Saturday, August 13, 2011

‘Dr. Nilamadhab Panigrahi Samman’ to Harekrishna Meher for 'Koshali Meghaduta'

Sambalpur University honoured Dr. Harekrishna Meher
with
'Dr. Nilamadhab Panigrahi Samman' for the Book ‘Koshali Meghaduta’.


Swabhava-Kavi Gangadhar Meher (1862-1924) is well- known as ‘Prakriti-Kavi’ of Oriya Literature. On the occasion of 150th Birth Day Celebration of this great poet, organized by Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, on 13 August 2011, the sacred day of Sravana Purnima and Raksha Bandhan, Dr.Harekrishna Meher, Sr. Reader and Head of the Department of Sanskrit, Government Autonomous College, Bhawanipatna, as the invited Chief Speaker, delivered his speech on literary works and life of the poet with their significance in the present society. In this literary meeting held in the University campus, Vice-Chancellor (i/c)-cum-President Prof. Kailas Chandra Saraf, Registrar Dr. Sudhansu Shekhar Rath, University Journal ‘Saptarshi’s Editor Prof. Krushna Chandra Pradhan, Chief Guest Poet Aswini Kumar Mishra and Co-ordinator Rajendra Kumar Thaty were present there on the dais.




During this function, the University conferred on Dr. Harekrishna Meher, the Koshali Award entitled ‘Nilamadhab Panigrahi Samman’ (2010) for his book ‘Koshali Meghaduta’, the Complete Koshali Lyrical Translation of Poet Kalidasa’s Sanskrit Kavya ‘Meghadutam’. This Award with Maanapatra and Angavastra was presented to Dr. Meher by the President-VC on behalf of the University. Every year Sambalpur University, as per its circular, gives this Award to an eminent litterateur for Translation and Creative literary work in Sambalpuri-Koshali language and literature.
* * *

* KOSHALI MEGHADUTA' Book * 
Updated : 
OdishaToday Network : Nilamadhab Panigrahi Award : http://groups.google.com/group/orissatoday/browse_thread/thread/3484f5e7c298c8e8#
*
Koshali Forum : Nilamadhab Panigrahi Samman : http://kddfonline.com/2011/08/15/eminent-sanskrit-and-kosli-language-scholar-dr-harekrishna-meher-has-been-conferred-on-%E2%80%98nilamadhab-panigrahi-samman%E2%80%99/
*
Twitter –Kalahandia : 20 August 2011:
‘Nilamadhab Panigrahi Samman’ to Dr. Harekrishna Meher for ‘Koshali Meghaduta’ Book :http://twitter.com/#!/kalahandia
= = = = = = 

Dr. Harekrishna Meher's Speech on receiving "Dr. Nilamadhab Panigrahi Award"-2010 conferred by Sambalpur University :
Video on Youtube : 
http://www.youtube.com/watch?v=uAYUtFXLDtE&feature=youtu.be
= = = = = = = = = = = 

Ref : 'Muse India' (Literary E-Journal) News and Events : 
Sambalpur University honours Harekrishna Meher:   http://www.museindia.com/newsview.asp?id=8
* * * 






























































Thursday, August 11, 2011

Tapasvini Kavya Canto-3 (‘तपस्विनी’ काव्य तृतीय सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर)


TAPASVINI
Original Oriya Mahakavya by :
Svabhava-Kavi Gangadhara Meher (1862-1924)

Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher
= = = = = = = = = =


[Canto-3 has been taken from pages 63-77 of my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see : ‘ Tapasvini : Ek Parichaya ‘
Link
: http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

= = = = = = = = = = = = = =
Tapasvini [Canto-3]

= = = = = = = = = = = = = =


‘तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर


= = = = = = = = = = = =
तृतीय सर्ग
= = = = = = = = = = = =


भागीरथी-तट पर लक्ष्मण
वैदेही को जब त्याग चले,
ससिन्धु वसुन्धरा में खरांशु-किरण
फैली थी विमल गगन के तले ॥

राम-रमणी की दुर्दशा देवराज्य को होगी दृश्य
तो लज्जा लगेगी अवश्य,
दिवाकर ने करके इस बात का ध्यान
मानो दी वह धवल जवनिका तान ॥

इस रहस्य को जानकर
बाहर दिखलाने दोष अंशुमान्-वंश का,
प्रदोष ने उठा दी सत्वर
धरा-पृष्ठ से वही जवनिका ॥

जब पुकारने लगे विहग
गगन-आंगन में ताराएँ जग
आकर एक के पीछे एक
सम्मिलित हो गयीं अनेक ॥

देखा, बैठे हैं एकाकी विजन में
विस्तृत आंगन में,
साश्रु-लोचन उदास-वदन
अंशुमान्-वंशी रघुनन्दन ॥

सोच रहे थे रघुवर :
‘राज-अधिकार है महादासत्व का बहाना ।
आसीन हो इस ऊँचे पद पर
प्रजा-चरणों में होता कष्ट ही उठाना ॥

जब मिल शत-शत जन
कहते मिथ्या वचन,
उसे मिथ्या जान भी उन्हें मान सर्वथा
बोली जाती उसे सत्य कथा ॥

प्रजा के शान्ति-याग में बलि हो जाता
राजा का सुख स्वाभाविक ।
दृढ़ धर्म-रज्जु से बँधा नरेश्वर
अपने कार्य में तनिक
हो नहीं पाता
एक पग भी अग्रसर ॥

किया जाता जो अभिषेक मंगल,
वह तो प्रोक्षण है केवल ।
चामर डुलाना, और क्या कहा जाय
मक्षी भगाने के सिवाय ?

सुख में निराशा नहीं रहती होगी कभी
देवता के हृदय में भी ।
इसलिये राजा है महान् देवता,
यश-पीयूष का सेवन करता ॥

प्रजा-रुधिर तो बिन्दु-बिन्दु जल ;
प्राप्त कर ऊँचा आसन
नरेश बन जाता बादल
करने प्रजा का कल्याण साधन ॥

धरती के जल में
वज्र नहीं रहता,
परन्तु बादल में
स्वभाव से ही रहता ।
प्रजा-कर-दण्ड
होता नहीं प्रचण्ड,
वह प्रचण्ड होता आकर
राजा के कर ॥

शम्पा की आग से भले
अपना हृदय जले,
दान करने उदक
बाध्य हो जाता बलाहक ॥

सुख त्याग कर सब
शासक नरेश्वर जब
प्रजा-मन में सन्तोष जगाता,
तब वह परम-पूज्य बन जाता ॥

महीमण्डल में राजपद सचमुच
स्वर्ग-सोपान का मस्तक समुच्च ।
यदि राज्य का अधीश्वर
अपने लक्ष्य से भ्रष्ट हो जाता,
तभी गभीर अधोगति पाकर
निश्चित नष्ट हो जाता ॥

ऐन्द्रजालिक समान
एक दण्ड पकड़ विद्यमान,
समभाव-सम्पन्न समदृष्टि डाल
राजत्व की डोरी पर नरपाल
स्वीकार कर सरलता,
अपने जीवन का विषय नहीं सोचता ॥

चरण स्थापित कर डोरी पर
मायाकार यदि होगा नहीं अग्रसर,
कुछ हँसी उड़ायेंगे बजा तालियाँ,
देगा वाद्यकार भी गालियाँ ॥

प्रेयसी-विरह से शिथिल कर जीवन अपना
यदि न रहूँगा मैं कर्म-तत्पर,
तब मनुष्य-समाज मुझ पर
बरसाएगा और भी भर्त्सना ॥

कहेगा संसार :
‘रामचन्द्र है कुलांगार,
रघुकुल में ले जनम
उसने विचार-कृपण बन
त्याग दिया अपना राजपन
वधू के वश में स्वयम् ॥’

उत्तम वानप्रस्थाश्रम का आश्रय,
परन्तु आया नहीं मेरा समय ।
फिर मेरे कार्य में व्रती रहने भरत
कैसे होगा सम्मत ?

अंक की वस्तु में घट जाती प्रीत
उसे नित-नित बारबार देखकर ।
अंक हो जाता जब शून्य प्रतीत,
तब अंक में शून्य लगाने पर
बहुगुणित होता जितना,
हृदय की प्रीत बढ़ जाती उतना ॥

अमर नहीं स्थूल तन,
अमर होता केवल मन ।
मन में संग जब
नहीं टूट जाता,
वही सुख ही तब
सच्चा सुख कहलाता ॥

दुनिया में पार्थिव वैभव से पला
कौन चिरन्तन रहता भला,
बाँध कनक-किरीट शीश विभूषित ?
यश और अपयश
न होकर काल-वश
उसके प्रतिवादी बन जाते निश्चित ॥

क्या स्वर्ग, क्या नरक,
हैं उनके गति-निर्णायक
स्वभाव से दुनिया के लोग ।
लोगों की बातें ठुकरा नीच मन
पाने अनित्य सुखभोग,
उसकी खोज में हो जाता मगन ॥

घर में नहीं तो क्या ?
मेरे हृदय के प्रेम-सरोवर में निकली
खिली है मेरी प्रिया
अमल कमल-कली ।
मानस-भ्रमर सानन्द
लूट रहा है मकरन्द ॥

तरसे हुए अरे नयनो !
क्यों पानी छोड़ रहे हो तुम दोनों ?
यदि सूख जाएगा सरोवर में पानी,
डगमगाएगी मेरी पद्मिनी रानी ॥

अरे वक्ष ! बन प्रस्तर का बाँध शक्तिशाली
तू बन्द कर दे नयनों की जल-नाली ।
अरे नासा-समीरण !
तू घना होकर न चल,
मेरे जीवन की शरण
काँप उठेगी विह्वल ॥

आयेगा लक्ष्मण,
बताएगा प्राण-संगिनी की बातें सारी ।
अरे दोनों श्रवण !
चञ्चल न हो, सब सुनोगे,
फिर त्याग दोगे
व्यथाएँ भारी ॥

अरे सन्तप्त चर्म !
हर लेगा तेरा स्वेद-नीर,
समीरण बहने लगा ।
व्यथाहारिणी पद्म-सौरभा सुभगा
प्रिया के कलेवर का सुगन्ध मनोरम
आहरण करके धीर-धीर ॥

कहता हूँ और एक बात ;
तुमलोग मन के साथ
सब सम्मिलित होकर
चलो हृदय-सरोवर ।
उधर अनन्त दिनों तक
रमते रहोगे रस-रंग में अथक ।
वहाँ खिली है नयी पद्मिनी
मेरी जीवन-संगिनी ।
स्मरण का सूरज वहीं सदा जगमगाता,
अस्त कभी नहीं जाता ॥

अरी रसना ! मेरी मान, वहीं मत रस,
तूने खाई है प्रजा की सम्पत्ति ।
जिसके धन से तू पली बस,
उसके नाम चलने न कर कोई आपत्ति ॥

विधान है दुनिया में जन-कल्याण साधन,
इसी कारण बचा है मेरा जीवन ।
अन्यथा क्यों भला
वज्र को पिघला
कर लेता पान
घृत के समान ?

मुक्त कर दूँगा शुक-सारी युगल,
पिञ्जरे से जाएंगे निकल ।
बीतने दो रयना;
तुझमें जगाने उत्तेजना
वे करेंगे नहीं पुनर्वार
‘सीता’ नाम उच्चार ॥

उस लाक्षारञ्जित-पदा के पास
चला जाएगा मृग-छौना ।
लाक्षा-रेखा है उसके गले का फाँस,
रंगीन पाट डोरी से बना ॥

केका-रव करके निरर्गल
क्यों रहेंगे फिर मयूर-युगल ?
किसका अनुकरण कर बोलेगा भीमराज ? [१]
उसे भी जाने दो आज ॥

कहाँ गौरव पाएगी वीणा,
मेरी संगीत-प्रवीणा
प्रिया के कण्ठ-संग बिना ?
वीणा यह जानकर
अपना भाग्य-दोष मानकर
रहेगी स्वर-हीना ॥’

तदुपरान्त नयन मूँद पलभर
चढ़ चिन्ता-शैल-शिखर
देखा राम ने, काल-प्रवाह भयंकर
तीव्र गति से है अग्रसर ॥

उसके गभीर गर्भ में उगकर
विलीन हो रहे समस्त चराचर ।
बुद्बुद की भाँति क्षणभर कोई रहता,
फिर कोई कुछ दिन ठहरता ॥

उस प्रबल वारि-धार में यश-पर्वत
उठा अपना शीश उन्नत
संकट की गिनती न कर
अटल खड़ा है चूम अम्बर ॥

उस पर्वत के सानु-देश में सती नारियाँ
ज्योतिर्मय वेश-सज्जित,
विहर रहीं स्व-स्व पति संग ले खुशियाँ
युग-युग युगल-भावान्वित ॥

पङ्क्ति-बद्ध सुन्दर
वहीं विराजित कई नरेश,
रत्नमय सिंहासन पर
दिव्य कुसुमालंकारों से भव्य वेश ॥

है जिनकी तनु-तरी
असाध्य-साधन-प्राप्त पुण्य-धन से भरी,
उन्हें ले रहे हैं हाथ पकड़ सादर
पर्वतवासी कविगण आकर ॥

कुछ दुराचारी धर्म न विचार
बलपूर्वक वहीं चढ़ चञ्चल,
पाकर कवियों के वज्रतुल्य मुष्टि-प्रहार
रहते अत्यन्त कष्ट से विकल ॥

आखें खोल सहसा राम ने
निहार उन लोगों की दुर्दशा इस प्रकार
अवलोकन किया सामने,
वसुन्धरा में परिव्याप्त है अन्धकार ॥

झिलमिल तारकाएँ सजाकर नील गगन
चमकाती रहीं अपने उज्ज्वल वदन,
परन्तु उपस्थित नहीं उधर
प्रियतम कलाकर ।
फिर भी उन सबका आनन्द
चल रहा अप्रतिबन्ध ॥

बोले रघुवर :
‘हे तारकागण !
चन्द्र की प्रीति-कारा के बन्धन में
ग्रस्त न होकर
विधि का विधान
तुमलोग मान
करती हो एकाग्र मन में
शिशुमार भ्रमण ॥

प्रियतम-विरह-व्यथा
दुर्विषह होने पर भी सर्वथा
दुनिया के लिये बिसर
समस्त दुःखभार,
कान्ति वितरने रहती हो तत्पर
अपने कर्मानुसार ॥

सिखला दो धर्मदीक्षा तुम्हारी
चलकर वाल्मीकि-आश्रम शीघ्र ही,
मेरे हृदय की चाँदनी प्यारी
अकेली बैठी रही,
नयनों से बरसाती होगी अश्रु-जल
मुझे ध्यान कर पल-पल ॥

बेला में इस निशा की
यदि रोती रहेगी व्याकुल-हृदया चक्रवाकी,
मेरी करुणामयी प्रिया खोकर चेतना
बचा नहीं पायेगी जीवन अपना ॥

दिखलाकर सरोवर
कुमुदिनियों का दोगी दृष्टान्त ।
सम्हालतीं अपना जीवन उधर
यद्यपि उगा नहीं प्रिय निशाकान्त ॥

पुनर्मिलन का विषय मेरी प्रिया
समझेगी नहीं विषम समस्या ।
हृदयों का मिलन
अत्यन्त मनभावन ।
तुम सभी तो जानती हो इसी को,
समझा दोगी प्रेयसी को ॥

इस विषय पर
पाएगी नहीं अवसर
मेरी सरोज-नयना प्रिया संशय का ।
तुमलोग निश्चित बतला दोगी
मेरा समस्त भाव हृदय का ।
देख तो रही हो, साक्षी बन जाओगी ॥

और भी प्रिया के गर्भ में ओतप्रोत
बह रहा है मेरी आत्मा का स्रोत ।
यह बात जब कहोगी तुम सभी,
इसे कदापि व्यर्थ नहीं बोल पायेगी वल्लभी ॥’

इसी से श्रीराम-हृदय को स्पर्श करने
क्या लाघव था समर्थ ?
दृष्टि-मार्ग पर बिछा तिमिर घने
तारकाएँ निहारने लगीं व्यर्थ ॥

न समझ गुणी का सद्गुण
जब कोई दोष देखने बन जाता निपुण,
उस दोषदर्शी की ऊँची स्थिति पर अपनी
होती विधि-कृत बड़ी विडम्बना भोगनी ॥

तारकाओं की थी भावना,
राम का दोष देख प्रसन्न करेंगी मन अपना ।
परन्तु निहार उनके हृदय की ऊँचाई
सबने शीश झुका अधोगति पाई ॥

श्रीराम का दुःख देखने विमुख होकर
उगे नभ में खेद-खण्डित-हृदय कलाकर,
यामिनी के आगमन पर
त्याग क्षीर-सागर ॥

उपहास-पूर्वक चक्रवाक की ओर
पुकारने लगा चकोर :
‘चिन्ता मत कर, चिन्ता मत कर,
तेरे ललाट-पट पर
लिखा गया है सही
केवल उपवास ही ॥’

वह कहेगा नहीं क्यों भला ?
दैव ने तो उसके मुख अमृत है डाला ।
उल्लसित-अन्तर बजाते ताली
दूसरों की विपत्ति देख वैभवशाली ॥

इधर सोच रहीं पिछली बातें मन-ही-मन,
मणि-रमणीय भवन,
गजदन्त-खचित शयन सुन्दर,
आडम्बर भरपूर
सब सुख त्याग बहुत दूर,
पूर्व-परिचित पत्र-निर्मित कुटीर के अन्दर
मृगचर्मासन-समासीन जानकी
विरहिणी गृहिणी श्रीराम की ॥

प्रियतम की प्यारभरी बातें मधुर
छेड़ रहीं निर्मल सुर
हृदय-फोनोग्राफ के भीतर
अपने आप प्रवेश कर ॥

सकल-भय-मोचन सुरुचिर सरल
मरकत-कान्तिमय बाहु-युगल
आन्तरिक ध्यान में अपने
स्पष्ट दीख रहे सिर के सामने ॥

रघुनन्दन के प्रियभाजन
विश्वस्त प्रहरी बन
निद्रा त्याग लक्ष्मण वीर
जैसे रहते साथ,
वैसे ही अपने हाथ
ले धनुष तीर
दृश्य हुए अदूर उसी क्षण में
स्मृति के दर्पण में ॥

उन्हें त्याग चुके हैं स्वामी और देवर,
इसी विषय सोचने पर
म्लान नयन बरसाने लगे जल,
जैसे तुषाराप्लुत कमल ॥

खाकर कई प्रहार
खर्जूर-ग्राही के हाथ से
छोड़ता रस जिस प्रकार
खर्जूर-तरु मौन अचल,
हो गयी क्षोभ-आघात से
सती की अवस्था अविकल ॥

इस तरह प्रिय प्रिया दोनों बारबार
स्मरण कर एक दूजे की भावराशि प्यारभरी,
बैठ दुःखासन पर ले धैर्य-तलवार
काट रहे थे सारी शर्वरी ॥

आत्मा-शिर-क्लान्ति से निकल
अविरल झर-झर,
पक्ष्म-गुल्मों को प्रक्षाल स्वद-जल
प्लावित करता रहा कपोल-परिसर ॥

चीत्कारने लगी निशा
उलूक-वेशा ।
धीरे-धीरे क्षीण हो चला जीवन ।
नभ में करके रुधिर प्लावन
किसी प्रकार बच गयी निशीथिनी
बनकर पलायन-पन्थिनी ॥

प्रेमिक-प्रेमिका-चरणों तले
करके अपना अहंकार विक्रय,
प्रसून-वेश ले
भूमि पर गिरी
तारकायें सारी
ढूँढने लगीं आश्रय ॥

त्याग समस्त छल अपने
शरण-वत्सल रघुवर ने
प्रतिष्ठित रखा उन्हींका सम्मान ।
साथ-साथ किया वर प्रदान,
‘तुम्हें युग-युगान्तर
स्थान प्राप्त होगा शीश पर ॥’

= = = = =


[पादटीका : (१) भीमराज = नाना-स्वनकारी पक्षीविशेष ।]
* * * * *

(तपस्विनी काव्य का तृतीय सर्ग समाप्त)
= = = = = = = = =



[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]

* * * * *



Tuesday, August 9, 2011

Tapasvini Kavya ‘Praak-Kathan’ (‘तपस्विनी’ काव्य ‘प्राक्‌कथन’/ हरेकृष्ण मेहेर)


TAPASVINI
Original Oriya Mahakavya by :
Svabhava-Kavi Gangadhara Meher (1862-1924)

Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher
= = = = = = = = = =


[‘Praak-Kathan’ has been taken from pages 10-12 of my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see : ‘ Tapasvini : Ek Parichaya'
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

= = = = = = = = = = = = = = = = =
Tapasvini [‘Praak-Kathan’]
= = = = = = = = = = = = = = = = =


‘तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर


= = = = = = = = = = = =
प्राक्‌कथन
= = = = = = = = = = = =


आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विश्व-साहित्य में अनुवाद एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है । विभिन्न-भाषा-साहित्यों के परस्पर भाव-विनिमय के लिये अन्य भाषा में अनुवाद करना अत्यन्त आवश्यक अनुभूत होता है । अनुवाद के माध्यम से साहित्य के तुलनात्मक विश्लेषण के साथ प्रसार का परिसर अधिक होता है । यदि अनुवाद न होता, तब विविध भाषा-वाङ्मयों से परिचित होने का अवसर उपलब्ध नहीं होता । किसी भी भाषा में अनुवाद करना सरल कार्य नहीं है । अनुवाद मूलभाषा का यथार्थ अनुगत होना चाहिये । एक साहित्य-कृति को, विशेषरूप से कविता को, भाषान्तरित करना न केवल आयास-सापेक्ष है, अपितु ज्ञान और प्रतिभा का निर्णायक भी । अनुवाद ऐसी एक विशिष्ट कला है, जो सभी के द्वारा सम्भव नहीं । यह कार्य बाह्य दृष्टि से सरल प्रतीत हो सकता है, परन्तु वास्तव में अनुभवी ही अनुवाद का श्रम और महत्त्व समझता है ।

स्वतःस्फूर्त्त मौलिक कविता-रचना में कोई प्रतिबन्ध प्राय नहीं होता । परन्तु अनुवाद में उपयुक्त शब्द-चयन, भाव की यथायथ सुरक्षा और लालित्य-माधुर्यादि की दृष्टि से अनुवादक एक निर्दिष्ट सीमा के भीतर बँधा रहता है । मूल भाव के आन्तरिक आलोड़न के कारण समयानुसार अनुवाद में भी स्वतःस्फूर्त्त पदावली के अभिव्यक्त होने में कोई अन्तराय नहीं रहता । मूल भाव की सुरक्षा के साथ अनुवाद की शाब्दिक मौलिकता तथा उपस्थापन-शैली भी प्रणिधान-योग्य होती है । मेरे अनुवाद में ऐसी अनुभूति हुई है । इस सम्बन्ध में कुछ अपनी बातें सविनय निवेदन करना चाहता हूँ ।

हिन्दी-अंग्रेजी-अनुवादों के माध्यम से महाकवि गंगाधर-मेहेर-कृत ‘तपस्विनी’ को परिचित कराने के उद्देश्य से मेरी आन्तरिक निष्ठा सहित आकाङ्क्षा जाग उठी थी सन् १९८२ के शेष भाग में । इन दोनों भाषाओं में सम्पूर्ण अनुवाद करने अक्टूबर १९८२ से लेकर जुलाई १९८३ तक अदम्य उत्साह और लगन के साथ मुझे बहुत श्रम करना पड़ा । उभय अनुवादों में अल्प कुछ स्थलों पर बाद में अति सामान्य परिवर्त्तन किया गया है ।

संस्कृत में अनुवाद करने की अभिलाषा मेरे मन में सुप्त रूप में थी । जनवरी १९९७ में बैंगलोर में आयोजित ‘दशम विश्व संस्कृत सम्मेलन’ में सक्रिय योगदान करने के उपरान्त मेरी आन्तरिक प्रवृत्ति ने ‘तपस्विनी’ का सम्पूर्ण संस्कृत अनुवाद करने मुझे विशेष उद्वेलित और उद्बुद्ध किया । फलस्वरूप १९९७ फरवरी-मार्च के अन्दर साग्रह परिश्रम पूर्वक मैंने संस्कृतानुवाद करने का परम आनन्द परितृप्ति के संग प्राप्त किया है । मेरे प्रत्येक अनुवाद में परमेश्वर की आशीर्वादात्मिका शक्ति प्रच्छन्न रूप से असीम प्रेरणादात्री बनी है ।

बरपाली में कवि गंगाधर-जयन्ती के शुभ अवसर पर ‘मेहेर ज्योति’ (अगस्त १९८३) पत्रिका में सम्पादक-मण्डली ने मेरे हिन्दी-अंग्रेजी-अनुवादों के बारे में स्वतन्त्र उल्लेखपूर्वक विज्ञापन दिया था । बाद में दोनों अनुवादों की कुछ पङ्क्तियाँ ‘सन् टाइम्स्’ (भुवनेश्वर), ‘सप्तर्षि’ (सम्बलपुर विश्वविद्यालय) और ‘झङ्कार’ (कटक) आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं । मेरे त्रिभाषी अनुवादों की अनेक पङ्क्तियाँ याजपुर की त्रैमासिक ‘बर्त्तिका’ के विषुव विशेषांक १९९९ में दीर्घ लेख के साथ प्रकाशित हुई हैं ।

तपस्विनी काव्य के मेरे अनुवादों के सारस्वत त्रिवेणी-प्रवाह में मैंने अपनी रुचि के अनुसार मुक्त छन्दोधारा के साथ व्यवहित तथा अव्यवहित मित्राक्षर में उपधा-मिलन का प्रयोग किया है । तीनों में अनुवाद-शैली प्राय एक जैसी है । उभय मित्राक्षर और अमित्राक्षर छन्द मेरे प्रिय हैं, फिर भी मित्राक्षर छन्द के प्रति मेरा विशेष आकर्षण रहा है । अतः तीनों अनुवादों में मित्राक्षर प्रयोग की दिशा में मैंने सारस्वत उद्यम किया है । काव्य के मूल भाव को पूर्णरूप से यथार्थ और अक्षुण्ण रखने का यथासम्भव प्रयास किया है, विशेषतः अपनी सरल ललित मौलिक शब्दावली के माध्यम से ।

समय ही सर्वशक्तिमान् है । सुयोग के अभाव के कारण अनुवाद कई दिनों तक पुस्तकाकार में अप्रकाशित रहा है । परम हर्ष का विषय है कि सम्बलपुर विश्वविद्यालय द्वारा हिन्दी अनुवाद का प्रकाशन हो रहा है । इस अभिनन्दनीय दिशा में गुणग्राही आद्य उद्योक्ता मान्यवर कुलपति प्रोफेसर डॉ. ध्रुवराज नाएक महोदय के प्रति मेरा अशेष आन्तरिक आभार व्यक्त करता हूँ । हार्दिक उत्साह प्रदान हेतु माननीय प्रोफेसर डॉ. मधुसूदन पति महोदय का विशेष आभारी हूँ । अनुवाद में कोई त्रुटि रह गई हो तो सहृदय काव्यामोदी पाठक-मण्डली का क्षमाप्रार्थी हूँ । कृपया सूचना देने का कष्ट करेंगे ।

तपस्विनी-अनुवाद की दिशा में मेरे पूज्य पिता-माता, गुरुजनों, बन्धुजनों तथा विविध पत्रिका-सम्पादकों की हार्दिक सदिच्छा और प्रेरणा के लिये मैं सविनय आभारी हूँ । उन सभी का स्नेह सदैव स्मरणीय रहेगा । लब्धप्रतिष्ठ साहित्यिक डॉ. केशवचन्द्र मेहेर महोदय ने मेरे इस हिन्दी-अनुवाद में बहुमूल्य ‘भूमिका’ लिखकर मुझे कृतार्थ किया है । इसलिये उनके प्रति आन्तरिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ ।

विनयावनत
हरेकृष्ण मेहेर


भवानीपाटना
दिनांक : २०-७-२०००
= = = = = = =

[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]
* * * * *

Sunday, August 7, 2011

Tapasvini Kavya Canto-8 (‘तपस्विनी’ काव्य अष्टम सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर)

TAPASVINI
(Original Oriya Mahakavya by :
Svabhava-Kavi Gangadhara Meher, 1862-1924)

Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher
= = = = = = = = = =


[Canto-8 has been taken from pages 147-162 of my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see : ‘ Tapasvini : Ek Parichaya ‘
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

= = = = = = = = = = = = = =
Tapasvini [Canto-8]
= = = = = = = = = = = = = =


तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

= = = = = = = = =
अष्टम सर्ग
= = = = = = = = =


यौवन जैसे बढ़ता जीवन में,
वसन्त वैसे बढ़कर ग्रीष्म बन गया वन में ।
युवा-बल जैसे होता प्रखर,
आतप वैसे हो चला प्रचण्डतर ।
किया उसने सुन्दरी मृगतृष्णा का सञ्चार,
सुख-विषय भोग तृष्णा जिस प्रकार ॥

त्याग शाल्मली-तरु-निवास
उड़ चला कार्पास,
कृपण का धन समयानुसार
उड़ता जैसे छोड़ गुप्त भण्डार ॥

पलाश-अंग में रहा नहीं पहले का रंग,
वैसे है क्षण-भंगुर संसार-प्रसंग ।
ताप से हुआ बहुतर
मल्ली का विकास,
फैलने लगा उधर
उसके अंग से अधिक सुवास ।
ताप से अटल रहता साधु-हृदय,
फैलता उसीसे शान्ति-यश अतिशय ॥

देखा मल्ली की ओर कुटज ने हर्षित-अन्तर,
साधु अवश्य रमता साधु-संग पाकर ।
विचार किया दोनों ने एक हृदय में :
‘महका करेंगे हम ग्रीष्म-समय में ।
वर्षा जब प्रदान करेगी जल
वसुन्धरा हो जायेगी शीतल ।
शान्ति लाभ करेंगे तभी
जीवजन्तु सभी ॥

कृपण नहीं कदम्ब और केतकी
करने सौरभ प्रदान,
करेंगे वे जगत की
तृप्ति का विधान ।
उन्हें सौंप लोक-रञ्जन का भार श्रम
तरु-दुनिया छोड़ चलेंगे हँसते-हँसते हम ॥’

उद्दण्ड पद्मिनी ने शीश उठा सानन्द-मन
कहा उन बातों का करके समर्थन :
‘तुम्हारे संग मैं रहूँगी,
काल-सागर की उत्तुंग तरंगों में कूद पड़ूँगी ॥’

मल्ली बोली : ‘अरी हाँ !
तू ऐसा कर सकेगी कहाँ ?
छोड़ेंगे नहीं तुझे पाकर
तेरे प्रियतम दिवाकर ॥’

बोली पद्मिनी : ‘ छाएगी जब घटा घनघोर
प्रियतम निहारेंगे नहीं मेरी ओर ।
विपत्ति में बिताकर कुछ दिवस
संसार-व्रत उद्यापन करूँगी बस ॥

मेरे प्रियतम
मेघ-पटल भेदने अक्षम ।
दुःख झेलते हैं ये
लोक-कल्याण के लिये ॥

प्रियतम का प्यार अनुराग भोग
कहाँ कर पाऊँगी अधिक दिन तक ?
नहीं मेरा सौभाग्य योग ।
करती रहूँगी अनुक्षण
उनके चरणों का स्मरण,
मुझे वरण कर ले जाएगा अन्तक ॥

इस जनम में कुछ दिन दुःख सहूँगी
तो अवश्य कर पाऊँगी
अगले जनम में दर्शन
प्रियतम का प्यारा वदन ॥’

यह वचन जब सीता के ज्ञान-श्रवण में पहुँचा,
मान उसे जीवन का आदर्श ऊँचा
बोलीं सती :
‘पद्मिनि ! तू साधवी है री !
तुझे अवश्य दीखती
सरणी पुण्यभरी ।
मेरे विचार में मैं तेरी भगिनी हूँ,
उसके ऊपर फिर भाग्य-भागिनी हूँ ॥

तेरी तरह पाया वन में पति का प्रणय,
भवन में सुख निर्मल अमृतमय ।
दिवस-नाथ सूरज हैं
तेरे प्रियतम स्वयम् ।
उनके वंशज हैं
पृथिवीनाथ मेरे प्रियतम ॥

कहती जो अपने भविष्य की अवस्था,
पहले से ही मुझे प्राप्त है वही पन्था ।
धन्य तेरा हृदय महान्,
तू सति ! धन्य धन्य है री !
कर ले प्रदान
मेरे जीवन में शुद्ध-मति तेरी ॥

लोकापवाद से दुःखित-मन
मेरे प्रियतम ने
मुझे त्याग दिया ।
बोल दिव्य-दर्शने !
पर-काल में स्वामी के दर्शन
भाग्य मेरा कर पाएगा क्या ?’

शीतल कमल-पंखुरियों के नीचे बस
घन-श्यामल-हृदय सरसी-जल में सरस
मध्याह्न चक्रवाक-दम्पति ने बिताया
और राजहंस ने संग ले अपनी जाया ॥

कारण्डव-कवल से बचकर झींगा
अम्बुज-वन में लम्बी छलांग लगा
छत्र-विशाल पत्र-वन में रास्ता भूल अपना
अन्त में बगुले का आहार बना ॥

उद्दण्ड अरविन्द-पंखुरियों के अन्दर
गिरी शफरी नीर में लम्फ दे रही ।
कुमुदिनी के बंकिम नाल पर
बैठने से पूर्व ही
फुदक रहा मण्डुक
डुण्डुभ के भय से दुकदुक ॥

आम्र-शाखा पर सविषाद बैठ कोयल
काक-नीड़ के पास
पत्रों में छुप विह्वल,
झेल सारी प्यास
पञ्चम स्वर में वहीं
श्रवणामृत बरसाती थी नहीं ।
छुप गयी थी जैसे
चाण्डाल के भय से ॥

अपनी पूँछ पसार
बुलबुल किसी प्रकार
पूँछ-छोर में रंगीन पर
नहीं नचा रही उधर ॥

पंख हिलाकर
देख अपना सोदर
वह थी क्रुद्ध नहीं होती,
पुकारती नहीं दे चुनौती ।
आहार ही उसे लड़वाता,
अन्यथा भ्राता किसका शत्रु बन जाता ?

पीन-अपघन
परिपूर्ण-उदर
बैठी थी वह प्रसन्न-मन
विशाल शाल-पादप-डाल पर ॥

बैठकर मधुक-जंगल में
मधुक फल काट भोजन-छल में
द्विज-स्वभाव से शुकगण
सूक्ष्म-पञ्जिकानुसार उसी समय
भावी वृष्टि-लक्षण
कर रहे थे निर्णय ॥

तमसा-तट पर वटवृक्ष-तल
गहन पत्र-छाया से था सुशीतल,
जहाँ कुटज-सुरभित कुटीर में अनायास
ग्रीष्म लेता शान्ति-चरणों में आश्वास ॥

वहाँ समासीन वाल्मीकि मुनिवर
खोल अपने ज्ञान-लोचन
दर्शन कर रहे पावन रामायण ।
कहीं कहीं तापसगण
रहे अध्ययन-तत्पर,
कहीं कोई वेद-गान में मगन ॥

गुरु गर्भ-भार से आलसी-काया
तापसी-समुदाय-परिवृत श्रीराम-जाया
घने कुञ्ज-वन में
बैठ पत्रासन
स्थिर नयन में
करतीं शान्ति सेवन ।
जैसे परिधि-मण्डित चन्द्र-मण्डली
पूर्णिमा की बिदाई पर अस्ताचल को चली ।
सती के पाण्डुर कपोल-परिसर के घर्म-पटल
शिशिर सदृश, हिम नेत्र-जल ॥

तापसियों के बीच रहकर श्रीराम-पत्नी
लंका-राक्षसी वृत्ति लाकर स्मृति में अपनी
कर रहीं भावना :
‘भाव तापसियों का कितना स्वर्गीय,
फिर राक्षसियों का भाव नारकीय
कुत्सित कितना ॥’

पवन-देव की दी बधाई,
जब मानस में आई
वीर पवन-कुमार की याद ।
सादर तालवृन्त व्यजन झल
देवी ने पाया सुशीतल
ऊर्मि का प्रसाद ॥

उसी समय समक्ष आ चिन्ता-सुन्दरी
बोली वाणी विनयभरी :
‘देवीजी ! कुछ लोग द्वार पधारे
प्यासे हैं दर्शन पाने तुम्हारे ।
यात्रा कर चुके राह बहुत लम्बी ।
धन्य वह दर्शन-कामना
प्रखर आतप से नहीं दबी ।
बन जाता हृदय अपना
अपार प्रीति का भण्डार
उनके कमनीय रूप निहार ॥’

बोलीं देवी : ‘सखी मेरी !
ले आओ उन्हें न कर देरी ।
भाग्य मेरा धन्य,
मुझ पर इतने आदर हैं अनन्य ।
अवश्य पाप-ताप मिटा देंगे मेरे नयन
पाकर उनके दर्शन ॥’

देवी की आज्ञा मान
पहले आकर
एक् ने मधुर मुस्कान
धीरे बिखराकर,
कई दिनों से परिचित बन्धु समान
कहा प्यारी बातों में अमृत सान ॥

‘देवीजी ! स्मृति में है क्या घटना पिछली ?
किया था पदार्पण
तुमने मेरे घर ।
पाई है मेरी काया ने उसी क्षण
तुम्हारी तनु-ज्योति से सुन्दर
यह स्वर्गीय प्रभा की सम्पदा उजली ॥

मेरे निर्झर उस प्रभा के व्याज
आनन्द-विभोर झर्झर बहते आज ।
प्रफुल्ल-वदन पुष्प-समुदाय हास्य निखार
नन्दन-कानन का करते तिरस्कार ॥

सरिता-सलिल महकाकर सदा सुगन्ध मन्द
तटवासियों के मन में जगाता आनन्द ।
तुम्हारे प्यार-पले मयूर सारे
उच्च स्वर नित्य गाते गुण तुम्हारे ॥

प्रतिक्षण वारिद आकर बारी-बारी से
अटल अभिलाषा रख तुम्हारे दर्शन की,
ढूँढते घूम-घूम दरी-दरी से
‘कहाँ है सुन्दरी जानकी ।’
पूछते मुझसे गंभीर स्वर में सभी,
‘नहीं है’ उत्तर से मानते नहीं कभी ।
ले उजाला बिजली का खोजते पुनर्वार
‘निश्चित है सीता सुन्दरी’ यही विचार ॥

देवीजी ! आज पहचाना क्या
इस हतभाग्य को तुमने ?
बहुत दिनों बाद आया
तुम्हारे सामने ।
तुम्हारी चरण-धूलि से सुन्दर
अपना मुकुट सजाकर
बन चुका हूँ भाग्यवान्
मैं चित्रकूट सानुमान् ॥’

तदुपरान्त पधारी एक शुभांगी रंगीली नयी
विमल-समुज्ज्वल-कान्तिमयी,
प्रखर-आतप-ताप-दर्पहारिणी,
वन-सुन्दरी की चिर-सहचारिणी ।
गिरिमल्लिका-माला से कण्ठ है सज्जित हुआ,
ललाट पर रमणीय शिरोमणि महुआ ।
जम्बु-नीलरत्न कर्णाभरण,
शुक्ति-पङ्क्ति जिसका कटि-भूषण ।
वनवासी मुनिजनों का अन्तःकरण मोहती,
सुन्दर कुटिल नील वेणी से सुहावनी लगती ॥

प्रफुल्ल प्रसन्न-वदन
उसने व्यक्त किया प्रत्यक्ष,
सुकुमार धीर मधुर वचन
सती के समक्ष :
‘अयि सुशीले !
कृतज्ञता मेरी स्वीकार ले सादर,
तेरे स्नेह-ऋण से ऋणी हूँ निरन्तर ।
ऋण कहाँ चुका पाऊंगी ? नहीं मेरी शक्ति,
मुझे कृतार्थ कर, सति !
आन्तरिक भक्ति मेरी ले ॥

दुनिया में मेरे जैसे हैं नहीं कितने ?
इतनी कृपा तेरी पाई है कहाँ किसने ?
पाकर तेरी शुभ दृष्टि पावनी,
मेरी बालुका है स्वर्ण-रेणु बनी ।
क्रीड़ा से रम गये जब दिव्य नयन तेरे
तूने हीरा-क्षेत्र बना दिया वक्षस्थल को मेरे । [१]
विद्यमान नगेन्द्र-नन्दिनी श्रीविष्णुपदी,
फिर भी तेरी प्रदत्त उपाधि से मैं हूँ ‘महानदी’ ॥’

आई निर्मल-कलेवरा गोदावरी
वदन में विषाद की छाया है भरी ।
अश्रु बहाकर व्याकुल-मन
पोँछ-पोँछ आँचल से सरोज-नयन,
समुज्ज्वल रंगों से रञ्जित कई
विचित्र चित्र अपने संग थी लाई ।
सती की अनुज्ञा लेकर शीघ्र ही
खोल स्तर-स्तर दिखाने लगी वही ॥

कहीं पुष्प-पुञ्ज झड़कर लतागण से
सड़ रहे मार्त्तण्ड की प्रचण्ड किरण से ।
शुष्क पत्र-शय्या पर पतित
कई वृक्ष हैं मलिन-वेश प्रभा-रहित ॥

एक टूटी शाखा किसकी
उस तरु का अंग छोड़ न सकी ।
तृणराशि की शरण चाहती चूम किसीका सिर,
किसीके पैर पकड़ फिर ॥

खग-पुरीषों से पूरित पत्र
शुक्ल कर रहे किसीका तन ।
ले ऊर्णनाभ-जाल रूप मलिन वस्त्र
आनन्द खो चुका कोई ढँक अपना आनन ॥

बक-विक्रम देख कई भेक बारबार
छलांग लगा झेल रहे क्लेश अपार ।
कुछ तो पाषाण-तल में छुपकर
चुपचाप बैठ भर रहे उदर ॥

कहीं वन्य महिष-दल अधीर
पंकिल कर रहे सरोवर का नीर ।
क्षिप्त हो रहे कर्दम से सने कुछ कमल
महिषों के पैरों से चञ्चल ॥

कहीं अजगर ले आहार-लालसा
नीर के पास पड़ा है काष्ठ-सा ।
उसके समीप मृगों का मार्ग निहार अनुकूल,
छुप-छुप अधर-प्रान्त लेहन करता शार्दूल ॥

फिर दृश्य हुआ प्रबल दावानल
धूमान्धकार से घिर वनस्थल ।
असंख्य-शाखावाली प्रचण्ड
अग्नि-शिखाएँ लिपटती
और खण्ड-खण्ड
गगन में जा रहीं मिलती ॥

ज्वलित पत्र सब अम्बर में उठकर
धूम-वाहन में चल रहे ।
दूर वृक्षों पर बैठ सुनाकर खबर
अतिशय ताप से जल रहे ॥

कुछ मुरझाये पत्र ऊर्ध्व मार्ग चल
अम्बर में हो रहे ओझल ।
पलायन-रत हैं विहंगम गगन में उड्डीन,
कुछ तो अग्नि-गर्भ में हो रहे विलीन ॥

मृग, महिष, मातंग,
शशक, शूकर,
भल्लुकों के संग
दल-दल शृगाल,
धूम-पुञ्ज से ग्रस्त होकर
अग्नि की ओर दृष्टि डाल
कान्दिशीक हैं समस्त
अत्यन्त विकल त्रस्त ॥

उधर अनेक वानर
भीत चकित-मन
छलांग लगा वृक्षों पर
कर रहे पलायन ॥

कुछ अपने शावकों को पीठ में रखकर,
कुछ अपने कक्ष में पकड़ जोर
दौड़ रहे धूम के भीतर
सरिता की ओर ।
सरिता के सैकत स्रोत से पुलिन पर्यन्त
भर गये हैं जन्तुकुल व्याकुल अत्यन्त ॥

बोली गोदावरी :
‘देखी तूने, वत्से जानकी !
तेरी बिदाई के बाद दशा दुःखभरी,
दण्डका-वन की ?’

बोलीं पर-दुःख-कातर सती :
‘हा हा ! दण्डका !
मेरे केलि-निधान !
लेकर जल मेरे नयन-युगल का
दैव तुरन्त करे तेरी शान्ति विधान,
तो मैं अपने को धन्य समझती ॥’

तदुपरान्त आ
मिलकर अयोध्या
सती के सामने
शोक-गद्गद दुःख-विकृत स्वन में,
कम्पित-अधर लज्जा-विनत वचन में
लगी राजलक्ष्मी का पत्र पाठ करने ॥

‘सखि ! मैं रजनी,
तू थी चाँदनी ।
मेरे प्रफुल्ल नयन-कुमुद मूँद
बिदाई तूने ले ली ।
तेरे बिना, अरी प्यारी !
और नहीं मेरे सुख की एक भी बूँद ।
बन गई है तेरी यह सहेली
जैसे आभरण-शून्या नारी ॥

आज राजभवन
बन गया है वन ।
तेरा विरह-दावानल उधर
सब नष्ट कर चुका समाकर भीतर ।
फिर बची है क्या
पूर्व सौन्दर्य-विलास-चर्या ?

जल चुके उल्लास-पल्लव-बहुल
विशाल साधु-हृदय-पादप-कुल ।
सुहास-सुरभित प्रसून समस्त
ओह ! अनायास वहाँ हो चुके विध्वस्त ॥

शान्ति-हरिणी-दल
साथ धीरज-गज सकल
विषाद-धूम से व्याकुल-जीवन
जाकर उदर में तितिक्षा-सरिता के
अपना अपना तन
आकण्ठ डुबा चुके ॥

खल-हृदय बलवान् श्वापद वहीं,
उस विपत्ति ने उन्हें भी छोड़ा नहीं ।
केवल श्रीरघुवर के
हृदय-सागर के
अथाह गर्भ में गहन,
वह बन गया है बड़वा-दहन ॥

जैसे राहु-कवलित कलेवर कलाकर का,
तेरे बिना बाकी है केवल आकार नरेश्वर का ।
मणिमय भवन में
छा गया है अन्धकार,
तारा-पूरित गगन में
अम्बुद जिस प्रकार ॥

बैठी हैं श्वश्रूगण विदीर्ण-हृदया
जैसे पुष्करिणी शुष्क-तोया ।
मणि जैसे सर्पिणी की प्राण-सम्पत्ति,
उससे अधिक तुझे वे मानतीं सम्प्रति ॥

बन्द हो चुके
द्वार प्रमद-वन के ।
किसकी दृष्टि में फिर आयेगी सुमन ?
पतित पुष्प-राशि को उधर
सुखा रहे मुस्तक समस्त उठकर
गन्ध-वणिक् बन ॥

शुष्क हो रहे लता-वृक्ष-निकर
तेरी स्मृति में दुःख-विह्वल मन ।
संगमर्मर-निर्मित मनोरम मार्ग पर
शुष्क पत्रों ने बनाये हैं आसन ॥

प्रभु की बात मान सभी देवर
विनत-शीश हैं विषादित-अन्तर ।
उरग जैसे मन्त्र से हीन-बल
या निशित अंकुश से शंकित दन्तावल ॥

भगिनियों के कपोल-परिसर
निर्भर कर रहे कर-सरोज पर ।
दिनों दिन तन उनके हो रहे कृश
कृष्णपक्ष के ऋक्षपति सदृश ॥

मृदंग-मुख छुए बिना संगीत-संगिनियाँ
बैठी हैं अपने आप गूंगी वहाँ ।
जी रही हैं व्यथा ले गहरी
बासी सुमन-सी दासियाँ तेरी ॥’

पत्र-पाठ -समाप्ति के पूर्व ही अयोध्या
बैठ गयी मलिन-रूपसी अधैर्या ।
दशा उसकी देखते ही
करुणामयी वैदेही
विवश हो गयीं अपने आप
पाकर अत्यन्त क्षोभ सन्ताप ॥

आ गया दिवस का अवसान अभी,
अपने निवास लौट चले अतिथि सभी ।
तापसियाँ सती को सप्रेम संग लेकर
हो गयीं अपने अपने कार्यों में तत्पर ॥

* * * * *

[पादटीका :
(१) सम्बलपुर के पास महानदी-गर्भ में ‘हीराकुद’ नाम का एक क्षुद्र द्वीप है । यहाँ हीरा मिलनेकी जनश्रुति है ।
= = = =


(तपस्विनी काव्य का अष्टम सर्ग समाप्त)
= = = = = = = =

[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]
* * * * *

Saturday, August 6, 2011

Tapasvini Kavya Preface (‘तपस्विनी’ काव्य मुखबन्ध/ हरेकृष्ण मेहेर)

TAPASVINI
Original Oriya Mahakavya by :
Svabhava-Kavi Gangadhara Meher (1862-1924)
Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher
= = = = = = = = = =


[Preface has been taken from page-28 of my Hindi ‘ Tapasvini ‘ Book
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see : ‘ Tapasvini : Ek Parichaya ‘
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

= = = = = = = = = = = = = =
Tapasvini [Preface]
= = = = = = = = = = = = = =



‘तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर


= = = = = = = =
मुखबन्ध
(मूल ओड़िआ का हिन्दी रूपान्तर)
= = = = = = = =


पितृ-सत्य की रक्षा के लिये वनवासी होने से श्रीराम का, और स्वामी की अनुगामिनी होने से सीता का, जो माहात्म्य व्यक्त हुआ था, सीता के निर्वासन से वह सौरभमय हो गया । निर्वासन-कष्ट सहने से सीता की पतिभक्ति जिस तरह तेजोमयी हो गयी, उनकी स्वर्णमयी प्रतिमा की स्थापना पूर्वक अश्वमेध यज्ञानुष्ठान करने से श्रीराम का पत्नी-प्रेम उसी तरह दीप्तिमान् हो उठा । उपयुक्त पति की उपयुक्त पत्नी । मिथ्या अपवाद के कारण सीता स्वामी द्वारा परित्यक्ता हुई थीं; फिर भी स्वामी के हार्दिक प्रेम को यथार्थरूप से समझ सकी थीं । निर्वासन को अपना भाग्य-दोष मानकर उन्होंने पतिभक्ति को कैसे दृढ़तर और उच्चतर किया था, वनवास को पति की कल्याणसाधिनी तपस्या में परिणत कर तपस्विनी के रूप में कैसे दिन अतिवाहित किये थे, उसी विषय को प्रकट करना इसी पुस्तक का प्रधान उद्देश्य है ।

सीता ने जिस प्रकार स्वामी की करुणा प्राप्त करने की आशा त्याग दी थी, मैंने उसी प्रकार उनके ऊँचे चरित्र को प्रकट करने में सफल होने की आशा छोड़ दी है । तब श्रीराम ने तपस्विनी सीता के स्थान पर हृदय की चाँदनी को मनोहारिणी मूर्त्ति बनाकर यज्ञ संपन्न किया था । विद्वान् पाठकगण, इसमें मेरे कृतित्व को लक्ष्य न करते हुए अपने अपने हृदय में स्थित सीता के उज्ज्वल, निर्मल और पवित्र चरित्र से चित्रित स्मृतिपट का एक एक बार उद्घाटन करके नारी-हृदय की उन्नति विधान करेंगे, केवल इतनी ही आशा है ।

उपसंहार में वक्तव्य यह है कि मेरे प्रिय सुहृद् श्रीयुत ब्रजमोहन पण्डा ने इस पुस्तक के प्रणयन के लिये मुझे जो ओजस्वी उत्साह प्रदान किया है, वह सर्वथा अतुलनीय है । मैं इसलिये उनके प्रति गभीर कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ । इति ।

विनीत
श्रीगंगाधर मेहेर

पद्मपुर / दिनांक : ५-१०-१९१४


= = = = =





[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]
* * * * *



Thursday, August 4, 2011

Tapasvini-Kavya Canto-1 (‘तपस्विनी’ काव्य प्रथम सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर)

TAPASVINI
Original Oriya Mahakavya by :
Svabhava-Kavi Gangadhara Meher (1862-1924)

Complete Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher


* * *
[Canto-1 has been taken from pages 29-46 of my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition 2000.]
For Introduction, please see : ‘ Tapasvini : Ek Parichaya'
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

= = = = = = = = = = = = = =
Tapasvini [Canto-1]
= = = = = = = = = = = = = =


‘तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर


= = = = = = = = = = = = = =
प्रथम सर्ग
= = = = = = = = = = = = = =


कौन तू ज्योतिर्मयी ?
वेश तेरा पावन समुज्ज्वल,
इन्द्रनीलमणि-कान्ति-जयी
सुन्दर हैं तेरे कुन्तल ॥

तेरा शुभ्र सूक्ष्म परिधान
भेदकर निकली,
हृदय में कर रही आह्लाद प्रदान
कान्ति कलेवर की उजली ॥

तू चाँदनी घनी होकर
क्या बन गयी है शरीराकार ?
लेट रहा तेरे पैरों पर
केशों के व्याज अन्धकार ॥

समुज्ज्वल मञ्जुल सुविरल
तारा ग्रह सकल
रत्न अलङ्कार बन
कर रहे हैं तेरा कलेवर मण्डन ॥

अनगिन सुमन हार धवल
भा रहे तेरे गले में उज्ज्वल ।
अद्भुत कौशल से ये
सब हैं पिरोये गये ॥

शुभांग-सौरभ से मोहित
हो रही धरती ।
आ रही उसके सहित
प्राणों में प्रफुल्लता उभरती ॥

हाथ में क्या लेकर सही
है तू डाल रही ?
लोग उसे पीकर ज्योतिष्मान्
बन रहे हैं देवता समान ॥

क्या मन्त्रदीक्षा दे रही तू फिर से
चुन-चुन कर लोगों में से ?
वे रच रहे हैं प्रकाश
करके अन्धकार का विनाश ॥

तेरे चरण-चिह्न पर विमल
खिल रहे हैं शुभ्र कमल ।
लगता सार्थक नहीं इसी कारण
तेरे लिये ‘चाँदनी’ नाम उच्चारण ॥

दारिद्र्‌य-पंक से भरा
जीवन-सरोवर मेरा ।
लेकर जंजाल-जलद-सलिल
उदर हो गया है आविल ॥

शरत् समान तेरे दर्शन पाकर
हो रहा स्वयं प्रसन्न-अन्तर ।
खिल रहा इस पल
अपना हृदय-उत्पल ।
देवि ! सच क्या
तेरा चरण-सम्बल उसने प्राप्त किया ?

तेरे चरण स्पर्श करके
प्राण मेरे मोहित हो चुके ।
जैसी तेरी इच्छा,
कर ले जो लगे अच्छा ॥

वाल्मीकि-आश्रम की ओर मन है दौड़ चला
करने निर्वासिता सीता के दर्शन ।
जीर्ण हृदय उन्होंने सीं लिया कैसे भला ?
किसके साथ कैसे बिताया जीवन ?

अयि कृपावति !
कृपया तू दे शक्ति ।
पवित्र हो जाये मेरा मन देखकर
और हाथ लिखकर ॥

वन के भीतर थी
बह रही भागीरथी,
पश्चिम तट पर
उछाल ऊँची लहर । (१)
वन-दृश्य देखने अग्रसर वही
विकल जीवन में मानो पग थी बढ़ा रही ॥

उसी तट पर ही
खड़ी होकर वैदेही
निहार रही थीं पूरब की ओर,
छा गया था मन में दुःख घोर ॥

उनके नयनों से आँसू उछल
वक्ष पर गिर रहे थे अनर्गल,
जैसे उमड़ पश्चिम दिशा में बादल
प्रबल वृष्टि से प्लावित करते अस्ताचल को ।
जैसे गजराज के सूँड से निकल
सरसी के उर पर गिर अविरल
बिन्दु बिन्दु जल
भिगा देते सायंकालीन कमल को ॥

‘हा नाथ !’ उच्चार व्याकुल कोमल-अन्तर
देवी सीता विवश मुह्यमान
धीरे बैठते-बैठते धरा पर
गिर पड़ीं उत्तान ।
चेतना अपनी खोई,
थामने पास न था कोई ॥

जिनके चरणों में सेवा-निरत
थीं सेविकायें शत-शत,
दारुण विपत्ति उनकी
कोई भी देख न सकी ॥

अहो ! नियति की रीति यह भयंकर,
देखने से हृदय में किसके आयेगा नहीं डर ?
कानन ऐसा देखकर
रो पड़ा विहग-मुख में अधीर ।
निश्वास-रूप प्रखर
बहने लगा समीर ॥

सरसराहट ध्वनि प्रश्वास बनकर
हुई श्रुतिगोचर ।
कारुण्य कल्लोल समान
पल्लव हो गये कम्पमान ॥

इधर-उधर देख चकित नयन
सारे मृग रह गये व्याकुल-मन ।
माता की रुलाई निहार
उसका अर्थ न जान,
व्यस्त हो जाती जिस प्रकार
उसकी सन्तान ॥

नियति के विरुद्ध
छेड़ने युद्ध
प्रबल गरज उठा ले तलवार
ताल तरु हाथ में अपने ।
मानो निकाला उसने
पत्र का तीर,
हिलाकर बारबार
बया-नीड़ का तूणीर ॥

काँपती सरिता की ऊर्मियों से उभर
पुलिन पर
पड़े सीकर
तरंग-चोटियाँ त्याग कर ।
निकाल तरंग-तोप
सीसक-गोलियाँ भर
मानो प्रहार किया सकोप
भागीरथी ने नियति के ऊपर ॥

सरोवर के अन्दर
विचलित अरविन्दों ने छेड़ा रण,
कमल-व्यूह रचकर
प्रहार भ्रमर-मार्गण ॥

बनफूल वृन्त छोड़कर
धरती पर गिर धूलि-धूसर,
हुए तत्पर
मल्ल-युद्ध में परस्पर ।
ऊर्णनाभ-तन्तु-रूप नियति-बन्धन तोड़
लता उछल पड़ी क्रोध से दिखला होड़ ॥

भग्न-हृदय शीर्ण-काय वारिधर
दौड़ आया सक्रोध अपना दलबल लेकर ।
आँखें तरेर करके गम्भीर गर्जना
दिखला दी नियति को तर्जना ॥

सती के आनन पर सुशीतल
बिन्दु-बिन्दु जल
सींच-सींच कर अपना
उनके जीवन में लाया चेतना ॥

साध्वी कुल-वधू की दुर्दशा करके दर्शन
दिवाकर ने लज्जावश छुपा लिया लपन ।
सारी दिशा-वधुओं ने उदास-मुख बैठकर
मन्द्र स्तनित-क्रन्दन से हिला दिया अम्बर ॥

कुछ समय के अनन्तर
चेतना-प्राप्त महादेवी कातर
अतिशय निराश-मति
निहारने लगीं दश दिशाओं प्रति ॥

सारी दिशायें उसी समय
दृश्य हुईं श्रीरामचन्द्रमय ।
बैठे हैं उदास-अन्तर
प्रभु रघुवीर ।
कृताञ्जलि खड़े हैं उधर
समक्ष लक्ष्मण सुधीर ॥

दोनों के नयन हैं बने
अश्रुओं के झरने ।
पूछ पाते नहीं रघुनन्दन
देवी सीता की खबर,
व्यक्त होता नहीं वचन
लक्ष्मण के मुख से बाहर ॥

लगीं सूरज की ओर देखने;
सूरज की गोद में रघुनन्दन
हाथ रख माथे पर अपने
बैठे हैं विनत-वदन ॥

दृष्टि गयी भागीरथी की ओर तदनन्तर,
देखा, भगीरथ के पीछे चले हैं रघुवर ।
गंगाप्रवाह-सा
राम-नयनों का नीर ।
कभी उसमें वे डूब जाते सहसा,
कभी बह जाते अधीर ॥

वहीं से आँखें मोड़कर
देखा सती ने अपना उदर ।
तब स्वयं ही निरर्गल
बरसाने लगीं अश्रु-जल ॥

संकुचित हो गयीं जानकी
निहार दूर्वाएँ श्याम-वर्ण की ।
चलने शिला की ओर लगा मन अपना,
परन्तु करके कुछ भावना
उधर भी न चलीं श्रीराम-नायिका,
रोक न सकीं आवेग रुलाई का ॥

करुण आर्त्त स्वन में
दग्ध वदन में
विलाप-विह्वल सती ने उस पल
स्तब्ध कर दिया बनस्थल ॥

दुःखिनी का था स्वर :
“ हा हा प्राणेश्वर !
करुणा-रत्नाकर !
स्नेह-जलधर !
किस कुलग्न में किया था आपने
इस अभागिन का पाणिग्रहण ?
आप दारुण दुःख-भवन बने
उसीके ही कारण ॥

प्रभु की अपार महिमा न जान
एक धनुष रखा था
मैंने गरिमा से घिर सर्वथा ।
तोड़ उसे इक्षुदण्ड समान
आपने मुझे थी मान ली
उसकी मधुरिमा रसीली ॥

वन-भ्रमण में वीर-शेखर !
मुझे चरण-शृंखला न समझकर
स्नेह से आपने
साथ लिया अपने ।
चरण-शृंखला को हार
हृदय का बनाकर
आपने किया विहार
पुनीत तीर्थों पावन आश्रमों पर ॥

मुझ पर स्नेह कितने
वन में थे बरसाये ।
कैसे भूल सकूंगी उन्हें
जीवन में हैं गहरे समाये ॥

तुच्छ यह दासी
क्षुधा से जायेगी तरस,
वन में करके भावना ऐसी
फलमूल लाते थे आप निरलस ॥

पल्लव-शय्या
होगी नहीं निद्रा-योग्या,
उसके लिये यही विचार
अंक-पलंक में करते थे झुला तैयार ॥

तुच्छ-सी मेरे
स्नेह-बन्धन में घेरे
आपने लाँघ महासागर
छेड़ा लंकापति से भयंकर समर ॥

सह लिये उसमें कई महास्त्रों के प्रहार,
समझते थे उन क्षतों को हृदय का हार ।
पदक में उस हार के
योग्या विचार करके
मुझे रखते थे मनोहर
मध्य-मणि बनाकर ॥

देख जब क्षत-चिह्न सकल
होता था मेरा मन विकल,
आप वाणी में अमृत सान
सदा करते थे मुझे सन्तोष प्रदान ॥

कहा था आपने :
‘इस घोर समर-यज्ञ में
अर्पण कर लहु की आहुति हमने
तुम्हीं दुर्लभ विभूति को पाया है, प्रियतमे !’

आज तक तीर-चोटों के चिह्न हैं मिटे नहीं,
हाय ! बिछड़ गयी आपसे अभागिन मैं यहीं ।
कृपया मिटा दें
हृदय-फलक से मेरी यादें,
आती रहेगी अन्यथा
पल-पल मनोव्यथा ॥

मैं तुच्छ क्या हूँ ?
आपके प्रजा-जनों में खुशी भर आये ।
मैं मर जाऊँ,
कलंक आपका मिट जाये ॥

इसीसे निकलेगी जो कीर्त्ति अक्षया,
उसीकी अटूट मूर्त्ति बनाकर
आप रख लें कृपया
अपने हृदय के भीतर ॥

आपके वंश-जनक ये अंशुमान्,
करने संसार को कल्याण प्रदान
स्वयं मुक्त-कर
हैं निरन्तर ॥

धरित्री की धात्री-रूपिणी ये भागीरथी
आपके कुल की विश्रुत कीर्त्ति शाश्वती ।
कीर्त्ति की तो रक्षा करने
मुझे त्याग दिया आपने ।
महाभाग ! यह आप ही का
अनुरूप है कर्म ।
रहेगा इस कीर्त्ति-केतन में चित्र पापिनी का,
परन्तु है यह विचित्र विषम ॥

धिक् मेरा जीवन,
नाथ ! केवल मेरे लिए
बने अपयश के भाजन
आप निष्कलंक होते हुए ॥

त्याग आपके चरण
किसकी शरण
ले लूंगी मैं ?
जब मेरा तन
जला नहीं सकता ज्वलन,
किससे जलाऊंगी मैं ? (२)

अपना ली है इन सारी
दूर्वाओं ने आपकी आभा प्यारी ।
इन्हें छोड़ वन में दूसरा
लूंगी मैं किसका आसरा ?

आपकी अनुकम्पा शिला पर
दरशाती असर । (३)
भला मुझे लेकर किसलिये
दण्डित होंगी ये ?

आपने जो भण्डार रत्न का
मेरे गर्भ में है स्थापित किया,
उपाय उसके रक्षण का
क्या है, नहीं बताया ॥

हृदय में गहरी
आशा पली थी मेरी,
सौंप यही अमूल्य रतन
करती मैं आपका अंक मण्डन ॥

परन्तु परिणाम उस आश का
बन गया प्रसून आकाश का ।
धन्य रे दैव ! नमस्कार
तुझे सहस्र बार ॥

पिता हैं महाराज
संसार में विशाल कीर्त्तिमान् ।
अरे दैव ! उनके कुमार की आज
करेगा तू कैसी दशा विधान ?

पर्वत के अंग पर
होता वज्राघात प्रखर ।
उसी संग गिरिवासी का संहार
है कैसा हाहाकार ?

धन्य नाथ ! मुख आपका
निष्यन्द है अमृत का ।
हृदय-पर्वत है अपार
अमृत-हिमशिलाओं का भण्डार ॥

यदि कभी जलता
वही हृदय दुःख से,
फिर भी अन्य कुछ नहीं निकलता
अमृत-अतिरिक्त मुख से ॥

समाचार मेरे अपवाद का हठात्
हुआ आपका श्रवण-गोचर,
अवश्य आया होगा दारुण व्यथाघात
आपके हृदय के भीतर ॥

परन्तु बोले नहीं, प्राणेश्वर !
आप एक पद भी कठोर बात ।
मधुमयी आशा देकर
मुझे त्याग दिया अकस्मात् ॥

मेरा अर्जित पाप ही
मेरे दुःख का कारण सही ।
उस पाप का स्मरण
मुझे हो रहा है इसी क्षण ॥

मेरे स्वामी महिमा-पारावार,
परन्तु उन्हें इतर मान
‘रक्षा करो लक्ष्मण’ पुकार
उनकी समझ बैठी मैं अज्ञान ॥

निम्न मन में अपने
लक्ष्मण को नीच विचार कर
बाध्यतापूर्वक प्रेषित किया मैंने
आपके समीप सत्वर ॥

उस पाप के कारण तत्काल
बढ़ाने उन प्रभु की महिमा विशाल,
हुआ चिरन्तन
इस पापिनी का निर्वासन ॥

दिया था जो तिरस्कार
निर्दोष लक्ष्मण के प्रति,
उसका समुचित पुरस्कार
मैंने प्राप्त किया संप्रति ॥

मुझसे उन्हें दूर हटाने
अत्यन्त व्यग्र होकर मैंने
उनके हृदय पर बारबार
किया था वचन-वज्र का प्रहार ॥

भक्ति-परायण लक्ष्मण
प्रणिपात कर मेरे चरणों तले
विनय-वचन कहकर तत्‌क्षण
मुझे दूर त्याग चले ॥

एक छिन्न मस्तक लाकर दशमुख ने
दिखलाया मेरे पापी नयनों के सामने ।
समझ उसे स्वामी का सिर
व्याकुल-प्राणा मैं सत्वर
रो पड़ी अधीर,
अश्रु-धारा में बहकर ॥

वही शीश देखकर भी
मेरा मरण न आया तुरन्त ही ।
उसी पाप से हूँ अभी
मैं जीते-जी जल रही ॥

आपके चरणों का सेवा-सुख
समझकर हल्का,
आश्रम-दर्शन का सुख
चाहा मैंने दो पल का ।
मुझे आपसे बिछड़ाकर सही
कह रहा पाप वही,
‘पापिनि ! अब कर वैसी
तेरी इच्छा जैसी ॥’

अयोध्या-राजलक्ष्मी के प्रेम-बन्धन में न आये
आपने संग मेरे कई दिन बिताये ।
थी मौका ढूँढ रही
राजलक्ष्मी ईर्ष्या से जल,
बहुत दिनों तक वही
न सकी और सम्हल ॥

उसके दुःख के साथी बन
थे जो नगरवासी प्रजाजन
उन्हें करा दिया स्मरण
मेरे निर्वासन के लिये उसी क्षण ॥

अयोध्या में विराजती
सपत्नी-शक्ति गरीयसी ।
उसे दमन कर नहीं सकती
पति-शक्ति महीयसी ॥

जब हुआ सफल
पराक्रम कैकेयीजी का,
उस देश में आ गया प्रबल
बल राजलक्ष्मी का ॥

‘प्रजा-रञ्जन की यदि हो आवश्यकता
प्राण-सी सीता को भी मैं त्याग सकता ।’
अष्टावक्र मुनि के समक्ष
कहा था आपने प्रत्यक्ष ।
उन वचनों का आप करते होंगे स्मरण
शिथिल होने न देकर अपना प्रण ॥

पितृ-वचन पालन में आप विमुख नहीं,
पति-वचन पालन में यदि मेरा दुःख नहीं,
तब ही बन सकूँगी मैं भवदीया
पत्नी-पदवी की योग्या ।
मन मेरा निश्चय
समझ लेगा यही विषय ॥

प्रजा-रञ्जन में व्रती आप अग्रणी,
मैं आपकी सहधर्मिणी ।
आपके चरण-चिह्न पर
गति मेरी है निरन्तर ॥

प्रजा-मन में सन्तोष जगाये
मेरा यह निर्वासन ।
सम्पूर्ण निर्दोष बन जाये
प्रभु का व्रत पावन ॥”

सती के रोदन से स्तम्भित
हो गयी पवन की गति ।
जल-स्थल के सहित
कातर हो उठी प्रकृति ॥

वेग रुक गया गंगा-तरंगों का,
वन में बन्द हो गया कलरव विहंगों का ।
एक भी पल्लव वृक्षों का
न हिला वहीं ।
लीलामयी लताओं का
तन भी डोला नहीं ॥

डाल-डाल पर आसीन विहंगमगण
करने लगे लय श्रवण में सकल,
प्राणों में भर प्रतिक्षण
सन्ताप का प्रवाह प्रबल ॥

मृग-शावक माता के स्तन पर मुख डाल
स्थिर रहा क्षीर न चूस तत्काल ।
मृग-मृगीगण स्थिर निरख
मुख के कुश-ग्रास मुख में ही रख,
रह गये ग्रीवा भंग कर
शोक-ध्वनि में निमग्न-अन्तर ॥

मयूर-मयूरियों ने
साथ ले अपने छौने
चित्रित-तुल्य रहकर
चपलता त्याग दी सत्वर ॥

शावकों के संग हस्ती हस्तिनी सकल
काष्ठ-गज समान,
रह गये राह पर निश्चल
भूल गंगा की ओर प्रस्थान ॥ *
= = = = = = =


[पाद-टीका :
(१) वाल्मीकि-आश्रम गढ़वाल के पास गंगा दक्षिण-वाहिनी । वहींसे अयोध्या पूर्वदिशा में अवस्थित ।
(२) लंका की अग्निपरीक्षा में सीता दग्‌ध नहीं हुई थी ।
(३) श्रीराम के पावन पदरज-स्पर्श से पाषाणी अहल्या दिव्य नारी बनी थीं ।]
= = = = = = =


(तपस्विनी काव्य का प्रथम सर्ग समाप्त)
= = = = = =


[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]
* * * * *

Wednesday, August 3, 2011

Tapasvini Kavya Canto-5 (‘तपस्विनी’ काव्य पञ्चम सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर)

TAPASVINI
Original Oriya Mahakavya by :
Svabhava-Kavi Gangadhara Meher (1862-1924)

Complete Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher
= = = = = = = = = =


[Canto-5 has been taken from pages 90-100 of my Hindi 'Tapasvini' Book

Published by Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition 2000]
For Introduction, please see : ' Tapasvini : Ek Parichaya '
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

= = = = = = = = = = = = = = =
Tapasvini [Canto-5]
= = = = = = = = = = = = = = =

‘तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर


= = = = = =
पञ्चम सर्ग
= = = = = =


राजोद्यान-सुषमा पारावार-तरंग
शीश पर धारण कर प्रसून -फेन-सम्भार ।
चरण-पुलिन में जिन सती-रतन के,
नख-मोती-ज्योति-सेवन से थी समुज्ज्वल,
उनका मंगल आगमन निहार
हर्षोल्लसित हो उठे संग संग
मुनि-उपवन के
पादप व्रतती कुसुम सकल ॥ (१)

एक तो मधुमय समय कुसुमाकर ;
फिर बालारुण की किरण सुनहरी,
हिम-सिक्त पल्लवों में प्रसारित हो सुन्दर
कर रही लीला रंगभरी ।
शिशिर-बूँदों में बिखरी
दिखला विचित्र कारीगरी
रच रही अगणित हीरे नीलम
मोती माणिक्य मनोरम ॥ (२)

सूर्य-प्रभ मणिराशि-विभूषित दशानन के
दशमुखों का ज्योति-गर्व था हर लिया
सतीकुल-रत्न के
जिन पावन चरणों ने,
मुनि-उद्यान में पधार आज उन्हों ने
मानो वही सारा मणि-गर्व बिखरा दिया ॥ (३)

सती का हृदय
श्यामल राममय ।
उसे हर ले तरु सकल
क्रम से बन गये घन-श्यामल ।
सती-मन की शरण पति केवल;
उनकी अंग-प्रभाओं ने आकर्षित होकर
सुमनों में क्रम से चल
बनाया अपना अपना घर ॥ (४)

भ्रमर ने ले ली केशों की चमक,
शरीर की आभा-सम्पदा ले गया चम्पक ।
लालिमा अधर-युगल की
जबा-पुष्प के पास चली
और गयीं सभी बाकी
जिसमे जिसकी थी रुचि भली ।
सब कान्तिमय उज्ज्वल
बन गये उस पल ।
मानो स्वर्गलक्ष्मी ने धरा पर पधार
बनाया उस उद्यान को अपना लीलागार ॥ (५)

सती की कान्ति
थी सुधा की भाँति ।
फूलों में आ बसा
मधु अमृत-सा ।
मृदुता मञ्जुता दोनों ने चल उसी प्रकार
फूलों के अंगों में किया स्थायी विहार ।
नीरस जीवन में
प्रभा-रहित तन में
हो गयीं काननवासिनी
तपस्विनी बन सती जनक-नन्दिनी ॥ (६)

करने सती का सत्कार विधान
रातभर सुन्दर चन्द्रातप तान
हेम-सुमनों के लम्बन
बनाये थे ऊर्णनाभों ने सुशोभन ।
कनक-गोलक रूप पक्व नागरंग
शत-शत डोल रहे थे उनके संग ॥ (७)

पङ्क्तियों में पत्र-पताका पकड़ी
रम्भा-सुन्दरी थी खड़ी ।
सुन्दर मुचुकुन्द, कुन्द,
साथ माधवी, नियाली, वकुल,
ये सभी वल्लरीवृन्द
निहार रही थीं ले पुष्पपुञ्ज मञ्जुल ।
समीप थी नवीना रजनीगन्धा,
सुमनों से था शोभित जूड़ा बँधा ॥ (८)

जब पहुँचीं उनके समीप जाकर
सखियों के संग जनक-तनूजा,
मृदुल बयार से पुलकित काया
किसीने चूम लिया सती का सिर
उस पर सुमन-माला सजाकर ।
किसीने हाथ मिलाया,
किसीने आलिंगन किया फिर
किसीने की चरणों की पूजा ॥ (९)

सुन्दर लोहित पैर लेहन करने
जिह्वा लम्बी कर दी पारिजात ने ।
मोती-द्युतिमय नख
चूमने की कामना रख
रहा अपना बदन खोल अनार ।
करुणा-ऋण पाने की आशा लेकर
चीनीचम्पा बन गयी हरिद्वर्णा उधर
राम-रूप के अनुसार ॥ (१०)

इन्दुकला-सम कोमल सुहावने
बाल-पादप सब स्थान-स्थान पर
उठाकर मस्तक अपने
झाँक रहे थे बाड़े के ऊपर
सती की ओर प्यासी आँखों में ।
नहीं उठ पाये जिनके मस्तक,
दर्शन करने एक झलक
वे बाड़े के भीतर ही
हो उठे अत्यन्त आग्रही
रन्ध्र की राहों में ॥ (११)

वृक्षों के बाड़े पर बैठी हुईं
चाञ्ची और फूलचुईं
सती की ओर थीं निहार रही,
कभी कभी गुञ्जार रही ।
पूँछ रही सानन्द हिल;
भावना रही, सती जब डालेंगी सलिल
सब आलबाल में बैठकर
नीर पान करेंगी निडर ॥ (१२)

ऊर्णनाभ कभी सती के पाँव गिर
पादप के ऊपर उठ रहा फिर ।
तरु से तरु पर लगा चञ्चल छलांग
कर रहा अपना सर्वांग
कारु-कौशल प्रदर्शन ।
उसका सूक्ष्म सूत्र-पुञ्ज शोभन,
कई रंगों से रंग रहे दिनकर
चित्रकर बनकर ॥ (१३)

स्वभाव से श्यामल-पत्रपूर्ण तरु सकल ;
तरु-शिखासीन कहीं चञ्चल
चञ्चू-मार्जन से समुज्ज्वल लगतीं
मरकत-कान्तिमय ठिण्ठिणी-पङ्क्तियाँ,
श्याम सागर की ऊर्मियों में लेटतीं
जैसे अंशुमान् की रश्मियाँ ॥ (१४)

प्रीति-प्रभामय
श्रीरामचन्द्र का हृदय
अस्थिर होकर राजसिंहासन में
मानो दौड़ आया है उपवन में
मिटाने सती की अन्तर्वेदना ।
नयन-रञ्जिनी मञ्जुल ज्योति वही
स्वाती-सलिल की भाँति कर रही
सती-हृदय में प्रेम-मोती की सर्जना ॥ (१५)

कहीं पर पनस-वन गहन,
कहीं अम्बर-चुम्बी आम्रवन ।
आम्रवन के तलप्रान्त में नभ था दृश्यमान
प्राकृतिक झील-सलिल के समान ।
तरु-शाखाएँ शत-शत
थीं प्रतीत हो रही,
जैसे सबने एकमत
निर्माण किया है कानन वही ॥ (१६)

शान्ति-सरोवर के तट निर्जन
मानो आश्रय लिया है तापस-समुदाय ने ।
गुरु विघ्नभार बहन कर
अपने सिर पर
मौन निश्चल गंभीर भाव सहित,
मानो कर रहे थे अवलोकन
सती सीता पर पतित
शीतांशु-खरांशु-रश्मियों का सन्ताप शान्त करने ॥ (१७)

प्रियंगु-संगत रम्य इंगुदी-कानन
कहीं बना चुके श्यामल भवन ।
रही वहाँ सरस स्वर-मधु वितर
श्यामा नववधू बनकर ।
इन्द्रनीलों से भव्य निलय बना
शचीदेवी इन्द्रादेश के अनुसार
मानो अर्पण करने नीराजना
सती को बुला रहीं वहीं पधार ॥ (१८)


चिक्कण उज्ज्वल नील पर्ण शोभन
अत्यन्त श्यामल पुन्नाग-वन
उड़िशा से उड़ गया था क्या ?
और सती का मन रंग दिया ।
नीलाचल-रूप धारण कर
मानो वह था स्वयम्
श्रीरामचन्द्र मनोरम,
प्राप्त करने सीता के प्रेम-सिन्धु की लहर ॥ (१९)

उद्यान में सती ने एक बार
सखियों के साथ किया विहार ।
आर्यावर्त्त-उर पर क्या भागीरथी
सखियों के संग अग्रसर थी ?
मार्ग भाने लगा सुन्दर
गन्धर्वबाला-विलसित चैत्ररथ का उपहास कर ॥ (२०)

तदुपरान्त ले तमसा-सलिल
आलबालों में भर दिया सबने मिल ।
जैसे नन्दन-वन में डालतीं
नीर मन्दाकिनी का
स्वर्ग-सुन्दरी कन्याएँ ;
जैसे प्लावित करतीं
उर मेदिनी का
सिन्धु-जल लेकर घटाएँ ॥ (२१)

कटि-तट आँचल कस
वे चल रहीं स्फूर्त्त निरलस ।
रूक्ष-कुन्तल मस्तक पर अपने
रखे थे कलस सुहावने ।
स्वेद-सरस था ललाट-परिसर,
पोंछ रही थीं हस्त उठाकर ।
बीच-बीच में ताक एक बार प्रतीक्षा की,
मन्दगामिनी राजनन्दिनी सीता की ॥ (२२)

अनुकम्पा इसी समय पधार
बोलीं वचन मधुमय सदुलार :
‘मेरी सीता सती
नीर बहना नहीं जानती ।
उसके सुकुमार प्राणों में व्यथा
हो रही होगी सर्वथा ।
अधिक श्रम मत करने दो,
केवल निहारने दो
उद्यान को एक झलक ।
पहली बार आई है यहाँ तक ॥ (२३)

आ जा, आ माँ !
बैठें शीतल छाया में यहाँ ।
मत कर दूसरा प्रयास,
आश्रम-रीति कुछ बताऊंगी तेरे पास ।’
अनुकम्पा कहकर इस प्रकार
ले गयीं दिखला प्यार ।
संग बैठीं सीता छाया में उधर,
नीर लाने हो गयीं तापसियाँ तत्पर ॥ (२४)

अनुकम्पा वहाँ बोलीं : ‘वत्से !
लोग कार्य करते श्रद्धा से ।
सुमन-सुमन में
जैसे तरह-तरह की महक रहती,
जीवन-जीवन में
वैसे श्रद्धा बसती ।
फल प्रदान करती स्वभावानुसार
दैवी, मानवी और आसुरी, श्रद्धा तीन प्रकार ॥ (२५)

दम्भ में, अहंकार में, काम-पोषण में, आसक्ति में,
आत्माकर्षण में, शारीरिक-शक्ति में
तप करते असुर-स्वभावी मानव ।
तेरे स्वभाव में ये नहीं संभव ।
देव-द्विज-गुरु-विद्वज्जनों का पूजन
करती तू शुद्ध-मन,
पवित्रता, सरलता तथा
श्रद्धा के साथ सर्वथा ॥ (२६)

शान्तिदायक सत्य प्रिय वचन
तेरे जीवन का प्यारा मण्डन ।
कपट तेरे मन को स्पर्श कर नहीं पाया;
फिर पास कैसे प्रवेश कर सकेगी माया ?
तेरी कमनीय सौम्य मूर्त्ति बताती यहीं,
विषय-गहन में तेरा अनुराग और नहीं ॥ (२७)

अरी वत्से !
तपस्विती तू दैव-स्वभाव से ।
दर्शन-मात्र से लिया मैंने तुझे पहचान,
अत्यन्त सुकुमार तेरे पवित्र प्रान ।
घोर तपस्या का है दुर्लभ फल;
पुण्य-वल्लरियों का फूल,
नयी तापसियों का श्रम सकल
नहीं उसका अनुकूल ॥ (२८)

तू जल लाती रहेगी
कुमारियों के संग रहकर तुम्बी भर
और जलाती रहेगी
उनका उत्साह-दीपक निरन्तर ।
छोड़ेंगे नहीं वे तेरे पास,
उन्हें समझा दिया है मैंने ।
झेल सारी भूख प्यास
तू लजाएगी नहीं पान-भोजन करने ॥ (२९)

कभी-कभी कन्याओं का उद्यान में हो काम
बस तू कर लेगी आराम ।
जिस वस्तु के लिये जब इच्छा होगी तेरी,
कन्याएँ पहुँचा देंगी न करके देरी ।
स्वयं विहर उद्यान में तू,
अपनी इच्छा के अनुसार
फल-पुष्प चयन हेतु
करेगी नहीं मन में शंका किसी प्रकार ॥’ (३०)

हो गयी प्रातः सप्त वादन बेला,
बैठ गयीं अनुकम्पा के निकट
अपने साथ ला
समस्त शून्य घट,
एक-एक हो धीरे से
स्विन्न-देहा कुमारियाँ ।
खिली धूस्तुर सुमन के पास जैसे
कुछ फल और पास ओसभरी कलियाँ ॥ (३१)


वहीं से उठ सम्पन्न कर स्नान दुबारा
सब लौट चलीं अपने आगार ।
लाये गये थे जो फलमूल तापसों द्वारा
सबने सादर किया आहार ।
मध्याह्न-बेला तापस-तापसियों ने बितायी
अध्ययन-अध्यापन करके नियमानुयायी ॥ (३२)

तापस-तापसियों के भरपूर
स्नेह-सुख ने भगा दिया दूर
समस्त व्यथाओं को सती-मन की ।
स्मृति की राह में उनकी
विलासमय राजसुख वहीं
एक बार भ्रमवश भी आया नहीं ।
उनके विमल हृदय-सरोवर में अविराम
विहर रहे राम-राजहंस अभिराम ॥ (३३)

* * *

(तपस्विनी काव्य का पञ्चम सर्ग समाप्त)
= = = = = =


[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]
* * * * *