Monday, August 31, 2009

Circumambulation (English Poem): Dr. Harekrishna Meher

By : Dr. Harekrishna Meher
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Yours is the happiest home
where permeates the hymnal Om.
You are the sole dictator.
Of mundane drama, the dexterous director.
Everyone an actor
whether good, bad, patriot or traitor,
actually acts
crossing through several uneven tracts,
just as a troublesome travelling tractor
forms the benefactor
of joys and sorrows,
observing or violating own vows.

Pondering over the arena
of ‘what’, ‘where’, ‘whence’, ‘how’ and ‘why’,
the eternal phenomena
none can deny,
one feels nonplussed;
but as the bar is crossed,
attains freedom
and shunning roaming at random
perceives in time,
the thoughtful theme
of own life’s epic,
and of heart’s violin
the melodious music,
devoid of din.

The essence of intelligentsia,
that is the ambrosia
eradicating lethargy
of inner inertia
and infusing effulgent energy
of peace-pouring panacea.

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Extracted from : 
Poems of the Mortals (English Poems)  
By : Dr. Harekrishna Meher

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Wednesday, August 19, 2009

Sanskrit Song 'Bhāratīyā Vayam' (भारतीया वयम्): Dr.Harekrishna Meher

Bhāratīyā Vayam (Sanskrit Song) 
Lyrics and Tuning By : Dr. Harekrishna Meher
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भारतीया वयम्     
गीति-रचना तथा स्वर-रचना :
डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः 
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भारतीया वयम्, भारतीया वयम् ; 
भारतं नो मातृ-भूमी माननीया स्वयम् । 
भारतीया वयम् ॥ (ध्रुवम्) 
जयतु जम्बूद्वीप-तिलकं भास्वरम्, 
जयतु हिन्दुस्थानमतुलं सुन्दरम् । 
कर्म-भूमी रत्न-कम्रा सत्‍फला, 
स्वर्ग-सुगुणा कला-निपुणा पुष्कला । 
वैरि-दलने वीर-सेना विजयते निर्भयम् । 
भारतीया वयम् ॥ (१) 
अहिंसाया दिव्य-वाणी शंसिता, 
भ्रातृ-मैत्री हृदय-कमलोद्‌भासिता । 
यत्र वार्त्ता मानविकता कीर्त्तिदा, 
ऐक्य-मन्त्रं वहति महतां संविदा । 
त्रिरङ्गा नो मङ्गलमयी चिरं तनुते जयम् । 
भारतीया वयम् ॥ (२) 
आत्मिकं नो बन्धनं सद्‌भावनम्, 
शान्ति-मधुरं भवतु जगतां पावनम् । 
मातृ-चरणे भक्ति-पूताराधना, 
अभीष्टा नो जयतु राष्ट्रिय-भावना । 
देश-रक्षा-विधौ दक्षा अद्वितीया वयम् । 
भारतीया वयम् ॥ (३) 
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(इयं गीतिका रूपक-तालस्य अथवा दीपचन्दी-तालस्य मध्य-लयेन परिवेषणीया ।) 
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(Published in ‘Sangeet’, Music Magazine, April 2004 Issue, page-56, 
Sangeet Karyalaya, Hathras, Uttar Pradesh, India.)
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Related Link :
‘Pushpanjali-Vichitra’ (Giti-Kavyam):
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Contribution of Dr. Harekrishna Meher to Sanskrit Literature:

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Thursday, August 13, 2009

English Version Book of “Tapasvini Kavya” Inaugurated


My Complete English Version Book
of Oriya Kavya “ Tapasvini ” Inaugurated.
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Poet Gangadhar Meher (1862-1924) is well-known as 'Prakriti-Kavi' of Oriya Literature. Every year on the day of Sravana Purnima, his Birth-Day is enthusiastically celebrated with much pomp and ceremony all over Orissa. His popularity has been so wide-spread that even in small villages and schools, his Jayanti Celebration is endearingly organized in his honour.

On the occasion of 147th Jayanti Celebration of Poet Gangadhar Meher on Sravana Purnima (5-8-2009) in Poet’s native place Barpali of Orissa state, the English Book entitled
(Complete English Translation by : Dr. HAREKRISHNA MEHER)
was inaugurated in the Function organized by Gangadhar Sahitya Parishad, Barpali at Kavi Bhavan, the sacred home where the poet composed his immortal literary works.
The Book (ISBN : 81-87661-63-1. Pages-220) has been published by :
R.N. Bhattacharya (Book Publishers and Exporters),
A-217, H.B. Town, Road No.- 4, Sodepur, Kolkata- 700110, India.

In this Celebration, Esteemed Guests and august personalities present were the noted writer and litterateur Padmashri Srinivas Udgata, Prof. Narayan Pruseth (Retired Principal of Women’s College, Bargarh and President of State Level Swabhava-Kavi Gangadhar Smruti Samiti, Barpali, Orissa) and Prof Ramakant Ray, Ex-Principal of Barpali College and President of Gangadhar Sahitya Parishad, Barpali. Members of Orissa Sahitya Akademi along with Dr. Tirthananda Mishra and Dr. Krishna Keshava Sadangi were also present there. Dr. Manindra Kumar Meher anchored in this Celebration. The Function was accomplished with various literary discussions in honour of the Poet. Prof. Pruseth presented reviews of the English 'Tapasvini' Book discussing the universal value-based writings of Poet Gangadhara Meher. The Book was well appreciated by the learned audience and media-persons of several newspapers as well as of Doordarshan, ETv and other channels.

The Book has been Dedicated by the Translator to the Sacred Memory of his Revered Father Poet Narayan Bharasa Meher and Mother Srimati Sumati Devi.

Back Cover Jacket bears the following passage :
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Poet's Philosophy of Life elucidated in the mouth of River Tamasa is noteworthy :

" Wandering over several woods wide,
never wavering astray
by illusion of any gorge,
surmounting many an impediment
in my life limpid,
never deeming darkness
as a distress,
never thinking light
to be a delight,
for a remote way
ahead I’ve continued to forge
with my head humbly bent.
Gratifying every bank-dweller
with offering of water,
fruitfulness of my birth
I’m realizing worth." .
(Tapasvini, 4/11)
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(Here it is worth-mentioning that onour of the Poet. Prof. Pruseth presented reviews of the
Tapasvini 's Complete Hindi Rendering
by Dr. Harekrishna Meher
has been published by Sambalpur University, Jyoti Vihar, Burla, Sambalpur, Orissa in 2000 and has been appreciated by the loving readers.)
(Front Cover of " TAPASVINI " Hindi Book)
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Saturday, August 8, 2009

Sāhitya Mein Mūlyabodh (साहित्य में मूल्यबोध): Harekrishna Meher

Sāhitya Mein Mūlyabodh
(Sense of Social Value in Literature)  
Hindi Article By : Dr. Harekrishna Meher    
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साहित्य में मूल्यबोध
 * डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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जीवन, साहित्य और समाज - ये तीनों तत्त्व परस्पर अन्तरंग रूप से जुड़े हुए हैं । जीवन की सुख-दुःखभरी नाना अनुभूतियों को लेकर साहित्य में शृंगार, हास्य, करुण आदि नव रसों की अवतारणा की गयी है । साहित्य-शास्त्रियों ने अपनी अपनी रचनाओं में जीवन का तात्त्विक विश्लेषण किया है । साहित्य जब जीवन-धर्मी होता है, तब पाठक और श्रोता के हृदय को विशेष रूप से स्पर्श करता है । काव्य-कविता हो, उपन्यास हो, नाटक हो, कथा हो या अन्य कुछ साहित्यिक रचना हो, हर क्षेत्र में ध्यान देने का विषय है सामाजिक मूल्यबोध । साहित्यिक कृतियों में रचनात्मक तत्त्व यदि सकारात्मक रूप में गर्भित हो, तो समाज पर अनुकूल और स्वस्थ प्रभाव अनुभूत होता है । सारस्वत साधकगण होते हैं समाज के दिग्‌दर्शक एवं असीम-शक्तिशाली व्यक्ति । कुपथ में चलनेवालों को उसीसे निवृत्त करके सत्पथ में आगे बढ़ने के लिये उत्साह और प्रेरणा देना लेखक का धर्म है । प्राणि-जगत् में मंगलकारक तत्त्व-समूह जीवनधर्मी चिन्तन का परिप्रकाश करता है । भारतीय साहित्य में 'उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान् निबोधत', 'असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय' इत्यादि उपनिषदीय वाणी मनुष्य-जीवन को संयत एवं शान्तिमय बनाने में सहायता करती है ।

विधाता की सृष्टि में सारे विश्व में धर्म-अधर्म, सत्य-मिथ्या, सुख-दुःख, आलोक-अन्धकार, भलाई-बुराई, मिलन-विच्छेद और जन्म-मरण आदि कई विरोधी तत्त्व हमेशा परस्पर संघर्ष-रत रहते हैं । मनुष्य के जीवन में धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष - ये चार पुरुषार्थ होते हैं । हर साहित्य में मनुष्य की धर्मशास्त्रीय संहिता या आचरण-पद्धति लिपिबद्ध होती रहती है । सत्कर्मों के फल अच्छे और दुष्कर्मों के फल बुरे होते हैं । ये बातें सर्वत्र भूरि-भूरि प्रतिपादित हुई हैं । इस चिरन्तन चिन्तन-धारा का प्रतिफलन समग्र विश्व-साहित्यों में परिलक्षित होता है । लोक-शिक्षा की दृष्टि से सामाजिक अंगीकार-बद्ध लेखक अपनी रचना में मानव तथा अन्य प्राणियों के जीवन में घटित अच्छाई और बुराई - दोनों दिशाओं का विवेचन करता है । आदिकवि वाल्मीकि-प्रणीत रामायण हो, महामुनि व्यास-कृत महाभारत हो या आधुनिक युग का जो कुछ भी साहित्य हो, सबमें जीवन के कुछ संघर्ष और सफलता का विवरण उपलब्ध होता है । साहित्यशास्त्रियों के मत में 'रामादिवद् वर्त्तितव्यम्, न तु रावणादिवत्' अर्थात् मर्यादा-पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र आदि आदर्श चरित्रों की भाँति अपने को प्रतिष्ठित करना चाहिये, रावण आदि निन्दित चरित्रों की तरह नहीं ।

महाभारतीय वर्णन में खलनायक शकुनि और अभिमानी अहंकारी दुर्योधन आदि कौरव पक्ष के बहुसंख्यक वीर योद्धा थे । परन्तु अन्त में सत्य-धर्म-नीतिवादी युधिष्ठिर आदि पञ्च पाण्डवों की विजय हुई है । असत्य, अन्याय और अधर्म के विरुद्ध संग्राम करके सत्य, न्याय एवं धर्म को प्रतिष्ठित करने में सफल और विजयी हुए हैं धर्म-पक्ष के पञ्च पाण्डव । इसलिये उस महाभारत ग्रन्थ का सार-मर्म है - 'यतो धर्मस्ततो जयः' , जहाँ धर्म है, वहाँ है विजय । यथार्थ में महाभारत के रचयिता वेदव्यास हैं मानव-जीवन के श्रेष्ठ व्याख्याकार । सामाजिक दृष्टि से जीवन में केवल बाह्य संघर्ष नहीं, आभ्यन्तर संघर्ष भी चलता रहता है । काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दुर्गुण मनुष्य को लक्ष्य-भ्रष्ट करके अधोगति की ओर खींच लेते हैं । अच्छाई और बुराई का भेद विचार करके सन्मार्ग में प्रवृत्त होने के लिये समाज को प्रेरणा देती है मूल्यबोध-सम्पन्न साहित्यिक रचना । इसी दृष्टि से साहित्य-सर्जनाकार की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है । नकारात्मक और विनाशात्मक चिन्तन से मनुष्य भली राह से भटक जाता है और अपने लक्ष्य से दूर चला जाता है । इसी कारण साहित्य में आवश्यक हैं सकारात्मक तत्त्व एवं विश्वजनीन उपादेयता ।

साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है । साहित्य-शिल्पी की रचना में कल्पना-विलास एवं वास्तवता का समन्वित चित्रण लेखनी को परिपुष्ट कराता है । केवल वास्तववादी वर्णन करने से कुछ नीरसता आ सकती है । कल्पना में भी वास्तवता का प्रतिफलन मानवीय संवेदना को जगाता है । अग्नि-पुराण में वर्णित है -
"अपारे काव्य-संसारे कविरेव प्रजापतिः ।
यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्त्तते ॥"

काव्य-जगत् का सर्जक है क्रान्तदर्शी कवि । अपनी रुचि के अनुसार लेखनी-चालना करके वह विश्व में परिवर्त्तन ला सकता है । ऐसी शक्ति है कवि-लेखक के पास । साहित्यकार होते हैं सत्य-शिव-सुन्दर के उपासक, रूपकार एवं उद्‌गाता । तत्त्वज्ञ व्यक्ति इन तीन तत्त्वों को हृदयंगम करता है । जीवन को सरस सुन्दर और मधुमय करना साहित्यकार का सारस्वत कर्त्तव्य है । फलस्वरूप साहित्य-जगत् के प्रति उसकी देन सार्वकालिक और अमर हो जाती है ।

साहित्य, संस्कृति, कला, विज्ञान, वाणिज्य आदि हर विधा की प्रगति देश में जरूरी है । देश का बाह्य कलेवर होता है सभ्यता और अन्तरात्मा है संस्कृति । कला, साहित्य एवं संगीत का आदर सामाजिक जीवन को ऊँचे स्तर पर पहुँचाता है । केवल बाह्य शरीर की स्वच्छता नहीं, आत्मा की भी परिष्कृति और निर्मलता चाहिये । साहित्य में संस्कृति का उपयुक्त समावेश लेखकीय विशेषत्व होता है । सारस्वत साधक की लेखनी में कोमलता के साथ कठोरता भी रहती है । अन्याय का निराकरण और न्य़ाय की प्रतिष्ठा के लिये लेखक सदा चेष्टित रहता है । इसलिये लेखनी के कलात्मक सूक्ष्म चित्रण सहित क्रान्तिकारी चिन्तन जन-समाज को उद्‌बुद्ध और अनुप्राणित करता है । प्राणि-जगत् में मधुरादि षड़्‍ रसों के स्रष्टा हैं विश्वविधाता ब्रह्मा । परन्तु काव्य-जगत् में शृंगारादि नव रसों के स्रष्टा है स्वयं कवि । उस कालजयी सर्जक का महत्त्व वास्तव में प्रणिधान-योग्य है । ‘गरिमा कवि की’ है इसप्रकार –

“विधाता से बढ़कर उसकी सृष्टि-रचना ;
भाती अद्‌भुत उसकी उद्‌भावना ।
गूंगे मुख से बहाता
वाणी-गंगा की अमृत-धार ।
पाषाण के अंग में जगाता
मंजुल संजीवनी अपार ॥

लेखनी में उसकी छा जाती
सहस्र सूर्य-रश्मियों की लालिमा ।
अंशुमाला उज्ज्वलता फैलाती ;
हट जाती तिमिर-पटल की कालिमा ॥

वही कवि तो है क्रान्तदर्शी,
सार्थक उसकी रचना मर्मस्पर्शी ।
अतीन्द्रिय अतिमानस के राज्यों में विहर
भाती उसकी प्रतिभा सुमनोहर ॥

रस-रंगों के संगम की तरंगों से,
जीवन की विश्वासभरी उमंगों से
लिखता रहता कवि निहार चहुँ ओर,
कभी मधुर सरस, कभी तीता कठोर ॥

उसकी कुसुम-सी कोमल कलम
जब करने लगती सर्जना,
निकलती कभी संगीत संग गूँज छमछम,
फिर कभी स्वर्गीय वज्रों की गर्जना ॥" 

हमारे समाज में प्रतिभा की कमी नहीं है । जरूरत है प्रतिभा के विकास के लिये उपयुक्त समय, सुयोग एवं परिवेश की । चारित्रिक उत्कर्ष शिक्षा का प्रधान लक्ष्य और जीवन-चर्या का अत्यन्त आवश्यक तत्त्व है । आज के विज्ञान-युग में मनुष्य असाध्य साधन करने में समर्थ है । परन्तु मानसिक एवं मानविक दृष्टि से वह प्रगति के बदले अधोगति की ओर चल पड़ा है । इसी कारण आध्यात्मिक चेतना का विशेष प्रयोजन अनुभूत हो रहा है । भौतिक और यान्त्रिक शक्ति से उन्मत्त होकर आज का मनुष्य केवल स्वार्थी बन गया है । वह स्वयं मनुष्य-जाति एवं प्रकृति पर अकथनीय अत्याचार करने लगा है । इसके परिणाम-स्वरूप सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण प्रदूषित और विपर्यस्त हो गया है । सारा सन्तुलन बिगड़ गया है । भस्मासुर की भाँति मनुष्य के औद्धत्यभरे आचरणों से प्रतिक्रिया-स्वरूप सुनामी-जैसे प्राकृतिक विपर्ययों की घटना आश्‍चर्यजनक नहीं है । मनुष्य के लिये यह एक गुरुत्वपूर्ण चेतावनी है । मनुष्य के ऊर्ध्व में एक अदृश्य शक्ति है, जो सबको नियन्त्रित कर रही है । महाकाल ही अमित-बलवान् है । प्रकृति की गोद में पले हुए मनुष्य को प्रकृति की सुरक्षा हेतु यत्‍नवान् होना चाहिये । साहित्य-साधक महामनीषियों ने वैदिक युग से ही प्रकृति और मनुष्य के बीच अन्तरंग आत्मिक संबन्ध का सुन्दर वर्णन किया है ।

आज के विशृंखलित और ध्वंसाभिमुखी समाज को सन्मार्ग पर प्रवृत्त और परिचालित करने हेतु लेखनी-शक्ति की विशिष्ट पहचान होनी चाहिये । अपसंस्कृति के दूरीकरण एवं आध्यात्मिक चिन्तन-धारा में कर्मों के आचरण से ही सांस्कृतिक महत्त्व को सुरक्षित रखने में सहायता प्राप्त होगी । दृढ़ मनोबल, आत्म-विश्वास एवं सदाचार द्वारा समाज में स्वच्छ परिवेश की सर्जना की जा सकती है । देश को समृद्ध और सुसंस्कृति-सम्पन्न करने में नारी-पुरुष सभीको राष्ट्रीय कर्त्तव्य निभाना है । भारतवर्ष को एक महनीय महान् देश के रूप में सुप्रतिष्ठित करने के लिये मन, वचन और कर्म का त्रिवेणी-संगम आवश्यक है । केवल वाक्य-वीर न होकर धर्म-वीर एवं कर्म-वीर के रूप में अपने को प्रतिपादन करने से मनुष्य-जन्म की सार्थकता बनी रहेगी ।

वर्त्तमान के कम्प्युटर-युग में सारा विश्व एक परिवार-सा बन गया है । महापुरुषों की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’- भावना साकार होने लगी है । इसी परिवेश में समाज और मातृभूमि के उत्कर्ष हेतु साहित्यकारों के युगानुरूप रचनात्मक अवदान सर्वथा स्वागतयोग्य एवं अपेक्षित हैं । प्रतिभाशाली व्यक्तिगण विविध क्षेत्रों में कृतित्व अर्जन करके देश के गौरव बढ़ायें । कलम और कदम साथ–साथ आगे चलें । विश्व-नीड़ में मानवता का सौरभ वितरण करना जीवन का ध्येय बने । विश्वबन्धुता, मैत्री, प्रेम और शान्ति की पावन धारा सभीके हृदय को रसाप्लुत एवं आनन्दमय करे ।

'शान्ति-मन्त्रो जयतु नितरां सौम्य-गाने,
प्रेम-गङ्गा वहतु सुजला ऐक्य-ताने ।
निवसतु सुखं विश्व-जनता
लीयतां ननु दनुज-घनता ;
चूर्णय त्वं वैर-वर्वर-पर्वतम् ।
प्राणिनां संवेदना  जायतां सद्‌भावना
भातु सत्यं सुन्दरं शिव-शाश्वतम् ।
भारतम्, भ्राजतां नो भारतं प्रतिभा-रतम् ॥'

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Srijan-Gatha : Article Link :
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Reference : सृजनगाथा : 

Monday, August 3, 2009

स्वभावकवि गङ्गाधर मेहेर (Poet Gangadhara Meher: An Immortal Genius): Dr. Harekrishna Meher

Swabhava-Kavi Gangadhar Meher : Ek Amar Pratibha 
Hindi Article By: Dr. Harekrishna Meher 
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स्वभावकवि गङ्गाधर मेहेर : एक अमर प्रतिभा 
* डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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(२००९ श्रावण पूर्णिमा कवि गङ्गाधर मेहेर जयन्ती के उपलक्ष्य में) 
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     भारतीय साहित्य के प्रतिभाशाली सफल निर्माताओंमें से स्वभावकवि गङ्गाधर मेहेर अन्यतम हैं । ओड़िआ साहित्य-गगन के एक समुज्ज्वल ज्योतिष्क के रूप में वे चर्चित हैं । कवि का आविर्भाव हुआ था ९ अगस्त १८६२, श्रावण पूर्णिमा, रक्षा बन्धन के दिन तत्कालीन सम्बलपुर-जिल्लान्तर्गत बरपालि गाँव में और तिरोभाव ४ अप्रैल १९२४, चैत्र अमावस्या में । उनकी साहित्यिक कृतियों में 'तपस्विनी', 'प्रणय-वल्लरी', 'कीचक-वध', 'उत्कल-लक्ष्मी', 'अयोध्या-दृश्य', 'पद्मिनी', 'अर्घ्यथाली' और 'कृषक-संगीत' इत्यादि प्रमुख हैं । अपनी पैनी कलात्मक दृष्टि से उन्होंने सारे विश्‍व को मधुमय और अमृतमय रूप में दर्शन किया है और कराया है । पंक से पंकज के विकास की भाँति संघर्षभरे परिवेश में रहकर भी उन्होंने अपनी महान् प्रतिभा की सुरभि फैला दी । वे हैं जीवन-शास्त्र के सार्थक कवि, मानवता के कवि, अमृत के कवि, आलोक के कवि एवं मानव-समाज के एक महनीय सारस्वत दिग्‌दर्शक । भारतीय संस्कृति की पावन पृष्ठभूमि पर उनकी कवितायें विकसित हुई हैं ।
     अन्धकार के गहन मार्ग से आलोक की ओर अग्रसर होने के लिये भारतीय महामनीषियों ने परमेश्वर से प्रार्थना की है : 'असतो मा सद्‌ गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय ।' कवि गङ्गाधर ने वैदिक भारतीय परंपरा के मूल्यबोध को लेकर काव्य-कविताऒं का प्रणयन किया है । औचित्यपूर्ण आचरण, जीवन का विमल आदर्श और सामाजिक मूल्यबोध उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से प्रतिफलित हुए हैं । दुःख-सुख की अनुभूतियाँ जीवन-ग्रन्थ में लिपिबद्ध हुई हैं । विधाता की सर्जना में अच्छे-बुरे, अन्धेरे-उजाले, मिलन-विच्छेद की भाँति कई द्वन्द्वमय तत्त्व हर समय प्राणी-जीवन को प्रभावित करते रहते हैं । ऐसी स्थिति में सद्‌गुणावली का अभ्युदय मानव-जीवन के लिये अत्यन्त आवश्यक है । अनेक दुष्प्रवृत्तियों की व्यापकता से मनुष्य पथभ्रष्ट हो जाता है । हर युग में मनीषीगण की साधना समाज के लिये विशेष उपादेय होती है । कवि गंगाधर जंजालभरे जीवन में कई दुःख-क्लेशों को झेल कर कभी विचलित नहीं हुए हैं । उनका धैर्य है असीम एवं मनोबल अत्यन्त सुदृढ़ । नैतिक आदर्शबोध और मानववाद की प्रतिष्टा उनकी लेखनी का काम्य है । क्षमा, सहनशीलता, सत्कर्म की ओर तत्परता एवं परोपकार उनके जीवन का ध्येय है । सांसारिक दुःखों के अन्दर कवि ने पारमार्थिक सुख का सन्धान किया है । जीवन-ज्योति और भी दीप्तिमती हो उठी है वेदना की अनुभूति के माध्यम से । विनय, नम्रता, शिष्टता आदि सदाचार उनके सामाजिक  जीवन के श्रेष्ठ गुण हैं, जो उनकी रचनाओं में भी रूपायित हुए हैं । उनके हृदय में अहमिका अथवा गर्व का स्थान नहीं है । निश्छल एवं सरल व्यक्तित्व उनके जीवन का उत्कर्ष है । उनके उच्चारण और आचरण में परस्पर निष्ठापर सामञ्जस्य अनुभूत होता है ।
    संस्कृत के महाकवि कालिदास और अंग्रेजी के वाड्‍स्‍वार्थ की भाँति गंगाधर मेहेर ओड़िआ साहित्य के 'प्रकृति-कवि' माने जाते हैं । कवि गंगाधर ने अपनी प्रतिभा की आँखों से प्रकृति के अन्तःस्वरूप का सूक्ष्म तथा गहरा निरीक्षण किया है । कवि की समस्त कृतियों में बाह्य प्रकृति और अन्तःप्रकृति का रोचक मनोरम चित्र अंकित हुआ है । प्रकृति के अनन्य रूपकार और व्याख्याकार हैं रंगाजीव कवि गंगाधर । उनकी रचनावली में श्रेष्ठ है "तपस्विनी" महाकाव्य । रामायण उत्तरकाण्ड में वर्णित सीता-वनवास की करुण गाथा इस काव्य का उपजीव्य है । महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में सौम्य शान्त कान्त उषाकाल का वर्णन कवि की भावुकता की एक विशिष्ट पहचान है । मानवीय सूक्ष्म भावों के सच्चे विश्‍लेषक एवं प्रकृति के एक निपुण सफल चित्रकार के रूप में कवि गंगाधर चिर-स्मरणीय हैं । चतुर्थ सर्ग में उषावर्णन का माधुर्य विशेष आस्वादनीय है । कवि की लेखनी में :

'समंगल आई सुन्दरी
प्रफ़ुल्ल-नीरज-नयना उषा,
हृदय में ले गहरी
जानकी-दर्शन की तृषा ।
नीहार-मोती उपहार लाकर पल्लव-कर में
सती-कुटीर के बाहर
आंगन में खड़ी होकर
बोली कोकिल-स्वर में :
'दर्शन दो सती अरी !
बीती विभावरी ॥'
'अरुणिमा कषाय परिधान,
सुमनों की चमकीली मुस्कान
और प्रशान्त रूप मन में जगाते विश्वास :
आकर कोई योगेश्वरी
बोल मधुर वाणी सान्त्वनाभरी,
सारा दुःख मिटाने पास
कर रही हैं आह्वान ।
मानो स्वर्ग से उतर
पधारी हैं धरती पर
करने नया जीवन प्रदान ॥'
    अपनी अन्तर्दृष्टि से कवि ने प्रकृति और मनुष्य के बीच संवेदनशील गहरा अन्तरंग सम्बन्ध स्थापित किया है । तपस्विनी-काव्य के चतुर्थ सर्ग में तमसा-नदी के मुख में कवि ने जो कुछ अभिव्यक्त किया है, उसमें जीवन-दर्शन का सार-तत्त्व प्रतिफलित हुआ है । जल- दान-रूप सत्कार्य से नदी का जीवन सार्थक और धन्य हो जाता है । तमसा-नदी की स्वार्थहीन सेवा के वर्णन में मनुष्य-जीवन का साफल्य गर्भित हुआ है । जीवन में कई प्रकार के बाधा-विघ्न आते हैं; फिर भी दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास एवं धैर्य के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिये कवि की वाणी में प्रेरणा भरी है । प्रकृति के सारे विभाव प्रकृति-कवि की लेखनी में सजीव, सरस और मानवायित हैं । चतुर्थ सर्ग का और एक उदाहरण उल्लेखनीय है, सीता के प्रति वनलक्ष्मी का सख्यपूर्ण आदर । आश्रम के उपवन में कवि-कल्पिता वनलक्ष्मी सीता के समक्ष अपना आन्तरिक भाव व्यक्त करती है इस प्रकार :-

'जा रही थी जब लौट चली
पुष्पकारूढ़ तू गगन-मार्ग पर,
खड़ी मैं तब ले पुष्पाञ्जली
हरिण-नयनों में शोकभर
ऊपर को निहार
तुझे मयूरी की बोली में पुकार
रही थी बड़ी चाह से,
लम्बी राह से ।
अरी प्यारी !
सहेली की बात मन में करके याद
क्या तू आज पधारी
इतने दिनों बाद ?'

   वास्तव दुनिया में निन्दुक और दोषदर्शियों की संख्या कम नहीं । फिर भी सज्जनों के सुकर्म और उत्कर्ष के सामने दुर्जनों का धैर्य टूट जाता है । सज्जनों के सद्‌गुण-रूप दिव्य अलंकार की दीप्ति के प्रभाव से दुर्जनों की निन्दुकता और बुरी नज़र सब मूल्यहीन हो जाती है । कवि गंगाधर हैं सारस्वत कलाकार, निष्ठापरायण साधक, समाज-संस्कारक, कर्मयोगी, भाग्यवादी, ईश्वर-विश्वासी और आशावादी; परन्तु नैराश्यवादी कभी नहीं । आशावाद की ज्योति से उनकी वर्णावली अत्यन्त उज्ज्वल और उद्‌भासित हुई है । भारतीय दर्शन में भाग्य और कर्मफल की भूमिका विशेष महत्वपूर्ण है । हर प्रकार की चेष्टाओं के बावजूद यदि सफलता की प्राप्ति नहीं होती, तब मनुष्य भाग्य को स्वीकार कर लेता है । कवि का मत है कि सौभाग्य के बिना सुफल प्राप्त नहीं होता । मन की भावना और चिन्तन-धारा उन्नत है तो कर्म और परिणाम भी उन्नत होते हैं । ऐसी ऊँची भावना की प्रक्रिया मानव-समाज और देश के लिये मान-मर्यादा एवं गौरव को बढ़ाती है । कवि के विचार में हीनमन्यता को प्रश्रय देना अपनी दुर्वलता है एवं वास्तव जीवन में सदा ऊँची भावना का पोषण करना चाहिये ।
     असत्य, अन्याय और अधर्म के विरुद्ध कवि गंगाधर ने हमेशा संग्राम किया है । अपने जीवन में उसे चरितार्थ भी किया है । शासक-रूपी शोषकों को एवं रक्षक-रूपी भक्षकों को ‘धर्मावतार’ कहकर व्यंग्य चित्रण किया है और समाज में जन-सचेतनता की सृष्टि हेतु सहायता की है । कवि का कहना है :

'जिसकी विद्या धर्म-नीति का शीश मरोड़ती,
बुद्धि जिसकी सौ सत्यों को चूर डालती,
धन से खरीदा जाता जिसका विचार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥'

     गंगाधर की कवितायें करुणा की विमल भाव-सुरभि से महिमान्वित हैं । उनकी भाषा हृदय को सीधा स्पर्श कर लेती है । भावानुरूप अभिव्यक्ति से उनकी रचनावली रसोत्तीर्ण हुई है । उनकी लेखनी का प्रकाश अन्तर के कोने-कोने में फैल जाती है । कविता का भाव और हृदय का भाव हो जाते हैं अभिन्न एकाकार । इसी कारण जाग उठती है अन्तर की कारुणिकता, समवेदना, सहानुभूति, जीवों में दया, नारी-समाज के प्रति सम्मान- भावना एवं विश्व-बन्धुता की भावधारा-जैसी महनीय मानवता के संग सद्‍गुणावली की आत्मीयता । सामाजिक परिवेश में नारी-जाति की मर्यादा-वृद्धि के लिये कवि का सारस्वत प्रयास सदैव प्रशंसनीय है । पत्नी के आदर्श एवं चारित्रिक तेजोराशि से विमण्डित हुई हैं कवि की लेखनी-नायिका सीता, द्रौपदी, शकुन्तला और पद्मिनी आदि महीयसी महिलायें । 

     देशभक्ति-परक कविताओं में कवि की 'भारती-भावना' उल्लेखनीय है । यहाँ श्‍लेषालंकार में अंग्रेज शासन के विरुद्ध और महात्मा गान्धी आदि स्वतन्त्रता-संग्रामी के अनुकूल पद्य-रचना की गयी है । "मातृभूमि" कविता में अपने देश की भाषा के लिये कवि की उक्ति स्मरणीय है इसप्रकार :-
'मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति 
जिसके हृदय में अपनापन जन्मा नहीं,
करेंगे जब ज्ञानियों में उसकी गिनती
तो कहाँ रहेंगे अज्ञानी ?'

      'भक्ति' कविता गंगाधर के जीवन-दर्शन की एक बड़ी उपलब्धि है । विभु-प्रीति की अमृत-धारा उनकी रचना में निरन्तर प्रवाहित है । ब्रह्माण्ड की सारी वस्तु परमेश्वर का दिआ हुआ प्रसाद है । कवि के मत में, उन महान् दाता परमेश्वर के लिये प्रतिदान में उनका प्रसाद अर्पण करना अपराध होगा । इसी कारण कवि ने अपनी निजस्व वस्तु "मुँकार" अर्थात् अहंभाव को परमेश्वर के चरणों में सविनय समर्पित किया है । आनन्द एवं अमृत के निधान हैं प्रभु परमेश्वर । उसीसे सब की सर्जना, उसीमें सब की स्थिति एवं उसीमें ही सब का विलय । कवि गंगाधर ने अपने को अमृत-सागर के एक बिन्दु के रूप में चित्रित किया है । आध्यात्मिकता के साथ प्राणीजीवन की तत्त्वावली को महिमामयरूप में अभिव्यक्त किया है । अपनी  'अमृतमय' कविता में कवि ने कहा है : 

'मैं तो बिन्दु हूँ
अमृत-समुन्दर का,
छोड़ समुन्दर अम्बर में
ऊपर चला गया था ।
अब नीचे उतर
मिला हूँ अमृत-धारा से ;
चल रहा हूँ आगे
समुन्दर की ओर ।
पाप-ताप से राह में
सूख जाऊँगा अगर,
तब झरूँगा मैं ओस बनकर ।
अमृतमय अमृत-धारा के संग
समा जाऊँगा समुन्दर में ॥' 

  *ओड़िआ साहित्य के प्रसिद्ध समालोचक मायाधर मानसिंह ने स्वभावकवि गंगाधर के व्यक्तित्व एवं साहित्य का सामग्रिक अनुशीलन करके यथार्थ में उन्हें एक 'साहित्यिक वीर' के रूप में प्रतिपादित किया है । सत्कर्म और उच्च कर्म से ही मनुष्य का जीवन गौरवमय बनता है । अपनी काव्य-माधुरी के साथ गंगाधर अर्पण कर गये हैं मानवीय सूक्ष्म-अनुभूति-संवलित अनेक काव्य-कवितायें, जो जन-समाज के संस्कार और उपकार की दिशा में एक एक महनीय अनमोल रत्‍न-रूप हैं । जीवन एवं साहित्य का मधुर समन्वय उनकी कृतियों में सुपरिलक्षित होता है । आज के कलुषित और प्रदूषित वातावरण में कवि का तात्त्विक चिन्तन विशेष प्रणिधान-योग्य है । सत्य-शिव-सुन्दर के परम उपासक और अनन्य व्याख्याकार यशस्वी सारस्वत शिल्पी गंगाधर मेहेर वास्तव में सभी सहृदयों और साहित्य-प्रेमियों के आदरणीय हैं ।
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 (इस लेख में उद्धृत कवि गंगाधर मेहेर की पंक्‍तियाँ डॉ. हरेकृष्ण मेहेर द्वारा अनूदित हैं ।)
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Svabhavakavi Gangadhar Meher : Ek Amar Pratibha
Published in ‘Srijangatha’ (Hindi E-Magazine), June 2009.
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Srijan-Gatha (Hindi E-Journal): Link : 
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