक्षां पठेत् प्राज्ञः पापघ्नीं सर्व-कामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥ (४)

कौशल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्र-प्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मख-त्राता मुखं सौमित्रि-वत्सलः ॥ (५)

जिह्‍वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरत-वन्दितः ।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेश-कार्मुकः ॥ (६)

करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खर-ध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥ (७)

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्-प्रभुः ।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुल-विनाशकृत् ॥ (८)

जानुनी सेतुकृत् पातु जङ्घे दशमुखान्तकः ।
पादौ विभीषण-श्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥ (९)

एतां राम-बलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥ (१०)

पाताल-भूतल-व्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं राम-नामभिः ॥ (११)

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापै-र्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ (१२)

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण राम-नाम्नाऽभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत् तस्य करस्थाः सर्व-सिद्धयः ॥ (१३)

वज्र-पञ्जर-नामेदं यो राम-कवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जय-मङ्गलम् ॥ (१४)

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने राम-रक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥ (१५)

आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् स नः प्रभुः ॥ (१६)

तरुणौ रूप-सम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीक-विशालाक्षौ चीर-कृष्णाजिनाम्बरौ ॥ (१७)

फल-मूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ राम-लक्ष्मणौ ॥ (१८)

शरण्यौ सर्व-सत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्व-धनुष्मताम् ।
रक्षःकुल-निहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥ (१९)

आत्त-सज्ज-धनुषाविषु-स्पृशा-
वक्षयाशुग-निषङ्ग-सङ्गिनौ ।
रक्षणाय मम राम-लक्ष्मणा-
वग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥ (२०)

सन्नद्धः कवची खड़्गी चाप-वाणधरो युबा ।
गच्छन् मनोरथान्नश्‍च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥ (२१)

रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौशल्येयो रघूत्तमः ॥ (२२)

वेदान्त-वेद्यो यज्ञेशः पुराण-पुरुषोत्तमः ।
जानकी-वल्लभः श्रीमानप्रमेय-पराक्रमः ॥ (२३)

इत्येतानि जपन्नित्यं मद्‍भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥ (२४)

रामं दूर्वादल-श्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभि-र्दिव्यै-र्न ते संसारिणो नराः ॥ (२५)

रामं लक्ष्मण-पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथ-तनयं श्यामलं शान्त-मूर्त्तिं
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुल-तिलकं राघवं रावणारिम् ॥ (२६)

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥ (२७)

श्रीराम राम रघु-नन्दन राम राम
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रण-कर्कश राम राम
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥ (२८)

श्रीरामचन्द्र-चरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचन्द्र-चरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्र-चरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचन्द्र-चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ (२९)

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु-
र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥ (३०)

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा ।
पुरतो मारुति-र्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥ (३१)

लोकाभिरामं रण-रङ्ग-धीरं
राजीव-नेत्रं रघुवंश-नाथम् ।
कारुण्य-रूपं करुणाकरं तं
श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥ (३२)

मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यं
श्रीराम-दूतं शरणं प्रपद्ये ॥ (३३)

कूजन्तं राम-रामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविता-शाखां वन्दे वाल्मीकि-कोकिलम् ॥ (३४)

आपदामपहर्त्तारं दातारं सर्व-सम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ (३५)

भर्जनं भव-बीजानामर्जनं सुख-सम्पदाम् ।
तर्जनं यम-दूतानां राम-रामेति गर्जनम् ॥ (३६)

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचर-चमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्त-लयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥ (३७)

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्र-नाम तत्तुल्यं राम-नाम वरानने ॥ (३८)

(इति श्रीबुधकौशिक-मुनि-विरचितं श्रीरामरक्षा-स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।)


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Śrī-Rāma-Rakshā-Stotra

(Oriya Version) : Harekrishna Meher
(For readers' convenience, Oriya letters have been shown here
in Devanagari script.)

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श्रीरामरक्षा-स्तोत्र
मूल-संस्कृत-रचना : बुध-कौशिक मुनि.
(ओड़िआ अनुवाद : हरेकृष्ण मेहेर)

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एहि श्रीरामरक्षा- स्तोत्र मन्तरर,
अटन्ति बुध क‌उशिक ऋषिबर ।
देबता अटन्ति श्रीसीता-रामचन्द्र,
अनुष्टुप नामरे अटे एहा छन्द ।
सीतादेवी शकति अटन्ति आबर,
श्रीमन्त हनुमन्त कीळक एहार ।
श्रीरामचन्द्र- प्रीति पाइँ मन्त्र ए त,
श्रीरामरक्षा स्तोत्र जपे बिनियुक्त ॥

(ध्यान )
बन्द‌इँ रामचन्द्र धनुशर-हस्त,
भुज लम्बिछि य़ार जानु परिय़न्त ।
कमळ-आसने य़े अछन्ति बिराजि,
पीत बसन य़ोगे निज देह साजि ।
य़ार नयन बेनि कान्ति बळे निज,
निन्दुछि नब पद्म- पत्रर सौन्दर्य़्य ।
बाम पार्श्‍वे शोभिता जनक-सुतार,
मुख-पद्मे मिळिछि नयन य़ाहार ।
बहु भूषण घेनि झळि उठे प्रभा,
जळधर समान दिशे य़ार आभा ।
बिस्तृत जटाराशि शिरे शोहे य़ार,
से प्रसन्न रामङ्कु मोर नमस्कार ॥

(स्तोत्र )
शतकोटि बिस्तार श्रीरामङ्क कथा,
प्रति अक्षरे तुटे महापाप-ब्यथा ॥ (१)

नीळ पद्म पराय श्यामळ य़ा देही,
जानकी लक्ष्मणङ्क सङ्गे छन्ति रहि ।
कमळ-नेत्र, जटा-मुकुट-शोभित,
खण्डा-तूणीर-धनु -शरे शोहे हस्त ।
निशाचर-मारक अज बिभु होइ,
स्वलीळारे य़े जात बिश्व-रक्षा पाइँ ॥ (२- ३)

एरूप श्रीरामङ्कु ध्यायि शुद्ध मने,
श्रीरामरक्षा स्तोत्र पढ़िब सुमने ।
सकळ पाप नाश कर‌इ ए स्तब,
य़ा द्वारा सिद्ध हुए कामना सरब ।
शिर मोर रखन्तु रघुकुळ-ईश,
भाल रक्षा करन्तु दशरथ-शिष ॥ (४)

रखन्तु क‌उशल्या-पुत्र नेत्रद्वय,
कर्ण बेनि रखन्तु बिश्‍वामित्र-प्रिय ।
य़ज्ञ-तारक नासा करन्तु रक्षण,
स‍उमित्रि- बत्सळ रखन्तु बदन ॥ (५)

जिह्‍वा रखन्तु मोर बिद्यार भण्डार,
भरत-पूज्य कण्ठ रखन्तु मोहर ।
बेनि स्कन्ध रखन्तु दिब्य-अस्त्रधारी,
भुज रखन्तु शिब-धनु-भङ्गकारी ॥ (६)

कर रक्षा करन्तु सीतादेबी-कान्त,
हृदय मो रखन्तु पर्शुरामजित ।
मध्यभाग रखन्तु खर-बिनाशन,
नाभि रखन्तु जाम्बबानङ्क शरण ॥ (७)

कटि रखन्तु मोर सुग्रीबङ्क सखा,
महाबीर-प्रभु मो सक्थि कर रक्षा ।
राक्षस-बिनाशन रघुङ्क उत्तम,
रक्षा करन्तु शुभे बेनि उरु मम ॥ (८)

दुइ जानु रखन्तु सेतुबन्धकारी,
दुइ जङ्घ रखन्तु राबण-संहारी ।
बिभीषण-ऐश्‍वर्य़्य-दाता पाद मोर,
रखन्तु रामचन्द्र सर्बाङ्ग शरीर ॥ (९)

श्रीरामचन्द्र-बळ-य़ुक्त रक्षा एहि,
य़ेउँ पुण्य-करमा जन पढ़िथाइ ।
हुए से दीर्घजीबी पुत्रबन्त जयी,
सुखरे रहे सदा होइ से बिनयी ॥ (१०)

स्वर्ग मर्त्त्य आबर पाताळ भुबने,
भमण करन्ति य़े छद्मचारीमाने ।
सेमाने राम-नाम-रक्षित लोकङ्कु,
देखिबा पाइँ मध्य न पान्ति बळकु ॥ (११)

श्रीराम रामभद्र रामचन्द्र ध्यायि,
पाप न लभे नर भोग मोक्ष पाइ ॥ (१२)

जगत जिणिबाकु राम-मन्त्र एका,
य़ेहु कण्ठे धारण करे रामरक्षा ।
सकळ सिद्धि तार हस्तगत हुए,
बज्र-पञ्जर नाम राम-कबच ए ।
ए कबच स्मरिले हुए जय शुभ,
बाणी-सिद्धि सर्वत्र लभ‍इ मानब ॥ (१३- १४))

एहि श्रीरामरक्षा य़ेउँ परकार,
स्वपनरे प्रकाश करिले शङ्कर ।
प्रभातुँ उठि बुध-क‍उशिक ऋषि,
सेहिरूपे लेखिले मन करि खुसि ॥ (१५)

कळप-तरुमानङ्कर उपबन,
य़ार नाम सकळ बिपत्ति-नाशन ।
तिनि लोक मध्यरे अपूर्व सुन्दर,
से रामचन्द्र रक्षा करन्तु आम्भर ॥ (१६)

दाशरथि लक्ष्मण अनुचर य़ार,
से रामचन्द्र बळीयान महाबीर ।
ककुत्स्थ-बंशी रघु-तिळक पुरुष,
क‍उशल्या-तनुज पूर्ण य़ज्ञ-ईश ।
ख्यात पुरुषोत्तम बेदान्तरे ज्ञेय,
सीताकान्त य़ा पराक्रम अप्रमेय ॥ (२२- २३)

एतेक नाम नित्य श्रद्धा परबशे,
मोहर भकत य़े जप‍इ मानसे ।
अश्‍वमेधुँ अधिक पुण्य लभे सेहि,
सन्दे्ह नाहिँ एथि राम छन्ति कहि ॥ (२४)

पीत-बस्त्र-शोभित दूर्बादळ-श्याम,
बिकच-पद्म-पत्र- नयन श्रीराम ।
दिब्य नामे य़े करे श्रीरामङ्क स्तुति,
संसार-जञ्जाळे से ग्रस्त न हुअन्ति ॥ (२५)

लक्ष्मणाग्रज राबणारि सीता-बर,
काकुत्स्थ कमनीय करुणा-सागर ।
ब्राह्मण-प्रिय गुणनिधि रघुराज,
धार्मिक सत्यसन्ध दशरथात्मज ।
राजेन्द्र शान्त-मूर्त्ति श्याम कळेबर,
बन्दे रघु-तिळक भुबन-सुन्दर ॥ (२६)

नम‍इँ राम राम-भद्र रामचन्द्र,
बिधाता सीतापति रघुकुळ-इन्द्र ॥ (२७)

श्रीराम राम रघु-सुत राम राम,
भरतङ्क अग्रज राम राम राम ।
श्रीराम राम राम य़ुद्धे बळीयार,
श्रीराम हुअ प्रभु शरण मोहर ॥ (२८)

श्रीरामचन्द्र-पाद सुमर‍इँ मने,
श्रीरामचन्द्र-पाद बर्ण‌इँ बचने ।
श्रीरामचन्द्र-पाद शिरे प्रणम‍इँ,
श्रीरामचन्द्र-पादे शरण पश‌इँ ॥ (२९)

माता राम मोहर पिता रामचन्द्र,
स्वामी राम मोहर सखा रामचन्द्र ।
दयाळु रामचन्द्र मोर सर्ब धन,
ताङ्करि बिना किछि न जाण‌इँ आन ॥ (३०)

दक्षिण पार्श्‍वे य़ार अछन्ति लक्ष्मण,
जानकी देबी य़ार बामे बिद्यमान ।
हनुमान अछन्ति सम्मुखे य़ाहार,
से रघु-सुत रामे मोर नमस्कार ॥ (३१)

समरे धैर्य़्यबन्त भुबन-मोहन,
रघुबंश-भूषण राजीब-नयन ।
कारुण्य-रूप प्रभु करुणा-निधान,
से रामचन्द्र-पादे पशुछि शरण ॥ (३२)

पबन तुल्य बेग, गति मन प्राय,
बुद्धिमानमानङ्के श्रेष्ठ जितेन्द्रिय ।
बात-सुत बानर-यूथे अग्रगण्य,
श्रीरामदूत-पादे पशुछि शरण ॥ (३३)

श्रबण-बिमोहन मधुर-अक्षर,
राम राम बोलिण गाइ निरन्तर ।
कबिता-शाखा परे बसिछन्ति सेहि,
बाल्मीकि-कोकिळङ्कु प्रणाम कर‌इँ ॥ (३४)

सर्ब-सम्पद-दायी महादुःखहर,
लोक-रम्य रामङ्कु नमे बारम्बार ॥ (३५)

संसार-बीज-नाशी सुख-बित्त-प्रद,
राम-नामे डरन्ति य़मदूत-बृन्द ॥ (३६)

सदा जय श्रीराम रघुकुळ-श्रेष्ठ,
निशाचर-स‌इनि करिले य़े नष्ट ।
श्रीराम बिना नाहिँ अपर आश्रय,
श्रीराम-पादे सदा मन करु लय ।
श्रीराम-सेबक मुँ भजे रमाईश,
उद्धार कर प्रभु मोते अहर्निश ॥ (३७)

शिब बोलन्ति प्रिये राम राम राम,
ए मनोरम नामे रमे अबिराम ।
बिष्णुङ्कर सहस्र नाम सङ्गे सरि,
जाण ए राम नाम सुमुखी सुन्दरी ॥ (३८)

श्रीबुध-क‌उशिक-मुनि- बिरचित,
श्रीरामरक्षा-स्तोत्र हेला समापत ॥

* * *

श्रीराम राम राम तारक-मन्तर,
अबिराम हेउ मो हृद-रत्‍न-हार ।
श्रीसीता-रामचन्द्र- पङ्कज-पयर,
हरेकृष्ण मेहेर ध्याये निरन्तर ॥


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Courtesy :
(Śrī-Rāma-Rakshā-Stotra,
Edited & Translated into Oriya by : Harekrishna Meher.

First Edition : 1977
Published by : Srimati Kuntala Kumari Meher. Sinapali, Kalahandi.

Also Available At : Bani Bhandar, Berhampur, Ganjam, Orissa, India)
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Ref : Śrī-Rāma-Rakshā-Stotra :
*http://www.worldcat.org/search?q=au%3AHarekr%CC%A5shn%CC%A3a+Mehera&qt=hot_author

*http://www.worldcat.org/oclc/10358769&referer=brief_results

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Friday, October 30, 2009

Divya-Vaibhavam (दिव्य-वैभवम्) / H.K.Meher


Divya-Vaibhavam (Sanskrit Song)
Lyrics & Tuning by : Dr. Harekrishna Meher

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दिव्य-वैभवम्
गीति-रचना तथा स्वर-संयोजना : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेर:

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दिव्य-वैभवं विभास्वरम्,
सत्यं शिवं सुन्दरम् ।
अजरं भज रे महेश्‍वरम्,
सत्यं शिवं सुन्दरम् ॥
(ध्रुवम्)
*
अगाध-जलधौ नगाधिराजे वने रणे,
पार्थिव-बन्धे भक्ति-सुगन्धे समीरणे ।
मज्ज सुकरुणा-वारि-कणे,
तमादिकन्दं . . . . . परमानन्दं
विरजं भज रे क्षणे क्षणे ।
तं भगवन्तं निरन्तरम्,
नाद-झङ्कृतं सुधा-झरम् ।
अजरं भज रे महेश्‍वरम्,
सत्यं शिवं सुन्दरम् ॥ (१)
*
पुण्य़-मताया मानवताया विचारणे,
दैन्य-गताया दानवताया निवारणे ।
आत्म-विश्‍वास-जागरणे,
विस्मर नो तं . . . . . भवाब्धि-पोतं
हृदये सुदया-परायणे ।
शान्ति-चन्दनं भ्रान्ति-हरम्,
चिन्तय नियतं ब्रह्म परम् ।
अजरं भज रे महेश्‍वरम्,
सत्यं शिवं सुन्दरम् ॥ (२)
*

प्रेम-बन्धनं विश्‍व-वन्दनं रसाङ्गणे,
निर्मलाञ्जनं तमोभञ्जनं सदीक्षणे ।
प्रपञ्च-मञ्चे सञ्चरणे,
तर्जय तापं . . . . . वर्जय पापं

सुमङ्गले कृत-पदार्पणे ।
पश्‍य सादरं सरोवरम्,
हंस-विहारं विकस्वरम् ।
अजरं भज रे महेश्‍वरम्,
सत्यं शिवं सुन्दरम् ॥ (३)
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(इयं गीतिका कहरवा-ताल-मध्य-लयेन परिवेषणीया ।)
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Monday, October 26, 2009

Śiva-Rakshā-Stotra (Oriya) / H.K.Meher


Śiva-Rakshā-Stotram of Sage Yājñavalkya
Oriya Version by : Harekrishna Meher
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श्रीशिवरक्षा-स्तोत्रम्
मूल-संस्कृत-रचना : याज्ञवल्क्य -मुनिः
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ॐ नमः शिवाय ।

अस्य श्रीशिवरक्षा-स्तोत्र-मन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः,
श्रीसदाशिवो देवता, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीसदाशिव-प्रीत्यर्थे शिवरक्षा-स्तोत्र-जपे विनियोगः ॥

चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम् ।
अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम् ॥ (१)


गौरी-विनायकोपेतं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रकम् ।
शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्षां पठेन्नरः ॥ (२)

गङ्गाधरः शिरः पातु भालमर्द्धेन्दु-शेखरः ।
नयने मदन-ध्वंसी कर्णौ सर्प-विभूषणः ॥ (३)

घ्राणं पातु पुराराति-र्मुखं पातु जगत्पतिः ।
जिह्‍वां वागीश्‍वरः पातु कन्धरां शिति-कन्धरः ॥ (४)

श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्‍व-धुरन्धरः ।
भुजौ भूभार-संहर्त्ता करौ पातु पिनाकधृक् ॥ (५)

हृदयं शङ्करः पातु जठरं गिरिजापतिः ।
नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटी व्याघ्रजिनाम्बरः ॥ (६)

सक्थिनी पातु दीनार्त्त-शरणागत-वत्सलः ।
ऊरू महेश्‍वरः पातु जानुनी जगदीश्‍वरः ॥ (७)

जङ्घे पातु जगत्कर्त्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः ।
चरणौ करुणासिन्धुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः ॥ (८)

एतां शिव-बलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स भुक्त्वा सकलान् कामान् शिव-सायुज्यमाप्नुयात् ॥ (९)

ग्रह-भूत-पिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये ।
दूरादाशु पलायन्ते शिव-नामाभिरक्षणात् ॥ (१०)

अभयङ्कर-नामेदं कवचं पार्वतीपतेः ।
भक्त्या बिभर्त्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत् त्रयम् ॥ (११)

इमां नारायणः स्‍वप्ने शिवरक्षां यथादिशत् ।
प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यस्तथालिखत् ॥ (१२)

(इति श्रीयाज्ञवल्क्य-प्रोक्तं शिवरक्षा-स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।)

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Oriya Śiva-Rakshā-Stotra / Harekrishna Meher

श्रीशिवरक्षा-स्तोत्र
ओड़िआ अनुवाद : हरेकृष्ण मेहेर

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एहि श्रीशिवरक्षा- स्तोत्र मन्तरर,
ऋषि अटन्ति य़ाज्ञवल्क्य मुनिबर ।
सदाशिव एहार अटन्ति दैवत,
अनुष्टुप् छन्दे एहा होइछि लिखित ।
सदाशिबङ्क प्रीति साधन निमित्त,
ए शिवरक्षा स्तोत्र जपे बिनिय़ुक्त ॥

देबदेब श्रीमहादेबङ्क चरित,
पबित्र-कारक ए अट‌इ अनन्त ।
धरम अर्थ काम मुकति चतुर -
बर्गर साधन ए परम उदार ॥ (१)

ग‌उरी गणेशङ्क सङ्गे त्रिलोचन,
पञ्चमुख शङ्कर ध्यायिब सुमन ।
दशभुज शिबङ्कु चिन्तिला उत्तारे,
ए शिबरक्षा पाठ करिब श्रद्धारे ॥ (२)

रखन्तु गङ्गाधर शिर देश मोर,
भाल रखन्तु मोर अर्द्धेन्दुशेखर ।
कन्दर्प-ध्वंसी मोर रखन्तु नयन,
कर्ण रखन्तु मोर भुजग-मण्डन ॥ (३)

नासिका मो रखन्तु त्रिपुर-अराति,
मुख रखन्तु मोर जगतर पति ।
जिह्‍वा रखन्तु मोर बाणीङ्क ईश्‍वर,
शिति-कन्धर ग्रीबा रखन्तु मोहर ॥ (४)

श्रीकण्ठ कण्ठ रक्षा करन्तु मोहर,
स्कन्ध बेनि रखन्तु बिश्‍व-धुरन्धर ।
बेनि भुज रखन्तु भूभार-हारक,
कर रखन्तु मोर पिनाक-धारक ॥ (५)

हृदय मोर रक्षा करन्तु शङ्कर,
गिरिजापति मोर रखन्तु उदर ।
मृत्युञ्जय मोहर रखन्तु नाभिकि,
ब्याघ्र-चर्म-धारक रखन्तु कटिकि ॥ (६)

दीन-आर्त्त-शरणागत-जन-प्रिय,
प्रभु रक्षा करन्तु मोर सक्थि द्वय ।
दुइ ऊरु रखन्तु देब महेश्‍वर,
दुइ जानु रखन्तु जगत-ठाकुर ॥ (७)

जङ्घ दुइ जगत-करता रखन्तु,
गणाधिप मो गुल्फ सुरक्षा करन्तु ।
पाद रक्षा करन्तु करुणा-सागर,
सदाशिव सर्बाङ्ग रखन्तु मोहर ॥ (८)

ए शिब-बळ-य़ुक्त रक्षा पढ़‍इ य़े,
शिब-साय़ुज्य लभे सर्ब काम भुञ्जे ॥ (९)

ग्रह भूत पिशाच आदि निशाचरे,
य़ेते भ्रमुथाआन्ति तिनि भुबनरे ।
ए शिबनाम रक्षा करन्ते श्रबण,
भये पळाइय़ान्ति दूररु तक्षण ॥ (१०)

अभयङ्कर नाम शिब-कबच ए,
भक्ति सहकारे य़े कण्ठे घेनिथाए ।
तिनि भुबन बश होइथाए तार,
दुःख शोकरु मुक्ति लभ‍इ से नर ॥ (११)

ए शिब-रक्षा य़ेउँ प्रकारे स्वपने,
नारायण आदेश करिले सुमने ।
प्रभातुँ उठि य़ाज्ञबल्क्य य़ोगीबर,
सेहि रूपरे ताहा लेखिले सत्वर ॥ (१२)

मुनि-प्रबर य़ाज्ञबल्क्य-विरचित,
श्रीशिबरक्षा-स्तोत्र एथि समापत ॥

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श्रीकाशीबिश्‍वनाथ प्रभुङ्क दयारे,
बिरचित हेला ए सरळ पदरे ।
श्रीबिश्‍वनाथ प्रभु सर्ब मनोरथ,
पूर्ण करिबे ताङ्कु नम‍इँ सतत ।
श्रीहर-ग‌उरीङ्क पङ्कज-चरण,
हरेकृष्ण मेहेर भजे अनुक्षण ॥

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(This Śiva-Rakshā-Stotra has been Published and included in the Book
Śrī-Rāma-Rakshā-Stotra Translated by Harekrishna Meher,
Published by : Bani Bhandar, Berhampur, Ganjam, Orissa, 1977.)
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Ref : Śiva-Rakshā-Stotram :
*http://www.worldcat.org/search?q=au%3AHarekr%CC%A5shn%CC%A3a+Mehera&qt=hot_author

*http://www.worldcat.org/oclc/10358769&referer=brief_results

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Wednesday, September 30, 2009

Chitrakut Aur Mahanadi (चित्रकूट और महानदी : तपस्विनी)


Chitrakut Aur Mahanadi

(Extracted from ' Tapasvini-Kavya' of Poet Gangadhara Meher)
From Original Oriya,
Hindi Translation By : Dr. Harekrishna Meher


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चित्रकूट और महानदी
(स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत 'तपस्विनी' काव्य, अष्टम सर्ग से)
मूल ओड़िआ से हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण
मेहेर

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उसी समय समक्ष आ चिन्ता-सुन्दरी
बोली वाणी विनयभरी :
'देवीजी ! कुछ लोग द्वार पधारे
प्यासे हैं दर्शन पाने तुम्हारे ।
यात्रा कर चुके राह बहुत लम्बी;
धन्य वह दर्शन-कामना
प्रखर आतप से नहीं दबी ।
बन जाता हृदय अपना
अपार प्रीति का भण्डार,
उनके कमनीय रूप निहार ॥'

बोलीं देवी : ' सखी मेरी !
ले आओ उन्हें न कर देरी ।
भाग्य मेरा धन्य,
मुझ पर इतने आदर हैं अनन्य ।
अवश्य पाप-ताप मिटा देंगे मेरे नयन
पाकर उनके दर्शन ॥'

देवी की आज्ञा मान
पहले आकर
एक ने मधुर मुस्कान
धीरे बिखराकर,
कई दिनों से परिचित बन्धु समान
कहा प्यारी बातों में अमृत सान ॥

'देवीजी ! स्मृति में है क्या घटना पिछली ?
किया था पदार्पण
तुमने मेरे घर ।
पाई है मेरी काया ने उसी क्षण
तुम्हारी तनु-ज्योति से सुन्दर
यह स्वर्गीय प्रभा की संपदा उजली ॥

मेरे निर्झर उस प्रभा के व्याज
आनन्द-विभोर झर्झर बहते आज ।
प्रफुल्ल-वदन पुष्प-समुदाय हास्य निखार
नन्दन-कानन का करते तिरस्कार ॥

सरिता-सलिल महकाकर सदा सुगन्ध मन्द
तटवासियों के मन में जगाता आनन्द ।
तुम्हारे प्यार-पले मयूर सारे
उच्च स्वर नित्य गाते गुण तुम्हारे ॥

प्रतिक्षण वारिद आकर बारी-बारी से
अटल अभिलाषा रख तुम्हारे दर्शन की,
ढूँढते घूम-घूम दरी-दरी से
'कहाँ है सुन्दरी जानकी' ।
पूछते मुझसे गंभीर स्वर में सभी,
'नहीं है' उत्तर से मानते नहीं कभी ।
ले उजाला बिजली का खोजते पुनर्बार
'निश्‍चित है सीता सुन्दरी' यही विचार ॥

देवीजी ! आज पहचाना क्या
इस हतभाग्य को तुमने ?
बहुत दिनों बाद आया
तुम्हारे सामने ।
तुम्हारी चरण-धूलि से सुन्दर
अपना मुकुट सजाकर
बन चुका हूँ भाग्यवान्
मैं चित्रकूट सानुमान् ॥'

तदुपरान्त पधारी एक शुभांगी रंगीली नयी
विमल-समुज्ज्वल- कान्तिमयी
प्रखर-आतप-ताप-दर्प-हारिणी,
वन-सुन्दरी की चिर-सहचारिणी,
गिरिमल्लिका- माला से कण्ठ है सज्जित हुआ,
ललाट पर रमणीय शिरोमणि महुआ ।
जम्बु-नीलरतन कर्णाभरण,
शुक्‍ति-पंक्‍ति जिसका कटि-भूषण ।
वनवासी मुनिजनों का अन्तःकरण मोहती,
सुन्दर कुटिल नील वेणी से सुहावनी लगती ॥

प्रफुल्ल प्रसन्न-वदन
उसने व्यक्‍त किया प्रत्यक्ष,
सुकुमार धीर मधुर वचन
सती के समक्ष :

'अयि सुशीले !
कृतज्ञता मेरी स्वीकार ले सादर,
तेरे स्नेह-ऋण से ऋणी हूँ निरन्तर ।
ऋण कहाँ चुका पाउँगी ? नहीं मेरी शक्‍ति ।
मुझे कृतार्थ कर, सति !
आन्तरिक भक्‍ति मेरी ले ॥

दुनिया में मेरे-जैसे हैं नहीं कितने ?
इतनी कृपा तेरी पाई है कहाँ किसने ?
पाकर तेरी शुभ दृष्टि पावनी,
मेरी बालुका है स्वर्ण-रेणु बनी ।
क्रीड़ा से रम गये जब दिव्य नयन तेरे,
तूने हीरा-क्षेत्र बना दिया वक्ष-स्थल को मेरे । (१)
विद्यमान नगेन्द्र-नन्दिनी श्रीविष्णुपदी;
फिर भी तेरी प्रदत्त उपाधि से मैं हूँ 'महानदी' ॥ '

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पादटीका (१) :
सम्बलपुर के पास महानदी-गर्भ में 'हीराकुद' नाम का क्षुद्र द्वीप है ।
वहाँ हीरा मिलने की जनश्रुति है ।
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[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, बुर्ला, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]

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