तृतीय दिबस अन्ते शुकळ
पक्षरे,
शुभ तिथिरे लग्नरु सप्तम स्थानरे ।
शङ्कर सङ्गे बिबाह- बिधि उमाङ्कर,
आयोजिले बन्धुबर्गे निमन्त्रि भूधर ॥ (१)
*
प्रतिगृहे प्रीतिबशे मङ्गळ तोरण,
पताका आदि शोभिला आड़म्बरे पूर्ण्ण ।
उत्सबे मज्जि रहिले गृहिणी समस्त,
नगेन्द्र-नगर हेला बिभा-कार्य़्य ब्यस्त ।
पुर-अन्तःपुर भेद न थिला सेठारे,
मने हेला सर्बे जात एक परिबारे ॥ (२)
*
कल्पपुष्प राजपथे होइला बिञ्चित,
चीन-बस्त्र ध्वजामान उड़िला अमित ।
कनक तोरणराजि प्रभा बिकाशिला,
चतुर्दिग समुज्ज्वळ सेकाळे दिशिला ।
ओषधिप्रस्थ नगर होइला प्रतीत,
स्थानान्तरे स्वर्ग किबा दिशे सुशोभित ॥ (३)
*
पुत्र अनेक थिलेहेँ एकइ दुहिता,
शीघ्र चालिय़िब एबे होइ बिबाहिता ।
निरेखिले पिता-माता तेणु समादरे,
सते ताङ्कु देखुछन्ति बहु काळ परे ।
मृत कन्या पुणि प्राण पाइ सते फेरि,
आसिछि, ए रूपे दुहेँ लक्ष्य कले हेरि ॥ (४)
*
कुटुम्बीए ताङ्कु निज अङ्के बसाइले,
शुभाशिष देइ बहु भूषणे मण्डिले ।
भिन्न सम्बन्ध हेलेहेँ भूधरेश-कुळ –
स्नेह सर्ब सुताठारे आसि हेला ठुळ ॥ (५)
*
मिहिर उदय परे तृतीय क्षणरे,
चन्द्र सङ्गते उत्तरा- फाल्गुनी य़ोगरे ।
पति-पुत्रबती साध्वी बन्धु-नारीगण,
बिरचिले उमा-अङ्गे शृङ्गार भूषण ॥ (६)
*
स्नान-य़ोग्य पट्ट बस्त्र पिन्धिले तरुणी,
श्वेत सोरिष- मिश्रित मृदु दूर्बा पुणि ।
माङ्गळिक बिधि-शर घेनिले सङ्गरे,
मानस मोहिले उमा स्नान-सुबेशरे ॥ (७)
*
तहिँ मङ्गळ बिबाह-संस्कारे गउरी,
शायक सम्बन्ध लभि शोभिले आहुरि ।
कृष्ण पक्ष अन्ते रबि- तेजे समुज्ज्वळा,
सुन्दर दिशइ य़था तन्वी चन्द्रकळा ॥ (८)
*
लोध्र-रजे तनु-तैळ शुष्क कले सर्ब,
शरीरे लेपन कले सुगन्ध दरब ।
लाबण्यमयीङ्कु तहुँ रमणी-निचय,
उत्तम बस्त्र पिन्धाइ नेले स्नानाळय ॥ (९)
*
मुक्ता-तोरण-चित्रित चारु मण्डपरे,
मरकत-बिरचित शिळातळ परे ।
हैमबतीङ्कि बसाइ हेम-कुम्भ-नीरे,
तूर्य़्य-नाद साथे स्नान कराइले धीरे ॥ (१०)
*
माङ्गळिक स्नान अन्ते शुद्ध-तनु पूता,
शोभिले शुभ बिबाह- बस्त्रे अद्रि-सुता ।
मेघ-जळे अभिषिक्ता होइ य़ेउँरूपे,
धरणी शोभे शरदे स्वच्छ
काश-पुष्पे ॥ (११)
*
पतिब्रताए उमाङ्कु नेले स्नानागारु,
चतुर्मणि-स्तम्भय़ुक्त चन्द्रातप चारु -
अळङ्कार-गृहे माङ्गळिक बेदिकारे,
सज्जित आसन थिला बेश रचिबारे ॥ (१२)
*
मोदे बसाइले पार्बतीङ्कि पूर्ब मुखे,
तनु-सज्जा पाइँ निजे बसिले सम्मुखे ।
तहिँ प्रसाधन उपकरण बहुत,
थिलेहेँ निज समीपे सज्जित प्रस्तुत ।
नारीए निसर्ग-शोभा करन्ते ईक्षण,
बेश-कर्म बिळम्बित हेला किछि क्षण ॥ (१३)
*
केउँ नारी धूप दीप देइ ताङ्क पाश,
धीरे शुष्क कला रम्य आर्द्र केशपाश ।
खञ्जिला मञ्जु कुसुम, बान्धिला मधुर –
मधुक सुमन-माळा सङ्गे
दूर्बाङ्कुर ॥ (१४)
*
गौरी-कळेबरे गोरचना चिता सङ्गे,
श्वेत अगुरु लेपिले नारीए कि रङ्गे ।
रथाङ्ग-चिह्नित चारु- पुळिना जाह्नबी–
कान्तिकि जिणिला तहिँ उमा-तनु-छबि ॥ (१५)
*
मेना-सुताङ्क कुन्तळ-कळित बदन,
अळि-सेबित नळिने करिला निन्दन ।
अम्बुद-बेष्टित चन्द्र- बिम्बकु आबर,
अपसारि न रखिला बिश्वे पटान्तर ॥ (१६)
*
लोध्र-पुष्परेणु-बोळा गण्ड शुष्क थिला,
गोरोचना-प्रलेपने उज्ज्वळ दिशिला ।
श्रबणे खचित य़बाङ्कुर बिभूषण,
गण्डे लम्बि कला जन- नेत्र आकर्षण ॥ (१७)
*
मध्य रेखारे बिभक्त ओष्ठ पार्बतीङ्क,
मधु-लेप य़ोगे हेला सराग अधिक ।
बहिला अपूर्ब छबि स्फुरि बारम्बार,
निकटे लाबण्य-फळ प्राप्ति हेब तार ॥ (१८)
*
उमा-पाद रञ्जि सखी आशिषिला हसि,
“स्परश कर ए पदे पति-शिर-शशी ।“
सेहि परिहास- गिर शुणि गौरी धीरे,
मौने माल्य प्रहारिले सखीर शरीरे ॥ (१९)
*
बेश-रचना-कारिणी प्रबीणा बामाए,
गिरिजाङ्क कृष्ण दीर्घ नीळ कञ्ज प्राये –
नेत्र चाहिँ शोभा अर्थे न करि रञ्जन,
मात्र मङ्गळ बिधिरे रञ्जिले अञ्जन ॥ (२०)
*
य़था नब पुष्पपुञ्जे मञ्जुळ बल्लरी,
ज्योतिर्मय ऋक्षे य़था शोभे बिभाबरी ।
बिहङ्ग-आगमे शोभे तरङ्गिणी य़था,
शुभ आभरणे उमा बिराजिले तथा ॥ (२१)
*
स्थिर नेत्रे आपणार रूपकु दर्पणे,
देखि उमा स्वामी-लाभे ब्यग्र हेले क्षणे ।
अङ्गनागण-रचित शृङ्गार सकळ,
प्रियतम-दरशने हुअइ सफळ ॥ (२२)
*
अङ्गुळि-य़ुगळे निज आर्द्र हरिताळ,
मनःशिळा चूर्ण्ण य़ोगे घेनि ततकाळ ।
कन्यार कर्ण्ण-भूषण - शोभित मुखकु,
नगाधिराज-गृहिणी टेकिले ऊर्द्ध्वकु ॥ (२३)
*
मङ्गळ तिळक लगाइले मस्तकरे,
ताङ्क मनोरथ सिद्ध हेला ए काळरे ।
जननी निज कन्यार प्रथम य़ौबने,
दीक्षा-तिळकर कथा भाबिथिले मने ॥ (२४)
*
पूर्ण्ण हेला माता-नेत्र हर्ष-लोतकरे,
ऊर्ण्णमय बिभा-सूत्र निज पुत्री-करे ।
अन्य स्थाने बान्धिबारु मङ्गळ बिधाने,
अङ्गुळिरे घुञ्चाइला धात्री य़थास्थाने ॥ (२५)
*
पट्ट बस्त्र पिन्धि नब दर्पण सङ्गते,
पर्बतराज-तनुजा शोभिले एमन्ते ।
फेनपुञ्ज य़ोगे क्षीर- सिन्धु-बेळा परि,
पूर्ण्ण चन्द्र घेनि य़था शारद शर्बरी ॥ (२६)
*
परिणय-रीति-दक्षा मेना स्वकुळर,
य़शोबर्द्धिनी दुहिता उमाङ्कु तत्पर ।
प्रणमाइ कुळ-देब अग्रते सहर्ष,
पतिब्रताङ्क चरणे कराइले स्पर्श ॥ (२७)
*
नम्रा उमाङ्कु सतीए देले आशीर्बाणी,
“स्वामीङ्क अखण्ड प्रेम लभ हे कल्याणि ! "
शिबङ्क अर्द्धाङ्ग-प्राप्त उमाङ्क निमन्ते,
आत्मीयङ्क आशीर्बाद हेला न्यून प्रते ॥ (२८)
*
उत्साह ऐश्वर्य़्य सह समारोहे भारि,
सुता बिबाह पूर्बरु स्वकर्त्तब्य सारि ।
सभा मध्ये उपबेशि बन्धुङ्क समीप,
शिबागम अपेक्षारे रहिले अद्रिप ॥ (२९)
*
सेहिकाळे कइळासे आदर सहित,
सपत माता प्रथम बिबाह-उचित ।
मङ्गळ बाचन लागि बस्त्र भूषणादि,
त्रिपुरारिङ्क पुरते रखिले सम्पादि ॥ (३०)
*
माताङ्क गौरब अर्थे भूषण सकळ,
न घेनि शङ्कर स्पर्श करिले केबळ ।
महामहिम शिबङ्क कपाळ प्रभृति,
बिबाह- बेशरे हेला रम्य अळङ्कृति ॥ (३१)
*
श्वेत अङ्गराग हेला चिता भस्म-जाळ,
मस्तक-भूषण हेला मञ्जुळ कपाळ ।
शोभा पाइला प्रभुङ्क देहे गज-चर्म,
प्रान्त-भाग-सुचित्रित बस्त्र मनोरम ॥ (३२)
*
ललाट देशे ताङ्करि दीप्त सुशोभन,
पीत –कनीनिका-य़ुक्त तृतीय नयन ।
निज तेज परकाशि हरिताळ- कृत –
पबित्र तिळक रूपे कला अळङ्कृत ॥ (३३)
*
शिब-अङ्गे य़थास्थाने भुजङ्गम-गण,
नाना बिभूषण रूपे शोभिले सेक्षण ।
केबळ तनुरे परिबर्त्तन होइला,
फणा-रत्न-कान्ति पूर्ब परि दीप्त थिला ॥ (३४)
*
दिबसे मध्य बिशद दीप्त निष्कळङ्क,
एक-कळात्मक चन्द्र नीळलोहितङ्क ।
चूड़ामणि स्थाने बिराजिला चमत्कार,
आबश्यक न होइला अन्य अळङ्कार ॥ (३५}
* *
नन्दी-भुजे हस्त थापि ब्याघ्र-चर्माबृत,
बृषभ-पृष्ठे आरूढ़ हेले शूळभृत ।
शिब-भक्ति घेनि सते कैळास आपणे,
बृष रूपे लघु काय कला सेहिक्षणे ॥ (३७)
* *
सुबर्ण्ण-रुचिरा मातृ-गणङ्क पछरे,
बिराजिले कपाळिनी काळी ए रूपरे ।
बळाका-शोभिता य़था नीळ कादम्बिनी,
सम्मुखे स्फुरित य़ार दीप्त सौदामिनी ॥ (३९)
* *
बिश्वकर्मा-कृत नब छत्र बिकर्त्तन,
ब्योमकेश-शिरे धरि कले बिमण्डन ।
छत्रर पट्ट-बस्त्रटि शिर पाशे जड़ि,
प्रते हेला, सते गङ्गा- धार अछि पड़ि ॥ (४१)
*
से समये मन्दाकिनी य़मुना ए बेनि,
चामर बिञ्चिले शिबे चारु तनु घेनि ।
तटिनी स्वरूप तेजि थिलेहेँ निजरि,
शोभिले चामर य़ोगे हंस-य़ुक्ता परि ॥ (४२)
*
आदि ब्रह्मा सङ्गे बिष्णु श्रीबत्स-भूषण,
शिबङ्कर जय ध्वनि कले उच्चारण ।
बेनि प्रभु कले शम्भु- महिमा बिस्तार,
घृत-हबनरे बह्नि बढ़े य़े प्रकार ॥ (४३)
*
एक मूरति बिभक्त तिनि स्वरूपरे,
सृष्टि-पाळन-प्रळय- हेतु ब्रह्माण्डरे ।
पद्मनाभुँ केबे बड़ हुअन्ति महेश,
महेश ठारु केबे त बड़ हृषीकेश ।
परमेष्ठी केबे बड़ बेनि देबतारु,
बिष्णु महादेब केबे बड़ ब्रह्मा ठारु ॥ (४४)
*
इन्द्रादि दिगीश तेजि राज-चिह्नमान,
शिब-दरशन इच्छि अइले से स्थान ।
इङ्गिते नन्दी दर्शन कराइले परे,
कर य़ोड़ि प्रणमिले समस्त अमरे ॥ (४५)
*
शिर चाळि शिब कले ब्रह्मारे आदर,
शिरीपतिङ्कि कुशळ पुच्छि महेश्वर ।
शतमन्युङ्कु सम्मान कले शुचि स्मिते,
अन्य देबतागणङ्कु निरेखि सुचित्ते ॥ (४६)
*
आशिषिले जय-शब्दे सप्त ऋषिबर,
बदने स्मित बिकाशि बोइले ईश्वर ,
“पूर्बरु मुँ बरिछि ए बिबाह-य़ज्ञरे,
आपणमानङ्कु प्रिय ऋत्विज रूपरे ॥" (४७)
*
बिकार-बर्जित प्रभु मृगाङ्क-शेखर,
पथ बाहिगले, तहिँ गन्धर्ब किन्नर –
बिश्वाबसु आदि बीणा बाइ तोषमन,
कले त्रिपुर-दहन महिमा गायन ॥ (४८)
* *
ओषधिप्रस्थ नगर नगराजङ्कर,
अपराजेय से पुर अराति-गणर ।
सुरक्षित से नगरे क्षणक मध्यरे,
पहञ्चिला महाबळी बृष आनन्दरे ।
ईशानङ्कर कटाक्ष – स्वर्ण्णसूत्र सते,
अग्रे आकर्षि ताहाकु घेनिगला द्रुते ॥ (५०)
* * *