Saturday, February 12, 2011

Kumāra-Sambhava, Canto-V (Oriya, Part-3): Dr. Harekrishna Meher

Kumāra-Sambhava (Canto-V)
Original Sanskrit Mahākāvya by : Poet KālidāsaOriya Version by : Dr. Harekrishna Meher(Extracted from Complete Version of the Epic)
*Theme of Canto-5 : Penance of Parvati
Number of Verses : 86

*(Entire Oriya Version of Canto-5th
with elaborate Introduction has been published in
‘Bartika’, Literary Quarterly, Dashahara Special Issue,
October-December 2001, pp. 169 – 203,
Dasarathapur, Jajpur, Orissa)
*

Part-1 comprises Verses 1 to 29.
Part-2 comprises Verses 30 to 62.
Part-3 comprises Verses 63 to 86.
**

For Part-1, please see :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/01/kumara-sambhava-canto-v-oriya-version.html

*
For Part-2, please see :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/01/kumara-sambhava-canto-v-oriya-part-2.html

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कुमार-सम्भव (पञ्चम-सर्ग)
मूल संस्कृत महाकाव्य : महाकवि कालिदास
ओड़िआ पद्यानुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
(महाकाव्यर संपूर्ण पद्यानुवादरु आनीत)
*
विषय : पार्वतीङ्क तपस्या ।
राग : चोखि
तृतीय भाग : श्‍लोक ६३ रु ८६
= = = =


[63]
स्वभाबे से लाजकुळी
तरुणी निज मुकुळी-
कृत कोमळ अङ्गुळि-
अग्रे तदन्ते,
घेनि स्फटिकर माळी
अद्रिराज-प्रियबाळी
संक्षेपरे भाळि भाळि
कौणसि मते ।
ब्रह्मचारी-सम्मुखे गिर,
प्रकाश करिले निजे मधुर धीर ॥
*

[64]
“बेदज्ञबर ! तुमरि
सम्मुखरे सहचरी
ब्यकत कले य़ेपरि
मोर बिषये,
से सबु अट‍इ सत
शिब-लाभर उन्नत
पद हेबाकु प्रापत
इच्छे हृदये ।
तेणु मुहिँ तपे तत्पर,
अबिषय नाहिँ किछि मनोरथर ॥

*

[65]
बटु प्रकाशिले पुण,
“गिरीन्द्र-नन्दिनि ! शुण
जाणिछि मुँ शिब-गुण
केउँ भरमे,
आउ तुमे ताङ्क पाश
करुछ श्रद्धा प्रकाश,
सदा ताङ्करि अभ्यास
अशुभ कर्मे ।
एहा चिन्ति तुम कार्य़्यर,
समर्थने न इच्छ‍इ मन मोहर ॥
*

[66]
आगो ! अपदार्थे मन
बळाइअछ केसन ?
बिबाह काळे शोभन
हस्त तुमरि,
मङ्गळ सूत्रे मण्डिब
किन्तु सर्प-य़ुक्त शिब-
कर ग्रहणे दिशिब
शोभा किपरि ?
से पाणिकि तुमरि पाणि,
सहिब कि आद्य बार, कह कल्याणि ! ॥
*

[67]
उत्तम रूपे निजर
चित्ते थरे चिन्ता कर
ग‍उरि ! कह तुमर
शुभ सुरुचि,
हंस-चिह्नित अम्बर
पुनराय शिबङ्कर
रकत-स्राबी कुञ्जर-
चर्म अशुचि ।
ए उभय एक ठाबरे,
रहिबा य़ोग्य हो‍इबे केउँ भाबरे ?
*

[68]
पुष्प-बिञ्चित प्रासाद-
तळे रखि मृदु पाद
बिहरुअछ आह्लाद-
मानसे तुमे,
लाक्षारस-सुरञ्जित
से पाद हेब स्थापित
परेत-केश-पूरित
श्मशान-भूमे ।
ए कथार अनुमोदन,
करिब कि बैरी हेले मध्य से जन ?
*

[69]
य़दि तुम पाइँ शिब-
बक्ष सुलभ हो‍इब,
कह एथिरु अतीब
अरुचिकर,
किस अछि अनुचित ?
हरिचन्दन- चर्चित
तुम उरजे निश्‍चित
ताङ्क बक्षर ।
चिता भस्म-धूळि बिशेष,
स्थान ग्रहण करिब लभि आश्‍लेष ॥
*

[70]
तुमे परिणय परे
बसि गजेन्द्र उपरे
चळन्त बधू रूपरे
पति-निबास,
मात्र य़ेबे बृद्ध बृषे
आरोहि य़िब सुदृशे !
ता देखि महापुरुषे
करिबे हास ।
ए त बिड़म्बना अपर,
रहिअछि परा सम्मुखरे तुमर ॥
*

[71]
कपाळीङ्कर प्रापति
कामना हेतु सम्प्रति
उभये भजिले गति
कि शोचनीय,
प्रथम सेहि शङ्कर-
शिरे राजित सुन्दर
मृदु लेखा चन्द्रङ्कर,
तुमे द्वितीय ।
बिश्‍वजन-नेत्र-चान्दिनी,
क्षीण हेल आगो गिरिराज-नन्दिनी ॥
*

[72]
शङ्कर त त्रिलोचन
तेणु बिरूप बदन
ताङ्क जन्म कदाचन
नुह‍इ लक्षि,
अटन्ति से दिगम्बर
मृगाक्षि ! बिचार कर
सम्पत्ति केते मातर
थिबे से रखि ।
बर लागि खोजा य़ेतेक,
ताङ्क पाशे सतरे कि रहिछि एक ?
*

[73]
सुन्दरि ! एथि निमित्त
मन्द अभिळाषुँ चित्त
कर तुमे निबर्त्तित
न हो‍इ बणा,
काहिँ से अरुचिकर
करमे श्रद्धाळु हर ?
काहिँ तुमे मनोहर
शुभ-लक्षणा ?
सज्जन श्मशान-शूळरे,
य़ज्ञ-स्तम्भर संस्कार केबे न करे ॥

*

[74]
बटु-बदनुँ स्फुरित
कटु कथा बिपरीत
शुणि उमा जर्जरित
हो‍इले रागे,
रक्त अधर कम्पाइ
रङ्ग नयने अनाइ
भूरु य़ुगळ बङ्काइ
ताङ्करि आगे ।
अनादरे बक्र ठाणिरे,
निरेखिले गिरिबाळा ब्रह्मचारीरे ॥
*

[75]
बो‍इले से , “ बास्तबरे
महादेब बिषयरे
नाहँ तुमे हृदयरे
य़थार्थ जाणि,
तेणु मोते एपरि त
कहुअछ बिपरीत,
तत्त्वज्ञान-बिरहित
अधम प्राणी ।
महात्माङ्क असाधारण,
अचिन्त्य चरिते करे दोषारोपण ॥
*

[76]
बिपत्ति निबारिबारे
सम्पत्ति लाभ आशारे
माङ्गल्य बस्तु संसारे
पुरुष सेबे,
शङ्कर त त्रिभुबन
करिथाआन्ति पाळन
कामनारे ताङ्क मन
न बळे केबे ।
चित्त-बृत्ति-दूषणकर,
माङ्गळिक द्रव्ये किस हेब
हेब ताङ्कर ?
*

[77]
अकिञ्चन से ईशान
सर्ब-ऐश्‍वर्य़्य़-निधान
बास हेलेहेँ श्मशान
त्रिलोकनाथ,
से भीम-स्वरूपधर
बिदित अछि ताङ्कर
नाम सुमङ्गळकर
‘शिब’ य़थार्थ ।
नाहिँ केहि जगते जन,
प्रकृत रूप जाणिबा पाइँ भाजन ।
*

[78]
बिश्‍वमूर्त्ति शिब-अङ्ग
भूषण य़ोगे सुरङ्ग
हेउ अथबा भुजङ्ग-
परिबेष्टित,
गजचर्म- परिहित
अबा दुकूळ-मण्डित
हेउ अथबा निश्‍चित
कपाळान्वित ।
अबा चन्द्रशेखर सेहि,
ए समस्त बास्तबरे न जाणे केहि ॥
*

[79]
श्मशान-भस्म शिबङ्क
कळेबर-सम्परक
लभि पबित्र-कारक
हुए तक्षण,
ताण्डब नृत्य काळरे
अङ्गु पड़िले तळरे
चिता-धूळिकि आदरे
देबतागण ।
पूत मणि आनन्दभरे,
लेपन करिथाआन्ति मस्तक परे ॥
*

[80]
शिब हेलेहेँ निर्द्धन
बृषभे कले गमन
ताङ्क पयरे सुमन-
बृन्द-नायक,
अ‍इराबत-बाहन
इन्द्र बिनये बन्दन
करि निज शिर-लग्न
पारिजातक -
पुष्पर लोहित परागे,
अङ्गुळि रञ्जन्ति ताङ्क चरण-भागे ॥
*

[81]
तुमे त दुःशीळ जन
इच्छि दोष दरशन
शिब-बिषये य़ेसन
कहिल भाबि,
तहिँ एक सत्य बाणी
निश्‍चय अछ बखाणि
अटन्ति से शूळपाणि
महाप्रभाबी ।
य़ाहाठारु सम्भूत ब्रह्मा,
किपरि बा न हेबे से अलक्ष्य-जन्मा ?
*

[82]
बिबादे कि प्रयोजन ?
मो पाशे तुमे य़ेसन
शिब सम्बन्धे बचन
कल प्रकाश,
से स्वरूपधारी हर
हेलेहेँ अछि मोहर
प्रेमी मन निरन्तर
ताङ्करि पाश ।
स्वेच्छारे य़े कर्म आचरे,
लोक-निन्दा प्रति से न भ्रूक्षेप करे ॥
*
[83]
देख सखि ! ब्रह्मचारी
अधर स्फुराइ भारि
इच्छन्ति किस बिचारि
कहिबा लागि,
बारण कर चञ्चळ,
महात्माङ्कु य़ेउँ खळ
निन्द‍इ से न केबळ
पातकभागी ।
ता ठारु य़े निन्दा शुण‍इ,
सेहि लोक मध्य पापभागी हु‍अ‍इ ॥
*
[84]
नोहोले मुहिँ एठारु
चालिय़िबि ” बोलि चारु-
गात्री ब्यस्ते उठिबारु
बक्षुँ ताङ्कर,
बल्कळ पड़िला खसि
पाद बढ़ान्ते रूपसी
सप्रेम मन्दे बिहसि
इन्दुशेखर ।
बृषध्वज स्वरूप धरि,
उभा हेले पार्बतीङ्कि बारण करि ॥
*

[85]
ताङ्कु देखि कुमारीर
थरिला मृदु शरीर
भाबाबेशे स्वेद-नीर
ब्यापिला बहि,
ऊर्द्ध्वे रखि सम्मुखीन
चरणटि गतिहीन
न पारिले य़ाइ कि न
पारिले रहि ॥
प्रबाह-पथरे पर्बत,
रोधिले आकुळा नदी हुए य़ेमन्त ॥
*

[86]
बो‍इले शशाङ्कधर,
“आजिठारु मुँ तुमर
तपे क्रीत परिकर
हेलि शोभने !
शुणि ए प्रिय भारती
हेले उमा हृष्ट-मति
तप-कष्टरु बिरति
नेले बहने ।
इष्ट सिद्धि हेले निश्‍चिते,
जणा न पड़‍इ पूर्ब श्रम किञ्चिते ॥

* * *
Translator’s Conclusion

[87]
काळिदासङ्क अमृत
लेखनीरु बिनिःसृत
कुमारसम्भबे कृत
सर्ग पञ्चम,
मेहेर हरेकृष्णर
उत्कळीय भाषान्तर
मोहु सुजन-अन्तर
सुमनोरम ।
छयाअशी श्‍लोके रचना,
पूर्ण्ण हेला अपर्ण्णाङ्क तप बर्ण्णना ॥

= = = = =

(Kumara-Sambhava, Canto-V,
Oriya Translation of Dr. Harekrishna Meher Completed)
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