Thursday, March 24, 2011

Participated in International Sanskrit Conference


Dr. Harekrishna Meher's Participation in International Conference
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International Conference on Holistic Health and Yogic Practices in Vedic and Later Sanskrit Texts’ was organized by and held at P.G. Department of Sanskrit, Utkal University, Vani Vihar, Bhubaneswar, Orissa on 14th to 17th March 2011. Prof. G.K. Dash, HoD of Sanskrit of this University, was the Director of the Conference. Many scholars and researchers from India and abroad attended and participated in the Conference.

(a) Invited by the Organizing Committee of the Conference, Dr. Harekrishna Meher (Sr. Reader and Head of the Department of Sanskrit, Government Autonomous College, Bhawanipatna, Orissa), as Chairperson presided over the first session of first day’s paper-reading on 14th March 2011.

(b) Dr. Harekrishna Meher, as an invited scholar, presented his research paper in Sanskrit entitled “Rig-Vede Paryaavaranam : Ekam Anushilanam” in the paper-reading session of the second day on 15th March 2011. The paper was discussed and very much appreciated by the scholars and students present in the session.

(c) In the evening of 15th March 2011, Sanskrit Kavi-Sammelan was held by the Committee of the Conference. Eminent poet Sri S. Sundarrajan presided over the meeting, while Sanskrit poet Prof. Dr. Prafulla Kumar Mishra and Dr. Paramba Sri Yogamaya coordinated this Poets’ Conference.
Several poets participated with their poems on various aspects. Dr. Harekrishna Meher presented his original Sanskrit poem entitled “Bhaaratam Priya-Bhaaratam” (A patriotic song bearing a touch of ecological awareness and national integration). This song written by Dr. Meher with his innovated new lyric-metre in Sanskrit was presented by him with own tuning and new presentation-style. It was highly appreciated by the poets, scholars and the audience.

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Nominated as a Member of Orissa Sahitya Akademi

Harekrishna Meher, a Member of Orissa Sahitya Akademi
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Dr. Harekrishna Meher has been nominated as a Member of General Council to the Orissa Sahitya Akademi (OSA), Bhubaneswar, from Nuapada district of Orissa State for a period of three calendar years. A notification to this effect has been issued by the Tourism and Culture (Culture) Department, Government of Orissa. (No. 61/ TC, Dated 11- 1 -2011).
In this regard, letter has also been received by Dr. Meher from Orissa Sahitya Akademi. [No.198 (34) OSA / Dated 3- 2-2011].

The first Meeting of General Council of the Akademi was held on 7th March 2011 at Bhanja Kala Mandap in the campus of OSA. Dr. Ramachandra Behera, President of OSA and Dr. Bijay Kumar Nayak, Secretary of OSA were on the dais. All official members, members from all districts of Orissa and members from Universities attended the meeting. Dr. Harekrishna Meher, as a Member of the General Council, actively participated in the meeting and there eight persons eminent in the field of Oriya literature were elected in their individual capacity by the General Council.
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Monday, February 14, 2011

भारतीय भाषाओं की सम्पर्क-लिपि देवनागरी (Devanagari Script): Dr. Harekrishna Meher

Bharatiya Bhashaon Ki Sampark Lipi Devanagari
Hindi Article By : Dr. Harekrishna Meher
(Devanagari : The Link-Script of Indian Languages)   
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भारतीय भाषाओं की सम्पर्क-लिपि देवनागरी   
* डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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हमारा भारतवर्ष ऐसा एक विशाल देश है, जिसमें कई प्रकार की विभिन्नता दृष्टिगोचर होती है । आचार-व्यवहार, वेशभूषा एवं भाषा की विवेचना जब की जाती है, तब पता चलता है कि विभिन्न प्रान्तों के अनुसार लोग विभिन्न प्रकार की भाषायें बोलते हैं और अपने जीवनयापन की व्यवस्था में एक स्वतन्त्र मर्यादा रखते हैं । ऐसे देखा जाये तो हर प्रान्त में अलग अलग भाषा के प्रयोग होने पर भी लोगों की चिन्तन-धारा में भारतीयता दृढ़ रूप से व्यवस्थित है । भारत में कई रुचियों और भाषाओं की विभिन्नता होने पर भी भारतीय यानी राष्ट्रीय एकता सभी भारतीयों के मन में बसी है, जो सभी भारतवासियों को एक ही सूत्र में बाँधती है ।

भारतीय संविधान में कई भारतीय भाषाओं को मान्यता प्रदान की गई है आधुनिक भारतीय भाषा के रूप में । इसके अलावा कई भाषायें प्रचलित हैं, जो मानक भाषा के रूप में अबतक स्वीकृतिप्राप्त नहीं हैं । मानक भाषाओं के प्रचार-प्रसार साहित्यिक दिशा से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं । भारत में आर्य-परिवार एवं द्राविड़-परिवार की भाषायें प्रचलित हैं भाषाविज्ञान के दृष्टिकोण से । उत्तर भारत में विशेषतः आर्य-परिवार की भाषायें जैसे हिन्दी, ओड़िआ, बंगाली, असमिया, पञ्जाबी, गुजराटी, मराठी इत्यादि । दक्षिण भारत में प्रचलित भाषायें द्राविड़ परिवार के अन्तर्गत हैं, जैसे तेलगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम इत्यादि । अधिकांश भारतीय भाषाओं का मूल आधार संस्कृत है । इसलिये संस्कृत ‘भाषा-जननी’ के नाम से सुपरिचित है ।

भाषा मुख से बोली जाती है । परन्तु लिखनेके लिये अर्थात्‌ भाषा में व्यक्त किये गये भाव को साकार रूप देने के लिये भाषा की ‘लिपि’ आवश्यक होती है । मुख से उच्चारित वर्ण-ध्वनियों को एक स्पष्ट रूप देने के लिये उस वर्ण-ध्वनि के द्योतक एक स्वतन्त्र वर्ण की आवश्यकता रहती है । वास्तव में देखा गया है कि कुछ भाषाओं की अपनी भाषानुगत स्वतन्त्र लिपि है और कुछ भाषाओं की अपनी स्वतन्त्र लिपि नहीं है । उदाहरण-स्वरूप, संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है, परन्तु इसकी कोई संस्कृत लिपि नहीं है । इसकी लिपि है ‘देवनागरी’ । हिन्दी भाषा की कोई हिन्दी लिपि नहीं है । देवनागरी लिपि को ही हिन्दीभाषा की लिपि के रूप में अपनाया गया है । ओड़िआ, बंगाली, असमिया, गुजराटी, मराठी, पञ्जाबी आदि भाषाओं की अपनी अपनी स्वतन्त्र लिपियाँ हैं एवं देवनागरी लिपि के आधार पर वर्ण निर्धारित किये गये हैं । दक्षिण भारत की तेलगु, कन्नड़, मलयालम प्रभृति भाषाओं की अपनी अपनी स्वतन्त्र लिपियाँ हैं । जिस भाषा की एक स्वतन्त्र लिपि होती है, उसकी एक स्वतन्त्र पहचान होती है । परन्तु ऐसी स्थिति सर्वत्र नहीं है ।

भारत में कई जातियों, वर्णो, धर्मों, भाषा-भाषियों के लोग रहते हैं । अपने हृदय के भावों को प्रकट करनेवाली भाषा की लिपि भी अनेक प्रकार है । फिर भी भारत में एक ऐसी प्राचीन लिपि अबके आधुनिक युग में नित्य-नूतन लिपि के रूप में स्वीकृत है, वह है ‘देवनागरी’ लिपि । भारतवासियों को एक सूत्र में जोड़ने के लिये जैसे ‘भारतीयता’ एक अद्वितीय साधन है, वैसे सभी भारतीय भाषाओं के एक सूत्र में सम्पर्क स्थापन हेतु देवनागरी लिपि एकमात्र उपयोगी साधन है आजके भारतवर्ष में ।

भाषा की उत्पत्ति की तरह लिपि की उत्पत्ति के बारे में पर्याप्त मतभेद पाया जाता है । भावों को पूर्णतया अभिव्यक्त करनेके लिये भाषा सम्पूर्ण समर्थ नहीं रहती । उसी प्रकार लिपि भी सर्वत्र उच्चारित भाषा को पूर्णतया अभिव्यक्त नहीं कर पाती । जैसे काकु आदि के द्वारा उच्चारित ध्वनि-विशेषताओं को लिपि पूर्णतया प्रकाशित नहीं कर सकती । शब्द और अर्थ का सम्बन्ध सर्वत्र यौगिक न होकर रूढ़ होता है । उसी प्रकार ध्वनि या वर्ण (लिपि-संकेत) का सम्बन्ध भी रूढ़ होता है । एक ही ध्वनि के लिये विभिन्न लिपियों में अलग अलग संकेतों या लिपि-चिह्नों का प्रयोग होता है । उदाहरण-स्वरूप, देवनागरी लिपि के ‘क्‌’ व्यञ्जन वर्ण के लिये रोमन लिपि में ‘k’, ‘c’, ‘q’ आदि का प्रयोग देखा जाता है ।

लिपि का प्राचीनतम स्वरूप चित्रलिपि माना जाता है । चित्रलिपि में प्रत्येक स्थूल वस्तु के लिये उस वस्तु-जैसा चित्र बनाने के कारण उसमें अनगिन संकेतों की आवश्यकता रहती थी । लिपि-संकेतों की पृथक्‌ता, अधिक स्थान एवं समय की आवश्यकता रहती थी । परन्तु प्रेम, उत्साह, दुःख, आनन्द आदि सूक्ष्म भावों को व्यक्त करने में चित्रलिपि असमर्थ थी । चित्रलिपि के दोषों का निराकरण करने के लिये बाद में ऐसी एक लिपि का प्रयोग हुआ, जिसमें कुछ निश्‍चित चिह्नों द्वारा, जैसे कुछ बिन्दुओं या रेखाओं द्वारा निश्‍चित भावों को व्यक्त किया जा सके । मनुष्य ने उसी दिशा में आगे चलकर ध्वनि-लिपियों का व्यवहार किया, जो आज भी प्रचलित होती हैं । भाषा में व्यवहृत ध्वनियों के लिये ध्वनि-चिह्नों या वर्णो का प्रयोग किया जाता है और उन वर्णों द्वारा भावों को व्यक्त किया जाता है । देवनागरी, रोमन, अरबी आदि लिपियाँ ध्वनि-लिपि के अन्तर्गत हैं ।

भारत की प्राचीन लिपियाँ दो हैं , ब्राह्मी और खरोष्ठी । भाषाविज्ञानियों का मत है कि ब्राह्मी लिपि मूलरूप से भारतीय है । इस लिपि का अस्तित्व ख्रीष्टपूर्व ५०० से ख्रीष्टाब्द ३५० तक माना जाता है । उत्तरी शैली और दक्षिणी शैली के रूप में इस लिपि का द्विविध विकास हुआ था । विद्वानों का मत है कि ब्राह्मी लिपि से ही आधुनिक देवनागरी लिपि की उत्पत्ति हुई है । ब्राह्मी की उत्तरी शैली की अन्तर्गत गुप्त-लिपि और कुटिल-लिपि क्रमशः देवनागरी लिपि के रूप में विकसित हो गई हैं । इसका प्रयोग भारत में प्राय दशवीं शताब्दी से स्वीकृत है । प्रारम्भ में इसके वर्णों पर शिरोरेखा नहीं लगती थी । प्राचीन नागरी लिपि को सम्मान देने के लिये बाद में इसका नाम ‘देवनागरी’ दिया गया है ।

‘नागरी’ नाम के बारे में भी कुछ मतभेद हैं । नगर में प्रयुक्त होनेके कारण ‘नागरी’ लिपि का नामकरण कुछ मानते हैं । कुछ विद्वानों का मत है कि नागर ब्राह्मणों में प्रचलित होनेके कारण लिपि का नाम नागरी हुआ है । और कुछ विद्वानों का मत है कि तान्त्रिक यन्त्र देवनगर की आकृति से इस लिपि के वर्णों का साम्य होनेके कारण देवनागरी नाम हुआ है । ‘नागरी’ या ‘देवनागरी’ जो भी हो, आजकल की वैज्ञानिक भाषा-पद्धति में इस लिपि की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है ।

देवनागरी लिपि में लिपिगत उत्कृष्टता सभी प्रकार से विद्यमान है । किसी भी उपादेय और उत्कृष्ट लिपि में ध्वनि और वर्ण में सामञ्जस्य होना चाहिये । भाषा की ध्वनियों में और उन्हें अभिव्यक्त करनेवाले लिपि-चिह्नों में जितनी अधिक समानता होती है, वही लिपि उतनी ही अधिक उत्कृष्ट मानी जाती है । देवनागरी में यह विशेषता पूर्णतया उपलब्ध है । उच्चारण के अनुरूप ही वर्ण-निर्धारण किया जाता है । जो बोला जाता है, वह लिखा जाता है, और जो लिखा जाता है, वह बोला जाता है । देवनागरी की यही एक विशिष्ट पहचान है । दूसरा महत्त्वपूर्ण लक्षण है एक ध्वनि के लिये एक ही संकेत । एक ध्वनि के लिये अनेक संकेत या अनेक ध्वनियों के लिये एक ही संकेत लिपि का बड़ा दोष माना जाता है । रोमन्‌ आदि लिपि में ऐसा दोष दृष्टिगोचर होता है । जैसे रोमन्‌ लिपि में एक ही ‘क्‌’ ध्वनि उच्चारण करने के लिये एकाधिक संकेत हैं । उदाहरण–स्वरूप k (king), c (call), ck (cuckoo), ch (chemical), q (quick) इत्यादि । एक संकेत ‘u’ कहीं ‘अ’ रूप में उच्चारित होता है, जैसे ‘but’ (बट्‌), ‘cut’ (कट्‌), और कहीं कहीं ‘उ’ रूप में, जैसे ‘put’ (पुट्‌) । फिर एक संकेत ‘o’ कहिं ‘अ’ रूप में (pot, पट्‌) तो कहीं ‘उ’ के रूप में (to, टु), कहीं ‘ओ’ रूप में (note, नोट्‌) उच्चारित होता है । ऐसे अन्य अनेक उदाहरण मिल सकते हैं । परन्तु देवनागरी लिपि में यह दोष बिलकुल नहीं ।

उत्कृष्ट लिपि का और एक विशेष गुण है लिपि-संकेतों द्वारा समस्त ध्वनियों की अभिव्यक्ति । देवनागरी में यह सम्पूर्ण विद्यमान है । लिपि का और एक गुण है असन्दिग्‌धता । एक ध्वनि-संकेत में अन्य किसी ध्वनि का सन्देह नहीं होना चाहिये । अन्य लिपियों की अपेक्षा देवनागरी में ये उत्कृष्टतायें सर्वाधिक उपलब्ध होती हैं । इसमें कोई भ्रान्ति या संशय का अवकाश नहीं होता । इसप्रकार अनुशीलन से यह निष्कर्ष निकलता है कि देवनागरी वास्तव में एक उत्कृष्ट लिपि है । व्यावहारिक एवं भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह सर्वथा युगोपयोगी रूप में स्वीकृत है ।

भाषा एक प्रवहमान धारा है । समयानुसार नदी-जल की तरह इसमें परिवर्त्तन होता रहता है । लिपियों में भी आवश्यकतानुसार परिवर्त्तन होता है । परन्तु देवनागरी ऐसी एक भव्य सुन्दर और उत्तम लिपि है जो समस्त भारतीय भाषाओं के सम्पर्क-सूत्र के रूप में प्रयुक्त हो सकती है । उत्तरभारत में हिन्दी का विशेष प्रचलन है, लेकिन दक्षिण भारत में हिन्दी को ग्रहण करने के लिये सर्वसम्मति प्राय नहीं है, चूँकि दक्षिण में प्रचलित तमिल, कन्नड़ आदि द्रविड़ भाषाओं की स्वतन्त्र लिपियाँ तथा प्रयोग हैं ।

आज की परिस्थिति में भाषा-जननी संस्कृत जैसे सभी भाषाओं को जोड़नेवाला एक सम्पर्क-सूत्र रूप में उपयोगी है, उसी प्रकार देवनागरी लिपि सभी भारतीय भाषा-लिपियों को जोड़नेवाला सम्पर्क-सूत्र के रूप में अत्यन्त उपादेय है । आर्य परिवार एवं द्रविड़ परिवार की अन्तर्गत सभी भाषाओं की लिपियों की अभिव्यक्ति एक महाभारतीय लिपि देवनागरी में प्रस्तुत की जा सकती है । आजकल आन्तर्जातिक स्तर पर रोमन्‌ लिपि के साथ सम्पर्क स्थापन करनेमें देवनागरी लिपि का ही ग्रहण किया जा रहा है । इससे किसी भी भाषा-भाषी को भ्रम या सन्देह का अवसर नहीं रहता । देवनागरी में लिखनेसे भारतीय स्तर पर एक स्वतन्त्र पहचान होती है, जो सभी भाषा-भाषियों के लिये सरल है और प्रान्तीय स्तर पर अपनी ही लिपि रहनेसे व्यवहार में सौकर्य होता है । इसप्रकार देवनागरी लिपि भारतीय स्तर पर सभी भाषाओं की लिपियों का सर्वोत्कृष्ट सम्पर्क सूत्र बनकर अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है । आधुनिक वैज्ञानिक युग में अन्तर्जाल पर देवनागरी लिपि का व्यापक प्रयोग उसकी विशेषता का एवं सार्थकताका सुपरिचायक है । इण्टर्नेट्‌ के अतिरिक्त कम्प्युटर और मोबाइल्‌ फोन्‌ आदि में भी देवनागरी लिपि की स्थिति एवं प्रयोग इस लिपि के महत्त्व को बढ़ानेमें बहुत सहायक सिद्ध हैं ।
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Courtesy : Published in 
Srijangatha (Hindi E-Magazine) Feb. 2011 Issue

Saturday, February 12, 2011

Kumāra-Sambhava, Canto-V (Oriya, Part-3): Dr. Harekrishna Meher

Kumāra-Sambhava (Canto-V)
Original Sanskrit Mahākāvya by : Poet Kālidāsa   
Oriya Version by : Dr. Harekrishna Meher     
(Extracted from Complete Version of the Epic)   
*    

Theme of Canto-5 : Penance of Parvati
Number of Verses : 86    

*  

(Entire Oriya Version of Canto-5th
with elaborate Introduction has been published in
‘Bartika’, Literary Quarterly, Dashahara Special Issue,
October-December 2001, pp. 169 – 203,
Dasarathapur, Jajpur, Orissa)
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Part-1  comprises Verses 1 to 29.
Part-2 comprises Verses 30 to 62.
Part-3 comprises Verses 63 to 86.
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For Part-1, please see : 

http://hkmeher.blogspot.com/2011/01/kumara-sambhava-canto-v-oriya-version.html
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For Part-2, please see : 

http://hkmeher.blogspot.com/2011/01/kumara-sambhava-canto-v-oriya-part-2.html
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कुमार-सम्भव (पञ्चम-सर्ग)
मूल संस्कृत महाकाव्य : महाकवि कालिदास 
ओड़िआ पद्यानुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर 
(महाकाव्यर संपूर्ण पद्यानुवादरु आनीत)
*
विषय : पार्वतीङ्क तपस्या ।
राग : चोखि
तृतीय भाग : श्‍लोक ६३ रु ८६
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[63]
स्वभाबे से लाजकुळी
तरुणी निज मुकुळी-
कृत कोमळ अङ्गुळि-
अग्रे तदन्ते,
घेनि स्फटिकर माळी
अद्रिराज-प्रियबाळी
संक्षेपरे भाळि भाळि
कौणसि मते ।
ब्रह्मचारी-सम्मुखे गिर,
प्रकाश करिले निजे मधुर धीर ॥
*

[64]
“बेदज्ञबर ! तुमरि
सम्मुखरे सहचरी
ब्यकत कले य़ेपरि
मोर बिषये,
से सबु अट‍इ सत
शिब-लाभर उन्नत
पद हेबाकु प्रापत
इच्छे हृदये ।
तेणु मुहिँ तपे तत्पर,
अबिषय नाहिँ किछि मनोरथर ॥

*

[65]
बटु प्रकाशिले पुण,
“गिरीन्द्र-नन्दिनि ! शुण
जाणिछि मुँ शिब-गुण
केउँ भरमे,
आउ तुमे ताङ्क पाश
करुछ श्रद्धा प्रकाश,
सदा ताङ्करि अभ्यास
अशुभ कर्मे ।
एहा चिन्ति तुम कार्य़्यर,
समर्थने न इच्छ‍इ मन मोहर ॥
*

[66]
आगो ! अपदार्थे मन
बळाइअछ केसन ?
बिबाह काळे शोभन
हस्त तुमरि,
मङ्गळ सूत्रे मण्डिब
किन्तु सर्प-य़ुक्त शिब-
कर ग्रहणे दिशिब
शोभा किपरि ?
से पाणिकि तुमरि पाणि,
सहिब कि आद्य बार, कह कल्याणि ! ॥
*

[67]
उत्तम रूपे निजर
चित्ते थरे चिन्ता कर
ग‍उरि ! कह तुमर
शुभ सुरुचि,
हंस-चिह्नित अम्बर
पुनराय शिबङ्कर
रकत-स्राबी कुञ्जर-
चर्म अशुचि ।
ए उभय एक ठाबरे,
रहिबा य़ोग्य हो‍इबे केउँ भाबरे ?
*

[68]
पुष्प-बिञ्चित प्रासाद-
तळे रखि मृदु पाद
बिहरुअछ आह्लाद-
मानसे तुमे,
लाक्षारस-सुरञ्जित
से पाद हेब स्थापित
परेत-केश-पूरित
श्मशान-भूमे ।
ए कथार अनुमोदन,
करिब कि बैरी हेले मध्य से जन ?
*

[69]
य़दि तुम पाइँ शिब-
बक्ष सुलभ हो‍इब,
कह एथिरु अतीब
अरुचिकर,
किस अछि अनुचित ?
हरिचन्दन- चर्चित
तुम उरजे निश्‍चित
ताङ्क बक्षर ।
चिता भस्म-धूळि बिशेष,
स्थान ग्रहण करिब लभि आश्‍लेष ॥
*

[70]
तुमे परिणय परे
बसि गजेन्द्र उपरे
चळन्त बधू रूपरे
पति-निबास,
मात्र य़ेबे बृद्ध बृषे
आरोहि य़िब सुदृशे !
ता देखि महापुरुषे
करिबे हास ।
ए त बिड़म्बना अपर,
रहिअछि परा सम्मुखरे तुमर ॥
*

[71]
कपाळीङ्कर प्रापति
कामना हेतु सम्प्रति
उभये भजिले गति
कि शोचनीय,
प्रथम सेहि शङ्कर-
शिरे राजित सुन्दर
मृदु लेखा चन्द्रङ्कर,
तुमे द्वितीय ।
बिश्‍वजन-नेत्र-चान्दिनी,
क्षीण हेल आगो गिरिराज-नन्दिनी ॥
*

[72]
शङ्कर त त्रिलोचन
तेणु बिरूप बदन
ताङ्क जन्म कदाचन
नुह‍इ लक्षि,
अटन्ति से दिगम्बर
मृगाक्षि ! बिचार कर
सम्पत्ति केते मातर
थिबे से रखि ।
बर लागि खोजा य़ेतेक,
ताङ्क पाशे सतरे कि रहिछि एक ?
*

[73]
सुन्दरि ! एथि निमित्त
मन्द अभिळाषुँ चित्त
कर तुमे निबर्त्तित
न हो‍इ बणा,
काहिँ से अरुचिकर
करमे श्रद्धाळु हर ?
काहिँ तुमे मनोहर
शुभ-लक्षणा ?
सज्जन श्मशान-शूळरे,
य़ज्ञ-स्तम्भर संस्कार केबे न करे ॥

*

[74]
बटु-बदनुँ स्फुरित
कटु कथा बिपरीत
शुणि उमा जर्जरित
हो‍इले रागे,
रक्त अधर कम्पाइ
रङ्ग नयने अनाइ
भूरु य़ुगळ बङ्काइ
ताङ्करि आगे ।
अनादरे बक्र ठाणिरे,
निरेखिले गिरिबाळा ब्रह्मचारीरे ॥
*

[75]
बो‍इले से , “ बास्तबरे
महादेब बिषयरे
नाहँ तुमे हृदयरे
य़थार्थ जाणि,
तेणु मोते एपरि त
कहुअछ बिपरीत,
तत्त्वज्ञान-बिरहित
अधम प्राणी ।
महात्माङ्क असाधारण,
अचिन्त्य चरिते करे दोषारोपण ॥
*

[76]
बिपत्ति निबारिबारे
सम्पत्ति लाभ आशारे
माङ्गल्य बस्तु संसारे
पुरुष सेबे,
शङ्कर त त्रिभुबन
करिथाआन्ति पाळन
कामनारे ताङ्क मन
न बळे केबे ।
चित्त-बृत्ति-दूषणकर,
माङ्गळिक द्रव्ये किस हेब ताङ्कर ?
*

[77]
अकिञ्चन से ईशान
सर्ब-ऐश्‍वर्य़्य़-निधान
बास हेलेहेँ श्मशान
त्रिलोकनाथ,
से भीम-स्वरूपधर
बिदित अछि ताङ्कर
नाम सुमङ्गळकर
‘शिब’ य़थार्थ ।
नाहिँ केहि जगते जन,
प्रकृत रूप जाणिबा पाइँ भाजन ।
*

[78]
बिश्‍वमूर्त्ति शिब-अङ्ग
भूषण य़ोगे सुरङ्ग
हेउ अथबा भुजङ्ग-
परिबेष्टित,
गजचर्म- परिहित
अबा दुकूळ-मण्डित
हेउ अथबा निश्‍चित
कपाळान्वित ।
अबा चन्द्रशेखर सेहि,
ए समस्त बास्तबरे न जाणे केहि ॥
*

[79]
श्मशान-भस्म शिबङ्क
कळेबर-सम्परक
लभि पबित्र-कारक
हुए तक्षण,
ताण्डब नृत्य काळरे
अङ्गु पड़िले तळरे
चिता-धूळिकि आदरे
देबतागण ।
पूत मणि आनन्दभरे,
लेपन करिथाआन्ति मस्तक परे ॥
*

[80]
शिब हेलेहेँ निर्द्धन
बृषभे कले गमन
ताङ्क पयरे सुमन-
बृन्द-नायक,
अ‍इराबत-बाहन
इन्द्र बिनये बन्दन
करि निज शिर-लग्न
पारिजातक -
पुष्पर लोहित परागे,
अङ्गुळि रञ्जन्ति ताङ्क चरण-भागे ॥
*

[81]
तुमे त दुःशीळ जन
इच्छि दोष दरशन
शिब-बिषये य़ेसन
कहिल भाबि,
तहिँ एक सत्य बाणी
निश्‍चय अछ बखाणि
अटन्ति से शूळपाणि
महाप्रभाबी ।
य़ाहाठारु सम्भूत ब्रह्मा,
किपरि बा न हेबे से अलक्ष्य-जन्मा ?
*

[82]
बिबादे कि प्रयोजन ?
मो पाशे तुमे य़ेसन
शिब सम्बन्धे बचन
कल प्रकाश,
से स्वरूपधारी हर
हेलेहेँ अछि मोहर
प्रेमी मन निरन्तर
ताङ्करि पाश ।
स्वेच्छारे य़े कर्म आचरे,
लोक-निन्दा प्रति से न भ्रूक्षेप करे ॥


[83]
देख सखि ! ब्रह्मचारी
अधर स्फुराइ भारि
इच्छन्ति किस बिचारि
कहिबा लागि,
बारण कर चञ्चळ,
महात्माङ्कु य़ेउँ खळ
निन्द‍इ से न केबळ
पातकभागी ।
ता ठारु य़े निन्दा शुण‍इ,
सेहि लोक मध्य पापभागी हु‍अ‍इ ॥
*

[84]
नोहोले मुहिँ एठारु
चालिय़िबि ” बोलि चारु-
गात्री ब्यस्ते उठिबारु
बक्षुँ ताङ्कर,
बल्कळ पड़िला खसि
पाद बढ़ान्ते रूपसी
सप्रेम मन्दे बिहसि
इन्दुशेखर ।
बृषध्वज स्वरूप धरि,
उभा हेले पार्बतीङ्कि बारण करि ॥
*

[85]
ताङ्कु देखि कुमारीर
थरिला मृदु शरीर
भाबाबेशे स्वेद-नीर
ब्यापिला बहि,
ऊर्द्ध्वे रखि सम्मुखीन
चरणटि गतिहीन
न पारिले य़ाइ कि न
पारिले रहि ॥
प्रबाह-पथरे पर्बत,
रोधिले आकुळा नदी हुए य़ेमन्त ॥
*

[86]
बो‍इले शशाङ्कधर,
“आजिठारु मुँ तुमर
तपे क्रीत परिकर
   हेलि शोभने !
शुणि ए प्रिय भारती
हेले उमा हृष्ट-मति
तप-कष्टरु बिरति
नेले बहने ।
इष्ट सिद्धि हेले निश्‍चिते,
जणा न पड़‍इ पूर्ब श्रम किञ्चिते ॥
* * * 


Translator’s Conclusion 

[87]
काळिदासङ्क अमृत
लेखनीरु बिनिःसृत
कुमारसम्भबे कृत
सर्ग पञ्चम,
मेहेर हरेकृष्णर
उत्कळीय भाषान्तर
मोहु सुजन-अन्तर
सुमनोरम ।
छयाअशी श्‍लोके रचना,
पूर्ण्ण हेला अपर्ण्णाङ्क तप बर्ण्णना ॥

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(Kumara-Sambhava, Canto-V)  
Oriya Translation of Dr. Harekrishna Meher 

COMPLETED 
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Related Link : 
Kumara-Sambhava Kavya : Odia Version by Dr. Harekrishna Meher :
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Translated Works of Dr. Harekrishna Meher : 
http://hkmeher.blogspot.in/2016/08/translated-works-of-dr-harekrishna-meher.html

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Monday, January 31, 2011

Daśarūpa-Gītikā (दशरूप-गीतिका) : Harekrishna Meher

Daśarūpa-Gītikā 
(Song for Ten Forms of God) 
Sanskrit Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher  
(Extracted from ‘Mātŗigītikāñjalih'- Kāvya)  
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* दशरूप-गीतिका * 
गीत-रचना तथा स्वर-रचना : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः  
(‘मातृगीतिकाञ्जलिः’- काव्यात्‌)  
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‌ॐ जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे !
धर्म-संस्थापनार्थं भुवि ते
चकास्ति चक्रं स्वस्ति करे,
निरस्त-समस्त-शुभेतरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे !
(ध्रुवम्‌)
*
राक्षस-शङ्ख-विनाशी भगवान्‌,
रक्षसि धातु-र्वेदान्‌ सर्वान्‌ ।
मीन-शरीरो रमसे श्रीमान्‌,
प्रलये वलयित-जलधि-भरे ।
महति निरवधौ सुदुस्तरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (१)
*
अम्बुनिधौ सुर-दानव-निहितम्‌,
मन्दरमद्रिं वहसि सुविहितम्‌ ।
कूर्मराज ! तव कर्म जन-हितम्‌,
काये कलिते सलिलचरे ।
प्रसन्न-किन्नर-नाग-नरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (२)
*
सुरक्षिता स्यात्‌ सर्जन-सरणी,
अगाध-नीरधि-मग्ना धरणी ।
शरणं भवतो लभते वरणी,
सुकरं शूकर-रद-शिखरे ।
समर्चिते धृत-चराचरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (३)
*
प्रह्लाद-मनोह्लादनकारी,
हिरण्यकशिपो-र्हृदय-विदारी ।
भक्त-कृते त्वं दुष्ट-निवारी,
विहरन्‌ नरहरि-कलेवरे ।
मन्द-निदारुण-खर-नखरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (४)
*
त्वमवसि वामन ! देव-समाजम्‌,
त्रिपद-मेदिनी-दान-व्याजम्‌ ।
पातयसि बलिं दानवराजम्‌,
विरसं रसातले विवरे ।
त्रिविक्रमे त्वयि पुरस्सरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (५)

*
भ्रमन्‌ भुवमेकविंशति-वारम्‌,
कुरुषे क्षत्रिय-गण-संहारम्‌ ।
वारयसि सर्व-वर्वर-भारम्‌,
स्वभुजे भ्राजति परशु-परे ।
भैरव-सन्निभ-वीरवरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (६)
*
सीता-वल्लभ ! रघुकुल-भूषण !
जित-खर-दूषण ! विभी-विभीषण !
तव सुगौरवं रावण-भीषण !
समङ्कितं लङ्का-समरे ।
पापराशिहर-चाप-शरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (७)
*
नीलाम्बर हे ! प्रलम्ब-दलनम्‌,
यशः प्रशस्यं यमुना-यमनम्‌ ।
दूरं दुरितं याति विगलनम्‌,
मङ्गल-लाङ्गल-मुषलधरे ।
सङ्गत-मध्वरि-मधुस्वरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (८)
*
शान्तिं कलयति तव कल्याणी,
हिंसा-पशुवध-विरोध-वाणी ।
सुगत ! सद्‌गतिं भजते प्राणी,
करुणा-ममता-प्रेम-झरे ।
भवद्‌-भाव-रस-विभास्वरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (९)
*
कल्कि-कलेवर ! कर-करवालम्‌,
वहन्‌ पुण्यमय-वह्नि-विशालम्‌ ।
दहसि दुस्सहं दुष्कृत-जालम्‌,
दुर्जन-गर्जन-महाज्वरे ।
कलुषित-कलि-काले प्रखरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (१०)
*
तनोतु भद्रं चिरन्तनी ते,
शुभानुकम्पा परम-पुनीते ।
हरेकृष्ण-मेहेर-सुगीते,
माधव ! तव भजनावसरे ।
मतिरास्तां त्वयि रमेश्‍वरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (११)  

* * *  

(इति दशरूप-गीतिका)  
इयं गीतिका कहरवा-ताल-मध्यलयेन परिवेषणीया ।  
= = = = = = =  

English Translation : 
http://hkmeher.blogspot.in/2013/01/dasarupa-gitika-drharekrishna-meher.html 
= = = = 


Kumāra-Sambhava, Canto-V (Oriya, Part- 2): Dr. Harekrishna Meher

Kumāra-Sambhava (Canto-V)
Original Sanskrit Mahākāvya by : Poet Kālidāsa
Oriya Version by : Dr. Harekrishna Meher   

(Extracted from Complete Version of the Epic)  
*   
Theme of Canto-5 : Penance of Parvati
Number of Verses : 86  

 *  
(Entire Oriya Version of Canto-5th
with elaborate Introduction has been published in 
‘Bartika’, Literary Quarterly, Dashahara Special Issue,
October-December 2001, pp. 169 – 203,
Dasarathapur, Jajpur, Orissa)
*
Here Part-1 comprises Verses 1 to 29.
Part-2 comprises Verses 30 to 62.
Part-3 comprises Verses 63 to 86.

*
For Part-1,  Link :  
*
For Part-3,  Link : 
http://hkmeher.blogspot.com/2011/02/kumara-sambhava-canto-v-oriya-part-3.html   
= = = = = = =

कुमार-सम्भव (पञ्चम-सर्ग)    

मूल संस्कृत महाकाव्य : महाकवि कालिदास    
ओड़िआ पद्यानुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर    
(महाकाव्यर संपूर्ण पद्यानुवादरु आनीत)   
*    
विषय : पार्वतीङ्क तपस्या ।
राग : चोखि
द्वितीय भाग : श्‍लोक ३० रु ६२ ।
= = = =


[30]
दिने केहि जटाधारी
बटु बाग्मी ब्रह्मचारी
प्रबेशिले सुकुमारी
उमा कतिरे,
मृगचर्म-परिहित
पलाश-दण्ड-मण्डित
सते कि से सन्दीपित
ब्रह्म-ज्योतिरे ।
देखि प्रते हेला य़ेसने,
मूर्त्तिमन्त ब्रह्मचर्य़्य अ‍इला बने ॥
*

[31]
से अतिथि-परायणा
हिमाद्रि-राजदुलणा
समादरे सम्भाषणा
कले बहन,
पूजिले से अभिनन्द्य
ब्रह्मचारीङ्कि सानन्द
स्वसम हेलेहेँ बन्द्य
बिशिष्ट जन ।
सत्कार करन्ति ताङ्करि,
समदर्शीगण बहु आदर भरि ॥
*

[32]
पार्बतीङ्क ए प्रकार
बिधिपूर्बक सत्कार
करिले बटु स्वीकार
परितोषरे,
बिश्रामि अळप क्षण
श्रम नाशिले तक्षण,
निज सरळ ईक्षण
य़ोगे ता परे ।
निरेखिले हैमबतीङ्कि,
क्रमे कुशळ पुच्छिले जाणि रीतिकि ॥
*

[33]
‘ धर्म कर्म सम्पादने
तुमर ए तपोबने
समिध कुश य़तने
मिळुअछि त ?
सळिल स्नान निमन्ते
उपय़ुक्त कि निरते ?
करुछ त शक्तिमते
तप बाञ्छित ?
धर्म कृत्य सकाशे देह,
मुख्य साधन अट‍इ नाहिँ सन्देह ॥
*

[34]
एइ लतिकाबळीरे
तुम कर-दत्त नीरे
निति बढ़‍इ कि धीरे
नब पल्लब ?
बहु दिनुँ अलकत
हेलेकेँ परित्यकत
शोभा पाउछि रकत –
अधर तब ।
से मृदु अधर समान,
दिश‍इ पाटळ नब पल्लबमान ॥
*

[35]
तुम हस्तरु भक्षण-
लाळसारे मृगगण
स्नेहरे कुश हरण
करन्ते बळे,
पद्माक्षि ! अछि कि मन
ताङ्कठारे परसन्न ?
खेळाइ निज नयन
चळ-चञ्चळे ।
करन्ति से हरिणगण,
सते बा तुम नेत्रर अनुकरण ॥
*

[36]
प्राणीर सुन्दरपण
पापकर्म आचरण
पाइँ उद्दिष्ट लक्षण
नुहे संसारे,
ए य़ेउँ रहिछि कथा,
सत्य अट‍इ सर्बथा
सुन्दरि ! नुहे अन्यथा
मो जाणिबारे ।
तब सदाचार स्वकीय,
तपस्वीङ्क पाइँ मध्य सुशिक्षणीय ॥
*

[37]
सप्त ऋषिङ्क अर्पित
पूजा-पुष्पे सुबासित
गङ्गा-सलिळ पतित
हेला स्वर्गरु,
ताहा निज अङ्गे धरि
ए हिमाळय शिखरी
हो‍इ न थिले सेपरि
पूत आगरु ।
एबे तुम शुद्ध चरित्र,
य़ोगुँ य़ेपरि सबंश हेले पबित्र ॥
*

[38]
भाबिनि ! ए काळे तब
राजभबने सरब
अर्थ काम ब‍इभब
ति‍आग करि,
एकमात्र धर्मे मन
करिअछ संलगन,
आजि प्रतीति एसन
हुए मोहरि ।
धर्म अर्थ काम मध्यरे,
धर्म हिँ सार अट‍इ सर्ब भाबरे ॥
*

[39]
देइछ निजे तुमर
बहु सत्कार सादर,
न कर एणिकि पर
ज्ञान मोठारे,
हे नताङ्गि सुलक्षणे !
कहिछन्ति ज्ञानीगणे,
सज्जनङ्कर गहणे
प्रिय बेभारे ।
जात हुए बन्धुता भले,
सप्त पद कथन बा गमन कले ॥
*

[40]
तपस्विनि ! मुँ तुमर
बन्धु हो‍इलि एथर,
द्विज-सुलभ निजर
चापल्य धरि,
क्षमाबती तुम पाशे
किछि पचारिबा आशे
उत्सुकता परकाशे
मन मोहरि ।
य़दि गुप्त कथा न थिब,
उत्तर देबा निमन्ते चेष्टा करिब ॥
*

[41]
आद्य स्रष्टा ब्रह्माङ्कर
कुळे जनम तुमर,
रम्य तनु त्रिलोकर
सौन्दर्य़्य परि,
हेउअछ‍इ प्रतीत,
स्वपुरे अपरिमित
अ‍इश्वर्य़्य सुख बित्त
अछि तुमरि ।
बिराजिछि नब य़ौबन,
कह आउ तप-फळे कि प्रयोजन ?
*

[42]
सहि न पारि अनिष्ट
केबे केबे भाबाबिष्ट
मानिनीगण अभीष्ट
पूरण लागि,
प्रबृत्त हु‍अन्ति बने
दुष्कर तप साधने,
किन्तु बिचारिले मने
आगो कृशाङ्गि !
न हु‍अ‍इ दृष्टिगोचर,
तुमठारे किछि हेले अनिष्टकर ॥
*

[43]
तुम ए सौम्य आकार
नुहे कौणसि प्रकार
शोक अबा तिरस्कार
पाइबा स्थान,
पितृ-सदने तुमरि
अबमानना किपरि ?
बळात्कार स्पर्श करि
न पारे आन ।
थाए केबा हस्त बढ़ाइ,
नेबा लागि फणी-शिरुँ मणि छड़ाइ ?
*

[44]
तुमे य़ुबा अबस्थार
तेजि सर्ब अळङ्कार
बृद्ध काळे शोभिबार
तरु-बल्कळ,
धारण कल किपरि ?
शोभे सिना बिभाबरी
चन्द्र-तारा-द्युति धरि
अङ्गे उज्ज्वळ ।
अरुणोदयर प्रापति,
प्रदोषे इच्छ‍इ कि से कह पार्बति !
*

[45]
य़दि स्वर्ग इच्छा करि
साधुछ तप एपरि,
तेबे निष्फळ ए परि-
श्रम बिशेष,
तुम पिता हिमाळय-
पुर त देव-निळय,
पति आशे तपे लय
न रख लेश ।
खोजे नाहिँ निजे रतन,
खोजिथाए सिना तारे ग्रहीता जन ॥
*

[46]
उष्ण निश्वास तुमर
जणाइदेला एथर,
काम्य उपय़ुक्त बर
तुम निमित्त,
किन्तु मो मने उदय
हेउछि एक संशय
तुम य़ाचना-बिषय
नाहिँ केहि त ।
तुमे पुणि कले य़ाचना,
दुनिआरे दुर्लभ के हेब सुमना ?
*

[47]
ए त बड़ आचम्बित,
य़े हेउ तुम काङ्क्षित,
अट‍इ तार निश्‍चित
कठोर मन,
बहु दिनुँ कर्ण्णोत्पळ-
शून्य ए गण्ड-मण्डळ
तहिँ धान्याग्र-पिङ्गळ-
बर्ण्ण गहन ।
जटा लम्बिअछि शिथिळे,
एहा प्रति से त दृष्टि न दिए तिळे ॥
*

[48]
घोर तपस्या आचरि
अति कृश तनु धरि
दिबा-चन्द्रलेखा परि
पा‍उछ क्लेश,
प्रखर रबि-करण
य़ोगुँ तुम आभरण-
स्थान लभिछि दूषण,
देखि ए बेश ।
मनरे शोचना निश्‍चय,
न करिब जगतरे के सहृदय ?
*

[49]
य़ेउँ जन प्रिय तब
से त सौन्दर्य़्य-गरब
घेनि हो‍इछि सरब
भाबे बञ्चित,
बिचार मो एहिपरि,
नोहिले से त तुमरि
दीर्घ बाङ्क भ्रू-बल्लरी
य़ोगे शोभित ।
नेत्र-य़ुगळर दर्शन,
लाभ आशे टेकिथान्ता निज बदन ॥
*

[50]
केते दिबस आहुरि
तप साधिब ग‍उरि !
मोर मध्य तप भूरि
ब्रह्मचर्य़्यरे,
सञ्चित अछि, सश्रद्ध
तुमरे अर्पिलि अर्द्ध,
बर लभ सेहि बर्द्ध-
मान तपरे ।
किन्तु किए तब प्रिय से,
जाणिबा सकाशे इच्छा जागे मानसे ॥“
*

[51]
अन्तर गोपन कथा
जाणि ब्रह्मचारी तथा
पचारन्ते उमा मथा
पोति आबेगे,
लाजे सम्मुखे ताङ्कर
न देले किछि उत्तर,
पारुशे स्थित निजर
सखीङ्कि बेगे ।
अनञ्जन नयन चाळि,
सङ्केत देले पर्बत-राजदुलाळी ॥
*

[52]
सखी बोले, ‘ब्रह्मचारी !
य़दि कुतूहळ भारि
शुण तेबे अपसारि
सन्देह मनुँ,
ए कठोर तपस्यार
साधन य़ेउँ प्रकार
हेला प्रिय सुकुमार
जेमाङ्क तनु ।
आतप बारण निमन्ते,
कमळ-छत्र टेकिबा अटे य़ेमन्ते ॥
*

[53]
इन्द्रादि ऐश्‍वर्य़्यबान
दिक्‌पाळङ्कु तुच्छ ज्ञान
कले उमा स्वाभिमान
बशे निजर,
स्मर भस्म हेबा फळे
रूप-लाबण्यर बळे
आकृष्ट नोहि अटळे
रहिले हर ।
तेणु ताङ्कु पति रूपरे,
पाइबा पाइँ इच्छन्ति जेमा मनरे ॥
*

[54]
महेश्‍वरे लक्षि स्मर
क्षेपिला मोहन शर,
निबर्त्तिला ता शङ्कर-
हुङ्कार घोषे,
जळिला रति-नायक
थिला ता पुष्प शायक,
सेकाळे मृत्युञ्जयङ्क
पारुशे तोषे ।
सेबा-रत थिले पार्बती,
ताङ्क हृदे तीब्र भेद कला झटति ॥
*

[55]
से दिनुँ पितृ-सदने
रहिले व्याकुळ मने
निज मस्तके य़तने
बोळि चन्दन,
दिशिला सुशीळाङ्कर
सौम्य अळक धूसर,
कले से हिम प्रस्तर
परे शयन ।
तेबे मध्य निज मानसे,
सुख न पाइले सखी मदन-बशे ॥
*

[56]
त्रिपुर-जयी शङ्कर-
चरित गान सुस्वर
आरम्भ हेले सत्वर
कानन स्थळे,
अश्रु ढाळि प्रेमास्पद
जेमा स्वबाष्प-गद्‌गद
कण्ठरु स्खळित पद
य़ोगे बिह्वळे ।
गान-सखी किन्नरपति-
कन्यामानङ्कु अनेक कन्दाइछन्ति ॥
*

[57]
रात्रिर शेष प्रहरे
निद्रा य़िबा समयरे
मुहूर्त्तक नयनरे
निमेष मारि,
‘नीळकण्ठ ! केउँठारे
बिहरुछ ?’ ए प्रकारे
निज स्वप्न अबस्थारे
राजकुमारी ।
काल्पनिक शङ्कर-कण्ठे,
समालिङ्गि चेइँ उठुथिले उत्कण्ठे ॥
*

[58]
निज करे प्रियतम
शिब-चित्र मनोरम
आङ्कि एकान्ते बिभ्रम
बशे सरळा,
कहुथिले गाळिभरे,
‘तुमे ज्ञानीङ्क मुखरे
सर्बब्यापक नामरे
कथित भला ।
जाणि न पारुछ काहिँकि ?
तुमरे अनुरागिणी एइ गौरीकि ॥‘
*

[59]
बिश्‍वेश्‍वरे लभिबार
बिश्‍वासे अनेक बार
खोजि न पाइले सार
पथ कौणसि,
ता परे निज पिअर-
आदेश घेनि सत्वर
आम सखीगणङ्कर
सङ्गे रूपसी ।
कठोर तपस्या साधन,
करिबा पाइँ आश्रिले बन-सदन ॥
*

[60]
राजसुता निति निति
घोर तपरे एमिति
मज्जिले गलाणि बिति
बहु दिबस,
बीज रोपिथिले साक्षी
रूपरे से राजीबाक्षी,
धरिलेणि सबु शाखी
फळ सरस ।
पति-लाभ आशा ताङ्करि,
अळप सुद्धा अद्यापि नाहिँ अङ्कुरि ॥
*

[61]
घोर तप कष्ट सहि
क्षीण हेले प्रिय सही,
आम नेत्रुँ य़ाए बहि
अश्रु झरणा,
तेबेहेँ केबे ताङ्कर
प्रार्थित-दुर्लभ बर
हेबे सदय अन्तर
न पड़े जणा ।
कृष्टा अनाबृष्टि बिरसा,
रसारे करन्ति य़ेह्ने इन्द्र बरषा ॥"
*

[62]
गिरिजाङ्क मर्म जाणि
सजनी सकळ बाणी
ब्यकत करिले आणि
एहि रूपरे,
तहुँ सौम्य ब्रह्मचारी
मुखे हर्ष न प्रसारि
पचारिले सुकुमारी
उमा पाशरे ।
‘सत्य कि ए राजदुलाळी !
अथबा परिहासरे कहिले आळि ?”
* * * 


Part-3 : Continued : Link : 
http://hkmeher.blogspot.com/2011/02/kumara-sambhava-canto-v-oriya-part-3.html   
= = = = = = 

Related Link : 
Kumara-Sambhava Kavya : Odia Version by Dr. Harekrishna Meher :
= = = = = = 
Translated Works of Dr. Harekrishna Meher : 
http://hkmeher.blogspot.in/2016/08/translated-works-of-dr-harekrishna-meher.html

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Kumāra-Sambhava (Canto-V) Oriya Version: Part-1 : Dr. Harekrishna Meher

Kumāra-Sambhava (Canto-V)
Original Sanskrit Mahākāvya by : Poet Kālidāsa
Oriya Version by : Dr. Harekrishna Meher    

(Extracted from Complete Version of the Epic) 
*
Theme of Canto-5 : Penance of Parvati
Number of Verses : 86

*   
(Entire Oriya Version of Canto-5th
with elaborate Introduction
has been published in
‘Bartika’, Literary Quarterly, Dashahara Special Issue,
October-December 2001, pp. 169 – 203,  
Dasarathapur, Jajpur, Orissa)
*
Here Part-1 comprises Verses 1 to 29.
Part-2 , Verses 30 to 62
Part-3 , Verses 63 to 86
= = = = = = = 

For Part-2,  Link : 
*
For Part-3,  Link : 
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कुमार-सम्भव (पञ्चम-सर्ग)
मूल संस्कृत महाकाव्य : महाकवि कालिदास
ओड़िआ पद्यानुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर    

(महाकाव्यर संपूर्ण पद्यानुवादरु आनीत)
*  

* विषय : पार्वतीङ्क तपस्या *
राग : चोखि
प्रथम भाग : श्लोक  १ - २९.
= = = = 


[1]
पिनाकपाणि शङ्कर –
कोपे भस्म हेले स्मर
देखि सम्मुखे निजर
ए अघटण,
भग्न हेला ग‍उरीङ्क
अभिळाष आन्तरिक,
हृदये निन्दिले धिक
सुन्दरपण ।
स‍उन्दर्य्य़ सार्थक ताहा,
प्रिय पाशे स‍उभाग्य लभ‍इ य़ाहा ॥
*

[2]
अबलम्वि एकाग्रता
मुनिब्रते हो‍इ रता
शारीरिक सुन्दरता
सार्थ-करणे,
बाञ्छिले आळस्यहीना
गिरीशबाळा नबीना,
ए बेनि किपरि बिना
तपश्‍चरणे ।
सेहिपरि प्रेम आबर,
सेपरि स्वामी लभिबा सम्भबपर ?
*

[3]
तपरे दृढ़-बरता
पार्बतीङ्क ए बारता
शुणि माता अधीरता
भजिले मने,
प्रिय कन्यार हृदय
शिबे करिअछि लय
जाणि एपरि निश्‍चय
मेना बहने ।
महातपस्यारु निरोधि,
पुत्रीकि उरे आलिङ्गि कहिले बोधि ॥
*

[4]
“माआ लो ! आमरि पुरे
अछन्ति ईप्‍सित सुरे,
काहिँ तप ? काहिँ दूरे शरीर तब ?
कोमळ शिरीष पुष्प
निज बळ-अनुरूप
सहि पार‍इ मधुप-
पाद- लाघब ।
मात्र पक्षी-चरण-भार,
सहिबा सकाशे शक्ति नाहिँ ताहार ॥“
*

[5]
एहिपरि पर्वतेश-
जाया देइ उपदेश
तप-उद्यमरु लेश-
मात्र पुत्रीकि,
पारिले नाहिँ निबारि,
स्थिर-चित्ता से कुमारी,
अभीष्ट बस्तुरे भारि
दृढ़ मतिकि ।
निम्नगामी बारिकि पुण,
फेराइ आणिबा लागि केबा निपुण ?
*

[6]
दिने प्रशस्त-हृदया
नगाधिराज-तनया
‘तपे मुहिँ दृढ़-लया
सिद्धि पर्य़्यन्त,
निज निबास कानने
रचिबि’ बोलि सुमने
प्रिय सजनी-बदने
पेषि उदन्त ।
अनुज्ञा मागिले पिताङ्क,
हिमाळय जाणिथिले अभीष्ट ताङ्क ॥
*

[7]
सुय़ोग्य अभिळाषरे
तोष लभि मानसरे
आज्ञा देले निबासरे
भूधरसाइँ,
तहुँ प्रसन्न मुखरे
गौरी चळिले सुखरे
शिखण्डीपूर्ण्ण शिखरे
तपस्या पाइँ ।
परे ताहा ‘गौरीशिखर’
बोलि लोके ख्यात हेला नामे ताङ्कर ॥
*

[8]
हृद स्थळे बिलेपित
चन्दनकु बिलोपित
करुथिला य़ा दोळित
दण्ड चञ्चळ,
से हारकु परिहरि
पिन्धिले बाळार्क परि
पिङ्गळ-बरण परि-
धान बल्कळ ।
उरज थिबारु उन्नत,
शिथिळ हेला बल्कळ-सन्धि समस्त ॥
*

[9]
सज्जित चारु कुन्तळ-
कान्तिरे मुखमण्डळ
दिशुथिला समुज्ज्वळ
पूर्बे य़ेभळि,
हेले मध्य जटागम
दिशिला ता मनोरम,
केबळ अळिरे पद्म
न उठे झळि ।
श‌इबाळ य़ोगे आबर,
हो‍इथाए जननेत्र-आनन्दकर ॥
*

[10]
घेनिले मेनादुहिता
तपोब्रते उत्साहिता
मञ्जुळा से त्रिगुणिता
मौञ्जी मेखळा,
ताङ्क देहे प्रतिक्षण
कर्कश कटि-भूषण
कला रोम-हरषण
से त कोमळा ।
आद्य बार पाइँ सूत्रटि,
पिन्धिबारु रक्तबर्ण्ण दिशिला कटि ।
*

[11]
स्तनाङ्गरागे अरुणी-
कृत कन्दुकरे पुणि
ओष्ठ-रञ्जने तरुणी
ग‍उरीङ्कर,
रत थिला य़ेउँ हस्त,
तेजि एबे से समस्त
अक्षमाळारे अभ्यस्त
हेला सादर ।
कला कुशाङ्कुर आदान,
बिक्षत हेला से लागि अङ्गुळिमान ॥
*

[12]
महार्घ मृदु शयने
पारुश परिबर्त्तने
केशुँ पतित सुमने
य़ेउँ गौरीकि,
हेउथिला कष्ट ज्ञान,
तपे से त बर्त्तमान
कले निज उपधान
बाहु-बल्लीकि ।
अनाबृत मुक्त भूमिरे,
उपबेशन शयन कले बिधिरे ॥
*

[13]
तपश्‍चरण-शेषरे
फेरि पाइबा आशरे
कोमळा लता पाशरे
सेकाळे आणि,
बिळास-भङ्गी निजर
अरपि देले आबर
एणीबृन्दरे सुन्दर लोळ चाहाणी ।
समर्पिले उमा सतेकि,
न्यास रूपे तहिँ एइ बस्तु बेनिकि ॥
*

[14]
निरळसा सुकुमारी
श‍इळ-राजकुमारी
देइ कुम्भ-स्तन-बारि
साजिले मात,
बाळ बृक्षङ्क बर्द्धन
कले निजे शुद्धमन,
परे पुत्र षड़ानन हेलेहेँ जात ।
अग्रज समग्र तरुर,
तनय-स्नेह केबे न करिबे दूर ॥
*

[15]
तपश्‍चारिणी अपार
स्नेहे मृगङ्कु आहार
देइ पाळिले नीबार
आहरि करे,
ताङ्क समीपे समस्त
एभळि थिले बिश्‍वस्त,
बढ़ाइ उमा स्वहस्त
कौतुकभरे ।
मृगङ्कर नेत्र सङ्गते,
मापुथिले सखीङ्कर नेत्र अग्रते ॥
*

[16]
करुथिले नित्य स्नान
से बल्कळ परिधान
अनळ होमबिधान
बेद-अभ्यास,
जाणि ए शुभाचरण
दर्शनार्थी ऋषिगण
करुथिले पदार्पण
ताङ्क आबास ।
धर्मबृद्ध ब्यक्ति पाशरे,
बयस गणना केबे केहि न करे ॥
*

[17]
बिरोधी प्राणीनिकर
तेजिले निज पूर्बर
बैरिभाब परस्पर
तपस्थळरे,
इष्टफळे तरुगण
कले अतिथि-तोषण,
अनुक्षण नब पर्ण्ण-
शाळा भितरे ।
दीप्त थिला होम-ज्वळन,
ए रूपे पबित्र हेला से तपोबन ॥
*

[18]
एपरि पूर्बाचरित
तपस्याबळे ईप्‍सित
फळ लभिबा निश्‍चित नुहे सम्भब,
ए कथा मने बिचारि
नगाधिराज-कुमारी
उपेक्षिले निज शारीरिक मार्दब ।
ता ठारु अधिक कठिन,
तपस्या आरम्भ कले हो‍इ तल्लीन ॥
*

[19]
कष्ट पा‍उथिले हेळे
सामान्य कन्दुक खेळे
निज पुरे सेतेबेळे
य़ेउँ सुन्दरी,
बर्त्तमान मुनिब्रते
मज्जिले से अबिरते
स्वर्ण्णपद्मे गढ़ा सते
तनु ताङ्करि ।
बहिथिला उभय गुण,
स्वभाबे कोमळ थिला कठिन पुण ॥
*
[20]
ग्रीष्मकाळे निज चारि
पारुशरे सुकुमारी
अनळ जाळि ताहारि
मध्ये रहिले,
रबिङ्क दहनात्मक
नयन-प्रतिघातक
रश्मि जिणि अपलक
नेत्रे चाहिँले ।
एकलये तपन प्रति,
सुमध्यमा शुभ्रहास-मुखी पार्बती ॥
*
[21]
एहिप्रकार प्रखर
मिहिर-तेज-निकर
बाजिबारु उमाङ्कर
मुख धबळ,
धारण कला सुन्दर
कान्तिकि अरबिन्दर
किन्तु तहिँ निरन्तर
तापे केबळ ।
दीर्घ बेनि नेत्र-प्रान्तरे,
काळिमा स्थान ग्रहण कला मन्थरे ॥
*
[22]
अय़ाचिते उपस्थित
सळिल-बिन्दु सहित
शशीङ्कर रसान्वित
रश्मि शीतळ,
एते मात्र सुलक्षणा
पार्बतीङ्कर आपणा
तपस्या काळे पारणा
हेला केबळ ।
पादपमानङ्क जीबन,
बृत्तिरु न थिला भिन्न एहि साधन ॥
*
[23]
गगनगामी तपन
इन्धन-दीप्त दहन
एभळि नाना ज्वळनङ्कर तेजरे,
अतिशय सन्तापिता
शैळाधिराज-दुहिता
तपान्ते हेले सिञ्चिता नब जळरे ।
उष्ण बाष्प निज शरीरु,
ऊर्द्ध्वकु तेजिले भूमि सङ्गे तहिँरु ॥
*
[24]
आद्य बारि-बिन्दु राशि
बर्षाकाळे मृदु्हासी-
नेत्रलोम परे आसि
मुहूर्त्ते थाइ,
ताड़ि कोमळ अधर
उच्च पीन पयोधर
उपरे पड़ि सत्वर
चूर्ण्णता पाइ ।
धीरे धीरे खसि बळीरे,
बिळम्बे प्रबेश कला नाभिस्थळीरे ॥
*
[25]
प्रबळ धारा-सम्पात
सङ्गते प्रचण्ड बात
बहन्ते शैळसुता त
दिबाबसाने,
अनाबृत शिळातळ-
शेय़े शो‍इले केबळ
सते सेकाळे चञ्चळ
य़ामिनीमाने ।
क्षणप्रभा-चक्षु मेलाइ,
देखुथिले तप-साक्षी स्वरूपे थाइ ॥
*
[26]
पौष रजनी काळरे
बायु तुषार-मेळरे
बहिबा बेळे जळरे
कले बसति,
तहिँ सम्मुखरे ताङ्क
परस्पर चक्रबाक-
दम्पति निशीथय़ाक
ब्याकुळे अति ।
बिरहे करन्ते रोदन,
दयार्द्र हेला उमाङ्क कोमळ मन ॥
*
[27]
आकण्ठ जळे केबळ
दिशिला मुख सुढळ
कम्पिला अधर-दळ
शीतळतारु,
पद्म-मुखुँ आपणार
सुबास कले प्रसार,
निशा समये तुषार
बर्षा हेबारु ।
नष्ट हेला कमळ-धन,
स्वमुखे से कले सते पद्म सर्जन ॥
*
[28]
बृक्षुँ स्वेच्छारे पतित
पत्र भक्षिले निश्‍चित
तपश्‍चर्य़्यार सेहि त
चरम सीमा,
किन्तु से पर्ण्ण आहार
पूर्ण्ण रूपे परिहार
कले तपे आपणार
पर्बत-जेमा ।
तेणु पुराणज्ञ-निकर,
देइअछन्ति ‘अपर्ण्णा’ नाम ताङ्कर ।
*
[29]
कमळिनीर पराय
सुकोमळ ताङ्क काय
दृढ़ ब्रत समुदाय
तहिँ आचरि,
कष्ट सहि निशिदिन
सुमुखी न हेले खिन्न,
तपस्वीगण कठिन
देहे निजरि ।
साधिथान्ति तपस्या य़ाहा,
अत्यन्त निऊन कले गिरिजा ताहा ॥
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Kumara-Sambhava Kavya : Odia Version by Dr. Harekrishna Meher :
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