Thursday, February 4, 2010

मुक्‍त बिहङ्ग आमे (Mukta Bihańga Āme: Patriotic Odia Song): Dr.Harekrishna Meher

Mukta Bihańga Āme  
(Oriya Patriotic Song)
Lyrics and Tuning By : Dr. Harekrishna Meher
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For Homemade Video Song, 
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मुक्‍त बिहङ्ग आमे  
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(ओड़िआ देशात्मबोधक गीत) 
गीत एवं स्वर-रचना : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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शुभ्र आकाशर मुक्त बिहङ्ग आमे,
महासागरर तुङ्ग तरङ्ग आमे ।
शुभ्र हिमालय उन्नत शृङ्ग आमे,
महासागरर तुङ्ग तरङ्ग आमे,
तुङ्ग तरङ्ग आमे ।
मुक्त बिहङ्ग आमे, तुङ्ग तरङ्ग आमे ॥ (0)
*
आम हाते रहिछि
देश आउ जातिर प्रगति,
आम साथे रहिछि
मानब जन्मर सुगति ।
जन-उपकारे नियोजित हेबारे
बीर सैनिक शक्‍त अङ्ग आमे ।
तुङ्ग तरङ्ग आमे ।
मुक्त बिहङ्ग आमे, तुङ्ग तरङ्ग आमे ॥ (१)
*
हसि उठु हरषे
सूर्य़्योदयर लालिमा,
दूर हेउ मनरु
गहन अन्धार काळिमा ।
जीबन-बीणारे सजाइबा सरसे
सुन्दर मधुर राग रङ्ग आमे ।
तुङ्ग तरङ्ग आमे ।
मुक्त बिहङ्ग आमे, तुङ्ग तरङ्ग आमे ॥ (२)
*
भरि य़ाउ हृदये
भारतीय भाबर सुरभि,
उल्लसित हेउ
सबुरि अन्तर ता लभि ।
एक परिबार ए भारत-भूइँ
रे 
सन्तान सरबे अन्तरङ्ग आमे ।
तुङ्ग तरङ्ग आमे ।
मुक्त बिहङ्ग आमे, तुङ्ग तरङ्ग आमे ॥ (३)
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For English Translation, Link :
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Transliteration in Roman Script 
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Mukta Bihańga Āme  
(Oriya Patriotic Song)
Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher
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Śubhra ākaśara Mukta bihańga āme,
Mahasāgarara Tuńga tarańga āme,
Tuńga tarańga āme.
Śubhra Himāļaya unnata śruńga āme,
Mahasāgarara tuńga tarańga āme.
Tuńga tarańga ame.
Mukta bihańga ame, Tuńga tarańga āme // (0)
*
Āma hāte rahichhi
Deśa āu jātira pragati,
Āma sāthe rahichhi
Mānaba janmara sugati.
Jana-upakāre niyojita hebāre
Bīra sainika śakta ańga āme,
Tuńga tarańga āme.
Mukta bihańga ame, Tuńga tarańga āme // (1)
*
Hasi uţhu harashe
Sūryyodayara lālimā,
Dūra heu manaru
Gahana andhāra kāļimā.
Jībana-bīņāre sajāibā sarase
Sundara madhura rāga rańga āme,
Tuńga tarańga āme.
Mukta bihańga ame, Tuńga tarańga āme // (2)
*
Bhari jāu hrudaye
Bhāratīya bhābara surabhi,
Ullasita heu
Saburi antara tā labhi.
Eka paribāra E Bhārata-bhūinre
Santāna sarabe antarańga āme,
Tuńga tarańga āme.
Mukta bihańga ame, Tuńga tarańga āme // (3)
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(Extracted from Oriya Poem-Anthology 
"Kavitavali" 
of Dr. Harekrishna Meher)
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(This was chorally presented with music as Opening Song 

in the Inaugural Function of 6-Day Golden Jubilee Celebration 
(1-6 February 2010) 
of Government Autonomous College, Bhawanipatna, Orissa 
on February 1, 2010. 
Convenor of Cultural Program and Lyricist-cum-composer 
Dr. Harekrishna Meher 
along with students of the College participated in singing.)   
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Mukta Bihańga Āme 
(Patriotic Oriya Song in Oriya Script Image)
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Tuesday, January 19, 2010

Sanskrit Poem: Svara-Mangala-Vandana (स्वरमङ्गला-वन्दना): Dr.Harekrishna Meher

Svara-Mańgalā-Vandanā 
('Prayer to the Auspicious Goddess of Musical Tune')
Sanskrit Poem By : Dr. Harekrishna Meher  
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स्वरमङ्गला-वन्दना 
* रचयिता : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः 
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हे शारदे ! त्वं तमसां निहन्त्री
सद्‍बुद्धि-दात्री शशि-शुभ्र-गात्री ।
देवीं सुविद्या-प्रतिभामयीं त्वां
नमामि नित्यं वर-दान-हस्ताम् ॥ (१)
*
आयाहि मातः ! स्वर-मङ्गला त्वं
राजस्व कण्ठे ललितं मदीये ।
तनुष्व रूपं सुपरिप्रकाशं
रागं सरागं मधुरं प्रकामम् ॥ (२)
*
कान्तिस्त्वदीया हि समुज्ज्वलन्ती
खेदावसादं विनिवारयन्ती ।
स्वान्तारविन्दं कुरुते प्रफुल्लं
मातर्नमस्ते वितरानुकम्पाम् ॥ (३)
*
विजयतां सुकृतामनुरागिणी
रुचिर-राग-रुचा स्वर-भास्वती ।
सरस-मङ्गल-वर्ण-तरङ्गिणी
सुमधुरा सुभगा भुवि भारती ॥ (४)
*
विराजते विनोदिनी पवित्रतां वितन्वती ।
सुमङ्गलं ददातु नो विभास्वरा सरस्वती ॥ (५)   

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Related Links : 
Stavarchana-Stavakam (स्तवार्चन-स्तवकम्) :
* * *
Contributions of Dr. Harekrishna Meher to Sanskrit Literature:  
Link :
*
Translated Kavyas by : Dr.Harekrishna Meher :
Link :
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Saturday, January 2, 2010

नववर्षर सद्‌भावना (Nava-Varshara Sadbhāvanā): HKMeher

NavaVarshara Sadbhavana 
(Best Wishes for New Year)
Oriya Poem by : Dr. Harekrishna Meher
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नववर्षर सद्‌भावना (ओड़िआ कविता)
रचना : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
(राग- शङ्कराभरण)
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स्वागत घेन सादर हे नब बरष !
बितर आशिष सर्ब हृदये हरष ।
दिअ नब उद्दीपना,
कर्त्तव्ये रत हु‍अन्तु सर्बे शुद्धमना ॥ (१)
*
काळचक्रर घूर्ण्णने समस्त जगत,
लभ‌इ परिबर्त्तन सत्य ए सतत ।
नब नब उद्‍भाबना,
जन-हिते हेउ रचि समृद्धि कामना ॥ (२)
*
उद्‍भासित हेउ हृदे दिव्य प्रेम-ज्योति,
मानबिकतार माळे भ्रातृभाब-मोति ।
हेउ चिर बिभ्राजित,
सदाचार य़ोगुँ सदा मनुष्य पूजित ॥ (३)
*
सर्ब मुखे हेउ शान्ति-मन्त्र उच्चारण,
देशात्मबोध- भावना लभु जागरण ।
दुःख य़ाउ अपसरि,
हृदय-सिन्धुरे खेळु आनन्द-लहरी ॥ (४)
*
हिंसा द्वेष ईर्ष्या द्वन्द्व दूर हेउ मनुँ,
उत्साह-तत्पर सुस्थ रहु सर्ब तनु ।
मन्द कर्म तेजि नरे,
हु‍अन्तु सुनियोजित मङ्गळ कर्मरे ॥ (५)
*
देशे देशे प्रतिष्ठित हेउ सुसम्पर्क,
सत्कर्मे प्रेरणा देउ सहस्रांशु अर्क ।
साम्य-आलोक बितरि,
परिबेश सन्तुळित रहिब य़ेपरि ॥ (६)
*
बन्य जन्तु पशु पक्षी सुरक्षित भाबे,
बितान्तु जीबन निज प्रबृत्ति स्वभाबे ।
जळे स्थळे नभे दूर,
हेउ नित्य मनुष्यर अत्याचार क्रूर ॥ (७)
*
हसि उठु तरु-लता प्रकृति-प्रसादे,
धन-धान्यभरा देश रहु अप्रमादे ।
मनुँ दूर हेउ भय,
सकळे रहन्तु सौख्यमय निरामय ॥ (८)
*
प्रकृति-मानब मध्ये शाश्‍वत सम्बन्ध,
अबिच्छिन्न रहु निति बितरि सुगन्ध ।
हेउ दुर्नीतिर क्षय,
सत्य धरम न्यायर सदा हेउ जय ॥ (९)
*
बिकाशु हृदे मनुष्य मङ्गळ लक्षण,
बिबेक-चक्षुरे करु आत्म-समीक्षण ।
जागतिक प्रगतिर,
सर्बभूते सद्‍भाबना चिन्तन आजिर ॥ (१०)
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Presented in 'Banānī Kavi Sammilanī' 
and included in the Book “Banānī -2010” (Collection of Oriya Poems) 

Published by : 
Kalahandi Lekhak Kala Parishad, Bhawanipatna,
On the occasion of New Year’s Day Celebration 2010.)

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Included in 
Kavitavali-Madhuri
(Anthology of Odia Poems) : 

Link : କବିତାବଳୀ-ମାଧୁରୀ :
https://hkmeher.blogspot.com/2026/04/l-kavitavali-anthology-of-odia-poems-by.html
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Biodata: Web Version: 
https://hkmeher.blogspot.com/2012/06/brief-biodata-english-dr-harekrishna.html?m=0 

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Wednesday, December 30, 2009

Mahakabi Kalidasa (महाकबि काळिदास):HKMeher

Mahakabi Kalidasa (Oriya Poem)
By : Dr. Harekrishna Meher
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महाकबि काळिदास (ओड़िआ कबिता)
रचना : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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हे भारती-बरपुत्र ! कबिकुळ-इन्दु !
धन्य काळिदास तब प्रकृति- सुषमा ।
बितरिल जन-मुखे काव्य-सुधा-बिन्दु
बिश्‍वे बिरचिल रम्य अमिय उपमा ॥ (१)

दिलीप-गोसेबा नृप अज-बिळपना
जणाए तब अपूर्ब काव्य-सुमाधुरी ।
सीता-बनबास राम- बिरह-बेदना
करुण रस झराए हृदये सबुरि ॥ (२)

स्मर-भस्मे घोर तपे गिरीश-हृदरे
करे परबत-सुता प्रणय उदय ।
कुमार जनमे षड़ कृत्तिका-उदरे
भज‍इ तारकासुर- पराण बिलय ॥ (३)

ऋतुपतिरे तरुणी- चन्द्रास्य अबश्य
जगाए प्रेमिक-हृदे मोहन स्पन्दन ।
काम-रसायन-राशि प्रकाशि रहस्य
आलोड़‍इ सर्बकाळे कामी जन-मन ॥ (४)

धनपति-शापे राम- गिरि मध्ये य़क्ष
रहे बरषे समय प्रेयसी-बिरहे ।
जीमूतकु दूत रूपे पेष‍इ प्रत्यक्ष
दारुण कारुण्ये प्रेमी जन-हृद दहे ॥ (५)

नृपति अप्‍सराङ्कर मधुर मिळन
मुनि-अभिशापे मर्त्त्ये उर्बशी आगमे ।
शापान्ते चळ‍इ स्वर्गे चाहिँ पुत्रानन
शोक-कल्लोळ उछुळे पुरुरबा-मर्मे ॥ (६)

नर्त्तकी-बिरहे बीर अग्निमित्र भूप
ब्यकत करन्ति भाब सखी-सन्निधाने ।
चरितार्थ हुए प्रेमे माळबिका-रूप
जागे अपूरुब भाब सुकृति बिधाने ॥ (७)

कण्व-तापस-नन्दिनी शकुन्तळा चारु
दुष्मन्त नरेश सङ्गे स्वर्गीय प्रणय ।
मुनि-शापे काळबशे बिच्छेद हेबारु
तब नब भाबनार दिए परिचय ॥ (८)

बिश्‍व-साहित्य-उद्याने काब्यर प्रसूने
सतत महके तब उपमा-सुरभि ।
हेल कबिकुळ-गुरु सुलेखनी-मुने
मर धामे अलौकिक काब्य-कळा लभि ॥ (९)

लोक-मुखे समुज्ज्वळ कीरति तुमरि
काळे काळे रहिथिब आहे कबीश्‍वर !
जने तब प्रिय बाणी गाइबे सुमरि
अमृत सन्तान तुमे अनन्त बिश्‍वर ॥ (१०) 
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(This Poem was written on Date 5-6-1973)

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Included in
'Kavitavali-Madhuri' (Anthology of Odia Poems) : କବିତାବଳୀ-ମାଧୁରୀ : 
https://hkmeher.blogspot.com/2026/04/l-kavitavali-anthology-of-odia-poems-by.html
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Monday, December 28, 2009

Kalamayi Kalahandi (कळामयी कळाहाण्डि) : କଳାମୟୀ କଳାହାଣ୍ଡି * Odia Poem by Dr.Harekrishna Meher

Kalāmayī Kalāhāņdi
(Oriya Poem)
By : Dr. Harekrishna Meher
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कळामयी कळाहाण्डि
(ओड़िआ कविता)
रचयिता : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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कळाहाण्डि माटि एइ कळार भण्डार,
बिराजे गौरब य़हिँ
कळाश्री माणिकेश्‍वरी- बिजय- झण्डार ॥

ख्यात्ति रहिछि ए भूमि
नाम महाकान्तारक अथबा कारुण्ड,
सुकुमार कळा य़हिँ
उत्कर्ष आहरि होइअछि एका रुण्ड ॥
*
कळामयी भूमिर य़े
बीर-बाद्य बिदित घुमुरा,
श्रुति- सुख देइ य़ाहा
दूर करे नयन- झुमुरा ॥ 

ऐतिहासिक वैशिष्ट्य 
 व्यक्त करे गिरि-गह्वरादि, 
    प्रकृति चारु सम्पद    
  रखिअछि यतने सम्पादि ॥ 

कळाहाण्डि स्वर्णप्रसू रतन-गरभा,
बिकशित य़हिँ कबि-प्रतिभा- सुप्रभा ।
साहित्य कळा ऐतिह्य
संस्कृति एहार,
भारत-मातार कण्ठे
रम्य़ पुष्प-हार ।
कळार माधुरी घेनि अभिनन्दनीया,
कळाबती कळाहाण्डि चिर बन्दनीया ॥

सहिछि य़े दुःख दैन्य
दारिद्र्य कषण,
लोके ता अपप्रचार
असह्य भीषण ।
बास्तबे महत्त्व तार
प्रशंसार य़ोग्य,
निसर्ग सौन्दर्य़्य तार
सदा उपभोग्य ॥ 
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(रचना : ता: १४-१-२००४)
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Poem in Odia Script
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* କଳାମୟୀ କଳାହାଣ୍ଡି * 
(ଓଡ଼ିଆ କବିତା)
ରଚୟିତା : ଡକ୍ଟର୍ ହରେକୃଷ୍ଣ ମେହେର

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କଳାହାଣ୍ଡି ମାଟି ଏଇ କଳାର ଭଣ୍ଡାର,
ବିରାଜେ ଗୌରବ ଯହିଁ
କଳାଶ୍ରୀ ମାଣିକେଶ୍ଵରୀ-ବିଜୟ-ଝଣ୍ଡାର ।।

ଖ୍ୟାତି ରହିଛି, ଏ ଭୂମି
ନାମ ମହାକାନ୍ତାରକ ଅଥବା କାରୁଣ୍ଡ,
ସୁକୁମାର କଳା ଯହିଁ
ଉତ୍କର୍ଷ ଆହରି ହୋଇଅଛି ଏକା ରୁଣ୍ଡ ।।

କଳାମୟୀ ଭୂମିର ଯେ
ବୀରବାଦ୍ୟ ବିଦିତ ଘୁମୁରା,
ଶ୍ରୁତି-ସୁଖ ଦେଇ ଯାହା
ଦୂର କରେ ନୟନ-ଝୁମୁରା ।।

ଐତିହାସିକ ବୈଶିଷ୍ଟ୍ୟ 
ବ୍ୟକ୍ତ କରେ ଗିରି-ଗହ୍ବରାଦି,
ପ୍ରକୃତି ଚାରୁ ସଂପଦ
ରଖିଅଛି ଯତନେ ସଂପାଦି ।।

କଳାହାଣ୍ଡି ସ୍ବର୍ଣ୍ଣପ୍ରସୂ ରତନ-ଗରଭା,
ବିକଶିତ ଯହିଁ କବି-ପ୍ରତିଭା-ସୁପ୍ରଭା ।
ସାହିତ୍ୟ କଳା ଐତିହ୍ୟ
ସଂସ୍କୃତି ଏହାର,
ଭାରତ-ମାତାର କଣ୍ଠେ
ରମ୍ୟ ପୁଷ୍ପ-ହାର ।
କଳାର ମାଧୁରୀ ଘେନି ଅଭିନନ୍ଦନୀୟା,
କଳାବତୀ କଳାହାଣ୍ଡି ଚିର-ବନ୍ଦନୀୟା ।।

ସହିଛି ଯେ ଦୁଃଖ ଦୈନ୍ୟ
ଦା‌ରିଦ୍ର୍ୟ କଷଣ,
ଲୋକେ ତା ଅପପ୍ରଚାର
ଅସହ୍ୟ ଭୀଷଣ ।
ବାସ୍ତବେ ମହତ୍ତ୍ବ ତାର ପ୍ରଶଂସାର ଯୋଗ୍ୟ,
ନିସର୍ଗ-ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ତାର ସଦା ଉପଭୋଗ୍ୟ ।।
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(ରଚନା : ତା: ୧୪-୧-୨୦୦୪)
******

Included in 

 * KAVITAVALI-MADHURI * 
କବିତାବଳୀ-ମାଧୁରୀ : 
(Anthology of Odia Poems) by Dr.Harekrishna Meher) 

****** 
Kalamayi Kalahandi : 
କଳାମୟୀ କଳାହାଣ୍ଡି :   https://hkmeher.blogspot.com/2009/12/kalamayi-kalahandi-hkmeher.html 
 ***** 



Sunday, December 20, 2009

Gīta-Govinda: First Verse: PDF : English-Hindi-Oriya Versions: Dr. Harekrishna Meher

Gīta-Govinda of Jayadeva 
*First Verse : Translated into English, Hindi and Oriya.
By : Dr. Harekrishna Meher
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PDF : 
http://www.scribd.com/doc/21876918/Gita-Govinda
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Wednesday, December 2, 2009

Sanskrit Poem 'Dvijana-Nīrājanam' (द्विजन-नीराजनम् )/Dr.Harekrishna Meher

Dvijana-Nīrājanam (Tribute to the Two) 
   
Sanskrit Poem By : Dr. Harekrishna Meher
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द्विजन-नीराजनम् (संस्कृत-कविता)
रचयिता : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेर:    
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हृदयस्य स्पन्दे स्पन्दे
प्रकटयति चरितं यो मलिनात्मनः,
दुर्जनं तं सर्वादौ वन्दे
भस्मभृतो यस्माद् बिभेति सज्जनः ॥

ध्वान्तो न विद्यते चेत्
महत्त्वमालोकस्य कुतः ?
दुराचारो यदि न भवेत्
सदाचारः कथं विश्रुतः ?

दुःखानुभावो न भवेद् यदि
सुखस्य महत्त्वं कीदृशम् ?
दारिद्र्यं नास्ति चेत् सपदि
कुतो द्रविणस्य गौरवं भृशम् ?

कीदृशं महत्त्वं शीतलतायाः
प्रखरस्तापो यदि नास्ति ?
रूपं यदि खेलति न खलतायाः
साधुताया माधुरी कथं चकास्ति ?

विरहो यदि नानुभूयते
मिलनं कथं स्तूयते ?
यदि न प्रादुर्भावो हेमन्तस्य
कुतो रामणीयकं वसन्तस्य ?

दानवा यदि न विद्यन्ते
देवाः कथं वा प्रशस्यन्ते ?
यदि न भवेत् प्रातिकूल्यम्
कीदृशं वा साफल्यस्य मूल्यम् ?

कथं प्रसूनस्य गौरवं
यदि न भवेत् कण्टकः ?
उदकस्य कीदृशं वा महत्त्वं
नास्ति यदि पावकः ?

यदि भवेन्नाधमः
समभिनन्द्यते कथमुत्तमः ?
यदि भवेन्न चार्वाक-सिद्धान्तः
कथं वा वन्द्यते वेदान्तः ?

क्रन्दनं यदि न स्यात्
माहात्म्यं कथं हास्यस्य ?
चण्ड-ताण्डवस्याभावात्
कीदृशो विलासो लास्यस्य ?

नास्ति यदि पतनस्य सत्ता
उत्थानस्य का वा सार्थकता ?
यदि न स्याद् विनाशः
कथं वा सर्जनायाः परिप्रकाशः ?

कदाचित् कु-वर्गोऽपि
ददाति हार्दिकं प्रसादम् ।
तद्‍वत् सु-वर्गोऽपि
कदाचिद् विषादम् ।
दोषोऽपि गुणायते,
गुणोऽपि दोषायते ।
क्वचित् प्रीतिः क्वचिद् व्यथा
जायते मर्त्त्य-जीवने व्यतिक्रमः सर्वथा ॥
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