Monday, February 14, 2011

भारतीय भाषाओं की सम्पर्क-लिपि देवनागरी (Devanagari Script): Dr. Harekrishna Meher

Bharatiya Bhashaon Ki Sampark Lipi Devanagari
Hindi Article By : Dr. Harekrishna Meher
(Devanagari : The Link-Script of Indian Languages)   
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भारतीय भाषाओं की सम्पर्क-लिपि देवनागरी   
* डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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हमारा भारतवर्ष ऐसा एक विशाल देश है, जिसमें कई प्रकार की विभिन्नता दृष्टिगोचर होती है । आचार-व्यवहार, वेशभूषा एवं भाषा की विवेचना जब की जाती है, तब पता चलता है कि विभिन्न प्रान्तों के अनुसार लोग विभिन्न प्रकार की भाषायें बोलते हैं और अपने जीवनयापन की व्यवस्था में एक स्वतन्त्र मर्यादा रखते हैं । ऐसे देखा जाये तो हर प्रान्त में अलग अलग भाषा के प्रयोग होने पर भी लोगों की चिन्तन-धारा में भारतीयता दृढ़ रूप से व्यवस्थित है । भारत में कई रुचियों और भाषाओं की विभिन्नता होने पर भी भारतीय यानी राष्ट्रीय एकता सभी भारतीयों के मन में बसी है, जो सभी भारतवासियों को एक ही सूत्र में बाँधती है ।

भारतीय संविधान में कई भारतीय भाषाओं को मान्यता प्रदान की गई है आधुनिक भारतीय भाषा के रूप में । इसके अलावा कई भाषायें प्रचलित हैं, जो मानक भाषा के रूप में अबतक स्वीकृतिप्राप्त नहीं हैं । मानक भाषाओं के प्रचार-प्रसार साहित्यिक दिशा से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं । भारत में आर्य-परिवार एवं द्राविड़-परिवार की भाषायें प्रचलित हैं भाषाविज्ञान के दृष्टिकोण से । उत्तर भारत में विशेषतः आर्य-परिवार की भाषायें जैसे हिन्दी, ओड़िआ, बंगाली, असमिया, पञ्जाबी, गुजराटी, मराठी इत्यादि । दक्षिण भारत में प्रचलित भाषायें द्राविड़ परिवार के अन्तर्गत हैं, जैसे तेलगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम इत्यादि । अधिकांश भारतीय भाषाओं का मूल आधार संस्कृत है । इसलिये संस्कृत ‘भाषा-जननी’ के नाम से सुपरिचित है ।

भाषा मुख से बोली जाती है । परन्तु लिखनेके लिये अर्थात्‌ भाषा में व्यक्त किये गये भाव को साकार रूप देने के लिये भाषा की ‘लिपि’ आवश्यक होती है । मुख से उच्चारित वर्ण-ध्वनियों को एक स्पष्ट रूप देने के लिये उस वर्ण-ध्वनि के द्योतक एक स्वतन्त्र वर्ण की आवश्यकता रहती है । वास्तव में देखा गया है कि कुछ भाषाओं की अपनी भाषानुगत स्वतन्त्र लिपि है और कुछ भाषाओं की अपनी स्वतन्त्र लिपि नहीं है । उदाहरण-स्वरूप, संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है, परन्तु इसकी कोई संस्कृत लिपि नहीं है । इसकी लिपि है ‘देवनागरी’ । हिन्दी भाषा की कोई हिन्दी लिपि नहीं है । देवनागरी लिपि को ही हिन्दीभाषा की लिपि के रूप में अपनाया गया है । ओड़िआ, बंगाली, असमिया, गुजराटी, मराठी, पञ्जाबी आदि भाषाओं की अपनी अपनी स्वतन्त्र लिपियाँ हैं एवं देवनागरी लिपि के आधार पर वर्ण निर्धारित किये गये हैं । दक्षिण भारत की तेलगु, कन्नड़, मलयालम प्रभृति भाषाओं की अपनी अपनी स्वतन्त्र लिपियाँ हैं । जिस भाषा की एक स्वतन्त्र लिपि होती है, उसकी एक स्वतन्त्र पहचान होती है । परन्तु ऐसी स्थिति सर्वत्र नहीं है ।

भारत में कई जातियों, वर्णो, धर्मों, भाषा-भाषियों के लोग रहते हैं । अपने हृदय के भावों को प्रकट करनेवाली भाषा की लिपि भी अनेक प्रकार है । फिर भी भारत में एक ऐसी प्राचीन लिपि अबके आधुनिक युग में नित्य-नूतन लिपि के रूप में स्वीकृत है, वह है ‘देवनागरी’ लिपि । भारतवासियों को एक सूत्र में जोड़ने के लिये जैसे ‘भारतीयता’ एक अद्वितीय साधन है, वैसे सभी भारतीय भाषाओं के एक सूत्र में सम्पर्क स्थापन हेतु देवनागरी लिपि एकमात्र उपयोगी साधन है आजके भारतवर्ष में ।

भाषा की उत्पत्ति की तरह लिपि की उत्पत्ति के बारे में पर्याप्त मतभेद पाया जाता है । भावों को पूर्णतया अभिव्यक्त करनेके लिये भाषा सम्पूर्ण समर्थ नहीं रहती । उसी प्रकार लिपि भी सर्वत्र उच्चारित भाषा को पूर्णतया अभिव्यक्त नहीं कर पाती । जैसे काकु आदि के द्वारा उच्चारित ध्वनि-विशेषताओं को लिपि पूर्णतया प्रकाशित नहीं कर सकती । शब्द और अर्थ का सम्बन्ध सर्वत्र यौगिक न होकर रूढ़ होता है । उसी प्रकार ध्वनि या वर्ण (लिपि-संकेत) का सम्बन्ध भी रूढ़ होता है । एक ही ध्वनि के लिये विभिन्न लिपियों में अलग अलग संकेतों या लिपि-चिह्नों का प्रयोग होता है । उदाहरण-स्वरूप, देवनागरी लिपि के ‘क्‌’ व्यञ्जन वर्ण के लिये रोमन लिपि में ‘k’, ‘c’, ‘q’ आदि का प्रयोग देखा जाता है ।

लिपि का प्राचीनतम स्वरूप चित्रलिपि माना जाता है । चित्रलिपि में प्रत्येक स्थूल वस्तु के लिये उस वस्तु-जैसा चित्र बनाने के कारण उसमें अनगिन संकेतों की आवश्यकता रहती थी । लिपि-संकेतों की पृथक्‌ता, अधिक स्थान एवं समय की आवश्यकता रहती थी । परन्तु प्रेम, उत्साह, दुःख, आनन्द आदि सूक्ष्म भावों को व्यक्त करने में चित्रलिपि असमर्थ थी । चित्रलिपि के दोषों का निराकरण करने के लिये बाद में ऐसी एक लिपि का प्रयोग हुआ, जिसमें कुछ निश्‍चित चिह्नों द्वारा, जैसे कुछ बिन्दुओं या रेखाओं द्वारा निश्‍चित भावों को व्यक्त किया जा सके । मनुष्य ने उसी दिशा में आगे चलकर ध्वनि-लिपियों का व्यवहार किया, जो आज भी प्रचलित होती हैं । भाषा में व्यवहृत ध्वनियों के लिये ध्वनि-चिह्नों या वर्णो का प्रयोग किया जाता है और उन वर्णों द्वारा भावों को व्यक्त किया जाता है । देवनागरी, रोमन, अरबी आदि लिपियाँ ध्वनि-लिपि के अन्तर्गत हैं ।

भारत की प्राचीन लिपियाँ दो हैं , ब्राह्मी और खरोष्ठी । भाषाविज्ञानियों का मत है कि ब्राह्मी लिपि मूलरूप से भारतीय है । इस लिपि का अस्तित्व ख्रीष्टपूर्व ५०० से ख्रीष्टाब्द ३५० तक माना जाता है । उत्तरी शैली और दक्षिणी शैली के रूप में इस लिपि का द्विविध विकास हुआ था । विद्वानों का मत है कि ब्राह्मी लिपि से ही आधुनिक देवनागरी लिपि की उत्पत्ति हुई है । ब्राह्मी की उत्तरी शैली की अन्तर्गत गुप्त-लिपि और कुटिल-लिपि क्रमशः देवनागरी लिपि के रूप में विकसित हो गई हैं । इसका प्रयोग भारत में प्राय दशवीं शताब्दी से स्वीकृत है । प्रारम्भ में इसके वर्णों पर शिरोरेखा नहीं लगती थी । प्राचीन नागरी लिपि को सम्मान देने के लिये बाद में इसका नाम ‘देवनागरी’ दिया गया है ।

‘नागरी’ नाम के बारे में भी कुछ मतभेद हैं । नगर में प्रयुक्त होनेके कारण ‘नागरी’ लिपि का नामकरण कुछ मानते हैं । कुछ विद्वानों का मत है कि नागर ब्राह्मणों में प्रचलित होनेके कारण लिपि का नाम नागरी हुआ है । और कुछ विद्वानों का मत है कि तान्त्रिक यन्त्र देवनगर की आकृति से इस लिपि के वर्णों का साम्य होनेके कारण देवनागरी नाम हुआ है । ‘नागरी’ या ‘देवनागरी’ जो भी हो, आजकल की वैज्ञानिक भाषा-पद्धति में इस लिपि की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है ।

देवनागरी लिपि में लिपिगत उत्कृष्टता सभी प्रकार से विद्यमान है । किसी भी उपादेय और उत्कृष्ट लिपि में ध्वनि और वर्ण में सामञ्जस्य होना चाहिये । भाषा की ध्वनियों में और उन्हें अभिव्यक्त करनेवाले लिपि-चिह्नों में जितनी अधिक समानता होती है, वही लिपि उतनी ही अधिक उत्कृष्ट मानी जाती है । देवनागरी में यह विशेषता पूर्णतया उपलब्ध है । उच्चारण के अनुरूप ही वर्ण-निर्धारण किया जाता है । जो बोला जाता है, वह लिखा जाता है, और जो लिखा जाता है, वह बोला जाता है । देवनागरी की यही एक विशिष्ट पहचान है । दूसरा महत्त्वपूर्ण लक्षण है एक ध्वनि के लिये एक ही संकेत । एक ध्वनि के लिये अनेक संकेत या अनेक ध्वनियों के लिये एक ही संकेत लिपि का बड़ा दोष माना जाता है । रोमन्‌ आदि लिपि में ऐसा दोष दृष्टिगोचर होता है । जैसे रोमन्‌ लिपि में एक ही ‘क्‌’ ध्वनि उच्चारण करने के लिये एकाधिक संकेत हैं । उदाहरण–स्वरूप k (king), c (call), ck (cuckoo), ch (chemical), q (quick) इत्यादि । एक संकेत ‘u’ कहीं ‘अ’ रूप में उच्चारित होता है, जैसे ‘but’ (बट्‌), ‘cut’ (कट्‌), और कहीं कहीं ‘उ’ रूप में, जैसे ‘put’ (पुट्‌) । फिर एक संकेत ‘o’ कहिं ‘अ’ रूप में (pot, पट्‌) तो कहीं ‘उ’ के रूप में (to, टु), कहीं ‘ओ’ रूप में (note, नोट्‌) उच्चारित होता है । ऐसे अन्य अनेक उदाहरण मिल सकते हैं । परन्तु देवनागरी लिपि में यह दोष बिलकुल नहीं ।

उत्कृष्ट लिपि का और एक विशेष गुण है लिपि-संकेतों द्वारा समस्त ध्वनियों की अभिव्यक्ति । देवनागरी में यह सम्पूर्ण विद्यमान है । लिपि का और एक गुण है असन्दिग्‌धता । एक ध्वनि-संकेत में अन्य किसी ध्वनि का सन्देह नहीं होना चाहिये । अन्य लिपियों की अपेक्षा देवनागरी में ये उत्कृष्टतायें सर्वाधिक उपलब्ध होती हैं । इसमें कोई भ्रान्ति या संशय का अवकाश नहीं होता । इसप्रकार अनुशीलन से यह निष्कर्ष निकलता है कि देवनागरी वास्तव में एक उत्कृष्ट लिपि है । व्यावहारिक एवं भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह सर्वथा युगोपयोगी रूप में स्वीकृत है ।

भाषा एक प्रवहमान धारा है । समयानुसार नदी-जल की तरह इसमें परिवर्त्तन होता रहता है । लिपियों में भी आवश्यकतानुसार परिवर्त्तन होता है । परन्तु देवनागरी ऐसी एक भव्य सुन्दर और उत्तम लिपि है जो समस्त भारतीय भाषाओं के सम्पर्क-सूत्र के रूप में प्रयुक्त हो सकती है । उत्तरभारत में हिन्दी का विशेष प्रचलन है, लेकिन दक्षिण भारत में हिन्दी को ग्रहण करने के लिये सर्वसम्मति प्राय नहीं है, चूँकि दक्षिण में प्रचलित तमिल, कन्नड़ आदि द्रविड़ भाषाओं की स्वतन्त्र लिपियाँ तथा प्रयोग हैं ।

आज की परिस्थिति में भाषा-जननी संस्कृत जैसे सभी भाषाओं को जोड़नेवाला एक सम्पर्क-सूत्र रूप में उपयोगी है, उसी प्रकार देवनागरी लिपि सभी भारतीय भाषा-लिपियों को जोड़नेवाला सम्पर्क-सूत्र के रूप में अत्यन्त उपादेय है । आर्य परिवार एवं द्रविड़ परिवार की अन्तर्गत सभी भाषाओं की लिपियों की अभिव्यक्ति एक महाभारतीय लिपि देवनागरी में प्रस्तुत की जा सकती है । आजकल आन्तर्जातिक स्तर पर रोमन्‌ लिपि के साथ सम्पर्क स्थापन करनेमें देवनागरी लिपि का ही ग्रहण किया जा रहा है । इससे किसी भी भाषा-भाषी को भ्रम या सन्देह का अवसर नहीं रहता । देवनागरी में लिखनेसे भारतीय स्तर पर एक स्वतन्त्र पहचान होती है, जो सभी भाषा-भाषियों के लिये सरल है और प्रान्तीय स्तर पर अपनी ही लिपि रहनेसे व्यवहार में सौकर्य होता है । इसप्रकार देवनागरी लिपि भारतीय स्तर पर सभी भाषाओं की लिपियों का सर्वोत्कृष्ट सम्पर्क सूत्र बनकर अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है । आधुनिक वैज्ञानिक युग में अन्तर्जाल पर देवनागरी लिपि का व्यापक प्रयोग उसकी विशेषता का एवं सार्थकताका सुपरिचायक है । इण्टर्नेट्‌ के अतिरिक्त कम्प्युटर और मोबाइल्‌ फोन्‌ आदि में भी देवनागरी लिपि की स्थिति एवं प्रयोग इस लिपि के महत्त्व को बढ़ानेमें बहुत सहायक सिद्ध हैं ।
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Courtesy :
Srijangatha (Hindi E-Magazine) Feb. 2011 Issue

Saturday, February 12, 2011

Kumāra-Sambhava, Canto-V (Oriya, Part-3): Dr. Harekrishna Meher

Kumāra-Sambhava (Canto-V)
Original Sanskrit Mahākāvya by : Poet Kālidāsa   
Oriya Version by : Dr. Harekrishna Meher     
(Extracted from Complete Version of the Epic)   
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Theme of Canto-5 : Penance of Parvati
Number of Verses : 86    

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(Entire Oriya Version of Canto-5th
with elaborate Introduction has been published in
‘Bartika’, Literary Quarterly, Dashahara Special Issue,
October-December 2001, pp. 169 – 203,
Dasarathapur, Jajpur, Orissa)
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Part-1  comprises Verses 1 to 29.
Part-2 comprises Verses 30 to 62.
Part-3 comprises Verses 63 to 86.
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For Part-1, please see : 

http://hkmeher.blogspot.com/2011/01/kumara-sambhava-canto-v-oriya-version.html
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For Part-2, please see : 

http://hkmeher.blogspot.com/2011/01/kumara-sambhava-canto-v-oriya-part-2.html
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कुमार-सम्भव (पञ्चम-सर्ग)
मूल संस्कृत महाकाव्य : महाकवि कालिदास
ओड़िआ पद्यानुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
(महाकाव्यर संपूर्ण पद्यानुवादरु आनीत)
*
विषय : पार्वतीङ्क तपस्या ।
राग : चोखि
तृतीय भाग : श्‍लोक ६३ रु ८६
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[63]
स्वभाबे से लाजकुळी
तरुणी निज मुकुळी-
कृत कोमळ अङ्गुळि-
अग्रे तदन्ते,
घेनि स्फटिकर माळी
अद्रिराज-प्रियबाळी
संक्षेपरे भाळि भाळि
कौणसि मते ।
ब्रह्मचारी-सम्मुखे गिर,
प्रकाश करिले निजे मधुर धीर ॥
*

[64]
“बेदज्ञबर ! तुमरि
सम्मुखरे सहचरी
ब्यकत कले य़ेपरि
मोर बिषये,
से सबु अट‍इ सत
शिब-लाभर उन्नत
पद हेबाकु प्रापत
इच्छे हृदये ।
तेणु मुहिँ तपे तत्पर,
अबिषय नाहिँ किछि मनोरथर ॥

*

[65]
बटु प्रकाशिले पुण,
“गिरीन्द्र-नन्दिनि ! शुण
जाणिछि मुँ शिब-गुण
केउँ भरमे,
आउ तुमे ताङ्क पाश
करुछ श्रद्धा प्रकाश,
सदा ताङ्करि अभ्यास
अशुभ कर्मे ।
एहा चिन्ति तुम कार्य़्यर,
समर्थने न इच्छ‍इ मन मोहर ॥
*

[66]
आगो ! अपदार्थे मन
बळाइअछ केसन ?
बिबाह काळे शोभन
हस्त तुमरि,
मङ्गळ सूत्रे मण्डिब
किन्तु सर्प-य़ुक्त शिब-
कर ग्रहणे दिशिब
शोभा किपरि ?
से पाणिकि तुमरि पाणि,
सहिब कि आद्य बार, कह कल्याणि ! ॥
*

[67]
उत्तम रूपे निजर
चित्ते थरे चिन्ता कर
ग‍उरि ! कह तुमर
शुभ सुरुचि,
हंस-चिह्नित अम्बर
पुनराय शिबङ्कर
रकत-स्राबी कुञ्जर-
चर्म अशुचि ।
ए उभय एक ठाबरे,
रहिबा य़ोग्य हो‍इबे केउँ भाबरे ?
*

[68]
पुष्प-बिञ्चित प्रासाद-
तळे रखि मृदु पाद
बिहरुअछ आह्लाद-
मानसे तुमे,
लाक्षारस-सुरञ्जित
से पाद हेब स्थापित
परेत-केश-पूरित
श्मशान-भूमे ।
ए कथार अनुमोदन,
करिब कि बैरी हेले मध्य से जन ?
*

[69]
य़दि तुम पाइँ शिब-
बक्ष सुलभ हो‍इब,
कह एथिरु अतीब
अरुचिकर,
किस अछि अनुचित ?
हरिचन्दन- चर्चित
तुम उरजे निश्‍चित
ताङ्क बक्षर ।
चिता भस्म-धूळि बिशेष,
स्थान ग्रहण करिब लभि आश्‍लेष ॥
*

[70]
तुमे परिणय परे
बसि गजेन्द्र उपरे
चळन्त बधू रूपरे
पति-निबास,
मात्र य़ेबे बृद्ध बृषे
आरोहि य़िब सुदृशे !
ता देखि महापुरुषे
करिबे हास ।
ए त बिड़म्बना अपर,
रहिअछि परा सम्मुखरे तुमर ॥
*

[71]
कपाळीङ्कर प्रापति
कामना हेतु सम्प्रति
उभये भजिले गति
कि शोचनीय,
प्रथम सेहि शङ्कर-
शिरे राजित सुन्दर
मृदु लेखा चन्द्रङ्कर,
तुमे द्वितीय ।
बिश्‍वजन-नेत्र-चान्दिनी,
क्षीण हेल आगो गिरिराज-नन्दिनी ॥
*

[72]
शङ्कर त त्रिलोचन
तेणु बिरूप बदन
ताङ्क जन्म कदाचन
नुह‍इ लक्षि,
अटन्ति से दिगम्बर
मृगाक्षि ! बिचार कर
सम्पत्ति केते मातर
थिबे से रखि ।
बर लागि खोजा य़ेतेक,
ताङ्क पाशे सतरे कि रहिछि एक ?
*

[73]
सुन्दरि ! एथि निमित्त
मन्द अभिळाषुँ चित्त
कर तुमे निबर्त्तित
न हो‍इ बणा,
काहिँ से अरुचिकर
करमे श्रद्धाळु हर ?
काहिँ तुमे मनोहर
शुभ-लक्षणा ?
सज्जन श्मशान-शूळरे,
य़ज्ञ-स्तम्भर संस्कार केबे न करे ॥

*

[74]
बटु-बदनुँ स्फुरित
कटु कथा बिपरीत
शुणि उमा जर्जरित
हो‍इले रागे,
रक्त अधर कम्पाइ
रङ्ग नयने अनाइ
भूरु य़ुगळ बङ्काइ
ताङ्करि आगे ।
अनादरे बक्र ठाणिरे,
निरेखिले गिरिबाळा ब्रह्मचारीरे ॥
*

[75]
बो‍इले से , “ बास्तबरे
महादेब बिषयरे
नाहँ तुमे हृदयरे
य़थार्थ जाणि,
तेणु मोते एपरि त
कहुअछ बिपरीत,
तत्त्वज्ञान-बिरहित
अधम प्राणी ।
महात्माङ्क असाधारण,
अचिन्त्य चरिते करे दोषारोपण ॥
*

[76]
बिपत्ति निबारिबारे
सम्पत्ति लाभ आशारे
माङ्गल्य बस्तु संसारे
पुरुष सेबे,
शङ्कर त त्रिभुबन
करिथाआन्ति पाळन
कामनारे ताङ्क मन
न बळे केबे ।
चित्त-बृत्ति-दूषणकर,
माङ्गळिक द्रव्ये किस हेब
हेब ताङ्कर ?
*

[77]
अकिञ्चन से ईशान
सर्ब-ऐश्‍वर्य़्य़-निधान
बास हेलेहेँ श्मशान
त्रिलोकनाथ,
से भीम-स्वरूपधर
बिदित अछि ताङ्कर
नाम सुमङ्गळकर
‘शिब’ य़थार्थ ।
नाहिँ केहि जगते जन,
प्रकृत रूप जाणिबा पाइँ भाजन ।
*

[78]
बिश्‍वमूर्त्ति शिब-अङ्ग
भूषण य़ोगे सुरङ्ग
हेउ अथबा भुजङ्ग-
परिबेष्टित,
गजचर्म- परिहित
अबा दुकूळ-मण्डित
हेउ अथबा निश्‍चित
कपाळान्वित ।
अबा चन्द्रशेखर सेहि,
ए समस्त बास्तबरे न जाणे केहि ॥
*

[79]
श्मशान-भस्म शिबङ्क
कळेबर-सम्परक
लभि पबित्र-कारक
हुए तक्षण,
ताण्डब नृत्य काळरे
अङ्गु पड़िले तळरे
चिता-धूळिकि आदरे
देबतागण ।
पूत मणि आनन्दभरे,
लेपन करिथाआन्ति मस्तक परे ॥
*

[80]
शिब हेलेहेँ निर्द्धन
बृषभे कले गमन
ताङ्क पयरे सुमन-
बृन्द-नायक,
अ‍इराबत-बाहन
इन्द्र बिनये बन्दन
करि निज शिर-लग्न
पारिजातक -
पुष्पर लोहित परागे,
अङ्गुळि रञ्जन्ति ताङ्क चरण-भागे ॥
*

[81]
तुमे त दुःशीळ जन
इच्छि दोष दरशन
शिब-बिषये य़ेसन
कहिल भाबि,
तहिँ एक सत्य बाणी
निश्‍चय अछ बखाणि
अटन्ति से शूळपाणि
महाप्रभाबी ।
य़ाहाठारु सम्भूत ब्रह्मा,
किपरि बा न हेबे से अलक्ष्य-जन्मा ?
*

[82]
बिबादे कि प्रयोजन ?
मो पाशे तुमे य़ेसन
शिब सम्बन्धे बचन
कल प्रकाश,
से स्वरूपधारी हर
हेलेहेँ अछि मोहर
प्रेमी मन निरन्तर
ताङ्करि पाश ।
स्वेच्छारे य़े कर्म आचरे,
लोक-निन्दा प्रति से न भ्रूक्षेप करे ॥


[83]
देख सखि ! ब्रह्मचारी
अधर स्फुराइ भारि
इच्छन्ति किस बिचारि
कहिबा लागि,
बारण कर चञ्चळ,
महात्माङ्कु य़ेउँ खळ
निन्द‍इ से न केबळ
पातकभागी ।
ता ठारु य़े निन्दा शुण‍इ,
सेहि लोक मध्य पापभागी हु‍अ‍इ ॥
*

[84]
नोहोले मुहिँ एठारु
चालिय़िबि ” बोलि चारु-
गात्री ब्यस्ते उठिबारु
बक्षुँ ताङ्कर,
बल्कळ पड़िला खसि
पाद बढ़ान्ते रूपसी
सप्रेम मन्दे बिहसि
इन्दुशेखर ।
बृषध्वज स्वरूप धरि,
उभा हेले पार्बतीङ्कि बारण करि ॥
*

[85]
ताङ्कु देखि कुमारीर
थरिला मृदु शरीर
भाबाबेशे स्वेद-नीर
ब्यापिला बहि,
ऊर्द्ध्वे रखि सम्मुखीन
चरणटि गतिहीन
न पारिले य़ाइ कि न
पारिले रहि ॥
प्रबाह-पथरे पर्बत,
रोधिले आकुळा नदी हुए य़ेमन्त ॥
*

[86]
बो‍इले शशाङ्कधर,
“आजिठारु मुँ तुमर
तपे क्रीत परिकर
हेलि शोभने !
शुणि ए प्रिय भारती
हेले उमा हृष्ट-मति
तप-कष्टरु बिरति
नेले बहने ।
इष्ट सिद्धि हेले निश्‍चिते,
जणा न पड़‍इ पूर्ब श्रम किञ्चिते ॥
* * * 


Translator’s Conclusion
[87]
काळिदासङ्क अमृत
लेखनीरु बिनिःसृत
कुमारसम्भबे कृत
सर्ग पञ्चम,
मेहेर हरेकृष्णर
उत्कळीय भाषान्तर
मोहु सुजन-अन्तर
सुमनोरम ।
छयाअशी श्‍लोके रचना,
पूर्ण्ण हेला अपर्ण्णाङ्क तप बर्ण्णना ॥

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(Kumara-Sambhava, Canto-V)  
Oriya Translation of Dr. Harekrishna Meher 

COMPLETED 
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Related Link : 
Kumara-Sambhava Kavya : Odia Version by Dr. Harekrishna Meher :
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Translated Works of Dr. Harekrishna Meher : 
http://hkmeher.blogspot.in/2016/08/translated-works-of-dr-harekrishna-meher.html

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