Monday, November 22, 2010

My Video : Koshali Song 'Daakuchhe I Maati' / HKMeher

My Homemade Video :
Koshali Song " Daakuchhe I Maati "
Lyrics and Tuning By : Dr. Harekrishna Meher

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Song Presented as Chorus
Ref : Youtube :

http://www.youtube.com/watch?v=GFpsfSenUH0

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Jivan-Dangaa Bahi Jaauchhe Samiaan-Nadir Dhaare /
Nijar Gun Bane Kari Chinhi Dekha Aare /
Kashte Aaru Naain Huanaa Ghaanti Re /
Tamke Daakuchhe I Maati Re //
Daakuchhe I Maati Re, Daakuchhe I Maati,
Andhaar-Jaal Dia Sabu Kaati Re /
Tamke Daakuchhe I Maati Re // (0)
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Munus-Jiban Badaa Unchaa,
Naain Bhaabare Taake Chhuchaa /
Dhukaa Garal Aasle Ghale, Naain Dia Re Pachha Ghunchaa /
Aagei Chaala Paar Hei Ghaati Re /
Tamke Daakuchhe I Maati Re // (1)
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Laaga Re Laaga Kaame Laaga,
Kathin Dekhi Naain Bhaaga /
Ektaa Kathaa Bhaabnaa Kara, Sabhe Misi Jaaga Re Jaaga //
Nijar Gode Naain Huanaa Chhati Re /
Tamke Daakuchhe I Maati Re // (2)
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Manke Sadaa Kari Ushat,
Naain Hua Re Kebhe Nisat /
Rakha Jaatir Deshar Naaan, Janam-Bhuinr Maana Mahat //
Nia Lokar Dukha Sukha Baanti Re /
Tamke Daakuchhe I Maati Re /
Tamke Daakuchhe I Maati Re // (3)

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(This Koshali Song ‘ Daakuchhe I Maati ’ was chorally presented with music as Opening Song in the Annual Day Celebration of Dramatic Society on February 5, 2010 during the Inaugural Function of Golden Jubilee Celebration of Government Autonomous College (CPE), Bhawanipatna, Orissa (February 1 to 6, 2010). Lyricist-cum-composer Dr.Harekrishna Meher and students of the College participated in singing.)

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कोसली गीत : ' डाकुछे इ माटि '
गीत एवं स्वर-रचना : डा. हरेकृष्ण मेहेर
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जीबन्-डंगा बहि जाउछे समिआँ- नदीर् धारे,
निजर् गुन् बने करि चिन्हि देख आरे ।
कष्टे आरु नाइँ हुअना घाँटि रे !
तम्‌‌के डाकुछे इ माटि रे ।
डाकुछे इ माटि रे, डाकुछे इ माटि,
अन्धार्- जाल् दिअ सबु काटि रे !
तम्‌के डाकुछे इ माटि रे ॥ > > >
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For Details and English Translation of the Song,
Please see :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/03/my-kosali-song-tamke-daakuchhe-i-maati.html

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Lyrics in Oriya Script Image :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/04/kosali-song-daakuche-i-maati-oriya.html

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Saturday, October 30, 2010

Utkal-Gaurav Madhusudan Das: Dr.Harekrishna Meher

Utkal-Gaurav Madhusudan Das : Ek Swaabhimaani Vyaktitva
Hindi Article By : Dr. Harekrishna Meher
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उत्कल-गौरव मधुसूदन दास : एक स्वाभिमानी व्यक्तित्व
* डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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भारतवर्ष में ओड़िआ-भाषा-आन्दोलन की भित्ति पर स्वतन्त्र ओड़िशा राज्य का गठन हुआ १ अप्रैल १९३६ को । अंग्रेज शासन में पराधीन अञ्चलों में ओड़िआ भाषा का अस्तित्व जब संकट में था, उसी समय कुछ महानुभाव व्यक्तियों के निःस्वार्थ उद्यमों से ओड़िशा राज्य को स्वतन्त्र रूप से अपना कलेवर प्राप्त हुआ । अंग्रेज-शासन में बंगाल, बिहार, केन्द्र प्रदेश और मद्रास के भीतर खण्ड-विखण्डित होकर ओड़िशा विपर्यस्त अवस्था में थी । ओड़िआ-भाषी लोगों को एकत्र करके एक स्वतन्त्र प्रदेश निर्माण के लिये अनेक चिन्तक, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक एवं देशभक्त व्यक्तियों ने बहुत प्रयत्‍न किये । उन नमस्य महान् व्यक्तियों में उत्कल-गौरव मधुसूदन दास अन्यतम हैं । वे ‘मधुबाबु’ नाम से सर्वत्र लोकादृत हैं । 

पूर्व भारत के अधिवासियों की राजनयिक, सामाजिक , आर्थनीतिक एवं सांस्कृतिक प्रगति हेतु मधुबाबु सदैव तत्पर रहे । विशेष रूप से ओड़िशा-गगन में पूर्व क्षितिज पर नवोदित सूर्य समान मधुबाबु ने ओड़िआ लोगों के मन से नैराश्य- अन्धकार को दूर करके नूतन आशा और उत्साह का सञ्चार किया । उनके नेतृत्व में ओड़िआ भाषा एवं ओड़िशा प्रदेश दोनों की प्राण-प्रतिष्ठा हुई । उस समय कुछ चक्रान्तकारी बंगाली लोग कहते थे –‘उड़िया एक स्वन्त्र भाषा नय; उड़िया बांग्लार एक उपभाषा ।‘ परन्तु ओड़िशा के विशिष्ट लोगों की सफल प्रचेष्टा से ओड़िआ एक स्वतन्त्र भाषा के रूप में मान्यता-प्राप्त हुई । फलस्वरूप भारत में भाषा-भित्तिक सर्वप्रथम प्रदेश बनकर ओड़िशा उभर आयी । 

ओड़िआ भाषा की सुरक्षा एवं स्वतन्त्र ओड़िशा प्रदेश गठन हेतु मधुबाबु ने उत्कल-सम्मिलनी की प्रतिष्ठा की । इसमें खल्लिकोट-राजा हरिहर मर्दराज, पारला-महाराज कृष्णचन्द्र गजपति, कर्मवीर गौरीशंकर राय, कविवर राधानाथ राय, भक्तकवि मधुसूदन राव, पल्लीकवि नन्दकिशोर बल, स्वभावकवि गंगाधर मेहेर और कई विशिष्ट व्यक्तिगणों का सक्रिय योगदान सतत स्मरणीय रहेगा । मधुबाबु ने उत्कल सम्मिलनी में योगदान के लिये अपनी कविता में लोगों का आह्वान किया था :- 

‘एहि सम्मिळनी जाति-प्राण-सिन्धु कोटि प्राण -बिन्दु धरे,
तोर प्राण-बिन्दु मिशाइ दे भाइ डेइँ पड़ि सिन्धु-नीरे ॥'
‘तात्पर्य है : यह उत्कल सम्मिलनी है जाति-प्राण का सिन्धु, जो कोटि प्राण-बिन्दुओं को धारण करती है । उस सिन्धु-जल में कुद कर, अरे भाई ! तेरा प्राण-बिन्दु को मिला ले । अपनी मातृभूमि-प्रीति अनल्प है मधुबाबु की । स्वार्थ त्याग कर मातृभूमि की सेवा में अपनेको नियोजित करने उनकी उत्साहमयी कविता थी :- 

‘जाति-नन्दिघोष चळिब कि भाइ स्वार्थकु सारथि कले,
टाणे कि रे गाड़ि दानार तोबड़ा घोड़ा- मुहेँ बन्धा थिले ॥‘
तात्पर्य है - जाति-रूप नन्दिघोष रथ कैसे चलेगा भाई, अगर स्वार्थ को सारथि बना दिया जाये ? घोड़े के मुहँ पर दाना की भरी थैली यदि बन्धी है, तो घोड़ा गाड़ी खींचता है क्या ? 

१९०३ में मधुबाबु द्वारा प्रतिष्ठित उत्कल सम्मिलनी से ओड़िआ-आन्दोलन आगे बढ़ा । उसी वर्ष वे कांग्रेस छोड़कर ओड़िआ-आन्दोलन में स्वयंको नियोजित किया । उसी समय श्रेय जाता है अंग्रेज शासक सर स्टाफोर्ड नर्थ को जिन्होंने ओड़िशा और असम को बंगाल से पृथक् करने हेतु १८६८ में सरकार को प्रस्ताव दिया । इस विषय से मधुबाबु को बहुत प्रेरणा मिली और ओड़िआ-आन्दोलन का सूत्रपात हुआ । उन्नीसवीं सदी के अन्तिम भाग में तत्कालीन आयुक्त मि. कूक के प्रस्ताव से सम्बलपुर और गञ्जाम ओड़िशा-खण्ड में सम्मिश्रित हुए । ओड़िआ-भाषी अंचलों को एकत्र करके उत्कल सभाका आयोजन किया गया । मयूरभञ्ज महाराज सभापति बने और मधुबाबु सम्पादक । उत्कल सभा की ओर से मधुबाबु सितम्बर १८९७ को लन्दन गये । अंग्रेज सरकार के आगे दावा किया कि ओड़िआ-भाषी सारे अंचल एक शासन के अधीन रहें । ओड़िआ लोगों की दुर्दशा दूर करने फिर अंग्रेजों के समर्थन पाने १९०७ में इंग्लण्ड यात्रा की । बाद में बिहार-ओड़िशा प्रदेश १ अप्रैल १९१२ को गठित हुआ । मधुबाबु बिहार-ओड़िशा बिधान परिषद के एक मन्त्री बने जनवरी १९२१ को और ओड़िशा के निर्विवादीय नेता के रूप में उनको बहुत प्रतिष्ठा मिली । 

मधुबाबु स्वाभिमान एवं आत्ममर्यादा को विशेष प्राधान्य देते थे । धन-सम्पत्ति भले ही नष्ट हो जाये, परवाय नहीं, परन्तु आत्म-सम्मान सदा अक्षुण्ण बना रहे । उनका कहना था :
'आलो सखि ! आपणा महत आपे रखि ।'
इसका अर्थ है - अरी सखी ! अपने सम्मान की रक्षा स्वयं ही करनी चाहिये । एक सच्चे राष्ट्रीयतावादी नेता के रूप में मधुबाबु ने बहुत आदर एवं सम्मान प्राप्त किये । 

कटक जिल्ला के सत्यभामापुर गाँव में मधुबाबु का जन्म हुआ था २८ अप्रैल १८४८ में । उनके पूज्य पिता थे चौधरी रघुनाथ दास और माता पार्वती देवी । प्राय ८६ वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ ४ फरवरी १९३४ को । विधि का विधान कौन भला टाल सकता ? बहुत दुःख की बात है कि ओड़िआ माटी के ये सुपुत्र मधुबाबु १९३६ में गठित स्वतन्त्र ओड़िशा प्रदेश को अपना चाक्षुष करने नहीं रहे । मधुबाबु प्रथम ओड़िआ हैं कलकत्ता से एम्.ए. डिग्री और बी.एल्. (बार् एट् ल’) प्राप्त करने । वे विधान परिषद के सदस्य होने में भी प्रथम ओड़िआ हैं । वे अपनी वकालत (बैरिष्टरी) के कारण ओड़िशा में “मधु बारिष्टर” के नाम से सुपरिचित हैं । इस विषय पर ओड़िआ में एक लोकोक्ति प्रचलित है :
“पाठ पढ़िबि, काळिआ घोड़ारे चढ़िबि,
मधु बारिष्टर संगे लढ़िबि ॥“
(तात्पर्य है - पाठ पढ़ूँगा, काले घोड़े पर चढ़ूँगा , मधु बारिष्टर के साथ लड़ूँगा ।) 

अपनी देशभक्ति, सच्चे नीति-संपन्न नेतृत्व एवं स्वाभिमानी मर्यादा-सम्पन्न गुणों के कारण बारिष्टर श्री मधुसूदन दास सदैव स्मरणीय हैं । कटक–स्थित मधुसूदन आइन् महाविद्यालय उनके नाम से नामित हुआ है । उनकी जन्मतिथि २८ अप्रैल को समग्र ओड़िशा राज्य में ‘वकील दिवस’ एवं 'स्वाभिमान दिवस' के रूप में पालन की जाती है । वे महान् व्यक्तित्व सभीके नमस्य हैं ।
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Ref : Hindi E-Magazine Srijangatha: Article of Harekrishna Meher :  

अमर कवि (Amara Kabi): Oriya Poem: Dr. Harekrishna Meher

Amara Kabi (Oriya Poem) 
By : Dr. Harekrishna Meher
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अमर कवि (ओड़िआ कविता) 

रचयिता : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर   
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लेखिय़ाए य़ेते अमर कबि,
अपूरुब भाब
जागि उठे मने
अनुपम तार दिव्य छबि ॥
*
बिधातारु बळि
ताहारि सृष्टि
अद्‌भुत तार उद्‌भाबनी,
मूक-मुखे भाषा-
पीयूष झराए
पाषाण-अङ्गे सञ्जीबनी ॥
*
काव्याकाशे ता
बिकाशे नियत
बिमळ-बर्ण्ण बिबस्वान,
द्रबिय़ाए हेळे
कोटि तमिस्र
आसि हेले ताहा सन्निधान ॥
*
अति-मानबर
अति-मानसर
अतीन्द्रियर राष्ट्रपरे,
अबिरत सेइ
कबिर अमर
आत्मा बिहरे हर्षभरे ॥
*
सहज शकति
प्रतिभार बळे
क्रान्त-दरशी कबिर मन,
तार अनल्प
शिल्प-कळारे
ए त आदर्श निदर्शन ॥

*  
से शकति घेनि
गढ़ि उठे तार
नब्य भब्य काब्य-कळा,
तेणु बरेण्य-
गणे से गण्य
कृति ता निरत पुण्य-फळा ॥
*
जगते सत्य़ 
शिब सुन्दर
उपासना करे रूपाङ्कने,
प्राणे भरिदिए
पुलक-आलोक
सम्मोहि रस- उद्‌बेळने ॥
*
लेखिय़ाए केते अमर कबि,
कुसुम- कोमळ
लेखनीर मुने
निनाद‌इ शत दिव्य पबि ॥
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* Amara Kabi  *
(In Odia Script) 
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* ଅମର କବି * 
    ରଚୟିତା : ଡକ୍ଟର୍ ହରେକୃଷ୍ଣ ମେହେର 
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   ଲେଖିଯାଏ ଯେତେ ଅମର କବି, 
ଅପୂରୁବ ଭାବ      ଜାଗି ଉଠେ ମନେ 
      ଅନୁପମ ତାର ଦିବ୍ୟ ଛବି । 
ବିଧାତାରୁ ବଳି            ତାହାରି ସୃଷ୍ଟି 
        ଅଦ୍ଭୁତ ତାର  ଉଦ୍ଭାବନୀ, 
ମୂକ-ମୁଖେ ଭାଷା-    ପୀୟୂଷ ଝରାଏ 
      ପାଷାଣ-ଅଙ୍ଗେ ସଞ୍ଜୀବନୀ । 
କାବ୍ୟାକାଶେ ତା      ବିକାଶେ ନିୟତ 
     ବିମଳ-ବର୍ଣ୍ଣ  ବିବସ୍ବାନ, 
ଦ୍ରବିଯାଏ ହେଳେ        କୋଟି ତମିସ୍ର 
     ଆସି ହେଲେ ତାହା ସନ୍ନିଧାନ । 
ଅତି-ମାନବର          ଅତି-ମାନସର 
    ଅତୀନ୍ଦ୍ରିୟର  ରାଷ୍ଟ୍ରପରେ, 
ଅବିରତ ସେଇ          କବିର ଅମର 
       ଆତ୍ମା ବିହରେ  ହର୍ଷଭରେ । 
ସହଜ ଶକତି         ପ୍ରତିଭାର ବଳେ 
     କ୍ରାନ୍ତଦରଶୀ କବିର ମନ, 
ତାର ଅନଳ୍ପ             ଶିଳ୍ପ-କଳାରେ 
    ଏ ତ ଆଦର୍ଶ  ନିଦର୍ଶନ ।
ସେ ଶକତି ଘେନି   ଗଢ଼ି ଉଠେ ତାର 
     ନବ୍ୟ ଭବ୍ୟ  କାବ୍ୟ-କଳା, 
ତେଣୁ ବରେଣ୍ୟ-    ଗଣେ ସେ ଗଣ୍ୟ 
       କୃତି ତା ନିରତ ପୁଣ୍ୟଫଳା । 
ଜଗତେ ସତ୍ୟ             ଶିବ ସୁନ୍ଦର 
      ଉପାସନା କରେ ରୂପାଙ୍କନେ, 
ପ୍ରାଣେ ଭରିଦିଏ    ପୁଲକ-ଆଲୋକ 
   ସମ୍ମୋହି ରସ- ଉଦ୍-ବେଳନେ । 
   ଲେଖିଯାଏ କେତେ ଅମର କବି, 
କୁସୁମ-କୋମଳ    ଲେଖନୀର ମୁନେ 
     ନିନାଦଇ ଶତ ଦିବ୍ୟ ପବି ।। 
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(Included in ‘BANĀNĪ’, Anthology of Oriya Poems,
Published by Kalahandi Lekhak Kala Parishad, 

Bhawanipatna, Orissa, India. 2009)
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Included in 
Kavitavali-Madhuri
(Anthology of Odia Poems) : କବିତାବଳୀ-ମାଧୁରୀ :
https://hkmeher.blogspot.com/2026/04/l-kavitavali-anthology-of-odia-poems-by.html
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Biodata: Web Version:
https://hkmeher.blogspot.com/2012/06/brief-biodata-english-dr-harekrishna.html?m=0 

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Friday, September 17, 2010

समन्वय के देवता श्रीजगन्नाथ (Sri-Jagannath): Dr. Harekrishna Meher

Samanvaya Ke Devata Sri-Jagannath
Hindi Article By: Dr. Harekrishna Meher
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समन्वय के देवता श्रीजगन्नाथ
* डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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'शुभं सुभद्रा-बलभद्र-सङ्गतं
नमामि नाथं जगतां वरेण्यम् ।
ओंकार-रूपं भुवि दारु-दैवतं
वेदान्त-वेद्यं महतां शरण्यम् ॥'


श्रीजगन्नाथ ओड़िशा के परम आराध्य देवता के रूप में सर्वत्र संपूजित हैं । 'पुरुषोत्तम' - नाम से उनकी विशेष प्रसिद्धि रही है । उनका पुण्य पुरी धाम 'पुरुषोत्तम क्षेत्र' नाम से सुपरिचित है । वे हैं आर्त्तत्राण, दीनबन्धु, दयासिन्धु, पतित-पावन, मान-उद्धारण, शरण-रक्षण, भावग्राही, प्रेम-भक्ति-प्रीत महामहिम देवेश्वर । दारुब्रह्म के रूप में वे नीलकन्दर में विराजित हैं । स्कन्द पुराण, ब्रह्म पुराण, नीलाद्रि-महोदय, पुरुषोत्तम-माहात्म्य आदि ग्रन्थों में पुरुषोत्तम क्षेत्र और जगन्नाथ महाप्रभु की महिमा विशेषरूप से प्रतिपादित है । राजा इन्द्रद्युम्न द्वारा प्रतिष्ठित शाबर देवता श्रीजगन्नाथ की कीर्त्ति अनन्त है । पहले से ही शाबर संस्कृति में विश्वावसु द्वारा समाराधित नीलमाधव महाप्रभु परवर्त्ती काल में विश्‍वजनीन देवता श्रीजगन्नाथ के रूप में पूजित हो रहे हैं । वे हैं पूर्ण परंब्रह्म सच्चिदानन्द परम-पुरुष । श्रीजगन्नाथ का दारुविग्रह नाना धार्मिक सम्प्रदायों की एकता प्रतिष्ठा करने की दिशा में मुख्य भूमिका निभाता रहा है । ऋग्‌‍वेद के दशम मण्डल में वर्णित है :
'अदो यद्‍ दारु प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम् । 
तदारभस्व दुर्हणो तेन गच्छ परस्तरं‍म् ॥' ( १२/१५५/३) 
इसका तात्पर्य है : 'ये जो दिव्य अपुरुष दारु (काष्ठ) समुद्र-तट जल में वहता जा रहा है, उसीके आश्रय से तुम परम गति लाभ करो ।' इस ऋग्‍वेदीय मन्त्र में दारुब्रह्म का उल्लेख रहा है । पावन क्षेत्रराज पुरी में विष्णु दारुब्रह्म मूर्त्ति रूप में विराजमान हैं । उनके कमनीय रूप का दर्शन करके प्राणी सारे पापों से मुक्ति प्राप्त होता है, ऐसा धार्मिक विश्वास रहा है । 

परमेश्‍वर महाप्रभु के कुछ अंगों की अपूर्णता के बारे में उपनिषद्‍ का वाक्य स्मरणीय है :
‘अपाणि-पादो जवनो ग्रहीता
पश्यतुअचक्षुः स शृणोत्यकर्णः ।
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति बेत्ता
तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥' (श्‍वेताश्‍वतर उपनिषद्‍ ३/१९) 
तात्पर्य यह है कि उन महनीय श्रेष्ठ परमपुरुष के हाथ नहीं हैं, फिर वे भी सभीको धारण करते हैं । उनके पैर नहीं, फिर भी वे चलते हैं । उनके नेत्र नहीं, फिर भी देखते हैं । उनके कान नहीं, फिर भी सुनते हैं । वे सर्वज्ञ हैं, परन्तु उनको जाननेके लिये किसीका सामर्थ्य नहीं ।

निगम-वाक्य के आधार पर भक्तकवि गोस्वामी तुलसीदास ने राम-ब्रह्म के बारे में लिखा है :
'बिनु पद चल‍इ सुन‍इ बिनु काना,
बिनु कर कर‍इ करम विधि नाना ।
आनन-रहित सकल रस-भोगी,
बिनु वानी बकता बड़ जोगी ।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा,
ग्रह‍इ घ्रान बिनु बास असेखा ।
असि सब भाँति अलौकिक करनी,
महिमा जासु जाइ नहीं बरनी ॥' (श्रीरामचरित-मानस, बालकाण्ड, ११७/३-४)

वही परंब्रह्म पैरहीन होकर भी चलते हैं, कान बिना भी सुनते हैं, हाथ बिना भी नाना कार्य करते हैं, मुख या जिह्वा बिना भी सभी रसों का आस्वादन करते हैं, वाणी बिना भी कहते हैं, शरीर बिना भी स्पर्श करते हैं, नेत्र बिना भी देखते हैं, नासिका बिना भी सारा गन्ध आघ्राण करते हैं । ऐसे परंब्रह्म की लीला अलौलिक है और महिमा अवर्णनीय । वे इन्दिय-रहित एवं इन्द्रियातीत परम आत्मतत्त्व हैं । वे साकार हैं और निराकार भी । भक्तकवि तुलसीदास ने श्रीराम-रूपी हरि का माहात्म्य बयान करके कहा है :
'वन्देऽहं तमशेष-कारणपरं रामाख्यमीशं हरिम् ।' करुणा-निधान वही पुरुषोत्तम सचराचर विश्व में लीलामय, बहुरूपधारी एवं सर्वव्यापी हैं । भावग्राही श्रीजगन्नाथ महाप्रभु को अपने इष्टदेव श्रीरामचन्द्र के रूप में दर्शन करके भक्तवर तुलसीदास का हृदय भक्ति-पुलकित हो उठा था । उनके मुख से भावभरी वाणी उच्चरित हुई थी : "जो ही राम सो ही जगदीशा ।" जो भक्त जिस रूप में भगवान् की उपासना करता है, वह उसी रूप से भगवान् को दर्शन करता है । वास्तव में सच ही है :  
'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु-मूरति देखि तिन तैसी ।'

संसार में रहकर मानव अपनी रुचि के अनुसार धार्मिक और सामाजिक आस्था पोषण करता है । प्रभु श्रीजगन्नाथ सर्वधर्म-समन्वय के रूप में प्रतिपादित हैं । अपाणि-पादादि-स्वरूप वर्णित परम ब्रह्म के प्रतीक हैं वे । भक्तों के भगवान् हैं वे विचित्रकर्मा एवं अद्‍भुत-विग्रहधारी । विभिन्न धर्म-सम्प्रदायों के उपासकगण दुःखहारी उन हरि को भिन्न भिन्न रूप में दर्शन करते हैं । इस विषय पर एक लोकप्रिय श्‍लोक है : 
‘यं शैवाः समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वेदान्तिनो
बौद्धा बुद्ध इति प्रमाण-पटवः कर्त्तेति नैयायिकाः ।
अर्हन्नित्यथ जैन-शासन-रताः कर्मेति मीमांसकाः
सोऽयं वो विदधातु वाञ्छित-फलं त्रैलोक्य-नाथो हरिः ॥' 

उक्त प्रचलित श्‍लोक में विभिन्न भारतीय दर्शनों का मूल आत्म-तत्त्व सूचित हुआ है । 'एकं सद्‍ विप्रा बहुधा वदन्ति' - इस वेद-वाणी की सार्थकता सर्वत्र परिलक्षित होती है । शैवलोग उन परमेश्वर त्रिलोकपति को शिव के रूप में आराधना करते हैं, वेदान्तीगण ब्रह्म के रूप में, बौद्धलोग बुद्ध के रूप में, नैयायिकगण कर्त्ता के रूप में, जैनगण ‘अर्हत्' के रूप में एवं मीमांसक लोग कर्म के रूप में उपासना करते हैं । जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा – इन त्रिमूर्त्ति को भारतीय परम्परा में सत्त्व-रज-तम त्रिगुण का प्रतीक कहा जाता है । बौद्धधर्म और जैनधर्म का 'त्रिरत्‍न' (सम्यक्‌ ‍ ज्ञान, सम्यक् दर्शन एवं सम्यक् चारित्र) भी इस त्रिमूर्त्ति में सन्निहित है । भक्तप्रवर चैतन्य प्रमुख वैष्णवगण श्रीजगन्नाथ को कृष्ण-रूप मानते हैं । श्रीजगन्नाथ के वैष्णवीय लक्षणो का निदर्शन वर्णित है ‘जगन्नाथाष्टकम्' में । यनुना-तटपर वनविहार करने वाले संगीतमय-वंशीवदन गोपिका-वल्लभ और ब्रह्मादि-देवगण द्वारा पूज्यपाद कृष्णरूपी श्रीजगन्नाथ मेरे नेत्र-पथ में आकर दर्शन दें, भक्त यही कामना करता है । इस पद्य में :
'कदाचित्‌ कालिन्दी-तट-विपिन-सङ्गीतक-वरो
मुदाभीरी-नारी-वदन-कमलास्वाद-मधुपः ।
रमा-शम्भु-ब्रह्मामरपति-गणेशार्चित-पदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥' (श्‍लोक- १) 
*
वाम हस्त में वंशी धारण करते हुए, मस्तक में मयूर-पुच्छ सजाते हुए, सुन्दर वस्त्र-शोभित, नेत्रकोण में साथी की भ्रूभंगी दरशाते करते हुए वृन्दावन-विहारी लीलामय भगवान् कृष्ण-स्वरूप श्रीजगन्नाथ हैं । उनके दर्शनाभिलाषी भक्त की प्रार्थना है :
‘भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते ।
सदा श्रीमद्‍-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥‘ (श्‍लोक -२) 

फिर परंब्रह्म-स्वरूप नाग-शयन नीलगिरिवासी नीलपद्म-नयन श्रीजगन्नाथ की कृष्ण-मूर्त्ति और श्रीराधा-प्रीति की वर्णना है इस पद्य में :

परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्‍फुल्ल-नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि ।
रसानन्दो राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥‘ (श्‍लोक- ६)

दाक्षिणात्य के भक्त गणपति-भाट्ट ने श्रीजगन्नाथ को गजानन-वेश में दर्शन किया था । उनकी स्मृति में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन स्नानयात्रा में महाप्रभु का गजानन वेश अनुष्ठित होता है । शाक्त धर्म के उपासकगण प्रभु जगन्नाथ को भैरव के रूप में पूजा करते हैं । ओड़िआ साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि उपेन्द्र भञ्ज की वर्णना में प्रभु जगन्नाथ एवं बलभद्र हैं हस्तीयुगल । जगन्नाथ हैं दक्षिण दिशा के हस्ती कृष्णवर्ण ‘वामन’ और उनके अग्रज बलभद्र हैं पूर्वदिशा के हस्ती धवल-वर्ण ‘ऐरावत’ । जनसाधारणों में प्रभु जगन्नाथ ‘कालिआ हाती’ के रूप में सुपरिचित हैं । इसीसे गजानन-वेश का माहात्म्य स्पष्ट प्रदिपादित होता है । जगन्नाथ-तत्त्व में विविध नामों की एकात्मता प्रतिष्ठित हुई है । कवि उपेन्द्र भञ्ज के मत में ‘जगन्नाथ’ शब्द में वैष्णवीय तत्त्व गुप्तरूप में समाया है । कवि का कहना है :
'भक्तिदेवा गुप्त होइअछि य़ुक्ताक्षरे । 
वैष्णव बिहुने केबा जाणिब संसारे ॥' 


‘जगत्'-शब्द का अर्थ है 'राधा' और ‘नाथ’-शब्द का अर्थ है ‘कृष्ण' । प्रकृति-रूपिणी राधा एवं पुरुष-रूप कृष्ण, ये दोनों परम तत्त्व 'जगन्नाथ'-शब्द में सन्निवेशित हैं । मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, बलराम, बुद्ध एवं कल्कि - ये विष्णु के दशावतार श्रीजगन्नाथ में समाविष्ट हैं । कवि उपेन्द्र भञ्ज की लेखनी में जगन्नाथ, विष्णु, कृष्ण एवं राम अभिन्न देवता के रूप में भावित हैं । सर्वदेवमय विग्रह जगन्नाथ हैं संसार के आदिमूल । ओड़िआ साहित्य के आदिकवि सारला दास ने जगन्नाथ को बुद्धावतार के रूप में चित्रित किया है । उनके मत में ब्रह्मा सुभद्रा-स्वरूप पूजित हैं । भक्तकवि बलराम दास ने जगन्नाथ को कृष्ण मानकर अपना लिया है । कवि दीनकृष्ण दास के मत में जगन्नाथ ही दशावतारी परम पुरुष हैं । सुदर्शन सहित चतुर्धा मूर्त्ति शङ्खक्षेत्र पुरी धाम में समाराधित हैं । अष्ट शम्भुरूपी महादेव पुरी क्षेत्र के रक्षक हैं । इस क्षेत्र में चण्डाल के हाथ से भी ब्राह्मण अन्न भोजन करके सौ जन्मों का पाप मिटा देते हैं । इस विषय पर स्कन्द-पुराण में वर्णित है :
'सुधोपमं पचत्यन्नं भुङ्‍क्ते नारायणः प्रभुः ।
तदुच्छिष्टोपभोगो हि सर्वाघ-क्षय-कारकः ॥' (उत्कल खण्ड)

कवि उपेन्द्र भञ्ज ‘कोटिब्रह्माण्ड-सुन्दरी’ काव्य में श्रीजगन्नाथ का विशेष वर्णन किया है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र – ये चार वर्णों के लोगों को धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चतुर्वर्ग प्रदान करने में जगन्नाथ महाप्रभु निपुण हैं । कवि की उक्ति में :

'से कम्बु-कटक- राजा नाम जगन्नाथ ।
चारि बर्णे च‍उबर्ग देबाकु समर्थ ॥' (को.ब्र. सु. १/१२) 

अचिन्तनीय है श्रीजगन्नाथ की महिमा । उनके पास जाति, धर्म, छोटा, बड़ा आदिका कोई भेदभाव नहीं । भाव ही उनके लिये प्रधान तत्त्व है । वे भक्तवत्सल दीनबन्धु दयासागर हैं, भक्ति से ही प्रीत और प्रसन्न होते हैं । दासिआ बाउरी के हाथ से भक्तिपूत हृदय में अर्पित नारियल स्वीकार करते हैं । पुरी में रथयात्रा के समय यवन भक्त सालबेग की बिनति सुनकर उनके पहुँचने तक रथ में अटल हो बैठकर भक्त की प्रतीक्षा करते हैं । कभी भक्तकवि बलराम दास के बालुका-रथ पर विराजित होते हैं । कभी छुपछुपकर माल्याणी के मुख से कवि-जयदेवकृत गीतगोविन्द की मधुर पङ्‍क्तियाँ सुनते हैं । कभी बन्धु-महान्ति को स्वर्ण थाली में अन्न-व्यञ्जन परोस देते हैं । औपचारिक रूप से स्नानयात्रा के बाद महाप्रभु को अतिस्नान-जनित ज्वर से आरोग्य करने के लिये औषध देकर चिकित्सा की जाती है । ये सब प्रभु के मानवीय आचरण या दिव्य मर्त्त्य लीला हैं । इसलिये श्रीजगन्नाथ मानवायित परम-पुरुष के रूप में भक्त जनों की आन्तरिक भक्ति और सश्रद्ध सेवा स्वीकार करते हैं । श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा या घोषयात्रा का महत्त्व सर्वजन-विदित है । ओड़िशा के सर्वत्र पुरपल्लियों में भी इस महोत्सव की परिव्याप्ति रही है । आजकल केवल भारत में ही नहीं , बल्कि विदेशों में जगन्नाथ महाप्रभु की रथयात्रा महासमारोह में अनुष्ठित होती है । आकाशवाणी-दूरदर्शनादि विभिन्न माध्यमों से विशेष प्रसार के कारण श्रीजगन्नाथ का माहात्म्य आज के वैज्ञानिक युग में विश्वव्यापी बन चुका है । ओड़िशा की सांस्कृतिक एवं धार्मिक चेतनाओं का उत्कर्ष-स्वरूप श्रीजगन्नाथ-तत्त्व सारे संसार में जन-मानस को सदा आह्लादित और भक्तिरसाप्लुत करता आ रहा है और करता रहेगा । रथयात्रा के पावन अवसर पर उन भावग्राही महाप्रभु के लिये हमारी वन्दना है : 

'तुलसी-लसित-सीतावरम्,
चैतन्य-नुत-मुरलीधरम् ।
भैरवं भजे गजाननम्,
खग-वाहनं ससुदर्शनम् । 
इन्दिरेशं विश्‍व-वेशं बुद्ध-रूपमनिन्दितम्,
प्रणमामि तं भुवि वन्दितम्,
जन-हृदय-मन्दिर- नन्दितम्, प्रणमामि तम् ॥' 
*
'रथ-महोत्सवे जगत्पते !
त्वयि मन्दिराद्‍ बहिरागते ।
जन-लोचनं गोविन्द ! ते,
शुभ- दर्शन-रसं विन्दते ।
नन्दिघोष- स्यन्दन-गतं शङ्ख-घण्टा-नादितम्,
प्रणमामि तं भुवि वन्दितम्,
जन-हृदय- मन्दिर- नन्दितम् ।
जगन्नाथं परात्मानं सर्व-तनुषु स्पन्दितम्,
प्रणमामि तम् ॥' (पुरुषोत्तम-गीतिका)

अन्त में, श्रीजगन्नाथ महाप्रभु के चरणारविन्द में प्रार्थना करते हैं कि उनके पावन नाम के स्मरण से
परस्पर भ्रातृत्व, मैत्री और श्रद्धा सदैव विकशित रहें एवं सबका जीवन सुख-शान्तिमय हो ।

'मैत्रीं प्रशान्तिं सुखदां चिरन्तनं
तनोतु विश्वे तव नाम-चिन्तनम् ।
आत्मीयता-रूप-रसो महीयतां
प्रभो जगन्नाथ ! कृपा विधीयताम् ॥' 

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Ref : Article Published in  Hindi e-Magazine 'Srijangatha' : 
'Samanvaya ke Devata Daru-Brahma SriJagannath' 
On the holy occasion of Rathayatra on 13 July 2010. 

Link : http://www.srijangatha.com/prasangvash2_13jul2k10
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Srijangatha : Harekrishna Meher : Search : 
http://www.srijangatha.com/searchtag_Args_%E0%A4%A1%E0%A5%89.%C2%A0%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3%C2%A0%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%B0
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Monday, September 6, 2010

'Acharya Prafulla Chandra Roy Smarak Samman' & ‘Gangadhar Samman’ awarded to Harekrishna Meher



'Acharya Prafulla Chandra Roy Smarak Samman' to Harekrishna Meher.

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Academy of Bengali Poetry, Kolkata-700054 with Chairmanship of Dr. Abhijit Ghose, awarded “Acharya Prafulla Chandra Roy Smarak Samman"-2010 to Dr. Harekrishna Meher, Sr. Reader and Head, Sanskrit Department of Sanskrit, Government Autonomous College, Bhawanipatna, Orissa, for his contribution in Art and Literature, in its function at National Library of India, Kolkata in Jan 2010.

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Harekrishna Meher honoured with 'Gangadhar Meher Samman' :
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Swabhava-Kavi Gangadhar Meher (1862-1924) is well-known as 'Prakriti-Kavi' of Oriya literature. State Level Kavi Gangadhara Meher Jayanti was celebrated by Orissa Sahitya Akademi in collaboration with Barpali Gangadhar Meher Club at the poet’s birth-place Barpali on 24 August 2010 on the day of Sravana Purnima. Several speakers delivered speeches on poet’s life and literary works. Prof. Dr. Niranjan Panda, Chairman of Western Orissa Development Council, was the Chief Guest there.


On this occasion, Dr. Harekrishna Meher, Sr. Reader and Head of the Department of Sanskrit, Government Autonomous College, Bhawanipatna, Orissa, was honoured with ‘Haripriya Mund Memorial Gangadhar Meher Samman'-2010 for his contribution to popularize Poet’s literary works such as ‘Tapasvini’ kavya through trilingual translations in Sanskrit, Hindi and English.
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Wednesday, August 25, 2010

‘Koshali Meghaduta’ Book Inaugurated : Dr. Harekrishna Meher


























'Koshali Meghaduta'  
(Complete Koshali Lyrical Translation of Sanskrit Gitikavya 
‘Meghadutam’ written by Poet Kalidasa)    
* Author : Dr. Harekrishna Meher 
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Publisher : Trupti Prakashan, Bhubaneswar-2, Orissa.
First Edition : 2010 / Pages : 136
Price : Rupees 80/-
ISBN : 13 978-93-80758-03-9

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My ‘Koshali Meghaduta’ Book Inaugurated   
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Poet Gangadhara Meher (1862-1924), well known as ‘Prakriti-Kavi’, Poet of Nature in Oriya Literature, is one among the illustrious makers of Indian Literature. He is so popular poet in Orissa that his birth day is celebrated every year all over the state. He is very famous for his Ramayana-based epic poem ‘Tapasvini’ that treats of Queen Sita’s post-banishment episode in the hermitage of Sage Valmiki.

Under the auspices of State Level Swabhava-Kavi Gangadhara Meher Smruti Samiti, Barpali in collaboration with Balangir Bhulia Meher Samaj, Balangir, Orissa, the 149th Birth Day Celebration of Poet Gangadhara Meher was observed with much pomp and ceremony in Town Hall, Balangir on the sacred day Sravana Purnima, 24 August 2010.

In this Gangadhara Jayanti Function, Prof. Narayan Pruseth, President of the Smruti Samiti presided over the meeting. Prof. Dr. Dhrubaraj Naik, Former Vice-Chancellor of Sambalpur University, Sambalpur adorned the dias as Chief Guest. Dr. Harekrishna Meher, Sr.Reader and Head of the Department of Sanskrit, Government Autonomous College of Bhawanipatna delivered his speech as Chief Speaker on life and socially value-based immortal literary works of Poet Gangadhara.

World Sanskrit Day and Raksha Bandhan are also observed on Sravana Purnima Day. On this occasion, Koshali Meghaduta’ Book (Complete Koshali Lyrical Translation of Poet Kalidasa’s Sanskrit Gitikavya ‘Meghadutam’)
authored by Dr. Harekrishna Meher was inaugurated by the honourable Chief Guest Prof. Dhrubaraj Naik and it was appreciated by the learned audience.
This book is the first Koshali Translation of Meghaduta in Indian literature. 

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Reference : 
http://hkmeher.blogspot.com/2008/02/kosali-meghaduta-part-1-purba-megha.html
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Saturday, July 31, 2010

Svarūpam (स्वरूपम्) Sanskrit Poem / HKMeher

Svarūpam (Sanskrit Poem)   
By : Dr. Harekrishna Meher
(Extracted from Sanskrit Kāvya ‘Mauna-Vyañjanā’)
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स्वरूपम् (संस्कृत-कविता)  
रचयिता : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः
('मौनव्यञ्जना'- काव्यतः)
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पुरतो लक्ष्यते यत्
सर्वं तत् सत्यं न भवति ।
भवति श्रवण-गोचरं यत्
तत् सर्वं सत्यतां नावति ॥


नेत्राभ्यां यद् दृश्यते
तत् सर्वं न भवति सत्यम्,
यथा मरुभूम्यां तोयपूर्णा मृगतृष्णा,
यथा कूटसाक्षिणो मिथ्यायां सत्यभ्रमः,
यथा पाण्डवानामिन्द्रप्रस्थ-भवने
जले स्थल-भ्रान्तिः
धृतराष्ट्र-तनय-नयने ॥

बाह्य-रूपं यदनुभूयते,
आभ्यन्तर-रूपं तन्न भवति सर्वथा ।
अभिधा-सम्पन्नः शब्दः
भिन्नार्थं प्रकाशयति
व्यञ्जना-व्यापारेण यथा ॥

हृदये भाव-सकलं
जागर्ति यत् किञ्चित्,
सर्वं वै न भवति कथ्यम्,
न वै भवति तथ्यम् ॥

बाह्य-वचनं चेत्

सर्वत्र कृत्रिम-रमणीयतरम्,
तद् भवितुं शक्यते
आभ्यन्तर-रूपेण हानिकरम् ॥

बाह्य-रूपे कृत्रिम-विश्‍वासः सञ्जातः,
आभ्यन्तरे परन्तु विश्‍वास-घातः ।

विश्रुतो वैश्रवणो रावणः
भिक्षार्थी विदेहजापहरण-प्रवणः ॥

अमधुरं भवतु नाम
बाह्यं मुख-मण्डलम्,
परन्तु हृदयं भवेत्
विश्‍वास-पूतं सुनिर्मलम् ।
हृदयं सदैव निरीक्षणीयम्,
आत्मीयत्वं परीक्षणीयम् ॥

बाह्य-रूपरेखा न भवति सदा
आभ्यन्तर-भावनाया अभिव्यक्तिः ।
बाह्य-रूपं ह्यापात-रसनीयम्
विश्‍वे न हि विश्‍वसनीयम् ।
यद् विष-कुम्भं पयोमुखं जगति
सर्वं वर्जनीयमेव भवति ॥
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