Saturday, October 15, 2016

Gita-Govinda Kavya: Canto-8 : Odia Version: Dr. Harekrishna Meher

‘Gita-Govinda’ Kavya of Poet Jayadeva
Complete Odia Metrical Translation by:
Dr. Harekrishna Meher
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Link:
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महाकवि-जयदेव-प्रणीत ‘गीतगोविन्द’ काव्य
सम्पूर्ण ओड़िआ पद्यानुवाद :  डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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(Gita-Govinda : Canto-8 : Vilakshya-Lakshmipati)
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गीतगोविन्द : द्वितीय सर्ग
(विलक्ष्य-लक्ष्मीपति)
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[श्लोक-१ : अथ कथमपि यामिनीं]
*
एहापरे राधा सुन्दरी,
कौणसिमते   बिताइदेले से
बिभाबरी ।
मन्मथ-बाणे ताङ्कर
निपीड़ित थिला कळेबर ।
प्रभात होइला समागत,
प्रिया-सम्मुखे      पहञ्चि हरि
कले सबिनय प्रणिपात ।
केते अनुनय करि
कथाळाप कले हरि ।
किन्तु अधिक ईर्षारे,
कहिले राधिका     प्रिय-हरिङ्कि
ए भाषारे ॥
*
[गीत-१: रजनि-जनित-गुरुजागर]
*
केउँ सङ्गिनी   सह उजागर
थिबारु रात्रि सारा,
तुमरि नेत्र    य़ुगळ होइछि
केते रक्तिमाभरा ।
नयन अर्द्धमीळित,
अळस पलके पूरित ।
रसर आबेशभरे,
अन्य नायिका    प्रति अनुराग
सते से व्यक्त करे ।
चालिय़ाअ आहे माधब !
चालिय़ाअ तुमे केशब !
हाय हाय ! आउ
न कह कपट बचन,
आहे पङ्कज-लोचन !
य़ेउँ सङ्गिनी     तुमरि दुःख
दूर करे,
ताहारि समीपे  चालिय़ाअ तुमे
सत्वरे ॥ (१)
*
श्याम कळेबर तुमर,
किन्तु लोहित अधर ।
अञ्जन-बोळा   नेत्रे ताहार
चुम्ब देबारु कृष्ण हे !
तुमरि अधर    काळिमा लभिछि
शरीर-तुल्य रूप बहे ॥ (२)
*
आन सङ्गिनी    सह अनङ्ग-
संग्रामरे,
मातिबा समये तुम शरीरे ।
ताहार तीक्ष्ण-  नखघात
रेखामान दिशे अङ्कित ।
प्रते हुए मने सते से कामिनी
मरकत-शिळा उपरे,
लेखिअछि रण-     बिजय-पत्र
हेम बर्ण्णर लिपिरे ॥ (३)
*
सेइ तरुणीर     चरण-कमळ
युगळुँ गळित अलक्तरे,
रञ्जित एइ        हृदय तुमरि
केड़े सुन्दर देख हे थरे ।
हरि हे ! बाहारे  सतेबा तुमर
से हृद करइ प्रदर्शित,
अतनु-तरुरे     होइअछि नब
पल्लबराजि सुबिकशित ॥ (४)
*
अन्य नारीर      दन्त-आघात
लागिछि तुमरि अधरे,
एहा निश्चय     व्यथा अतिशय
जन्माए मोर हृदरे ।
मो सहित तुम अभिन्न-भाब पीरति,
एबे बि रहिछि    बोलि तुम एहि
शरीर कहुछि केमिति ? (५)
*
कृष्ण हे ! तुम  देह त बाहारे
दिशुअछि कळाबरण,
सेपरि निश्चे     होइथिब पुणि
तुम अन्तःकरण ।
नोहिले कि मोते हरि !
करिथाआन्त  बञ्चना एहिपरि ?
पञ्चबाणे पीड़िता,
तुम बिरहिणी     प्रणयिनी मुहिँ
सदा तब अनुगता ॥ (६)
*
अबळाजनकु    ग्रासिबा इच्छा
रखि मने,
भ्रमुअछ तुमे बने बने ।
कि बिचित्रता ए बिषयरे ?
पूतना हिँ निजे प्रमाण करे ।
नारीबध कथा  घेनि हे माधब !
प्रसरिअछि कीरति,
बाल्यकाळरु         तुम चरित्र
अटे निर्दय अति ॥ (७)
*
शिरीजयदेब कबि रचित,
रति-बञ्चिता     खण्डिता राधा
बिरहिणीङ्क बिळाप गीत ।
बिबुध-नगरी        स्वरगुँ मध्य
दुर्लभ बोलि जाण,
ए बाणी सरस   पीयूष-मधुर
शुण हे बिबुधगण ॥ (८)
*
[श्लोक-२ : तवेदं पश्यन्त्याः]
*
आन नायिकार  पदयुगे बोळा
अलक्त रसे सुरञ्जित,
उरदेश तुम    दिशुछि मोहरि
नेत्रे अरुण-आभान्वित ।
से रमणी प्रति     तुम अन्तर
भाबानुराग,
प्रकाश लभिछि     प्रसरि सतेकि
बहिर्भाग ।
ए राधा सङ्गे     तुमरि प्रणय
सुबिख्यात,
किन्तु शठ हे !  आजि हेला तहिँ
भङ्ग जात ।
तुम दर्शने मो हृदय,
शोक अपेक्षा      लज्जारे एबे
अभिभूत हुए अतिशय ॥
* * *
जयदेब कबि-प्रणीत
गीतगोबिन्द काव्य मधुर लळित ।
हेला अष्टम सर्ग इति,
नाम ‘विलक्ष्य-लक्ष्मीपति’ ।
श्रीहरेकृष्ण मेहेर,
रचिले ओड़िआ पद्यानुबाद एहार ॥

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* गीतगोविन्द अष्टम सर्ग सम्पूर्ण *

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