Monday, January 31, 2011

Daśarūpa-Gītikā (दशरूप-गीतिका) / HKMeher

Daśarūpa-Gītikā (Sanskrit Song)  
Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher  
(Extracted from ‘Mātŗigītikāñjalih'- Kāvya)  
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दशरूप-गीतिका  
गीत-रचना तथा स्वर-रचना : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः  
(‘मातृगीतिकाञ्जलिः’- काव्यात्‌)  
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‌ॐ जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे !
धर्म-संस्थापनार्थं भुवि ते
चकास्ति चक्रं स्वस्ति करे,
निरस्त-समस्त-शुभेतरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे !
(ध्रुवम्‌)
*
राक्षस-शङ्ख-विनाशी भगवान्‌,
रक्षसि धातु-र्वेदान्‌ सर्वान्‌ ।
मीन-शरीरो रमसे श्रीमान्‌,
प्रलये वलयित-जलधि-भरे ।
महति निरवधौ सुदुस्तरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (१)
*
अम्बुनिधौ सुर-दानव-निहितम्‌,
मन्दरमद्रिं वहसि सुविहितम्‌ ।
कूर्मराज ! तव कर्म जन-हितम्‌,
काये कलिते सलिलचरे ।
प्रसन्न-किन्नर-नाग-नरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (२)
*
सुरक्षिता स्यात्‌ सर्जन-सरणी,
अगाध-नीरधि-मग्ना धरणी ।
शरणं भवतो लभते वरणी,
सुकरं शूकर-रद-शिखरे ।
समर्चिते धृत-चराचरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (३)
*
प्रह्लाद-मनोह्लादनकारी,
हिरण्य़कशिपो-र्हृदय-विदारी ।
भक्त-कृते त्वं दुष्ट-निवारी,
विहरन्‌ नरहरि-कलेवरे ।
मन्द-निदारुण-खर-नखरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (४)
*
त्वमवसि वामन ! देव-समाजम्‌,
त्रिपद-मेदिनी-दान-व्याजम्‌ ।
पातयसि बलिं दानवराजम्‌,
विरसं रसातले विवरे ।
त्रिविक्रमे त्वयि पुरस्सरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (५)

*
भ्रमन्‌ भुवमेकविंशति-वारम्‌,
कुरुषे क्षत्रिय-गण-संहारम्‌ ।
वारयसि सर्व-वर्वर-भारम्‌,
स्वभुजे भ्राजति परशु-परे ।
भैरव-सन्निभ-वीरवरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (६)
*
सीता-वल्लभ ! रघुकुल-भूषण !
जित-खर-दूषण ! विभी-विभीषण !
तव सुगौरवं रावण-भीषण !
समङ्कितं लङ्का-समरे ।
पापराशि-हर-चाप-शरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (७)
*
नीलाम्बर हे ! प्रलम्ब-दलनम्‌,
यशः प्रशस्यं यमुना-यमनम्‌ ।
दूरं दुरितं याति विगलनम्‌,
मङ्गल-लाङ्गल-मुषलधरे ।
सङ्गत-मध्वरि-मधुस्वरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (८)
*
शान्तिं कलयति तव कल्याणी,
हिंसा-पशुवध-विरोध-वाणी ।
सुगत ! सद्‌गतिं भजते प्राणी,
करुणा-ममता-प्रेम-झरे ।
भवद्‌-भाव-रस-विभास्वरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (९)
*
कल्कि-कलेवर ! कर-करवालम्‌,
वहन्‌ पुण्यमय-वह्नि-विशालम्‌ ।
दहसि दुस्सहं दुष्कृत-जालम्‌,
दुर्जन-गर्जन-महाज्वरे ।
कलुषित-कलि-काले प्रखरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (१०)
*
तनोतु भद्रं चिरन्तनी ते,
शुभानुकम्पा परम-पुनीते ।
हरेकृष्ण-मेहेर-सुगीते,
माधव ! तव भजनावसरे ।
मतिरास्तां त्वयि रमेश्‍वरे ।
जय जय जय दशरूप हरे !
नमोऽस्तु ते दशरूप हरे ! (११)  


* * *  


(इति दशरूप-गीतिका)  
इयं गीतिका कहरवा-ताल-मध्यलयेन परिवेषणीया ।  
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English Translation : 
http://hkmeher.blogspot.in/2013/01/dasarupa-gitika-drharekrishna-meher.html 
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Kumāra-Sambhava, Canto-V (Oriya, Part- 2): Dr. Harekrishna Meher

Kumāra-Sambhava (Canto-V)
Original Sanskrit Mahākāvya by : Poet Kālidāsa
Oriya Version by : Dr. Harekrishna Meher   

(Extracted from Complete Version of the Epic)  
*   
Theme of Canto-5 : Penance of Parvati
Number of Verses : 86  

 *  
(Entire Oriya Version of Canto-5th
with elaborate Introduction has been published in 
‘Bartika’, Literary Quarterly, Dashahara Special Issue,
October-December 2001, pp. 169 – 203,
Dasarathapur, Jajpur, Orissa)
*
Here Part-1 comprises Verses 1 to 29.
Part-2 comprises Verses 30 to 62.
Part-3 comprises Verses 63 to 86.

*
For Part-1,  Link :  
*
For Part-3,  Link : 
http://hkmeher.blogspot.com/2011/02/kumara-sambhava-canto-v-oriya-part-3.html   
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कुमार-सम्भव (पञ्चम-सर्ग)    

मूल संस्कृत महाकाव्य : महाकवि कालिदास    
ओड़िआ पद्यानुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर    
(महाकाव्यर संपूर्ण पद्यानुवादरु आनीत)   
*    
विषय : पार्वतीङ्क तपस्या ।
राग : चोखि
द्वितीय भाग : श्‍लोक ३० रु ६२ ।
= = = =


[30]
दिने केहि जटाधारी
बटु बाग्मी ब्रह्मचारी
प्रबेशिले सुकुमारी
उमा कतिरे,
मृगचर्म-परिहित
पलाश-दण्ड-मण्डित
सते कि से सन्दीपित
ब्रह्म-ज्योतिरे ।
देखि प्रते हेला य़ेसने,
मूर्त्तिमन्त ब्रह्मचर्य़्य अ‍इला बने ॥
*

[31]
से अतिथि-परायणा
हिमाद्रि-राजदुलणा
समादरे सम्भाषणा
कले बहन,
पूजिले से अभिनन्द्य
ब्रह्मचारीङ्कि सानन्द
स्वसम हेलेहेँ बन्द्य
बिशिष्ट जन ।
सत्कार करन्ति ताङ्करि,
समदर्शीगण बहु आदर भरि ॥
*

[32]
पार्बतीङ्क ए प्रकार
बिधिपूर्बक सत्कार
करिले बटु स्वीकार
परितोषरे,
बिश्रामि अळप क्षण
श्रम नाशिले तक्षण,
निज सरळ ईक्षण
य़ोगे ता परे ।
निरेखिले हैमबतीङ्कि,
क्रमे कुशळ पुच्छिले जाणि रीतिकि ॥
*

[33]
‘ धर्म कर्म सम्पादने
तुमर ए तपोबने
समिध कुश य़तने
मिळुअछि त ?
सळिल स्नान निमन्ते
उपय़ुक्त कि निरते ?
करुछ त शक्तिमते
तप बाञ्छित ?
धर्म कृत्य सकाशे देह,
मुख्य साधन अट‍इ नाहिँ सन्देह ॥
*

[34]
एइ लतिकाबळीरे
तुम कर-दत्त नीरे
निति बढ़‍इ कि धीरे
नब पल्लब ?
बहु दिनुँ अलकत
हेलेकेँ परित्यकत
शोभा पाउछि रकत –
अधर तब ।
से मृदु अधर समान,
दिश‍इ पाटळ नब पल्लबमान ॥
*

[35]
तुम हस्तरु भक्षण-
लाळसारे मृगगण
स्नेहरे कुश हरण
करन्ते बळे,
पद्माक्षि ! अछि कि मन
ताङ्कठारे परसन्न ?
खेळाइ निज नयन
चळ-चञ्चळे ।
करन्ति से हरिणगण,
सते बा तुम नेत्रर अनुकरण ॥
*

[36]
प्राणीर सुन्दरपण
पापकर्म आचरण
पाइँ उद्दिष्ट लक्षण
नुहे संसारे,
ए य़ेउँ रहिछि कथा,
सत्य अट‍इ सर्बथा
सुन्दरि ! नुहे अन्यथा
मो जाणिबारे ।
तब सदाचार स्वकीय,
तपस्वीङ्क पाइँ मध्य सुशिक्षणीय ॥
*

[37]
सप्त ऋषिङ्क अर्पित
पूजा-पुष्पे सुबासित
गङ्गा-सलिळ पतित
हेला स्वर्गरु,
ताहा निज अङ्गे धरि
ए हिमाळय शिखरी
हो‍इ न थिले सेपरि
पूत आगरु ।
एबे तुम शुद्ध चरित्र,
य़ोगुँ य़ेपरि सबंश हेले पबित्र ॥
*

[38]
भाबिनि ! ए काळे तब
राजभबने सरब
अर्थ काम ब‍इभब
ति‍आग करि,
एकमात्र धर्मे मन
करिअछ संलगन,
आजि प्रतीति एसन
हुए मोहरि ।
धर्म अर्थ काम मध्यरे,
धर्म हिँ सार अट‍इ सर्ब भाबरे ॥
*

[39]
देइछ निजे तुमर
बहु सत्कार सादर,
न कर एणिकि पर
ज्ञान मोठारे,
हे नताङ्गि सुलक्षणे !
कहिछन्ति ज्ञानीगणे,
सज्जनङ्कर गहणे
प्रिय बेभारे ।
जात हुए बन्धुता भले,
सप्त पद कथन बा गमन कले ॥
*

[40]
तपस्विनि ! मुँ तुमर
बन्धु हो‍इलि एथर,
द्विज-सुलभ निजर
चापल्य धरि,
क्षमाबती तुम पाशे
किछि पचारिबा आशे
उत्सुकता परकाशे
मन मोहरि ।
य़दि गुप्त कथा न थिब,
उत्तर देबा निमन्ते चेष्टा करिब ॥
*

[41]
आद्य स्रष्टा ब्रह्माङ्कर
कुळे जनम तुमर,
रम्य तनु त्रिलोकर
सौन्दर्य़्य परि,
हेउअछ‍इ प्रतीत,
स्वपुरे अपरिमित
अ‍इश्वर्य़्य सुख बित्त
अछि तुमरि ।
बिराजिछि नब य़ौबन,
कह आउ तप-फळे कि प्रयोजन ?
*

[42]
सहि न पारि अनिष्ट
केबे केबे भाबाबिष्ट
मानिनीगण अभीष्ट
पूरण लागि,
प्रबृत्त हु‍अन्ति बने
दुष्कर तप साधने,
किन्तु बिचारिले मने
आगो कृशाङ्गि !
न हु‍अ‍इ दृष्टिगोचर,
तुमठारे किछि हेले अनिष्टकर ॥
*

[43]
तुम ए सौम्य आकार
नुहे कौणसि प्रकार
शोक अबा तिरस्कार
पाइबा स्थान,
पितृ-सदने तुमरि
अबमानना किपरि ?
बळात्कार स्पर्श करि
न पारे आन ।
थाए केबा हस्त बढ़ाइ,
नेबा लागि फणी-शिरुँ मणि छड़ाइ ?
*

[44]
तुमे य़ुबा अबस्थार
तेजि सर्ब अळङ्कार
बृद्ध काळे शोभिबार
तरु-बल्कळ,
धारण कल किपरि ?
शोभे सिना बिभाबरी
चन्द्र-तारा-द्युति धरि
अङ्गे उज्ज्वळ ।
अरुणोदयर प्रापति,
प्रदोषे इच्छ‍इ कि से कह पार्बति !
*

[45]
य़दि स्वर्ग इच्छा करि
साधुछ तप एपरि,
तेबे निष्फळ ए परि-
श्रम बिशेष,
तुम पिता हिमाळय-
पुर त देव-निळय,
पति आशे तपे लय
न रख लेश ।
खोजे नाहिँ निजे रतन,
खोजिथाए सिना तारे ग्रहीता जन ॥
*

[46]
उष्ण निश्वास तुमर
जणाइदेला एथर,
काम्य उपय़ुक्त बर
तुम निमित्त,
किन्तु मो मने उदय
हेउछि एक संशय
तुम य़ाचना-बिषय
नाहिँ केहि त ।
तुमे पुणि कले य़ाचना,
दुनिआरे दुर्लभ के हेब सुमना ?
*

[47]
ए त बड़ आचम्बित,
य़े हेउ तुम काङ्क्षित,
अट‍इ तार निश्‍चित
कठोर मन,
बहु दिनुँ कर्ण्णोत्पळ-
शून्य ए गण्ड-मण्डळ
तहिँ धान्याग्र-पिङ्गळ-
बर्ण्ण गहन ।
जटा लम्बिअछि शिथिळे,
एहा प्रति से त दृष्टि न दिए तिळे ॥
*

[48]
घोर तपस्या आचरि
अति कृश तनु धरि
दिबा-चन्द्रलेखा परि
पा‍उछ क्लेश,
प्रखर रबि-करण
य़ोगुँ तुम आभरण-
स्थान लभिछि दूषण,
देखि ए बेश ।
मनरे शोचना निश्‍चय,
न करिब जगतरे के सहृदय ?
*

[49]
य़ेउँ जन प्रिय तब
से त सौन्दर्य़्य-गरब
घेनि हो‍इछि सरब
भाबे बञ्चित,
बिचार मो एहिपरि,
नोहिले से त तुमरि
दीर्घ बाङ्क भ्रू-बल्लरी
य़ोगे शोभित ।
नेत्र-य़ुगळर दर्शन,
लाभ आशे टेकिथान्ता निज बदन ॥
*

[50]
केते दिबस आहुरि
तप साधिब ग‍उरि !
मोर मध्य तप भूरि
ब्रह्मचर्य़्यरे,
सञ्चित अछि, सश्रद्ध
तुमरे अर्पिलि अर्द्ध,
बर लभ सेहि बर्द्ध-
मान तपरे ।
किन्तु किए तब प्रिय से,
जाणिबा सकाशे इच्छा जागे मानसे ॥“
*

[51]
अन्तर गोपन कथा
जाणि ब्रह्मचारी तथा
पचारन्ते उमा मथा
पोति आबेगे,
लाजे सम्मुखे ताङ्कर
न देले किछि उत्तर,
पारुशे स्थित निजर
सखीङ्कि बेगे ।
अनञ्जन नयन चाळि,
सङ्केत देले पर्बत-राजदुलाळी ॥
*

[52]
सखी बोले, ‘ब्रह्मचारी !
य़दि कुतुहळ भारि
शुण तेबे अपसारि
सन्देह मनुँ,
ए कठोर तपस्यार
साधन य़ेउँ प्रकार
हेला प्रिय सुकुमार
जेमाङ्क तनु ।
आतप बारण निमन्ते,
कमळ-छत्र टेकिबा अटे य़ेमन्ते ॥
*

[53]
इन्द्रादि ऐश्‍वर्य़्यबान
दिक्‌पाळङ्कु तुच्छ ज्ञान
कले उमा स्वाभिमान
बशे निजर,
स्मर भस्म हेबा फळे
रूप-लाबण्यर बळे
आकृष्ट नोहि अटळे
रहिले हर ।
तेणु ताङ्कु पति रूपरे,
पाइबा पाइँ इच्छन्ति जेमा मनरे ॥
*

[54]
महेश्‍वरे लक्षि स्मर
क्षेपिला मोहन शर,
निबर्त्तिला ता शङ्कर-
हुङ्कार घोषे,
जळिला रति-नायक
थिला ता पुष्प शायक,
सेकाळे मृत्युञ्जयङ्क
पारुशे तोषे ।
सेबा-रत थिले पार्बती,
ताङ्क हृदे तीब्र भेद कला झटति ॥
*

[55]
से दिनुँ पितृ-सदने
रहिले व्याकुळ मने
निज मस्तके य़तने
बोळि चन्दन,
दिशिला सुशीळाङ्कर
सौम्य अळक धूसर,
कले से हिम प्रस्तर
परे शयन ।
तेबे मध्य निज मानसे,
सुख न पाइले सखी मदन-बशे ॥
*

[56]
त्रिपुर-जयी शङ्कर-
चरित गान सुस्वर
आरम्भ हेले सत्वर
कानन स्थळे,
अश्रु ढाळि प्रेमास्पद
जेमा स्वबाष्प-गद्‌गद
कण्ठरु स्खळित पद
य़ोगे बिह्वळे ।
गान-सखी किन्नरपति-
कन्यामानङ्कु अनेक कन्दाइछन्ति ॥
*

[57]
रात्रिर शेष प्रहरे
निद्रा य़िबा समयरे
मुहूर्त्तक नयनरे
निमेष मारि,
‘नीळकण्ठ ! केउँठारे
बिहरुछ ?’ ए प्रकारे
निज स्वप्न अबस्थारे
राजकुमारी ।
काल्पनिक शङ्कर-कण्ठे,
समालिङ्गि चेइँ उठुथिले उत्कण्ठे ॥
*

[58]
निज करे प्रियतम
शिब-चित्र मनोरम
आङ्कि एकान्ते बिभ्रम
बशे सरळा,
कहुथिले गाळिभरे,
‘तुमे ज्ञानीङ्क मुखरे
सर्बब्यापक नामरे
कथित भला ।
जाणि न पारुछ काहिँकि ?
तुमरे अनुरागिणी एइ गौरीकि ॥‘
*

[59]
बिश्‍वेश्‍वरे लभिबार
बिश्‍वासे अनेक बार
खोजि न पाइले सार
पथ कौणसि,
ता परे निज पिअर-
आदेश घेनि सत्वर
आम सखीगणङ्कर
सङ्गे रूपसी ।
कठोर तपस्या साधन,
करिबा पाइँ आश्रिले बन-सदन ॥
*

[60]
राजसुता निति निति
घोर तपरे एमिति
मज्जिले गलाणि बिति
बहु दिबस,
बीज रोपिथिले साक्षी
रूपरे से राजीबाक्षी,
धरिलेणि सबु शाखी
फळ सरस ।
पति-लाभ आशा ताङ्करि,
अळप सुद्धा अद्यापि नाहिँ अङ्कुरि ॥
*

[61]
घोर तप कष्ट सहि
क्षीण हेले प्रिय सही,
आम नेत्रुँ य़ाए बहि
अश्रु झरणा,
तेबेहेँ केबे ताङ्कर
प्रार्थित-दुर्लभ बर
हेबे सदय अन्तर
न पड़े जणा ।
कृष्टा अनाबृष्टि बिरसा,
रसारे करन्ति य़ेह्ने इन्द्र बरषा ॥"
*

[62]
गिरिजाङ्क मर्म जाणि
सजनी सकळ बाणी
ब्यकत करिले आणि
एहि रूपरे,
तहुँ सौम्य ब्रह्मचारी
मुखे हर्ष न प्रसारि
पचारिले सुकुमारी
उमा पाशरे ।
‘सत्य कि ए राजदुलाळी !
अथबा परिहासरे कहिले आळि ?”
* * * 


Part-3 : Continued : Link : 
http://hkmeher.blogspot.com/2011/02/kumara-sambhava-canto-v-oriya-part-3.html   
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Related Link : 
Kumara-Sambhava Kavya : Odia Version by Dr. Harekrishna Meher :
= = = = = = 
Translated Works of Dr. Harekrishna Meher : 
http://hkmeher.blogspot.in/2016/08/translated-works-of-dr-harekrishna-meher.html

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Kumāra-Sambhava (Canto-V) Oriya Version: Part-1 : Dr. Harekrishna Meher

Kumāra-Sambhava (Canto-V)
Original Sanskrit Mahākāvya by : Poet Kālidāsa
Oriya Version by : Dr. Harekrishna Meher    

(Extracted from Complete Version of the Epic) 
*
Theme of Canto-5 : Penance of Parvati
Number of Verses : 86

*   
(Entire Oriya Version of Canto-5th
with elaborate Introduction
has been published in
‘Bartika’, Literary Quarterly, Dashahara Special Issue,
October-December 2001, pp. 169 – 203,  
Dasarathapur, Jajpur, Orissa)
*
Here Part-1 comprises Verses 1 to 29.
Part-2 , Verses 30 to 62
Part-3 , Verses 63 to 86
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For Part-2,  Link : 
*
For Part-3,  Link : 
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कुमार-सम्भव (पञ्चम-सर्ग)
मूल संस्कृत महाकाव्य : महाकवि कालिदास
ओड़िआ पद्यानुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर    

(महाकाव्यर संपूर्ण पद्यानुवादरु आनीत)
*  

* विषय : पार्वतीङ्क तपस्या *
राग : चोखि
प्रथम भाग : श्लोक  १ - २९.
= = = = 


[1]
पिनाकपाणि शङ्कर –
कोपे भस्म हेले स्मर
देखि सम्मुखे निजर
ए अघटण,
भग्न हेला ग‍उरीङ्क
अभिळाष आन्तरिक,
हृदये निन्दिले धिक
सुन्दरपण ।
स‍उन्दर्य्य़ सार्थक ताहा,
प्रिय पाशे स‍उभाग्य लभ‍इ य़ाहा ॥
*

[2]
अबलम्वि एकाग्रता
मुनिब्रते हो‍इ रता
शारीरिक सुन्दरता
सार्थ-करणे,
बाञ्छिले आळस्यहीना
गिरीशबाळा नबीना,
ए बेनि किपरि बिना
तपश्‍चरणे ।
सेहिपरि प्रेम आबर,
सेपरि स्वामी लभिबा सम्भबपर ?
*

[3]
तपरे दृढ़-बरता
पार्बतीङ्क ए बारता
शुणि माता अधीरता
भजिले मने,
प्रिय कन्यार हृदय
शिबे करिअछि लय
जाणि एपरि निश्‍चय
मेना बहने ।
महातपस्यारु निरोधि,
पुत्रीकि उरे आलिङ्गि कहिले बोधि ॥
*

[4]
“माआ लो ! आमरि पुरे
अछन्ति ईप्‍सित सुरे,
काहिँ तप ? काहिँ दूरे शरीर तब ?
कोमळ शिरीष पुष्प
निज बळ-अनुरूप
सहि पार‍इ मधुप-
पाद- लाघब ।
मात्र पक्षी-चरण-भार,
सहिबा सकाशे शक्ति नाहिँ ताहार ॥“
*

[5]
एहिपरि पर्वतेश-
जाया देइ उपदेश
तप-उद्यमरु लेश-
मात्र पुत्रीकि,
पारिले नाहिँ निबारि,
स्थिर-चित्ता से कुमारी,
अभीष्ट बस्तुरे भारि
दृढ़ मतिकि ।
निम्नगामी बारिकि पुण,
फेराइ आणिबा लागि केबा निपुण ?
*

[6]
दिने प्रशस्त-हृदया
नगाधिराज-तनया
‘तपे मुहिँ दृढ़-लया
सिद्धि पर्य़्यन्त,
निज निबास कानने
रचिबि’ बोलि सुमने
प्रिय सजनी-बदने
पेषि उदन्त ।
अनुज्ञा मागिले पिताङ्क,
हिमाळय जाणिथिले अभीष्ट ताङ्क ॥
*

[7]
सुय़ोग्य अभिळाषरे
तोष लभि मानसरे
आज्ञा देले निबासरे
भूधरसाइँ,
तहुँ प्रसन्न मुखरे
गौरी चळिले सुखरे
शिखण्डीपूर्ण्ण शिखरे
तपस्या पाइँ ।
परे ताहा ‘गौरीशिखर’
बोलि लोके ख्यात हेला नामे ताङ्कर ॥
*

[8]
हृद स्थळे बिलेपित
चन्दनकु बिलोपित
करुथिला य़ा दोळित
दण्ड चञ्चळ,
से हारकु परिहरि
पिन्धिले बाळार्क परि
पिङ्गळ-बरण परि-
धान बल्कळ ।
उरज थिबारु उन्नत,
शिथिळ हेला बल्कळ-सन्धि समस्त ॥
*

[9]
सज्जित चारु कुन्तळ-
कान्तिरे मुखमण्डळ
दिशुथिला समुज्ज्वळ
पूर्बे य़ेभळि,
हेले मध्य जटागम
दिशिला ता मनोरम,
केबळ अळिरे पद्म
न उठे झळि ।
श‌इबाळ य़ोगे आबर,
हो‍इथाए जननेत्र-आनन्दकर ॥
*

[10]
घेनिले मेनादुहिता
तपोब्रते उत्साहिता
मञ्जुळा से त्रिगुणिता
मौञ्जी मेखळा,
ताङ्क देहे प्रतिक्षण
कर्कश कटि-भूषण
कला रोम-हरषण
से त कोमळा ।
आद्य बार पाइँ सूत्रटि,
पिन्धिबारु रक्तबर्ण्ण दिशिला कटि ।
*

[11]
स्तनाङ्गरागे अरुणी-
कृत कन्दुकरे पुणि
ओष्ठ-रञ्जने तरुणी
ग‍उरीङ्कर,
रत थिला य़ेउँ हस्त,
तेजि एबे से समस्त
अक्षमाळारे अभ्यस्त
हेला सादर ।
कला कुशाङ्कुर आदान,
बिक्षत हेला से लागि अङ्गुळिमान ॥
*

[12]
महार्घ मृदु शयने
पारुश परिबर्त्तने
केशुँ पतित सुमने
य़ेउँ गौरीकि,
हेउथिला कष्ट ज्ञान,
तपे से त बर्त्तमान
कले निज उपधान
बाहु-बल्लीकि ।
अनाबृत मुक्त भूमिरे,
उपबेशन शयन कले बिधिरे ॥
*

[13]
तपश्‍चरण-शेषरे
फेरि पाइबा आशरे
कोमळा लता पाशरे
सेकाळे आणि,
बिळास-भङ्गी निजर
अरपि देले आबर
एणीबृन्दरे सुन्दर लोळ चाहाणी ।
समर्पिले उमा सतेकि,
न्यास रूपे तहिँ एइ बस्तु बेनिकि ॥
*

[14]
निरळसा सुकुमारी
श‍इळ-राजकुमारी
देइ कुम्भ-स्तन-बारि
साजिले मात,
बाळ बृक्षङ्क बर्द्धन
कले निजे शुद्धमन,
परे पुत्र षड़ानन हेलेहेँ जात ।
अग्रज समग्र तरुर,
तनय-स्नेह केबे न करिबे दूर ॥
*

[15]
तपश्‍चारिणी अपार
स्नेहे मृगङ्कु आहार
देइ पाळिले नीबार
आहरि करे,
ताङ्क समीपे समस्त
एभळि थिले बिश्‍वस्त,
बढ़ाइ उमा स्वहस्त
कौतुकभरे ।
मृगङ्कर नेत्र सङ्गते,
मापुथिले सखीङ्कर नेत्र अग्रते ॥
*

[16]
करुथिले नित्य स्नान
से बल्कळ परिधान
अनळ होमबिधान
बेद-अभ्यास,
जाणि ए शुभाचरण
दर्शनार्थी ऋषिगण
करुथिले पदार्पण
ताङ्क आबास ।
धर्मबृद्ध ब्यक्ति पाशरे,
बयस गणना केबे केहि न करे ॥
*

[17]
बिरोधी प्राणीनिकर
तेजिले निज पूर्बर
बैरिभाब परस्पर
तपस्थळरे,
इष्टफळे तरुगण
कले अतिथि-तोषण,
अनुक्षण नब पर्ण्ण-
शाळा भितरे ।
दीप्त थिला होम-ज्वळन,
ए रूपे पबित्र हेला से तपोबन ॥
*

[18]
एपरि पूर्बाचरित
तपस्याबळे ईप्‍सित
फळ लभिबा निश्‍चित नुहे सम्भब,
ए कथा मने बिचारि
नगाधिराज-कुमारी
उपेक्षिले निज शारीरिक मार्दब ।
ता ठारु अधिक कठिन,
तपस्या आरम्भ कले हो‍इ तल्लीन ॥
*

[19]
कष्ट पा‍उथिले हेळे
सामान्य कन्दुक खेळे
निज पुरे सेतेबेळे
य़ेउँ सुन्दरी,
बर्त्तमान मुनिब्रते
मज्जिले से अबिरते
स्वर्ण्णपद्मे गढ़ा सते
तनु ताङ्करि ।
बहिथिला उभय गुण,
स्वभाबे कोमळ थिला कठिन पुण ॥
*
[20]
ग्रीष्मकाळे निज चारि
पारुशरे सुकुमारी
अनळ जाळि ताहारि
मध्ये रहिले,
रबिङ्क दहनात्मक
नयन-प्रतिघातक
रश्मि जिणि अपलक
नेत्रे चाहिँले ।
एकलये तपन प्रति,
सुमध्यमा शुभ्रहास-मुखी पार्बती ॥
*
[21]
एहिप्रकार प्रखर
मिहिर-तेज-निकर
बाजिबारु उमाङ्कर
मुख धबळ,
धारण कला सुन्दर
कान्तिकि अरबिन्दर
किन्तु तहिँ निरन्तर
तापे केबळ ।
दीर्घ बेनि नेत्र-प्रान्तरे,
काळिमा स्थान ग्रहण कला मन्थरे ॥
*
[22]
अय़ाचिते उपस्थित
सळिल-बिन्दु सहित
शशीङ्कर रसान्वित
रश्मि शीतळ,
एते मात्र सुलक्षणा
पार्बतीङ्कर आपणा
तपस्या काळे पारणा
हेला केबळ ।
पादपमानङ्क जीबन,
बृत्तिरु न थिला भिन्न एहि साधन ॥
*
[23]
गगनगामी तपन
इन्धन-दीप्त दहन
एभळि नाना ज्वळनङ्कर तेजरे,
अतिशय सन्तापिता
शैळाधिराज-दुहिता
तपान्ते हेले सिञ्चिता नब जळरे ।
उष्ण बाष्प निज शरीरु,
ऊर्द्ध्वकु तेजिले भूमि सङ्गे तहिँरु ॥
*
[24]
आद्य बारि-बिन्दु राशि
बर्षाकाळे मृदु्हासी-
नेत्रलोम परे आसि
मुहूर्त्ते थाइ,
ताड़ि कोमळ अधर
उच्च पीन पयोधर
उपरे पड़ि सत्वर
चूर्ण्णता पाइ ।
धीरे धीरे खसि बळीरे,
बिळम्बे प्रबेश कला नाभिस्थळीरे ॥
*
[25]
प्रबळ धारा-सम्पात
सङ्गते प्रचण्ड बात
बहन्ते शैळसुता त
दिबाबसाने,
अनाबृत शिळातळ-
शेय़े शो‍इले केबळ
सते सेकाळे चञ्चळ
य़ामिनीमाने ।
क्षणप्रभा-चक्षु मेलाइ,
देखुथिले तप-साक्षी स्वरूपे थाइ ॥
*
[26]
पौष रजनी काळरे
बायु तुषार-मेळरे
बहिबा बेळे जळरे
कले बसति,
तहिँ सम्मुखरे ताङ्क
परस्पर चक्रबाक-
दम्पति निशीथय़ाक
ब्याकुळे अति ।
बिरहे करन्ते रोदन,
दयार्द्र हेला उमाङ्क कोमळ मन ॥
*
[27]
आकण्ठ जळे केबळ
दिशिला मुख सुढळ
कम्पिला अधर-दळ
शीतळतारु,
पद्म-मुखुँ आपणार
सुबास कले प्रसार,
निशा समये तुषार
बर्षा हेबारु ।
नष्ट हेला कमळ-धन,
स्वमुखे से कले सते पद्म सर्जन ॥
*
[28]
बृक्षुँ स्वेच्छारे पतित
पत्र भक्षिले निश्‍चित
तपश्‍चर्य़्यार सेहि त
चरम सीमा,
किन्तु से पर्ण्ण आहार
पूर्ण्ण रूपे परिहार
कले तपे आपणार
पर्बत-जेमा ।
तेणु पुराणज्ञ-निकर,
देइअछन्ति ‘अपर्ण्णा’ नाम ताङ्कर ।
*
[29]
कमळिनीर पराय
सुकोमळ ताङ्क काय
दृढ़ ब्रत समुदाय
तहिँ आचरि,
कष्ट सहि निशिदिन
सुमुखी न हेले खिन्न,
तपस्वीगण कठिन
देहे निजरि ।
साधिथान्ति तपस्या य़ाहा,
अत्यन्त निऊन कले गिरिजा ताहा ॥
* * 


Related Link : 
Kumara-Sambhava Kavya : Odia Version by Dr. Harekrishna Meher :
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* * * * 

Sunday, January 30, 2011

Sanskrit Song कलाकर-गीतिका (Kalākara-Gītikā): Dr.Harekrishna Meher

Kalākara-Gītikā (Sanskrit Song) 
Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher 
(Extracted from ‘ Mātŗigītikāñjalih'- Kāvya)
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*Song for the Moon* 

कलाकर-गीतिका  
गीत-रचना तथा स्वर-रचना : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः   
(‘मातृगीतिकाञ्जलिः’-काव्यात्‌ ) 
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कलाकर हे ! 
हृदय-वियति मम समुदय नियतम्‌,
निज-किरणैः
सुविकिरणैः
शुचि-हासैरुद्‌भासय नियतम्‌ ।
हृदय-वियति मम समुदय नियतम्‌ ॥
(ध्रुवम्‌)
*
यत्र सन्ति मे सन्ताप-तमो-विभ्रमाः,
ततः समस्तान्‌ नीत्वा त्वमेव चन्द्रमाः ।
रुज-हरणैः
शम-झरणैः
कालिम-विवरे पूरय नियतम्‌ ।
हृदय-वियति मम समुदय नियतम्‌,
समुदय नियतम्‌ ॥ (१)
*
ललित-शीतला मृदुला सरसामोदिनी,
त्वदीय-कान्तिः सकल-क्लान्त्यपनोदिनी ।
विच्छुरणैः
सपारणैः

तया दिव्यया नन्दय नियतम्‌ ।
हृदय-वियति मम समुदय नियतम्‌,
समुदय नियतम्‌ ॥ (२)
*
विरहि-जनानां ज्वलनस्त्वं यदि तापदः,
मिलित-युगलयो-र्हरसि पुन-र्विरहापदः ।
सित-वर्णैः
प्रस्रवणैः
सराग-हर्षं प्लावय नियतम्‌ ।
हृदय-वियति मम समुदय नियतम्‌,
समुदय नियतम्‌ ॥ (३)
*
हृत्वा विरह-स्फुलिङ्ग-लिङ्गं पावकम्‌,
स्वाग्नेयाङ्गे वेशय सदयं मामकम्‌ ।
मुद्‌गिरणैः
सुधा-कणैः
सन्तापं निर्वापय नियतम्‌ ।
हृदय-वियति मम समुदय नियतम्‌,
समुदय नियतम्‌ ॥ (४)
*
आधारस्त्वं मधुर-कलानां शं-तमः,
इन्दो ! सुन्दर ! जन-नयनानां सम्भ्रमः ।
सपार्वणैः
सञ्चरणैः
ब्रह्मानन्दं विन्दय नियतम्‌ ।
हृदय-वियति मम समुदय नियतम्‌,
समुदय नियतम्‌ ॥ (५)
* * *

(इति कलाकर-गीतिका)
इयं गीतिका प्रायः कहरवा-ताल-मध्यलयेन परिवेषणीया ।
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English Translation :  
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Complete ‘Matrigitikanjalih’ Kavya: 
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Sanskrit Song अभिज्ञान-गीतिका (Abhijñāna-Gītikā): Dr.Harekrishna Meher

Abhijñāna-Gītikā (Sanskrit Song)  
Lyrics and Tuning By : Dr. Harekrishna Meher
(Extracted from ‘ Mātŗigītikāñjalih'- Kāvya)
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* Song for Recognition * 

अभिज्ञान-गीतिका
गीत-रचना तथा स्वर-रचना : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः  

(मातृगीतिकाञ्जलिः’- काव्यतः)
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कथयति को वा
दिव्यालोको नासि त्वम्‌ ?
प्रथयति को वा
पुण्य-श्लोको नासि त्वम्‌ ?
दिव्यालोको नासि त्वम्‌ ?
(ध्रुवम्‌)
*
रवि-सङ्काशः
स्वयम्प्रकाशः,
संसरणे त्वमनन्ताकाशः ।
कथयति को वा
नन्दित-लोको नासि त्वम्‌ ?
प्रथयति को वा
पुण्य-श्लोको नासि त्वम्‌ ?
दिव्यालोको नासि त्वम्‌ ? (१)
*
त्वं संसारे
पारावारे,
सुन्दर-मौक्तिक-रूपोऽपारे ।
कथयति को वा
स्वस्ति-विशोको नासि त्वम्‌ ?
प्रथयति को वा
पुण्य-श्लोको नासि त्वम्‌ ?
दिव्यालोको नासि त्वम्‌ ? (२)
*
यथासि जातः
कथमज्ञातः ?
विश्‍वे किं त्वं नाभिज्ञातः ?
कथयति को वा
हृत-निर्मोको नासि त्वम्‌ ?
प्रथयति को वा
पुण्य-श्लोको नासि त्वम्‌ ?
दिव्यालोको नासि त्वम्‌ ? (३)
*
द्वन्द्व-ग्रस्तः
किं त्वं त्रस्तः ?
माया-मोहौ द्वावत्रस्तः ।
कथयति को वा
निरस्त-शोको नासि त्वम्‌ ?
प्रथयति को वा
पुण्य-श्लोको नासि त्वम्‌ ?
दिव्यालोको नासि त्वम्‌ ? (४)
*
कुत आयातः
कदासि यातः ?
स्वजनाः सर्वे भुवि मायातः ।
कथयति को वा
ज्ञान-विलोको नासि त्वम्‌ ?
प्रथयति को वा
पुण्य-श्लोको नासि त्वम्‌ ?
दिव्यालोको नासि त्वम्‌ ? (५)

* * *
(इति अभिज्ञान-गीतिका)
गीतिकेयं प्रायः कहरवा-ताल-मध्यलयेन परिवेषणीया ।
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English Translation : 
http://hkmeher.blogspot.in/2012/12/abhijnana-gitika-drharekrishna-meher.html 
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Complete ‘Matrigitikanjalih’ Kavya: 
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प्रबोध-गीतिका (Prabodha-Gītikā): Sanskrit Song: Dr. Harekrishna Meher

Prabodha-Gītikā (Sanskrit Song) 
Lyrics and  Tuning by : Dr. Harekrishna Meher  
(Extracted from ‘ Mātŗigītikāñjalih'- Kāvya of the Author)
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प्रबोध-गीतिका  
गीत-रचना तथा स्वर-रचना : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः   
(‘मातृगीतिकाञ्जलिः’ - काव्यतः)
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मानव रे !
मानव रे !
वर-कलेवरे, मर-कलेवरे,
सद्‌भावं कुरु हृदयाभरणम्‌, दुःख-विशरणम्‌ ।
भव-सिन्धौ हरि-नाम हि शरणम्‌ ॥
(ध्रुवम्‌)
*
जगतां सर्वे सत्त्वादि-जुषः,
पुरुषे प्रकृतिः प्रकृतौ पुरुषः ।
जहि विभ्रान्तिं स्वदिव्य-कान्तिं भासय रे !
विनय क्लान्तिं लभस्व शान्तिं चिन्तय रे !
मानव रे !
वर-कलेवरे, गत-तमोज्वरे,
उन्मोचय तन्मायावरणम्‌, जन्म-विवरणम्‌ ।
भव-सिन्धौ हरि-नाम हि शरणम्‌ ॥ (१)
*
विकासनीया मैत्री ममता,
भाव्या नियतं सुमानविकता ।
पश्यालोकं पुण्यश्लोकं दर्शय रे !
वञ्चित-लोकं प्रपञ्च-शोकं नाशय रे !
मानव रे !
वर-कलेवरे, त्वं प्रेमभरे,
पवित्रय सदा स्वान्तःकरणम्‌, तपोविकिरणम्‌ ।
भव-सिन्धौ हरि-नाम हि शरणम्‌ ॥ (२)
*
छल-कपटादौ खला निमग्नाः,
दुर्मतयः पर-पीड़न-लग्नाः ।
आस्तिक-बोधं नयानुरोधं राधय रे !
शमित-क्रोधं स्वात्म-विशोधं साधय रे !
मानव रे !
वर-कलेवरे, कलुष-जर्जरे,
विधेहि मङ्गल-धर्माचरणम्‌, यशोवितरणम्‌ ।
भव-सिन्धौ हरि-नाम हि शरणम्‌ ॥ (३)
*
सन्तः सन्ति सहृदया विरलाः,
परोपकारे निपीत-गरलाः ।
विश्‍वजनीनं कर्म नवीनं भावय रे !
स्वार्थ-विहीनं सुसमीचीनं श्रावय रे !
मानव रे !
वर-कलेवरे, सरस-निर्झरे,
अमृतं प्लावय मधुरं झरणम्‌, दुर्गति-हरणम्‌ ।
भव-सिन्धौ हरि-नाम हि शरणम्‌ ॥ (४)
*
भोग-विकारं साहङ्कारम्‌,
संहर हिंसा-द्वेषोद्‌गारम्‌ ।
कुरु सत्सङ्गं जगदुत्सङ्गं मार्जय रे !
संयम-भङ्गं काय-तरङ्गं तर्जय रे !
मानव रे !
वर-कलेवरे, क्षण-विनश्‍वरे,
भजस्व सुतरां श्रीगुरु-चरणम्‌, आत्मोद्धरणम्‌ ।
भव-सिन्धौ हरि-नाम हि शरणम्‌ ॥ (५)
*
धार्या चित्ते भगवत्‌-सत्ता,
तन्मय-पार्थिव-जन्म-महत्ता ।
नम गोविन्दं तमादिकन्दं मार्गय रे !
उपरत-मन्दं परमानन्दं धारय रे !
मानव रे !
वर-कलेवरे, तव विभास्वरे,
असंशयं त्वं जेष्यसि मरणम्‌, इह संसरणम्‌ ।
भव-सिन्धौ हरि-नाम हि शरणम्‌ ॥ (६)
* * *

(इति प्रबोध-गीतिका)
(इयं गीतिका प्रायः कहरवा-ताल-मध्यलयेन परिवेषणीया ।)
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English Translation : 
http://hkmeher.blogspot.in/2012/12/prabodha-gitika-english-version-dr.html 
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Complete ‘Matrigitikanjalih’ Kavya: 
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Saturday, January 29, 2011

Sanskrit Song प्रणयिनी-गीतिका (Praņayinī-Gītikā): Dr.Harekrishna Meher

Praņayinī-Gītikā (Sanskrit Song) 
Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher  
(Extracted from ‘ Mātŗigītikāñjalih'- Kāvya) 
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प्रणयिनी-गीतिका  
गीत-रचना तथा स्वर-रचना : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः  
(‘मातृगीतिकाञ्जलिः’- काव्यतः )
= = = = =

लीलाऽहम्‌,
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ।
प्रणय-प्रणीत-दोलाऽहम्‌ ।
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ॥
(ध्रुवम्‌)
*
वसन्तस्य पिक-काकली,
रतिः कन्दर्प-कन्दली ।
अहं हिमांशो-र्यामिनी,
विवस्वतस्तव पद्मिनी ।
अम्बुद-कम्पा
स्वर्णा शम्पा
विभ्रम-सुकलित-कोलाऽहम्‌ ॥
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ॥ (१)
*
वल्ली तरुवर-वल्लभा,
अस्मि सुरभिः समीर-भा ।
नीलताऽम्बर-करम्बिता,
शून्यता पूर्ण-लम्बिता ।
अस्मि सुस्मितिः
कुसुम-परिचितिः
पुलकित-कम्र-कपोलाऽहम्‌ ।
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ॥ (२)
*
तरुणस्य तवोद्दीपना,
करुणस्याहं वेदना ।
मम सरसी-कलहंस हे !
शिरसि पदकावतंस हे !
मधुर-गीतिका
सुस्वागतिका
भवत्स्वर-समुत्तोलाऽहम्‌ ।
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ॥ (३)
*
हरेरहं रामा रमा,
शचीन्द्र-शुचि-र्मनोरमा ।
मम मूर्त्तेरात्मा भवान्‌,
सावित्र्या मम सत्यवान्‌ ।
अस्मि राधिका
तवाराधिका
कृष्ण-मुदा व्यालोलाऽहम्‌ ।
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ॥ (४)
*
त्यागस्य सहनशीलता,
आशा ह्याश्‍वासं गता ।
ईश्‍वरस्य माया मता,
विधेरहं भवितव्यता ।
साहं स्वाहा
पावन-वाहा
वह्नि-सुचिह्नित-चोलाऽहम्‌ ।
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ॥ (५)
*
मानसस्य तव भावना,
साधूद्यमस्य साधना ।
मुक्तस्त्वमहं बन्धनी,
हृदयस्य तव स्पन्दनी ।
अस्मि विभक्तिः
कारक-पृक्तिः
कलम-ललामा गोलाऽहम्‌ ।
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ॥ (६)
*
पर्वोत्सवस्य सर्वथा,
लोक-प्रथिता सुप्रथा ।
समङ्कित-शक्र-कार्मुका,
वर्णावली समुत्सुका ।
श्रावण-सारा
वर्षा धारा
मण्डित-रस-कण्डोलाऽहम्‌ ।
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ॥ (७)
*
अलङ्कारस्य चारुता,
प्रदीपिका ज्योतिर्युता ।
सत्य-रूपस्य नित्यता,
गणित-सखी संख्या मता ।
त्वमनुप्रासः
सरस-न्यासः
पद-लालिती विलोलाऽहम्‌ ।
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ॥ (८)
*
अयस्कान्ताऽयसः कृते,
क्षीरस्त्वं नाराऽस्मि ते ।
सुलेख-लसिता पुस्तिका,
वारस्त्वमहं तारिका ।
तवास्मि दयिता
प्रत्यय-सहिता
सुकृता प्रकृति-र्मौलाऽहम्‌ ।
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ॥ (९)
*
समाधेस्तवैकाग्रता,
श्रद्धा विश्‍वासं गता ।
प्राण-निश्‍चिता चेतना,
स्वप्न-सुपन्ना कल्पना ।
समय-सहचरी
गतिः सुन्दरी
छन्दोमय-हिन्दोलाऽहम्‌ ।
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ॥ (१०)
*
बिम्बाकृतिः सदर्पणा,
व्याप्ति-र्नाद-परायणा ।
देशस्य परा संस्कृतिः,
प्रणवस्याहं व्याहृतिः ।
जनक-नन्दिनी
प्रीति-वन्दिनी
रघुवर-वरणालोलाऽहम्‌ ।
लीलाऽहम्‌, लोलाऽहम्‌ ॥ (११)
* * *

(इति प्रणयिनी-गीतिका)  
[इयं गीतिका प्रायः कहरवा-ताल-मध्यलयेन परिवेषणीया ।]
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English Translation : 
http://hkmeher.blogspot.in/2012/12/pranayini-gitika-english-version-dr.html 
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Complete ‘Matrigitikanjalih’ Kavya: 
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Sanskrit Song प्रणयि-गीतिका (Praņayi-Gītikā): Dr.Harekrishna Meher

Praņayi-Gītikā (Sanskrit Song)   
Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher  
(Extracted from ‘ Mātŗigītikāñjalih'- Kāvya of the Author)  
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प्रणयि-गीतिका  
गीत-रचना तथा स्वर-रचना : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः  
(‘मातृगीतिकाञ्जलिः’- काव्यतः )
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लीला त्वम्‌,
लीला त्वं लोला त्वम्‌,
प्रणय-प्रणीत-दोला त्वम्‌ ।
लीला त्वम्‌, लोला त्वम्‌ ॥
(ध्रुवम्‌)   

*
अयि ! पुरुषस्य त्वं सदा,
प्रकृतिः प्रमदा प्रेमदा ।
शुभाङ्गना मम सङ्गिनी,
अवनी नभसो भाविनी ।
अस्मि समुद्रः
प्रशान्त-मुद्रः
सरिता कल-कल्लोला त्वम्‌ ।
लीला त्वम्‌, लोला त्वम्‌ ॥ (१)
*
ऋक्‌ त्वमसि साम-शोभना,
ध्वने-र्मञ्जुला व्यञ्जना ।
मम मर्मोद्‌गारस्य वा,
विभाविता कविता नवा ।
प्रियाभिलाषा
मधुरा भाषा
भावाश्लिष्ट-निचोला त्वम्‌,
लीला त्वम्‌, लोला त्वम्‌ ॥ (२)
*
मम नायिका मनो-र्धनी,
कमनीया कामायनी ।
दुष्यन्तस्य शकुन्तला,
कान्ता सुललित-कुन्तला ।
सम्मदयन्ती
सा दमयन्ती
नैषध-कृत-हिल्लोला त्वम्‌ ।
लीला त्वम्‌, लोला त्वम्‌ ॥ (३)
*
उदयन-हृदय-निवासिनी,
वासवदत्ता भासिनी ।
लज्जासि मे समुज्ज्वला,
सम्मानस्य सुनिर्मला ।
शिल्प-चातुरी
स्वाद-माधुरी
सौम्यासि सम्यगोला त्वम्‌ ।
लीला त्वम्‌, लोला त्वम्‌ ॥ (४)
*
असि नयनस्य कनीनिका,
अङ्गुलि-मङ्गल-मुद्रिका ।
सिञ्जा नूपुर-सारिणी,
त्वमसि रागस्य रागिणी ।
उषा कृत-लया
वृत-दिग्‌वलया

पाटलासि चटुलोला त्वम्‌ ।

लीला त्वम्, लोला त्वम्‌ ॥ (५)
*
उत्साह-परा प्रेरणा,
संयमस्य मम धारणा ।
अत्रेः सती महीयसी,
अनसूया त्वं प्रेयसी ।
हरिश्‍चन्द्रगा
शैव्या सुभगा
यमुना गाङ्ग-पयोला त्वम्‌ ।
लीला त्वम्‌, लोला त्वम्‌ ॥ (६)
*
ज्ञानस्य मे पवित्रता,
सवितु-र्गायत्री रता ।
स्मृतिरसि संस्कारस्य मे,
रीतौ काव्य-गुणो रमे ।
प्रिये ! सदर्था
हुलहुली तथा
शङ्ख-रव-प्रेङ्खोला त्वम्‌ ।
लीला त्वम्‌, लोला त्वम्‌ ॥ (७)
*
अहमौषधे-र्वनस्पतिः,
त्वं विवेकस्य सन्मतिः ।
सुनय-संश्रया श्रीः प्रिया,
सङ्कल्प-युता सत्‌क्रिया ।
त्वमसि चैकता
सङ्घ-सङ्गता
भ्रान्तिस्तिमिरान्दोला त्वम्‌ ।
लीला त्वम्‌, लोला त्वम्‌ ॥ (८)
*
प्रमाणस्य मे त्वं प्रमा,
मृत्स्ना बीज-समागमा ।
छन्न-तालाऽसि मूर्च्छना,
शीतलता वृत-चन्दना ।
प्रिये ! वनानी
हिमगिरि-धानी
पोषित-तुषार-पोला त्वम्‌ ।
लीला त्वम्‌, लोला त्वम्‌ ॥ (९)
*
स्फटिक-वाञ्छिता स्वच्छता,
कर्मोत्तम-कीर्त्ति-र्मता ।
इतिहासस्य परम्परा,
प्रज्ञा त्वमसि ऋतम्भरा ।
सत्त्व-सुव्रता
भासि शुभ्रता
भूति-र्विजयोल्लोला त्वम्‌ ।
लीला त्वम्‌, लोला त्वम्‌ ॥ (१०)
*
सांख्यस्य योग-पद्धतिः,
सिद्धिस्तपः-समुन्नतिः ।
शान्तिराह्लाद-शालिनी,
उपनिषद्‌ ब्रह्मवादिनी ।
सविनय-भक्तिः
शिवस्य शक्तिः
वितत-सकल-भूगोला त्वम्‌ ।
लीला त्वम्‌, लोला त्वम्‌ ॥ (११)
* * *

(इति प्रणयि-गीतिका) 
[इयं गीतिका प्रायः कहरवा-ताल-मध्यलयेन परिवेषणीया ।] 
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English Translation : 
http://hkmeher.blogspot.in/2012/12/pranayi-gitika-english-dr-harekrishna.html
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Complete ‘Matrigitikanjalih’ Kavya: 
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गीता-गीतिका (Gītā-Gītikā) / HKMeher

Gītā-Gītikā (Sanskrit Song)  
Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher  
(Extracted from ‘ Mātŗigītikāñjalih'- Kāvya of the Author)
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गीता-गीतिका  
गीत-रचना तथा स्वर-रचना : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः  
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श्रीमद्‍-भगवद्‍-गीता,
प्रहर्षिणीयं
महर्षि-कृष्ण-
द्वैपायन-प्रणीता ।
श्रीमद्‍-भगवद्‍-गीता ।
गीता, गीता, गीता ॥
(ध्रुवम्‌)
*
पुण्या श्रीहरि-पार्थ-सनाथा,
निर्भर-गर्भित- गौरव-गाथा ।
महाभारते
विश्व-हित-रते
यस्या वाणी सदा यथार्था ।
सुमेधसा समेधिता,
श्रीमद्‍-भगवद्‍-गीता ।
गीता, गीता, गीता ॥ (१}
*
सकलोपनिषद्‌ गाभी सुभगा,
प्रभु-गोविन्दे दोग्धरि शुभगा ।
निवसति वत्सः
पार्थोऽनलसः
भोक्तृ-सुधीभि-र्धृतापवर्गा ।
सुदुग्ध-रूपा पीता,
श्रीमद्‍-भगवद्‍-गीता ।
गीता, गीता, गीता ॥ (२}
*
कर्म कुरु त्वं स्वधर्म-सक्तः,
देहि गुरुत्वं कर्मणि शक्तः ।
विवेक-बुद्ध्या

मानस-शुद्ध्या
भुवि भव सुतरां विभु-पद-भक्तः ।
सम-दर्शितोष्ण-शीता,
श्रीमद्‍-भगवद्‍-गीता ।
गीता, गीता, गीता ॥ (३}
*
समुपदिशति या मर-संसारे,
मानव-मानं सुव्यवहारे ।
तत्त्वं सत्त्वं
याति महत्त्वं
ज्ञाने भक्तौ कर्माचारे ।
आत्म-विचार-पुनीता,
श्रीमद्‍-भगवद्‍-गीता ।
गीता, गीता, गीता ॥ (४}
*
कलयति सकलं कलि-मल-नाशम्,
तिरयति मर्त्त्ये संसृति-पाशम्‌ ।
सुविहित-योगा
निरस्त-भोगा
वितरति दिव्यं हृदि प्रकाशम्‌ ।
ब्रह्ममयी सम्प्रीता,
श्रीमद्‍-भगवद्‍-गीता ।
गीता, गीता, गीता ॥ (५}

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(इति गीता-गीतिका)  

इयं गीतिका प्रायः कहरवा-ताल-मध्यलयेन परिवेषणीया ।
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English Translation : 


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रुचिरं विश्वम् (Ruchiram Viśvam: Sanskrit Song)/Dr.HKMeher

Ruchiram Viśvam (Sanskrit Song)
Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher

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रुचिरं विश्वम्  (संस्कृत-गीतिका)
गीत-रचना तथा स्वर-रचना : डॉं. हरेकृष्ण-मेहेरः
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रुचिरम्‌, रुचिरम्‌‍, रुचिरम्‌,
रुचिरे करणे भुवनं रुचिरम्‌ ।
रुचिरे चरणे गमनं रुचिरम्‌ ॥
(ध्रुवम्‌)
*
राष्ट्रं रुचिरं रुचिरा धरणी,
धर्मो रुचिरो रुचिरा सरणी ।
सहितं निहितं
रुचिरं विहितं
रुचिराचरणे भवनं रुचिरम्‌ ।
रुचिरे करणे भुवनं रुचिरम्‌ ॥ (१)
*
ग्रामो रुचिरो रुचिरा पल्ली,
रुचिरा काशी रुचिरा दिल्ली ।
अशनं वसनं
रुचिरं हसनं
रुचिरे द्रविणे रसनं रुचिरम्‌ ।
रुचिरे करणे भुवनं रुचिरम्‌ ॥ (२)
*
कन्या तनयो रुचिरा भग्नी,
रुचिरौ पितरौ रुचिरा पत्‍नी ।
रुचिरा सुवधू
रुचिरो बन्धू
रुचिरे वरणे मिलनं रुचिरम्‌ ।
रुचिरे करणे भुवनं रुचिरम्‌ ॥ (३)
*
आस्यं रुचिरं रुचिरं हास्यम्‌,
रूपं रुचिरं रुचिरं लास्यम्‌ ।
अयनं नयनं
रुचिरं शयनं
रुचिराभरणे रचनं रुचिरम्‌ ।
रुचिरे करणे भुवनं रुचिरम्‌ ॥ (४)
*
त्यागो रुचिरो रुचिरा शिक्षा,
प्रीती रुचिरा रुचिरा दीक्षा ।
उचिता शुचिता
रुचिरा रचिता
रुचिरे स्मरणे मननं रुचिरम्‌ ।
रुचिरे करणे भुवनं रुचिरम्‌ ॥ (५)
*
ज्ञानं रुचिरं रुचिरं कृत्यम्‌,
गुरवो रुचिरा रुचिरं सत्यम्‌ ।
भक्ती रक्ती
रुचिरा शक्ती
रुचिरे गिरणे वचनं रुचिरम्‌ ।
रुचिरे करणे भुवनं रुचिरम्‌ ॥ (६)
*
श्रद्धा रुचिरा रुचिरं ध्यानम्‌,
दानं रुचिरं रुचिरं यानम्‌ ।
नीती रीती
रुचिरा गीती
रुचिरे वर्णे कवनं रुचिरम्‌ ।
रुचिरे करणे भुवनं रुचिरम्‌ ॥ (७)
*
सन्ध्या रुचिरा रजनी रुचिरा,
चन्द्रो रुचिरो रुचिरा तारा ।
दिवसो रुचिरो
रुचिरो मिहिरो
रुचिरे किरणे गगनं रुचिरम्‌ ।
रुचिरे करणे भुवनं रुचिरम्‌ ॥ (८)
*
जलधी रुचिरो रुचिरः पोतः,
रुचिरा सरसी रुचिरं स्रोतः ।
पुलिनं नलिनं
रुचिरामलिनं
रुचिरे झरणे प्लवनं रुचिरम्‌ ।
रुचिरे करणे भुवनं रुचिरम्‌ ॥ (९)
*
वृक्षो रुचिरो रुचिरा वल्ली,
विहगो रुचिरो रुचिरा मल्ली ।
पत्रं छत्रं
रुचिरं क्षेत्रं
रुचिरावरणे गहनं रुचिरम्‌ ।
रुचिरे करणे भुवनं रुचिरम्‌ ॥ (१०)
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(इयं रुचिर-गीतिका प्रायः कहरवा-ताल-मध्यलयेन परिवेषणीया ।)
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