Friday, December 30, 2011

Three Poems of Mahendra Bhatnagar (Oriya: Harekrishna Meher)

डॉ. महेन्द्र भटनागर की तीन कवितायें
मूल हिन्दी से ओड़िआ भाषान्तर : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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Three Hindi Poems of Dr. Mahendra Bhatnagar
Oriya Translation By : Dr. Harekrishna Meher
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१. बिजलियाँ गिरने नहीँ देंगे :
विद्युत्‌पात हेबाकु देबुँ नाहिँ :

http://hkmeher.blogspot.in/2011/12/mahendra-bhatnagars-poem-oriya-version_28.html
*
२. अदम्य :
अदम्य :
http://hkmeher.blogspot.in/2011/12/mahendra-bhatnagars-poem-oriya-version.html
*
३. ओ भवितव्य के अश्वो ! :
हे भबितव्यर अश्वगण ! :

http://hkmeher.blogspot.in/2011/12/hindi-poem-of-mahendra-bhatnagar-oriya.html
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Biography of Poet Dr. Mahendra Bhatnagar : http://www.srijangatha.com/profiles_Args_34


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Thursday, December 29, 2011

Indradhanu & Aamrakuta (Kosali Meghaduta: Harekrishna Meher)

Indradhanu & Aamrakuta
From ‘Kosali Meghaduta’
of Dr. Harekrishna Meher:
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इन्द्रधनु एवं आम्रकूट पर्वत
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इन्दर् धनु केते सुन्दर् दिशुछे इ साम्‌ने,
बिनोमुँड़िर् टिपिनुँ से उठिछे जतने ।
गुटे ठाने मिशि गले
रतन् केते बानि,
तेज् झल्‌मल् करुछे सते
मन्‌के नेसि टानि ।
इ धनु त तोर् साम्‌ला देहिके,
सजेइ देबा केते रंगे
अएन् दिश्‌बु सेनुँ ।
खोच्‌ले य़ेन्ति रङ्ग्‌रङ्गिआ मजूर्-चूल्,
गोपाल्-बेशे सुन्दर् देही
नन्दनन्दन् काह्नु ॥

[15]

*
आम्रकूटे तिहिड़ि देइ मुषल् धारा बिषम्,
जंग्‌ली जूएर् उत्पात्‌के करि देबु खतम् ।
बाट् चालिचालि तुइ त थाकि
य़ाइथिबु केते,
आदर् करि शुर्‌ङ्गे निजर्
ठान् देबा से तोते ।
आस्‌रा लागि पाशे बन्धु आएले
सेतार् आघर् उप्‌कार्‌के इ बेले,
हेतेइ करि कृपण् घले
अनादर् करे नाइँ ।
देखुछु त आम्रकूट पर्बत
केड़े उँचा बहिछे मान् महत,
इतार् सरि साधुर् कथा
काणा कहेमि मुइँ ॥

[17]
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( कोशली मेघदूत : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर )
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Wednesday, December 28, 2011

Mahendra Bhatnagar’s Poem विद्युत्‌पात हेबाकु देबुँ नाहिँ (Oriya Version : Harekrishna Meher
























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मूल हिन्दी कविता : बिजलियाँ गिरने नही देंगे
रचयिता : डॉ. महेन्द्र भटनागर
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कुछ लोग
चाहे जोर से कितना
बजाएँ युद्ध का डंका
पर, हम कभी भी
शान्ति का झंडा
जरा झुकने नहीं देंगे ।
हम कभी भी
शान्ति की आवाज को
दबने नहीं देंगे ।

क्योंकि हम
इतिहास के आरम्भ से
इन्सानियत में,
शान्ति में
विश्वास रखते हैं,
गौतम और गान्धी को
हृदय के पास रखते हैं ।
किसीको भी सताना
पाप सचमुच में समझते हैं,
नहीं हम व्यर्थ में पथ में
किसी से जा उलझते हैं ।

हमारे पास केवल
विश्व-मैत्री का,
परस्पर प्यार का सन्देश है,
हमारा स्नेह
पीड़ित ध्वस्त दुनिया के लिए
अवशेष है ।

हमारे हाथ
गिरतों को उठाएंगे,
हजारों
मूक, बंदी, त्रस्त, नत,
भयभीत, घायल औरतों को
दानवों के क्रूर पञ्जों से बचाएंगे ।

हमें नादान बच्चों की हँसी
लगती बड़ी प्यारी,
हमें लगतीं
किसानों के
गडरियों के
गलों से गीत की कड़ियाँ मनोहारी ।
खुशी के गीत गाते इन गलों में
हम
कराहों और आहों को
कभी जाने नहीं देंगे ।


हँसी पर खून की छींटें
कभी पड़ने नहीं देंगे ।
नये इनसान के मासूम सपनों पर
कभी भी बिजलियाँ गिरने नहीं देंगे ।
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Hindi Poem of Dr. Mahendra Bhatnagar
Oriya Translation By : Dr. Harekrishna Meher
(Bidyutpaata hebaaku debun naahin)
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विद्युत्‌पात हेबाकु देबुँ नाहिँ
(मूल हिन्दी कविता –
बिजलियाँ गिरने नहीँ देंगे : डॉ. महेन्द्र भटनागर)

ओड़िआ भाषान्तर : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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किछि लोक य़ेते जोर्‌रे
य़ुद्धर डिण्डिम पिटुथान्तु पछे,
आमे केबेहेले
शान्तिर वैजयन्तीकु
टिकिए बि नइँबाकु देबुँ नाहिँ ।
आमे केबे बि
शान्तिर उदात्त उच्चारणकु
दमित हेबाकु देबुँ नाहिँ ॥

कारण हेउछि,
आमे इतिहासर प्रारम्भरु
विश्वास रखिछुँ
मानविकतारे
आउ शान्तिरे ।
गौतम आउ गान्धीङ्कु
आमे रखिछुँ
आपणार हृदय निकटरे ।
काहारिकि पीड़ा देबा
आमे बास्तबरे पाप बोलि बुझुँ ।
काहारि सङ्गे
तुच्छाटारे रास्तारे
आमे कळिद्वन्द्व करुँना ॥

आमठारे रहिछि
बार्त्ता केबळ विश्वमैत्रीर,
परस्पर प्रेमर ।
पीड़ित ध्वस्त दुनिआ लागि
अबशिष्ट रहिछि
आमरि आन्तरिक स्नेह ॥

आमरि हात
कराइब निश्चित
पतितमानङ्कर उत्थान ।
हजार हजार
मूक बन्दी त्रस्त नत
भयभीत आहत
महिळामानङ्कु सुरक्षा करिब
दानबमानङ्कर क्रूर पञ्झारु ॥

निरीह निष्कपट
शिशुमानङ्कर हस
आमकु बहुत भल लागे ।
कृषकमानङ्कर
आउ मेषपाळकमानङ्कर कण्ठरु
निर्गत गीत-पङ्क्ति
आमकु लागे
बहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी ।
आनन्दर गीत गाउथिबा
एइ कण्ठमानङ्करे
दुःखर उच्छ्वास आउ य़न्त्रणाकु
केबेहेले प्रबेश कराइ देबुँ नाहिँ ॥

हस उपरे रक्तर छिटा पड़िबाकु
केबेहेले देबुँ नाहिँ ।
नूतन मणिषर निश्छळ स्वप्न उपरे
केबेहेले बिद्युत्पात
हेबाकु देबुँ नाहिँ ॥

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Mahendra Bhatnagar’s Poem अदम्य (Oriya Version: HK Meher)

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मूल हिन्दी कविता : अदम्य
रचयिता : डॉ. महेन्द्र भटनागर
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दूर-दूर तक छाया सघन कुहर,
कुहरे को भेद
डगर पर बढ़ते हैं हम ।

चट्टानों ने जब-जब पथ अवरुद्ध किये,
चट्टानों को तोड़ नयी राहें गढ़ते हैं हम ।

ठंडी तेज हवाओं के वर्तुल झोंके आते हैं,
तीव्र चक्रवातों के सम्मुख सीना ताने
पग-पग अड़ते हैं हम ।

सागर-तट पर टकराता भीषण ज्वारों का पर्वत,
उमड़ी लहरों पर चढ़ पूरी ताकत से लड़ते हैं हम ।

दरियाओं की बाढ़ें तोड़ किनारे बहती हैं,
जल-भँवरों, आवेगों को थाम
सुरक्षा-यान चलाते हैं हम ।

काली अंधी रात कयामत की
धरती पर घिरती है जब-जब,
आकाशों को जगमग करते
आशाओं के विश्वासों के
सूर्य उगाते हैं हम ।
मणि-दीप जलाते हैं हम ।

ज्वालामुखियों ने जब-जब
उगली आग भयावह,
फैले लावे पर
घर अपना बेखौंफ बनाते हैं हम ।

भूकम्पों ने जब-जब
नगरों गावों को नष्ट किया,
पत्थर के ढेरों पर
बस्तियाँ नयी हर बार बसाते हैं हम ।

परमाणु-बमों उद्जान-शस्त्रों की
मारों से
आहत भू-भागों पर
देखो कैसे
जीवन का परचम फहराते हैं हम ।
चारों ओर नयी अँकुराई हरियाली
लहराते हैं हम ।

कैसे तोड़ोगे इनके सिर ?
कैसे फोड़ोगे इनके सिर ?
दुर्दम हैं,
इनमें अद्भुत खम है ।
काल-पटल पर अंकित है -
‘जीवन अपराजित है ।’

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Hindi Poem of Dr. Mahendra Bhatnagar
Oriya Translation By : Dr. Harekrishna Meher

(Adamya)
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अदम्य
मूल हिन्दी कविता - अदम्य : डॉ. महेन्द्र भटनागर .
ओड़िआ भाषान्तर : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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बहु दूर य़ाए छाइ य़ाइछि
गहन कुहेळिका ।
सेइ कुहेळिका भेदि
आमे आगेइ चालिछुँ रास्तारे ॥
*
बड़ बड़ पथर-खण्डगुड़िक
य़ेबे य़ेबे रास्ता अबरुद्ध करे,
सेइ पथर-खण्डगुड़िकु भाङ्गिदेइ
नूतन मार्ग निर्माण करुँ आमे ॥
*
शीतळ प्रखर पबनर घूर्णि झड़ आसे,
तीब्र चक्र-बात सम्मुखरे
बक्ष प्रसारित करि
अटळ रहुँ आमे प्रति पद-क्षेपरे ॥
*
सिन्धु-तटरे आघात दिए
भीषण जुआरर पर्बत ।
प्रबळ ढेउ उपरे चढ़ि
समस्त शक्ति लगाइ
आमे तत्पर होइथाउँ घोर संग्रामरे ॥
*
स्रोतस्विनी-समूहर बन्या
कूळ भाङ्गि बहि चाले ।
जळ-भउँरी आउ आबेगकु स्थिर रखि
आमे चाळना करुँ सुरक्षार य़ान ॥
*
प्रळयर कळा अन्धकार रात्री
य़ेबे य़ेबे पृथिबीकु घेरिय़ाए,
ब्योम-परिसरकु उज्ज्वळतारे भरिदेइ
आमे कराइथाउँ सूर्य्य़ोदय
आशार आउ बिश्वासर ।
कराइथाउँ आमे
मणि-प्रदीप प्रज्वळित ॥
*
आग्नेय-गिरिराजि य़ेबे य़ेबे
भयङ्कर अग्निर उद्गिरण करे,
बिस्तृत लाभा उपरे
निज भबन निर्माण करुँ
आमे निर्भयरे ॥
*
भूमिकम्प य़ेबे य़ेबे
नगर आउ ग्राम-समूहकु नष्ट करे,
ध्वस्त प्रस्तर-स्तूप उपरे
नूतन बसति
निर्माण करुँ आमे प्रति थर ॥
*
परमाणु बोमार, उद्जान शस्त्रराशिर
प्रबळ प्रहार य़ोगुँ
आहत भूखण्ड उपरे
देख केमिति
उड़ाइथाउँ आमे
जीबनर बैजयन्ती ।
चतुर्दिगरे आमे दोळायित करुँ
नब अङ्कुरराजिर सबुजिमा ॥
*
केमिति भाङ्गिब तुमे सेमानङ्क मस्तक ?
केमिति फटाइब तुमे सेमानङ्क मुण्ड ?
सेमाने अत्यन्त दुर्द्दम;
सेमानङ्क निकटरे अछि अद्भुत साहस ।
काळ-पटळ उपरे अङ्कित होइ रहिछि
“ जीबन अपराजित ” ॥
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Tuesday, December 27, 2011

Hindi Poem of Mahendra Bhatnagar (Oriya Rendering: Harekrishna Meher


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मूल हिन्दी कविता : ओ भवितव्य के अश्वो !
रचयिता :
डॉ. महेन्द्र भटनागर
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ओ भवितव्य के अश्वो !
तुम्हारी रास
हम
आश्वस्त अंतर से सधे
मजबूत हाथों से दबा
हर बार मोड़ेंगे ।

वर्चस्वी,
धरा के पुत्र हम
दुर्धर्ष,
श्रम के बन्धु हम
तारुण्य के अविचल उपासक
हम तुम्हारी रास
ओ भवितव्य के अश्वो !
सुनो
हर बार मोड़ेंगे ।

ओ नियति के स्थिर ग्रहो !
श्रम-भाव तेजोदृप्त
हम
अक्षय तुम्हारी ज्योति
ग्रस कर आज छोड़ेंगे ।

तितिक्ष अडिग
हमें दुर्ग्रह नहीं अब
अन्तरिक्ष अगम्य ।
निश्चय
ओ नियति के
पूर्व निर्धारित ग्रहो !
हम ..
हम तुम्हारी ज्योति
ग्रस कर आज छोड़ेंगे ।

ओ अदृष्ट की लिपियो !
कठिन प्रारब्ध हाहाकार के
अविजेय दुर्गो !
हम उमड़
श्रम-धार से
हर हीन होनी की
लिखावट को मिटाएंगे ।

मदिर मधुमान
श्रम संगीत से
हम
हर तबाही के
अभेदे दुर्ग तोड़ेंगे ।
ओ भवितव्य के अश्वो !
तुम्हारी रास मोड़ेंगे ।


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Hindi Poem of Dr. Mahendra Bhatnagar
Oriya Translation By : Dr. Harekrishna Meher

(He Bhavitavyara Aśvagaņa ! )

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हे भबितव्यर अश्वगण !
मूल हिन्दी कविता - ओ भवितव्य के अश्वो ! : डॉ. महेन्द्र भटनागर.
ओड़िआ भाषान्तर : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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हे भबितव्यर अश्वगण !
तुमरि लगाम्
आमे समस्ते
आश्वस्त चित्तरे प्रवृत्त
शक्तिशाळी हातरे दबाइ
प्रति थर मोड़ि चालिबुँ स्वेच्छारे ॥
*
महाबळशाळी आमे,
बसुन्धरार सन्तान ।
दुर्द्धर्ष समस्ते,
श्रमर बन्धु आमे,
तरुणिमार अबिचळित उपासक आमे ।
हे भबितव्यर अश्वगण !
शुण,
तुमरि लगाम् आमे स्वेच्छारे
मोड़ि चालिबुँ प्रति थर ॥
*
हे नियतिर स्थिर ग्रहगण !
श्रम-भाब तेजोदृप्त
आमे अक्षय
तुमरि ज्योतिकु
आजि ग्रास करिबुँ निश्चय ॥
*
तितिक्षु अचळ आम पाइँ
आजि आउ दुर्ग्रह नुहे
अन्तरीक्ष अगम्य ।
हे नियतिर पूर्ब-निर्द्दिष्ट ग्रहगण !
आमे,
आमे तुमरि ज्योतिकु
ग्रास करिबुँ निश्चय ॥
*
हे अदृष्टर लिपिगण !
कठिन प्रारब्ध हाहाकारर
अपराजेय दुर्गराजि !
श्रम-धारारे उच्छळ होइ
प्रत्येक हीन घटणार लेखाकु
आमे लिभाइदेबुँ ।


मदिर आउ मधुमान् श्रम-सङ्गीत य़ोगे
आमे प्रत्येक ध्वंसर
अभेद्य दुर्गकु भाङ्गिदेबुँ ।
हे भबितव्यर अश्वगण !
आमे तुमरि लगाम्
मोड़ि चालिबुँ निज इच्छामते ॥
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गंगाधर मेहेर की कविता: नर और मयूर * हिन्दी अनुवाद: हरेकृष्ण मेहेर


‘Nara O Mayura’ (नर ओ मयूर)
Original Oriya Poem
By : Svabhava-Kavi Gangadhar Meher (1862-1924)

Hindi Translation By : Dr. Harekrishna Meher
(Extracted from ‘Arghya-Thaali’)

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नर और मयूर
मूल ओड़िआ कविता : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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बैठे थे नरेश्वर
हस्ती के पृष्ठ पर
चित्रमय राजकीय वस्त्रों से सुन्दर
अपना शरीर सुसज्जित कर ॥

रहकर गिरि-शिखर पर
मयूर वही निहार कर
झेल न सका
कृत्रिम बड़प्पन नरेश का ।
अपनी पूच्छ पसार
बोला केकानाद से पुकार ।

“ हे नरेश्वर !
तुम नहीं हो मेरे-जैसे
सुन्दर या ऊँचे ।
देखो मुझे,
तुम कितने छोटे हो मुझसे ।
फिर किसलिये अपनेको
ऊँचे मानकर
बड़ा गर्व करते हो ?

मेरी पूंछ के साथ
अगर तुलना करोगे सही,
अपने वेश को नरनाथ !
तुच्छ समझोगे निश्चित ही ॥

तुम यदि कहोगे भला
‘ज्ञान होता है मनुष्य का,
कहाँ हो सकेगी पक्षी-जाति
मनुष्य की भाँति ?’

मण्डुक के विकट रव के प्रति
ध्यान देती नहीं मेरी श्रुति ।
मेघ का गर्जन सुनकर ऊपर
रहता हूँ मैं नृत्य-तत्पर ॥

झेल नीच जन का दुर्वचन,
उच्च जन की भर्त्सना
हित समझकर अपना,
करते हो क्या उच्च का अर्चन ?

निगलता हूँ भयानक विषधर भुजंग को;
यदि तुम्हारे हृदय में
विनाश की इच्छा जन्मे,
तो क्या विनाश करते हो ?

इन्द्रधनुष के दर्शन से सदा
मेरे मन में खुशी बढ़ जाती ।
क्या दूसरों की सम्पदा
तुम्हारे मन में आनन्द जगाती ?

जो सुख है मेरा पर्वत पर,
भूमि पर भी सुख है वो ।
अटारी में और कुटीर में, हे नरेश्वर !
क्या तुम समान सुखी रहते हो ?”


* * * * *


[‘अर्घ्यथाली’ कविता-संकलन से]
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Ref : Nawya (Hindi e-magazine):
http://www.nawya.in/hindi-sahitya/item/अर्घ्यथाली-काव्य-से-दो-कवितायें.html
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Friday, December 23, 2011

गंगाधर मेहेर की कविता : उसे भी कहते हैं धर्मावतार * हिन्दी रूपान्तर : हरेकृष्ण मेहेर

'Taaku Madhya Bolithaanti Dharma-Abataara'
(ताकु मध्य बोलिथान्ति धर्मअबतार)
Original Oriya Poem
By : Svabhaava-Kavi Gangadhar Meher (1862-1924)
Hindi Translation By : Dr. Harekrishna Meher
(Extracted from ‘Arghya-Thaali’)
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‘उसे भी कहते हैं धर्मावतार’
मूल ओड़िआ कविता : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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पराया धन लुण्ठन करने
मन जिसका व्यस्त निरन्तर,
कुचली जाती जिसकी सम्पत्ति
गणिकागण के चरणों पर ।
जिसका जीवन लाखों लोगों का बोझ अपार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥


जिसकी विद्या धर्मनीति का शीश मरोड़ती,
बुद्धि जिसकी सौ सत्यों को चूर डालती ।
धन से खरिदा जाता जिसका विचार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥


हरण कर स्वर्ण का
जो ताम्र दान करता,
धनों से अपने प्रभु का
सन्तोष जगाता रहता ।
दोषोंको ढँकने अर्पण करता कई उपहार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥


भ्रमण खर्च के लिये
प्राप्त करता है भत्ता,
दरिद्रों के मस्तक मरोड़कर
इधर खाता रहता ।
करता रहता क्षमता का अपव्यवहार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥


घर से खाली हाथ निकलता बाहर,
अपने घर भरता गाड़ी-गाड़ी द्रव्य लाकर ।
बाजार दिखलाता उन द्रव्यों को पुनर्बार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥


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[‘अर्घ्यथाली’ कविता-संकलन से]
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Ref : Nawya (Hindi e-magazine):
http://www.nawya.in/hindi-sahitya/item/अर्घ्यथाली-काव्य-से-दो-कवितायें.html
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Love Knows No Distance : Upendra Bhanja (English Version : HKMeher)

Love Knows No Distance


Original Oriya Poem : Kavi-Samrāt Upendra Bhanja


(English Version by : Dr. Harekrishna Meher)


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Dūre thile pāśe achhi thibu ehā gheni /


Kete dūre Chandra kete dūre Kumudinī //


Prīti abheda tāńkara /


Jete dūre thile je jāhāra se tāhāra //


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“Even far, I’m thy very near,


This always keep in the heart, My Dear !


Moon and Lily both are


from each other, away very far.


Still flows all the while


their love ever-juvenile.


For a loving couple, see,


the distance may whatever be,


Hers is he


and his is she.”


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(Taken from Upendra Bhanja’s Oriya Kavya ‘Prema-Sudhānidhi’ Chapter-XIV,


English Rendering by : Harekrishna Meher)


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Friday, October 28, 2011

Tapasvini Kavya (Complete English Version): Dr.Harekrishna Meher

Original Oriya Epic Poem ‘TAPASVINĪ’ of POET GAŃGĀDHARA MEHER (1862-1924).
Complete Translation into Hindi, English and Sanskrit languages
By : Dr.HAREKRISHNA MEHER.

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Tapasvinī, an eleven-canto Oriya epic poem, is the magnum opus and a great classic of Poet Gańgādhara Meher. With the prevailing sentiment of Pathos, this kāvya depicts the post-banishment episode of Sītā in the hermitage of Sage Vālmīki. Here Sītā, the adorable daughter of Earth and the devoted wife of King Rāma, in her later life appears as a Tapasvinī, ‘A Woman practising penance’ or ‘An Ascetic-maid’. In this Rāmāyana-based literary composition, the poetic presentation is well-embellished with originality and significant innovations. Like Kālidāsa in Sanskrit and William Wordsworth in English, Gańgādhara Meher is regarded as ‘Prakŗti-Kavi’, Poet of Nature, in Oriya literature.

This epic poem reveals the ambition of the poet to portray the brilliant character of a devoted wife steeped in Indian culture. With vivid and prominent delineation of Sītā’s life-deeds, ‘Tapasvinī Kāvya' may be construed as a ‘Sītāyana’ in the field of Indian Literature.
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‘ Tapasvinī of Gańgādhara Meher ’
Complete English Translation by : Dr. Harekrishna Meher.

Published by : R.N. Bhattacharya,
A-217, Road No.4, H.B.Town, Sodepur, Kolkata-700110.
First Edition : 2009. ISBN : 81-87661-63-1.

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‘ Tapasvinī of Gańgādhara Meher ’ Book Ref :
http://hkmeher.blogspot.com/2009/08/english-version-book-of-oriya-tapasvini.html

* Tapasvini : A Literary Appreciation :
http://www.museindia.com/focuscontent.asp?issid=34&id=2292
*[All Eleven Cantos have been taken here from this English Book.]

Complete English ‘ TAPASVINĪ ’ is presented here.
Also see : http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/complete-english-tapasvini.html

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English Tapasvinī [Contents]
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Translator’s Foreword :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-translators-foreword.html

Tapasvinī of Gańgādhara Meher : A Critical Observation (Article) :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-tapasvini.html

Preface (Translated from Original Oriya)
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-preface.html

* * *  
Canto-1 :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-canto.html

Canto -2 :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-canto-2.html

Canto-3 :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavyacanto-3.html

Canto-4 :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-canto-4.html

Canto-5 :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-canto-5.html

Canto-6 :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-canto-6.html

Canto-7 :http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-canto-7.html

Canto-8 :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-canto-8.html

Canto-9 :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-canto-9.html

Canto-10 :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-canto-10.html

Canto-11 :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-canto-11.html

* * English Tapasvinī Complete* *
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Other Related Links : 
Complete Hindi-English-Sanskrit Versions 
of Tapasvinī Kāvya :
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Complete Hindi Tapasvinī Kāvya :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/complete-hindi-tapasvini-kavya.html
*
Articles on My Hindi-English-Sanskrit Translations of Tapasvinī Kāvya :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/my-hindi-english-sanskrit-articles-on.html
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/08/blog-post.html
*
For more details about Gańgādhara Meher’s Tapasvinī,
Please see: 

Thursday, October 20, 2011

Complete 'Koshali Meghaduta' संपूर्ण कोशली मेघदूत : Dr.Harekrishna Meher

संपूर्ण कोशली मेघदूत :   
डॉ. हरेकृष्ण मेहेर 
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Complete 'Koshali Meghaduta'
(Koshali Lyrical Translation of Poet Kalidasa’s Sanskrit Kavya Meghadutam)

‘Koshali Meghaduta’ Book
By : Dr. Harekrishna Meher
  


Published by : Trupti, Bhubaneswar-2, Orissa, India. 
First Edition : 2010
[ISBN : 13 978-93-80758-03-9] 


Book Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2010/08/koshali-meghaduta-book-inaugurated.html

Dr. Nilamadhab Panigrahi Award (2010) by Sambalpur University 
for the Book 'Koshali Meghaduta : 
http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/nilamadhab-panigrahi-samman-to.html
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Video of Dr. Nilamadhab Panigrahi Award by Sambalpur University
For ‘Kosali Meghaduta’ Book : Dr.Harekrishna Meher's Speech : 
YouTube Link :   
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Book Reference :
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WorldCat :  
http://www.worldcat.org/search?q=au%3AMehera%2C+Harekr%CC%A5shn%CC%A3a.&qt=hot_author   

Google Books :   
http://books.google.com/books/about/Kosli_Meghaduta.html?id=Xq0eKQEACAAJ
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मूल संस्कृत मेघदूत-काव्य : महाकबि कालिदास  
* संपूर्ण कोशली गीत रूपान्तर : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

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Complete 'Koshali Meghaduta' 
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(All the Contents have been taken from my 'Koshali Meghaduta' Book)
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Dedication : Arpan : अर्पन् : 
* Translator’s Acknowledgement : Pade Adhe : पदे अधे :  
http://hkmeher.blogspot.com/2008/02/kosali-meghaduta.html

Foreword : Praak Kathan : प्राक्‌कथन् :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/10/koshali-meghaduta-foreword-harekrishna.html
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Part-1 : Purba Megha : पूर्ब मेघ : 
Kosali Version : 
http://hkmeher.blogspot.com/2011/09/koshali-meghaduta-purba-megha.html
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Part-2 : Uttara Megha : उत्तर मेघ : 
Kosali Version : 
http://hkmeher.blogspot.com/2011/10/koshali-meghaduta-uttara-megha.html

* The End * 
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Other Related Links : 
Purba Megha : Introduction :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/02/kosali-meghaduta-part-1-purba-megha.html
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Uttara Megha : Introduction :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/02/kosali-meghaduta-part-2-uttara-megha.html
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Translated Works of Dr. Harekrishna Meher : 

Wednesday, October 19, 2011

Koshali Meghaduta - Foreword/ Dr.Harekrishna Meher

Koshali Meghaduta – Praak Kathan   
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Translator’s Foreword
(Taken from the Book ‘Koshali Meghaduta’
(Koshali Lyrical Translation of Poet Kalidasa’s Sanskrit Kavya 'Meghadutam')
By : Dr. Harekrishna Meher 

*  
Published by : Trupti, Bhubaneswar-2, Orissa, India.
First Edition : 2010. ISBN : 13 978-93-80758-03-9)

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कोशली मेघदूत /  हरेकृष्ण मेहेर  
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प्राक्‌कथन् 

॥ १ ॥ 

प्रकृतिर् बाहारिआ सौन्दर्य़्य साङ्गे भित्‌रिआ सौन्दर्य़्यके काव्यथि रूप् देबार् लागि महाकबि कालिदास् माहिर् आन् । ताँकर् अमर् कृति ‘मेघदूत’ सन्देश् काव्य, दूतकाव्य, गीतिकाव्य आरु खँड्काव्य भाबे केबल् संस्कृत् साहित्यथि नाइँसे, सारा विश्वसाहित्यने बि ख्यातिअर्जन् करिछे । देश् बिदेशर् बिभिन्न भाषाथि इ काव्यर् अनुबाद् हेइ सारिछे । इ काव्यर् नायक् हउछे जने य़ुआन् जक्ष । से जक्षपति कुबेर् रजार् सेबक् आरु कैलास् पर्बतर् कोले अबस्थित् अल्‌कापुरीर् बासिन्दा । नूआँ नूआँ बिहा हेइ करि निजर् काम्‌ने हेला कर्‌ला बलि से कुबेर् रजा ठानुँ अभिशाप् पाइछे आरु एक् बछर् तक् एक्‌ला निर्वासित् हेइ करि प्रिया ठानुँ बहुत् दूरे राम्‌गिरिर् आश्रम्‌ने बसा करिछे । 


आषाड़् मासर् पहेला दिने पर्बत् उप्‌रे गुटे बड़् हाती बागिर् मेघ्‌के देखि करि बिरही जक्षर् मन् भित्‌रे प्रेम् भाब् जागि उठिछे । अल्‌कापुरीने निजर् घरे एक्‌ला बिरहिनी प्रियाके सान्त्वना देबार् लागि मेघ्‌के दूत् बनेइ करि जख्य कुशल् बार्ता पठेइछे । धूआँ, जुए, पाएन् आरु पबन्‌थि तिआरि हेला मेघ् त निर्जीब् आरु जड़् आए । खबर् पुहुँचेबार् शक्ति तार् नेइँना । मातर्‌क प्रकृति-कबि कालिदास् इ कथा भल् करि जानिछन् आरु लेखिछन् । य़क्ष बहुत् कामातुर् हेबार् जोगुँ अचेतन् आरु सचेतन् भित्‌रे भेद् बिचार् कर्‌बार् शक्ति हरेइ बसिछे । इथिर् लागि प्रिया पाख्‌के जल्‌दि खबर् नेबा काजे मेघ्‌के गुहैर् करिछे । य़क्ष मेघ्‌के निजर् सान् भाइ आरु बन्धु बलि करि सम्बोधन् करिछे । इथिनुँ य़क्षर् स्नेह आरु आत्मीय भाब् जना पड़ुछे । एन्ता बिचार्‌ने प्रिया य़क्षिणीके मेघर् बोहू (भाउज) आरु सखी भाबे चित्रण् कराहेइछे । प्रकुर्‌ति आउर् मुनुस् भित्‌रे एकात्मतार् रूप् देइ करि कबि कालिदास् निर्जीब् मेघके बि मुनुस् बागिर् सम्बेदन्‌शील् आरु सुख-दुःखर् अनुभबी भाबे बर्णना करिछन् । 

माहापुरु श्रीहरि (जगन्नाथ्) अनन्त नागर् शेजे निद्रा जाएसन् बलि पुराण्‌मन्‌थि प्रसिद्धि रहिछे । अषाड़् मासर् शुक्लपक्ष दुतिआ तिथिने माहापुरुर् रथ्‌य़ात्रा उच्छब् हेसि आरु दश्‌मी तिथिने बाहाड़ा य़ात्रा । इतार् अन्य दिन एकादशी तिथिने माहापुरु शुइसन् । हेतिर् लागि इ दिन् हउछे ‘हरिशयनी एकादशी’ । इनुँ आरँभ् हेसि चतुर्मास्या । माहापुरु चाएर् मास् तक् शुइसन् आरु कार्तिक् मासर् शुक्लपक्ष एकादशी दिने निदुन् उठ्सन् । देब्‌ता उठ्बार् य़ोगुँ इ दिन्‌के ‘देबोत्थान एकादशी’ कहेसन् । भक्तमाने माहापुरुके उठैबार् जोगुँ इ दिन्‌के ‘देबोत्थापन एकादशी’ बलि करि बि कहाय़ाएसि । आसाड़् मासर् पहेला दिने रामगिरिर् शिखर्‌थि जक्ष मेघ्‌के देखिछे । कबि कहिछन् : 
‘आषाढ़स्य प्रथम-दिवसे मेघमाश्लिष्ट-सानुं
वप्रक्रीड़ा-परिणत-गज-प्रेक्षणीयं ददर्श ॥’ (श्लोक-२)

केतेक् बिद्वान् आलोचक् आसाड़र् ‘प्रथम दिवस’ नाइँ मानि करि ‘प्रशम दिवस’ अर्थात् आख्‌री दिन् बलि मत देसन् । मातर् एन्ति हेले गुटे बछर् पर्य़न्त् निर्बासन् सजार् एक् मास् हिसाब् ठिक् रूपे नाइँ हेइपारे । सेथिर् लागि ‘प्रथम दिवस’ पद्के अधिकांश् आलोचक्‌मने स्वीकार् कर्‌सन् । इ गन्‌ति जाहा हउ पछे, आषाड़् मास् बेल्‌के जख्य आठ् मास् पाखापाखि सजा भोगि सारिथिसि । सारंग्‌धारी माहापुरु निदुन् उठ्ले, माने ‘देबोत्थान एकादशी’ आएले, कुबेर् रजार् शाएप् कटिय़िबा आरु जक्ष मुक्ति पाएबा । इ दिन् पते सजा चाएर् मास् बाकी अछे बलि कबि जक्षर् मुहेँ उत्तर्‌मेघथि सूच्‌ना देइछन् : 

‘शापान्तो मे भुजग-शयनादुत्थिते शार्ङ्गपाणौ
शेषान् मासान् गमय चतुरो लोचने मीलयित्वा ।’ (श्लोक-११६)

बिरहिणी य़क्षिणीके आश्वासनार् सन्देस् देइ करि कबि दाम्पत्य प्रेमर् गभीर् अटल् बिश्वास् आरु आन्तरिक् माधुर्य़्य प्रतिपादन् करिछन् । ताँकर् लेखनी काव्यिक् बिषयबस्तु, सामाजिक् जीबनर् सुख्‌दुख्‌भरा कथा आरु प्राकृतिक् सौन्दर्य़्यर् अम्लान् चित्रण् द्वारा सहृदय लोकर् अन्तर्‌के रसाप्लुत् करिपारिछे । इने मेघदूत काव्यर् इ आलोचना सहित् गोटे बिशेष् जान्‌बार् कथा अछे य़े अष्टादश् शताब्दीने ओड़िशार् संस्कृत् विद्वान् महामहोपाध्याय पण्डित् नरहरि निजे मेघदूतर् ‘ब्रह्म-प्रकाशिका’ टीकाथि श्लोकर् भित्‌रिआ गुपत् अर्थके बुझेइ करि रामगिरिर् अर्थात् नीलगिरिर् निबासी य़क्षरूपी श्रीजगन्नाथ् माहापुरु आरु रथय़ात्रा आदिर् माहात्म्य दर्शेइछन् ।

॥ २ ॥ 


बिषयबस्तु-दृष्टिनुँ ‘मेघदूत’ काव्य दुइ भागे बिभक्त हेइछे - पूर्ब मेघ आरु उत्तर् मेघ । पूर्ब मेघर् श्लोक् संख्या ६६ आरु उत्तर् मेघर् ५५ । इतार् बाहारे अल्प केतेटा प्रक्षिप्त श्लोक् संस्कृत् मेघदूत काव्यपुस्तकर् केते संस्करण्‌थि देख्‌बाके मिल्‌सि । पूर्बमेघथि रामगिरि ठानुँ आरँभ् करि अल्‌कानगरी तक् मेघर् य़िबार् बाट् बर्नना करा हेइछे । माल् क्षेत्र, आम्रकूट् पर्बत्, नर्मदा नएद्, बिन्ध्य गिरि, दशार्ण देश् आरु तार् राज्‌धानी बिदिशा, बेत्रबती नएद्, नीच् पर्बत्, निर्बिन्ध्या नएद्, काल्‌सिन्धु नएद्, अबन्ती देश् संगे राज्‌धानी उज्जयिनी, सिप्रा नएद्, गन्धबती नएद्, महाकाल् मन्दिर्, गम्भीरा नएद्, पर्‌भु कार्त्तिकेयर् निबास् देबगिरि, चर्मण्वती नएद्, दश्‌पुर्, ब्रह्माबर्त्त, सरस्वती नएद्, गङ्गा नएद्, पर्बत्‌राज् हिमालय, क्रौञ्चगिरि, कैलास् पर्बत्, मान्‌सरोबर् आरु अल्‌कापुरी - इ सबु भौगोलिक् दृष्टिनुँ कबिर् लेखनीथि बहुत् सुन्दर् भाबे ठान् पाइछे । उत्तर् मेघने बिरहिनी जक्षिणीर् शारीरिक् आरु मानसिक् अबस्था संगे जक्षर् सन्देश् पाठक्-मन्‌कर् मन्‌छुआँ हेइ पारिछे । इ काव्यर् मुख्य रस् शृङ्गार् आए । तेबे य़क्ष आरु य़क्षिणी परस्पर् अल्‌गा हेइथिबा जोगुँन् बिप्रलम्भ शृङ्गारर् चित्रण् रहिछे । केतेक् नदी, जङ्गल् आरु पर्बतर् बर्णना भित्‌रे सम्भोग् शृङ्गारर् उदाहरन् देख्‌बाके मिल्‌सि । इ प्रकार् चित्रण् थिले बि शिब-भक्त कबि कालिदास् ऐश्वरिक् आरु धार्मिक् भाब्‌ना सङ्गे भारतीय संस्कृतिर् महत्त्वके प्रतिष्ठा करिछन् । प्रकुर्‌तिर् नाना पर्‌कार् सुन्दर् रूप् आरु मुन्‌स जीबनर् नाना अबस्थार् कथा इ काव्यथि सरस् भाबे अनुभब् करि हेसि । 


बाल्मीकि-रामायणर् बर्ण्णना मते सीतादेबी लङ्कापुरीर् अशोक् बगिचाने थिला बेल्‌के बिरही पर्भु श्रीराम् हनुमान्‌के दूत करि प्रियापाश्‌के निजर् दुख्‌सुख्‌भरा खबर् पठेइथिले । हनुमान् सीता देबीके कुशल् बार्‌ता देबार् प्रसंग् मेघदूत काव्यर् उत्तर् मेघने रहिछे :
‘इत्याख्याते पवन-तनयं मैथिलीवोन्मुखी सा ।’ (श्लोक-१०६)
रामायणर् इ सीता-हनुमान् उपाख्यान् द्वारा अनुप्राणित् हेइ करि कालिदास् मेघके दूत बनेइ करि ज़क्षर् सन्देस् जक्षिणी निके पठेइछन् बलि करि विद्वान् आलोचक्‌मने मत देइछन् । बिख्यात् व्याख्याकार् मल्लिनाथ् ‘मेघदूत’ काव्यर् ‘सञ्जीवनी’ टीकाने इ कथाके सूचेइ देइछन् :-
‘सीतां प्रति रामस्य हनुमत्-सन्देशं मनसि निधाय मेघ-सन्देशं कविः कृतवान् इति आहुः ।’
इतार् छड़ा काव्यर् पहेला श्लोक्‌थि ‘जनकतनया-स्नान-पुण्योदकेषु’ पदेने जान्‌की सीताकर् उल्लेख् रहिछे । फेर् आरु गुटे श्लोक्‌ने कबि कहिछन् :  
‘आपृच्छस्व प्रियसखममुं तुङ्गमालिङ्ग्य शैलं  
वन्द्यैः पुंसां रघुपति-पदैरङ्कितं मेखलासु ।’ (पूर्बमेघ, १२)

श्रीराम् पर्भुर् पूज्य पाबन् पाद्-चिन्हा राम्‌गिरिने रहिछे बलि करि बर्णना अछे । इथिनुँ रामायणर् आभास् जना पड़ुछे । कबि कालिदास् ‘रघुबंश’ आदि महाकाव्यर् रच्‌ना कला बेल्‌के रामायण् द्वारा प्रभाबित् हेइथिबार् जना पड़्‌सन् । ‘मेघदूत’ के बिचार् कले बि रामायण् कथा आलोचना परिसर्‌के आएसि । 

महाकबि कालिदास्-रचित् ‘मेघदूत’ गीतिकाव्यके पश्चिम् ओड़िशार् प्रचलित् कोश्‌ली भाषाने पद्यानुबाद् करि मुइँ धएन् मने करुछेँ । मोर् इ कोश्‌ली मेघदूतर् आरँभ्‌थि ‘उपक्रम्’ भाबे आरु आख्‌रीथि ‘उपसंहार्’ भाबे निजर् गीत् संय़ोजना कराहेइछे । प्रिय पाठक्‌मन्‌कर् जान्‌बार् लागि इ अनुबाद्ने केतेक् शब्द-बेभारर् सूच्‌ना टिके दउछेँ । शाब्दिक् एक्‌ता दृष्टिनुँ पश्चिम् ओड़िशार् भिन् भिन् ठाने बहुप्रचलित् केतेक् शब्दर् प्रयोग् इ गीते करा हेइछे । उदाहरण् स्वरूप्, साहित्यर् ‘उपमा’ अलङ्कार्‌थि ‘समान्’ अर्थके बुझोउथिबा शब्दगुरा हउछे : बागि, बागिर्, भलिआ, सरि, परा, तुल, समान्, लेखेँ, लेखेन्, मितार्, मितान्, जेन्ता, जेन्ति इत्यादि ।

इ प्रकारे उन्‌जा शब्दगुरा : शोइ/शुइ, पानि/पाएन्/पैन्, गोटे/गुटे, नाइँ/नेइँ, सेन/सेने, सेलके/सेलगे/सेठाने, सेमान्‌कर्/सेमन्‌कर्, तोते/तते, तोके/तके, कर्‌ला/कला, केँ/काएँ/ केएँ/काणा, बिहा/भिआ, चाएर्/चिएर्, पाखे/पाशे/निके/छुमे, आरु/आउर्, खबर्/खबेर् इत्यादि उपय़ुक्त जागा देखि करि लगा हेइछे । कलाहाँड़ि आरु तार् आखेपाखे प्रचलित् ‘थेब्‌बा’ (=रहेबा, अट्किबा) आरु ‘खेट्बा’(=पुहुँचिबा), इ दुइटा शब्दके बि उचित् जागाने प्रयोग् कराहेइछे । इतार् संगे अन्यबिषयर् बिचार् बिज्ञ पाठक् आरु समीक्षक्‌मन्‌कर् हाते रहेला ।

॥ ३ ॥ 

संस्कृत भाषा सह प्राकृत भाषार सम्बन्ध परि, ओड़िआ सह कोशलीर सम्बन्ध परिलक्षित होइथाए । संस्कृत साहित्यकु अनुशीळन कले जणाय़ाए, पूर्बकाळरे संस्कृत थिला बिद्वान्‌ मानङ्कर भाषा ओ प्राकृत थिला साधारण जनतार भाषा । प्राकृत स्थळबिशेष अनुसारे अनेक प्रकारर थिला । संस्कृत ओ प्राकृत समस्तङ्कर बोधगम्य ओ आदरणीय थिला । संस्कृत थिला उभय लिखित ओ कथित भाषा । प्राकृत निज सीमा भितरे लिखित ओ कथित भाषा रूपे प्रचळित थिला । 

प्राकृत भाषारे अनेक काव्यकृति पाठकङ्कर दृष्टि आकर्षण करिथाए । राजशेखर-कृत ‘कर्पूरमञ्जरी’, सातबाहन-हाल-रचित ‘गाथा-सप्तशती’, गुणाढ्य-प्रणीत ‘बृहत्‌कथा’ (बड्डकहा) प्रभृति प्राकृत रचनाबळी उल्लेखनीय । ‘साहित्यदर्पण’र प्रणेता बिश्वनाथ कबिराजङ्क रचित ‘कुबलयाश्वचरित’ नामक प्राकृत काव्यग्रन्थ तत्काळीन समाजरे प्राकृत भाषार बिशेषत्व प्रतिपादन करिथाए । महाकबि भास, काळिदास, भबभूति ओ अन्यान्य प्रमुख नाट्यकारङ्क प्रणीत नाटकमानङ्करे संस्कृत भाषार संळाप सहित प्राकृतभाषार संळाप ओ पद्यमान दृष्टिगोचर होइथाए । काळिदासङ्क ‘कुमारसम्भब’ महाकाव्यर सप्तम सर्गरे शिब-पार्बती-परिणय प्रसङ्गरे संस्कृत ओ प्राकृत भाषार स्वतन्त्र माधुर्य्य़ बर्णित होइछि । नब-बिबाहित दम्पतिङ्कु अभिनन्दन जणाइ बाग्‌देबी सरस्वती बन्दना करिछन्ति प्रभु महादेबङ्कु शुद्ध संस्कृत बाणीरे एबं देबी पार्बतीङ्कु लाळित्यभरा प्राकृत भाषारे । 

मानक भाषा सह लोकभाषा य़ेमिति सम्पृक्त, सेमिति संस्कृत भाषा सहित प्राकृत । तेबे शब्द ओ बाक्यर बिन्यास दृष्टिरु उभय भाषार स्वातन्त्र्य रहिछि । साहित्यिक भाषा ओ आञ्चळिक भाषार समन्वय साहित्यर समृद्धि दिगरे सहायक होइथाए । ओड़िआ एबं कोशली भाषार अबस्था सेहिपरि । ओड़िशा समेत अन्यान्य प्रदेशमानङ्करे भाषार बिभिन्नता परिदृष्ट होइथाए । ओड़िशार मानक साहित्यिक भाषा ओड़िआ हेलेहेँ पूर्ब, पश्चिम, उत्तर ओ दक्षिण अञ्चळमानङ्करे कथित भाषागुड़िकर किछि किछि पार्थक्य परिलक्षित हुए । पश्चिमाञ्चळर कथित भाषा भाबरे ‘कोशली’ भाषार प्राधान्य रहिछि । काव्यकबिता, गीत, काहाणी, नाटक ओ चळच्चित्र आदिरे कोशलीर बिशेषत्व सुबिदित । ओड़िआ गीत सह सम्बलपुरी गीतर सरसता ओ माधुर्य्य़ श्रोता तथा पाठकमानङ्क हृदयहारी होइपारिछि । ओड़िआ, बङ्गळा, मराठी, हिन्दी प्रभृति परि आधुनिक भारतीय भाषासमूह एबं भोजपुरी, अवधी, ब्रजबोली प्रभृति परि आञ्चळिक भाषागुड़िकर सारस्वत महत्त्व रहिछि । हिन्दी साहित्यरे गोस्वामी तुळसीदास, सुरदास, मीराबाई आदि भक्त-कबिमानङ्क रचनाबळीरु आञ्चळिक भाषार महत्त्व उपलब्धि कराय़ाइपारे । 

ओड़िआ भाषार बर्णमाळारे ‘ळ’ एबं ‘ल’ - एहि उभय बर्ण थिबाबेळे कोशलीरे मूळरूपरे केबळ ‘ल’ बर्णर ब्यबहार होइथाए । स्थळबिशेषरे ‘ळ’ बर्णर प्रयोग बि देखाय़ाए । एहा मूळ रूपरे संस्कृतर प्रभाब । बैदिक संस्कृतरे ‘ल’-‘ळ’ दुइटिर एबं लौकिक संस्कृतरे केबळ ‘ल’ र ब्यबहार रहिछि । संस्कृत उपरे आधारित होइथिबा य़ोगुँ भारतर केतेक प्रान्तीय भाषागुड़िकरे, यथा ओड़िआ ओ मराठी आदिरे, ‘ल’-‘ळ’ दुइ बर्णर प्रयोग परिदृष्ट हुए । बङ्गळा आदि परि हिन्दी भाषारे मूळ रूपे केबळ गोटिए ‘ल’ बर्ण रहिछि । किन्तु हिन्दीरे संस्कृतर ‘ळ’-बर्णय़ुक्त शब्द स्थळ-बिशेषरे आबश्यक हेले देबनागरी लिपिरे थिबा ‘ळ’ बर्णर प्रयोग कराय़ाए । तेणु बिभिन्न भारतीय प्रान्तीय भाषारे उभय ‘ल’-‘ळ’ बर्णर स्वतन्त्र ब्यबहार रहिछि । ओड़िआ बाक्यरे संस्कृत (तत्‌सम) शब्दर प्रयोग परि कोशली बाक्य भितरे प्रसङ्ग देखि ओड़िआ, संस्कृत ओ हिन्दी भाषार शब्द प्रयोग कराय़ाइपारे । 

केतेक आलोचक कोशली भाषारे दीर्घ ‘ई’ एबं दीर्घ ‘ऊ’ बर्णर दीर्घ उच्चारण न हेबा कारण दर्शाइ ए बर्णद्वय अनाबश्यक बोलि मत पोषण करन्ति । एहा ब्यतीत तालव्य ‘श’ एबं मूर्द्धन्य ‘ष’ बर्ण द्वयर बदळरे केबळ दन्त्य ‘स’ बर्णकु ग्रहण करिबारे आग्रह प्रकाश करन्ति । आउ केतेके युक्ताक्षरगुड़िकु उपेक्षा करिबारे प्रयासी होइथान्ति । किन्तु एभळि नकारात्मक चिन्ताधारा सम्पूर्ण्ण भित्तिहीन । मो मतरे, अन्यान्य दीर्घस्वर परि दीर्घ ‘ई’ एबं ‘ऊ’ बर्ण, ‘श-ष-स’ बर्णत्रय, ‘ज-य-य़’ एबं ‘ ब-व’ बर्णगुड़िक कोशली भाषारे रहिबा उचित, रहिछि एबं रहिबा आबश्यक । भाषा ओ लिपि सङ्गे साहित्यिक दिगर बिचार करिबा नितान्त जरुरी । कारण, अन्यान्य भाषार शब्दगुड़िक सहित तुळनात्मक दृष्टिरु उक्त बर्णगुड़िकर बिशेष प्रयोजन रहिछि । 

संस्कृत भाषामानङ्कर जननी रूपे सुबिदित । तेणु संस्कृत शब्दाबळी ओड़िआ एबं अन्यान्य भारतीय भाषामानङ्करे बहुभाबरे दृष्टिगोचर ओ व्यबहृत होइथाए । येते युक्तितर्क ओ आलोचना कले सुद्धा सत्यकु केहि अन्यथा करिपारिबे नाहिँ । भाषा, ब्याकरण ओ छन्द दृष्टिरु बिचार कले प्रत्येक भाषारे ह्रस्व ओ दीर्घ स्वर निश्चित रूपे रहिछि । कोशलीरे मध्य दीर्घ ई-ऊ प्रभृति स्वरर उच्चारण रहिछि ओ कराय़ाउछि । एहा लोकप्रचळनरे अनुभब-सिद्ध । संस्कृत एबं ओड़िआ भाषा परि कोशलीरे आबश्यक स्थळे ’शषस’ तिनि बर्णर व्यबहार कराय़ाउछि । 

संस्कृतरे ‘बिकाश’, ‘बिकास’ आदि उभय शब्द शुद्ध ओ समानार्थ-प्रकाशक । हिन्दीरे ‘देश्’, ‘देस्’ आदि शब्दमान शुद्ध रूपरे व्यबहृत हेउछि । कोशलीरे बि ‘कोश्‌ली’, ‘कोस्‌ली’, ‘देश्’, ‘देस्’, ‘भाषा’, ‘भासा’ इत्यादि शब्दमान शुद्ध । ता बोलि ‘श’-‘ष’ बर्णद्वयकु बर्णमाळारु निर्बासित करि ताहा बदळरे केबळ ‘स’ व्यबहार करिबार कौणसि य़थार्थता नाहिँ । शब्द रहिछि बोलि सबु भाषारे युक्ताक्षर रहिब हिँ रहिब । कौणसि शब्दरे थिबा एक बा एकाधिक व्यञ्जन बर्णकु हळन्त-चिह्न देइ लेखा य़ाइपारे; किन्तु युक्तबर्णत्वकु केबेहेले परिहार कराय़ाइ पारिब नाहिँ । ए सबु दृष्टिरु कोशलीरे युक्ताक्षरर स्थिति सुनिश्चित रहिछि । एहा व्यतीत ‘विश्व’, ‘तत्त्व’, ‘द्वारका’ आदिरे ‘व’ बर्ण एबं ‘आम्ब’, ‘लम्ब’ आदि शब्दरे ‘ब’ बर्णर स्वतन्त्र स्थिति ओ उच्चारण रहिछि । ‘मयूर’, ‘मय़ूर’, ‘मजूर’ आदि शब्दरे ‘ज’ ओ ‘य़’ बर्णर बिकळ्प-भाब परिलक्षित होइथाए । सेथिपाइँ संपृक्त बर्णगुड़िकु एहि ‘कोशली मेघदूत’ र यथास्थानरे प्रयोग कराय़ाइछि ।

कोशलीर आउ एक बिशेषत्व रहिछि । शब्दगुड़िकर अ-कारान्त मझि बर्णरे ओ शेष बर्णरे साधारणतः हळन्तर बहुळ प्रयोग होइथाए, हिन्दीभाषार शब्द परि । उदाहरण-स्वरूप, ‘मन्’, ‘अल्‌का’, ‘शूइन्’, ‘भम्‌रा’, ‘जङ्ग्‌ली’ इत्यादि । तेबे आबश्यकता ओ सुबिधा अनुसारे हळन्त-हीन ओ हळन्त-युक्त उभय प्रकार उच्चारण होइथाए । यथा : ‘भात्’/भात, ‘गीत्’/गीत, ‘पद्’/पद इत्यादि । बिभक्ति-क्षेत्ररे बि एपरि उच्चारण लक्ष्य कराय़ाइपारे, यथा : ‘गोपाल्‌र’/ ’गोपालर्’ । ‘घर्‌नुँ’/’घरुँन्’ इत्यादि शब्दरे बिभक्ति-प्रत्यय आदिर प्रसङ्ग व्याकरण ओ भाषा-बिज्ञानर बिषय एबं गबेषणा-सापेक्ष । 


कोशलीरे संस्कृतर सिधासळख प्रभाब केतेक स्थळरे प्रणिधान-योग्य । यथा : संस्कृत शब्द ‘ऐषमः’ (=ए बर्ष) अपभ्रंश होइ कोशलीरे ‘एसुँ’ होइछि । सेहिपरि ‘परुत्’ (=गत बर्ष) शब्दर ‘परु’/‘पर्‌हु’, ‘परारि’ (=गत बर्षर पूर्ब बर्ष) शब्दर ‘परिआर्’/‘परिएर्’, ‘केन उपायेन’ (=केउँ उपायरे) शब्दर ‘केन् उपैन’ रूप प्रभृतिर प्रयोग कोशलीरे बिशिष्टतार परिचय प्रदान करिथाए । एहा छड़ा हिन्दीर प्रभाबरे ‘है’ आदि शब्दरे एबं साधारण उच्चारणरे एक स्वतन्त्रता परिलक्षित होइथाए । ए हेउछि प्रचळित कोशली भाषा सम्बन्धरे केतेक आबश्यक ज्ञातव्य बिषय । 

प्रत्येक घटणार निर्द्दिष्ट समय एबं य़ोग रहिथाए । मेघदूतकु कोशली भाषारे पद्यानुबाद करिबा लागि सन् २००३ मसिहार प्रारम्भरे मोर आन्तरिक अभिळाष जाग्रत होइथिला । फळस्वरूप, ईश्वरङ्क आशीर्बादरु फेबृआरी, मार्च्च ओ अप्रेल २००३ - एहि तिनि मास भितरे बिभिन्न समयरे अनूदित होइ ‘कोशली मेघदूत’ पूर्णरूपरे साकारता लाभ कला । य़ाजपुररु प्रकाशित स्वनामधन्य त्रैमासिक साहित्यिक मुखपत्र ‘बर्त्तिका’र दशहरा बिशेषाङ्क - २००३ रे मोर एहि ‘कोशली मेघदूत’ काव्य पूर्ण्ण रूपरे स्थानित होइथिला । परे एथिर अळ्प केतेक शब्दर सामान्य परिबर्त्तन कराय़ाइछि । मूळ संस्कृत श्लोकर भाबराजिकु कोशली गीतानुबादरे निज भाषारे य़थार्थ ओ उपयुक्त रूपे परिबेषण करिबा लागि यथासम्भब प्रयास कराय़ाइछि । भारतीय साहित्यरे मेघदूत काव्यर एहा हेउछि प्रथम कोशली अनुबाद । सहृदय पाठकबृन्द हिँ साहित्यर उपयुक्त बिचारक । एक भिन्न स्वाद नेइ एहि ‘कोशली मेघदूत’ जनसाधारणङ्क हृदय रञ्जन करिब बोलि मोर दृढ़ आशा ओ बिश्वास ।    


* हरेकृष्ण मेहेर  
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Sunday, October 2, 2011

‘Koshali Meghaduta’ (Uttara Megha): कोशली मेघदूत (उत्तर मेघ): Dr.Harekrishna Meher


‘Koshali Meghaduta’  
By : Dr. Harekrishna Meher    
(Complete ‘Koshali Lyrical Translation of Poet Kalidasa’s   
Sanskrit Kavya ‘Meghadutam’)
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Published by : 
 ‘Trupti’, Bhubaneswar-2, Orissa, India, 2010.
[ISBN : 13 978-93-80758-03-9] 

*   
'Koshali Meghaduta' Book :
http://hkmeher.blogspot.com/2010/08/koshali-meghaduta-book-inaugurated.html


For this ‘Koshali Meghaduta’ book,   
Translator Dr. Harekrishna Meher
was honoured with
  

‘Dr.Nilamadhab Panigrahi Award’-2010    
conferred by   
Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa.
Ref :  

http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/nilamadhab-panigrahi-samman-to.html.
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For Purba Megha, Part-1 of Koshali Meghaduta, 
Please see : Link : 
http://hkmeher.blogspot.com/2008/02/kosali-meghaduta-part-1-purba-megha.html
*

Uttara Megha, Part-2 of Koshali Meghaduta 
is presented here.
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संस्कृत मेघदूत-काव्य : महाकबि कालिदास
कोशली गीत रूपान्तर : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
*
कोशली मेघदूत
- - - - - - -
(उत्तर मेघ)
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[67]
से अलका पुरीर् सबु
उँचा उँचा महल्,
तोर् बागिर् गुन् बहिछे
छुइँ करि बादल् ।
सेन सुन्द्‌‍री माईकिना करुथिसन् खेला,
तोर् कोलेने जेन् पर्कार् बिज्‌ली चंचला ।
शोभा पाएसि चित्र सेने
केते रंग् रंगिआ,
तोर् गाग्‌रे नाना रंगर्
इन्दर् धनु भलिआ ।
संगीत् लागि बाजुथिसि मुर्‌दुंग बाइद,
कान्‌के मधुर् धीर् गँभीर् जेन्ता तोर् शबद ।
झल्‌झल्‌सि महल् जाकर् भूइँतल्,
खञ्जा हेइछे धोब् उजल्
खोब् मणि रतन् ।
ढल्‌ढल्‌सि तोर् देहि भितरे,
बादल् भाइ ! बुन्दा बुन्दा
पानि जेन्ति जतन् ॥
*
[68]
हाते लीला- पदम् थिसि सेने सुन्द्‌‍रीलोकर्,
खोचिथिसन् मुँड़र् बाले कुन्द फुल् सुन्दर् ।
लोध्र फुलर् पराग् चूरुन्
रेति रेति करि,
दिशुथिसि पँर्‌रा बरन्
ताँकर् मुहुर् शिरी ।
शिरीष् फुल् काने थिसन् लगेइ,
नूआँ कुरुबक फुले
सुन्दर् ताँकर् खोषा ।
मांगे निजर् ajei थिसन् कदम् फुल्,
फुटिथिसि जेन्टा भाइ !
कले तुइ बर्‌षा ॥
*
[69]
फुल् गछेने सबु दिने फुटिथिसि जतन्,
बास्न लोभे भम्‌रामाने गुन्गुनोउथिसन् ।
पदम् लता सुन्दर् सदा
पदम् फुल् धरि,
हँस्‌माने घुन्सि बागिर्
ताके थिसन् घेरि ।
सदा उजल् पुएँक् मेलि कएँ कएँ,
शबद् केते करुथिसन्
पोषिआँ मजूर्‌माने ।
सञ्ज् बेला जन्-उकिआ सबु दिन्,
दिशुथिसि केड़े सुन्दर्
अन्धार् नाइँ सेने ॥
*
[70]
दुस्‌रा कारन् नाइँ, केबल् हेइ करि खुसि,
से नगरर् लोक्‌मन्‌कर् आँखिर् पानि झर्‌सि ।
प्रेम् जोगुँ हेले एका
प्रिय प्रिया मिलन्,
ताप् आएसि देहे ताँकर्
नाइँ उन्‌जा कारन् ।
प्रेम्-झगर् एका बिरह करैसि,
निज निजर् भित्‌रे सेने
नाइँ कारन् दुसर् ।
सबु बेल्‌के बयस् एका य़उबन्,
अन्य बयस् नाइँ काहार्
सेने जक्षमन्‌कर् ॥
*
[71]
से पुरे त बिराट् बिराट् अछे सबु महल्,
तले लागिछे फटिक् मणि सफेद् केते उजल् ।
चिक्‌चिकुछे सेने एन्ति
छबि तरामन्‌कर्,
फुल् बागिर् जना पड़्‌सि
बिछेइ हेइ सुन्दर् ।
बाज्‌ले सेन धीरे धीरे मुर्दंग,
बादल् भाइ ! तोर् गंभीर्
शबद् लेखेँ शुभ्‌सि ।
आनन्द्-मने कल्‌प-मधु पिइसन्,
य़क्षमाने सुन्द्‌‍री संगे
केलि रंगे रसि ॥
*
[72]
देब-बाञ्छित् सुन्द्‌‍री सुन्द्‌‍री जख्य-टुकिल् माने,
गुपत्-मणि खेल् खेल्‌सन् सेने हरष् मने ।
हात्-मुठाने धरि करि
मणि देले फिकि,
गंगा नदीर् सुना बाएल्
भित्‌रे जाएसि लुकि ।
नुरि नुरि फेर् रख्‌सन् बाहार् करि आनि,
इ पर्कार् मजा देसि खेल् लुक्‌लुकानि ।
मन्दाकिनीर् बुन्दा बुन्दा पानिके,
धरिकिना धीरे धीरे
बहेसि पबन् शीतल् ।
मन्दार् गछ बहुत् अछे खँड़िथि,
खरातप नाइँ बाजे
छाइ सेतार् बहल् ॥
*
[73]
प्रेमीमाने चंचल् हाते कर्‌बा लागि केलि,
प्रियार् बसन् ढिला कर्‌सन् अँटार् गएँठ् खोलि ।
बिम्बाधरी सुन्द्‌‍रीमाने
बुड़ि लाजे लाजे,
बिभोर् हेइ निज्‌के सेने
गुपत् रख्‌बा काजे ।
झअट् करि चूरुन् धरि मुठाथि,
फिकि देसन् रतन्-बती-
शिखा उप्‌रे पाखर् ।
मातर् बती-शिखा उँचा बड़ा तेज्,
नाइँ लिभे, हेतिर् लागि
बेकार् चेष्टा ताँकर् ॥
*
[74]
पबन् जोगुँ बादल्‌माने बुलि बुलि धीरे,
चघिजाएसन् केते महलर् उँचा भूइँ उप्‌रे ।
सेमाने त तोर् समान्
आरे जलधर् भाइ !
पाएन् बर्‌षा करि पार्‌सन्
जाहिँ ताहिँ थाइ ।
बुन्दा बुन्दा पानि भिजेइ सेमाने,
सेथि काँथिर् चित्रमन्‌के
करि देसन् खराप् ।
हेतिर् दोषे डरि करि पलैसन्,
झर्का बाटे कुहुला रूपे
लुकि करि चुप्‌चाप् ॥
*
[75]
रातिर् बेले धोब् चन्दर् किरन् पड़्‌सि घरे,
सेथिर् य़ोगुँ तोर् आबरन् घुचि जाएसि दूरे ।
सेन मण्डप् सूतामन्‌थि
चन्दर्‌कान्त मनि,
झुलि करि रहिथिसि
शीतल् गुन् जानि ।
बुन्दा बुन्दा पाएन् धीरे थिपेइ,
मझि राति माएझि-लोकर्
थकान् मिटेइ देसि ।
पतिमन्‌कर् बाहाँर् प्रेम् आलिंगन्,
पाएला परे नरम् देहे
दुखा जेते हेसि ॥
*
[76]
मजा कर्‌सन् पर्ति दिन् कामी जक्षमाने,
अल्‌कापुरीर् केते सुन्दर् भँटार् बगिचाने ।
जक्ष-रजार् उद्यान् आए
‘बइभ्राज’ तार् नाँ,
सेन सरगर् अप्सरादल्
आसि हेसन् जमा ।
सेमान्‌कर् संगे मिशि नाना कथा हेइ,
केते खुसि गप कर्‌सन् मन्‌के रसेइ ।
कामीलोकर् पाखे सदा रहिछे,
अचलाचल् धन् रतन्
सेतार् नाइँ गन्‌ति ।
सांगे रहि किन्नर्‌माने गाएसन्,
सेने मधुर् उँचा सुरे
कुबेर् रजार् कीर्ति ॥
*
[77]
स्तिरीमाने राति केन् केन् बाटे जाइथिले,
इ कथाटा जना पड़्‌सि बेल् उदे हेले ।
तन्द्रा हेइ चाल्‌बा य़ोगुन्
मुँड़र् बाले लाग्‌ला,
मन्दार् फुल् पड़ि जाएसि
हेइ करि ढिला ।
काने खोच्‌ला पदम् फुलर् कअँलिआ,
पतर् खँड़् ठाने ठाने
पड़िथिसि तले ।

छिट्‌‍कि करि पड़िथिसि मोतिफल्,
छाति उप्‌रे पिन्ध्‌ला हारर्
सूता छिड़िगले ॥
*
[78]
सेन साक्षात् महेश्वर माहापुरु बिजे,
जक्ष-पति कुबेर् रजार् बन्धु से त निजे ।
इ कथाके कामदेब
भाबि करि डरे,
भमर्-गुन लाग्‌ला धनु
हाते नेइँ धरे ।
भूरु-लतार् मोहनी भंगी संगे त,
बाँक् चाहाँनी सुन्दरी चतुर्
माईकिना-मान्‌कर् ।
भेदि पार्‌सि कामी पुरुषर् हुरुद्के,
हेतिर् लागि सफल् हेसि
काम् कामदेबर् ॥
*
[79]
अब्‌लालोकर् बेश्‌भूषा अलंकार् बेसि,
कल्‌प तरु एक्‌ला निजे सबु जोगेइ देसि ।
बाँक् चाहाँनीर् आदेश्‌कारी
मद, चित्र बसन्,
नाना बानिर् फुलर् कढ़ि
माला आदि भूषन् ।
देहे सजेइ हेबार् काजे अलंकार्,
देसि आरु कहँलिआ
पतर् केते रकम् ।
सेतार् संगे लाल् रंगर् अलता,
रँचेइ हेबार् लागि ताँकर्
नरम् पाद-पदम् ॥
*
[80]
सेने कअँल् पतर् बागि शाम्‌ला घोड़ा अछन्,
सूरुज् देबर् घोड़ामन्‌के बल् देखेइ पार्‌सन् ।
हातीमाने अछन् उँचा
बड़् पर्‌बत् परा,
तोर् सरि से जोर् बर्‌षेइ
देसन् मद धारा ।
बीर्‌मन्‌कर् देहे शोभा पाएसि,
खँड़िआ चिन्हा केते पर्‌कार्
अलंकार् साजि ।
राबण् संगे लढ़िथिले सेमाने,
हेतिर् जोगुँन् दाग् रहिछे
खँडार् चोट् बाजि ॥
*

[81]
से अल्‌का पुरीथि मोर् घर तुइ देख्‌बु,
जक्षपतिर् राज्‌महलर् उत्तर् आड़े जान्‌बु ।
दुआरे अछे इन्दर् धनु
बागि सुन्दर् तोरन्,
दुरुन् तुइ पार्‌बु चिन्हि
सेटा मोर् भबन् ।
घर्-तराने बढ़ेइछे घरनी,
सान् मन्दार् गछ गुटे
पोओ बागिर् पालि ।
झोपा झोपा फुल् फुटि झुलुछे,
सेन हात्‌के टेकि करि
तलुन् हेबा तोलि ॥
*
[82]
से भबनर् भित्‌रे सान् पोख्‌री गुटे अछे,
केते मर्कत् पथ्‌रे सेतार् पाउँच् बना हेइछे ।
सुना-बरन् पदम् फुल्
फुटिथिबा गहल्,
बइदुर्‌य़ मणिर् मितान्
सुन्दर् नाड़् कहँल् ।
हँस्‌माने पानि बसा करिछन्,
तोर् दर्शन् पाएले सेने
सभे उषत् हेबे ।
मान्‌सरोबर् पाशे ताँकर् थिले बि,
सेन्‌के जिबार् लागि इच्छा
नाइँ करन् केबे ॥
*
[83]
केलि-पाहाड़् गुटे अछे खँड़िथि से बन्धर्,
नीलम् मणि लागिछे तार् चूले केड़े सुन्दर् ।
केतेनिकेते कनक्-बरन्
सरस् कदली गछे,
चाएर् दिगे से परबत्
घेरा हेइ अछे ।
तोर् तरातरा बिज्‌ली मार्‌ले भाइ रे !
से पाहाड़र् बागि तके
मुइँ देखि पार्‌सिँ ।
मोर् कनिआँर् प्रिय बलि पाहाड़्‌के,
सेत्‌कि बेले बिकल् मने
सुर्‌ता केते कर्‌सिँ ॥
*
[84]
माध्‌बी गछर् मण्डप् गुटे अछे से पाहाड़े,
कुरुबकर् बाड़ा दिआ हेइछे चाएर् आड़े ।
मण्डप् छुमे लाल् अशोक्
पतर् तार् चुल्‌चुल्,
तार् संगे फेर् अछे गुटे
सुन्दर् गछ बकुल् ।
तोर् सखीर् डेब्‌रि पाद् पाएबाके,
मोर् बागिर् अशोक् गछ
इच्छा कर्‌सि भले ।
प्रियार् मुहुँर् मदिराके चाहेँसि,
मोर् लेखेन् बकुल् गछ
तार् दोहदर् छले ॥
*
[85]
दुइ गछर् मझि अछे सुना डँड़ा गुटे,
बस्‌बा पीठे फटिक् मणि लगा हेइछे पटे ।
सेतार् मूले कषि बउँश्
बागिर् बड़ा तेजा,
शागुआ बरन् मणि मर्कत्
हेइछे केते खञ्जा ।
सञ्ज् बेल्‌के आसि करि डँड़ाथि,
बसिथिसि तोर् सांग
मजूर् पुएँक् मेलि ।
मोर् कनिआँ हाते तालि बजाएले,
रुन्‌झुन् चूड़ी शबद् संगे
नाच्‌सि हलि हलि ॥
*
[86]
मोर् हुरुदर् कथा तके कहेलिँ जेते सबु,
तुइ साधु बादल् भाइ ! मने रखिथिबु ।
दुआर्-तरे मंगल्-सूचक्
शँख् पदम् चिह्ना,
लेखा हेइछे देख्‌बु सेने
असुबिधा नाइँना ।
चिह्नि पार्‌बु निश्चे मोर् भबन्‌के,
मोर् बिने तार् तेज् ऊना
हेइथिबा इछन् ।
सूरुज् बिना केभेहेले पदम् फुल्,
पर्‌काश् करि नाइँ पारे
निजर् दीप्ति बरन् ॥
*
[87]
हाती-छुआ बागिर् तुइ छोटिआ रूप धर्‌बु,
जेन्ता कि मोर् घरे जल्‌दि प्रबेश् करि पार्‌बु ।
केलि-पाहाड़् कथा तके
देइछेँ बतेइ,
छने बिश्राम् कर्‌बु सेतार्
सुन्दर् चूले जाइ ।
अलप् उकिआ करि तुइ बिग्-बिग्,
जुग्‌जुगिआ कीरा दलर्
तेज् बागि निजर् ।
उज्‌ला धरि तोर् बिज्‌ली-आँखिने,
सेनु डुंगि देख्‌बु सांग !
मोर् भबन् भितर् ॥
*
[88]
पात्‌ला देही श्यामा से त
मुनिआँ दाँत सान् सान्,
लाल् चएँड् दिश्‌सि पाच्‌ला
बिम् फलर् समान् ।
सुर्लि अँटा गड़िआ नाभि थिबा मोर् कनिआँ,
आएँख् सेतार् हिर्‌नी बागिर् लाग्‌सि छन्‌छनिआँ ।
मोटा चुतल् जोगुँ धीरा चालि तार्,
छातिर् भारे अलप् नइँ
जाएसि जीबन्-धनी ।
धांग्‌री जेते गढ़िअछे बिधाता,
ताँकर् भित्‌रे सते पर्थम्
सर्जना मोर् सज्‌नी ॥
*
[89]
कनिआँ मोर् कहेसि भाइ ! धीरे कम् कथा,
मोर् दुतीय जीबन् बलि ताहाके जानिथा ।
मुइँ सेतार् परान्-जुलि
धुरे अछेँ अधीर्,
एक्‌ला रहि थिबा प्रिया
चक्रबाकी बागिर् ।
मोर् बिरहे केते केते लमा दिन्,
बितेइछे संगिनी मोर्
हेइ आकुल् मति ।
काकर् घोटि देले जेन्ता पद्मिनी,
मलिन् दिश्‌सि थिबा सेन्ता
मोर् शिरीमती ॥
*
[90]
कान्दि कान्दि बिकल् हेइ मोर् बिरहे झुरि,
प्रियार् कहँल् आएँख् निश्चे य़ाइथिबा फुलि ।
बोहुथिबा केते दुखे
निनास् पबन् गरम्,
सेथिर् जोगुँ शुखिथिबा
तार् चएँड़् नरम् ।
बसिथिबा हात थापि गालेथि,
लमा बाल् ढाँकि थिबा
मलिन् मुहेँ प्रियार् ।
तु ढाबि देले जेन्ता चन्दर्‌मा,
तेज्-बिहीन् जना पड़्‌सि
शुख्‌ला दिश्‌सि आकार् ॥
*
[91]
तोर् नज्‌रे पड़्‌बा जल्‌दि सेन मोर् भारिजा,
मुइँ भाबुछेँ, सत्‌कि बेले करुथिबा पूजा ।
नेहेले से त मने मने
भाबि करि मते,
बिरह-दुब्‌ला पतिर् चित्र
लेखुथिबा हाते ।
सेने आरु पचारुथिबा पिञ्जरार्,
मधुर्-गला सारीके मोर्
प्रिया बिरहिनी ।
'तोर् ठाने त ताँकर् बेशी सेनेह,
रसिका लो ! ताँके तुइ
सोर् कर्‌सु किनि ?'
*
[92]
मलिन् शाढ़ी पिन्धिथिबा बीणा रखि कोले,
गीत् गुटे गाएबा लागि चाहुँथिबा भोले ।
से गीते त रहि थिबा
मोर् नाँर् सूचना,
बाछि बाछि सुन्दर् पद
हेइथिबा रचना ।
नयन्-धारे भिज्‌‍ला बीणा-तारके,
कहँल् हाते केन्‌सि मते
पोछि सजोउथिबा ।
बहुत् थर आगुन् रचिथिले बि,
प्रिया स्वरर् मूर्छनाके
पास्‌रि जाउथिबा ॥
*
[93]
दुआर् बन्धे आगर् थिला फुल्‌मन्‌के सखी,
गोटे गोटे करि आनि भूईँ तले रखि ।
गनुथिबा हिसाब् करि
रहेला मास् केते,
बिरह दिनुँ आरँभ् करि
शाएप् सर्‌बा पते ।
लाजे लाजे सेने प्रिय सजनी,
मोर् संगे तार् केलि रस
भाबुथिबा मने ।
पति निजर् दूरे थिले इ भाबे,
मन् भुर्‌तेन् करिथिसन्
बिरहिनीमाने ॥
*
[94]
दिनर् बेले कामे लागि थिबा तोर् सखी,
मोर् बिरह नाइँ करे ताके जह दुखी ।
मातर् राति मन् भुर्‌तेन्
नाइँ हेबार् जोगुन्,
दुख बहुत् पाएबा प्रिया
मुइँ भाबुछेँ आगुन् ।
भूइँ तले शोइथिबा रातिथि,
झुम्‌रा आँखि नाइँ थिबा
से त पति-बर्‌ता ।
देख्‌बु ताके रहि घरर् खिड़्‌किथि,
मन् खुसि तार् कर्‌बा लागि
जनेइ मोर् बार्‌ता ॥
*
[95]
मोर् बिनुँ से खीन् देही मन् दुःखे झुरि,
गुटे कड़े रहि शेजे शुइथिबा गुरी ।
पूरुब् दिगे गुटे कलार्
तन् धरि चन्दर्‌मा,
दिशुथिसि मलिन् सेन्ता
थिबा प्रियतमा ।
जेन् रातिके छने बागिर् बितेइछे,
मन् इच्छा से केलि रसे
मोर् संगे छएली ।
उषुम् लह झरेइ एबे से राति,
बितउथिबा मोर् बिरहे
बहुत् लम्बा बलि ॥
*

[96]
सुधा-शीतल् चन्दर् किरन् आनन्द् देसि मने,
मोर् भबनर् खिड़्‌कि-बाटे प्रबेश् कर्‌ले सेने ।
सेनेह आघर् अछे बलि
ताके देखि छनेक्,
बिराग् जोगुँ शिर्‌मती मोर्
फिरेइ नेबा आँएक् ।
ढाँकि हेइथिबा आँखि सजनीर्,
पता डब्‌डबि जाउथिबा
दुखे लह-भारे ।
दिश्‌बा प्रिया बाद्‌‍लिआ दिने थल्-पदम्,
जेन्ता मुजि नाइँ हुए कि
फुटि नाइँ पारे ॥
*
[97]
सेत्‌कि बेले बहुथिबा लमा निनास् बिकल्,
बाजि करि दुख्‌बा चएँड़् पतर् बागि कहँल् ।
बिना तेलर् सिनान् जोगुँ
भुर्‌भुसा बाल् मुँड़र्,
खेलउथिबा हाते लमेइ
गाल् पते से निजर् ।
झुम्‌रा लागि चाहुँथिबा सजनी,
सप्‌ने घले मोर् संगे तार्
हेबा बलि मिलन् ।
मातर् निद् नाइँ आसे ताहाके,
बिकल् करि देबा सेने
आँखिर् लह-झरन् ॥
*
[98]
मोर् बिरहर् पहिल् दिने माला छाड़ि करि,
शिखा बान्धि थिला सखी मने थय् धरि ।
शाएप् सर्‌ला परे मुइँ
हुर्‌दे उषत् हेइ,
खोलि देमि से शिखाके
दुःख् छाड़ि देइ ।
छुइँले जाहा दुखा देबा मूले तार्,
बड़ा कठिन् आरु बिषम्
हेइ एकाबेनी ।
बिना-कटा नखर् हाते ताहाके,
गाल् उप्‌रुँ घुचोउथिबा
पछके सजनी ॥
*
[99]
से अब्‌ला प्रियतमा झुरि मोर् बिरहे,
मूर्छि देइ थिबा सारा अलंकार् देहे ।
दुखे कष्टे से बार्‌बार्
निजर् शेज्-कोले,
कहँल् गागर् रखिथिबा
केन्‌सि मते हेले ।
सुन्द्‌री मोर् कन्देइ देबा तके बि,
झरेइ देबा बुन्दा बुन्दा
तोर् आँखिर् पानि ।
जेन्‌मान्‌कर् आत्मा कोमल् दयालु,
हुरुद् ताँकर् तर्‌लि जाएसि
परर् दुख जानि ॥
*
[100]
मोर् पाशे तोर् सखीर् मन् रमिछे सर्बदा,
मोर् लागि तार् बहुत् प्रेम्, जानिछे इ ददा ।
पहेला करि अल्‌गा अछे
मोर् ठानुँ से सुन्द्‌री,
मुइँ भाबुछेँ एन्ति दशा
भोगुथिबा गोरी ।
प्रियार् सुहाग् अछे बलि इ कथा,
तोर्‌ने मुइँ नाइँ कहेबार्
बकर् बकर् हेइ ।
य़ेन् पर्कार् तके मुइँ कहेलिँ,
तुइ जल्‌दि आँखि साम्‌ने
देख्‌बु आरे भाइ ! ॥
*
[101]
मुँड़र् बाल् लमिथिबा य़ोगुन् य़तेखते,
आएँख् बुलि नाइँ पारे दुइ कोना पते ।
कजल् गार् सेथि आरु
नाइँ हेइ लगा,
मदर् बिना भुलि जाइछे
भूरु नचाडेगा ।
तुइ हेलगे पुहुँचि गले भाबुछेँ,
सखीर् हेइ आँखि उपर्
फुर्‌फुर्‌बा चँचल् ।
माछ्‌माने हलेइ देले तर्‌तरे,
नीला पदम् फुल् बागिर्
दिश्‌बा आएँख् जुगल् ॥
*
[102]
फेर् सेठाने फुर्‌फुर्‌बा प्रियार् डेब्‌रि ऊरु,
सरस् कद्ली खँभा बागिर् गोरा-बरन् सुरु ।
लागिथिला मोति-गुँथ्‌ला
घुन्‌सि सबुदिनिआँ,
सेटा अल्‌गेइ देइछे एभे
जानि खराप् समिआँ ।
सर्‌ले आमर् मधुर् प्रेम् मिलन,
ताके निजर् हाते मुइँ
घषि देसिँ धीरे ।
मोर् नखर् चिन्हा सेने नाइँना,
प्रिया एछेन् बिरहिनी
अछे केते दूरे ॥
*
[103]
बादल् भाइ ! सेत्‌किबेले मोर् कनिआँ जदि,
निदर् सुखे शुइथिबा दुइ आएँख् मुदि ।
तुम् पड़ि तुइ रहेबु सेन
घड़्‌घड़ि नाइँ कर्‌बु,
गोटे पहर् सेतार् पाशे
जगि बसिथिबु ।
प्रेमी मुइँ केन्‌सि मते सपने,
आसिथिमि गोरी मके
भिड़ि धरिथिबा ।
सेने जेन्ता मोर् गलानुँ सजनीर्,
कहँल् बाहाँ- लता-बन्धन्
खस्‌रि नाइँ जिबा ॥
*
[104]
बुन्दा बुन्दा पाएन्-मिशा शीतल् पबन् धीरे,
चलेइ करि जगेइ देबु प्रियाके मोर् घरे ।
फुटि उठ्बा सेत्‌किबेले
माल्‌ती कढ़ि नूआँ,
तार् संगे त खोल्‌बा आँएख्
सेने मोर् कनिआँ ।
लागि करि रहेबु तुइ खिड़्‌किने,
प्रिया छने घन् करि
ठअँकेएबा तके ।
लुकेइ करि बिज्‌लीके तोर् भितरे,
तुइ कहेबार् आरँभ् कर्‌बु
धीर् स्वरे तेन्‌के ॥
*
[105]
‘आगो सती सौभागिनि ! मुइँ बादल् जान,
तमर् पतिर् प्रिय सांग निजर् बलि मान ।
तमर् पाखे पठेइछन्
मनर् कथा बिशेस्,
मुइँ आसिछेँ आनि करि
ताँकर् ठानुँ सन्देस् ।
दुरिआ देशुँन् फिरि बाटे य़ेन्‌माने,
बिशोउथिसन् मुइँ निजे
करि गँभीर् गर्जन् ।
घर्‌के शीघ्र पठेइ देसिँ सेमन्‌के,
तन्द्रा सभे खोल्‌बा लागि
प्रियार् बेनी-बन्धन् ॥'
*
[106]
इ कथाके सुनि करि मोर् कनिआँ काने,
मुहुँ उपर् करि तके देखि नेबा छने ।
शिरीरामर् दूत बीर हनुमान्‌के जेन्ता,
देखि थिले मुहुँ टेकि लंकापुरे सीता ।
केएँ कथा बलि प्रियार्
हुरुद् आकुल् हेबा,
तके सेन देखि से त
केते आदर् कर्‌बा ।
बादल् भाइ ! तार् उतारु तोर् मुहुँन्,
कुशल् खबर् शुन्‌बा प्रिया
थिर् करि तार् मन् ।
बन्धुर् मुहुँन् शुन्‌ले पतिर् बारता,
खुसि हेसन् स्तिरीमाने
हेला बागिर् मिलन् ॥
*
[107]
बहुत् बरष् जीइँथा भाइ ! मोर् कथाके धरि,
निजे सुफल् पाएबा लागि पर्-उप्‌कार् करि ।
कहेबु मोर् प्रिया छुमे
धीरे कअँल् बचन्,
‘रामगिरिर् आश्रम्‌ने
तमर् पति अछन् ।
तमर् ठानुँ दूरे रहि जीइँछन्,
कुशल् कथा पचारुछन्
तम्‌के आगो अब्‌ला !
बिपत्तिने पड़िथिला परानी,
इ पर्कार् कुशल् कथा
पच्‌राएसन् पहेला ॥
*
[108]
उल्‌टा भाग्य छेकिदेइछे रास्ता तमर् पतिर्,
बहुत् दूरे रहिछन् से खीन् ताँकर् शरीर् ।
लह झरेइ ताँकर् गागर्
तपत् हेइ अति,
उषुम् साँस् छाड़्‌सि दुखे
आकुल् ताँकर् मति ।
मने निजर् करि केते कल्‌पना,
मिलन्-सुख पाएसन् से
तमर् संगे रसि ।
ताँकर् लेखेँ लह-भिजा तपत,
खीन् आकुल् तमर् देहि
उषुम् निनास् छाड़्‌सि ॥
*
[109]
तमर् प्रिय सखीमन्‌कर् आगे थाइ हाए !
खोला मुहेँ जेन् कथाके कहेबा उचित् आए ।
कहुथिले से मिठा कथा
तमर् काने काने,
मुहुँके तमर् छुइँबा लोभे
जिए चञ्चल् मने ।
एभे देखि नाइँ हेबार् ताहाँके,
कथा पदे ताँकर् मुहुँन्
नाइँ हेबार् शुनि ।
मोर् मुहेँ से जेन्ता भाबे कहिछन्,
ताँकर् आकुल् मनर् कथा
शुन प्रेम् गुनि ॥
*
[110]
‘आगो प्रिय-संगिनि ! तोर् अंग-लाएबन,
मुइँ प्रियंगु-लता पाशे कर्‌सिँ दरशन ।
तुइ धरिछु जेन् परकार्
मोहिनी चाहाँनी,
छन्‌छनिआँ हिर्‌नी-आँखि
देख्‌सिँ हेइ ठानि ।
चन्दर् पाशे तोर् मुहुँर् तेज् मन-लोभा,
देख्‌सिँ मजूर्- चन्द्रिकाने मुँड़र् बाल-शोभा ।
नदीमन्‌कर् सरु सरु लहरीथि,
तोर् भूरु-भंगीके त
देखि पार्‌सिँ मुइँ ।
मातर् हाय्, फुलेइ-रानी सजनि !
गुटे ठाने तोर् तुल
काहिँ दिशे नाइँ ॥
*

[111]
तुइ प्रेमे केबे रिसा हेले आगो सुन्द्‌रि !
पथर् उप्‌रे धातु रसे तोर् चित्र करि ।
मुइँ मनैबा लागि तके
केन्‌सि मते हेले,
तोर् चरने पड़्‌बा इच्छा
कर्‌सिँ जेतेबेले ।
झरि आएसि सखि रे ! मोर् आँखिने,
केते उषुम् लह सेनुँ
नाइँ दिशे आउर् ।
चित्रे हेले तोर् मोर् इ मिलन्‌के,
सहि नाइँ पारे सते
दइब् केड़े निठुर् ॥
*
[112]
केन्‌सि मते पाएले सखि ! तते मुइँ सपने,
पोटालि करि धर्‌बा लागि प्रेम् आकुल् मने ।
शूइन्‌के मोर् दुइ हात्‌के
लमेइ देसिँ जेबे,
मोर् एन्ता अबस्थाके
देखि दुखी भाबे ।
इनर् बन-देबीमन्‌कर् आँखिनुँ,
मोति मेतार् मोटा लह
बुन्दा बुन्दा झरि ।
गछ्‌मान्‌कर् कअँलिआ पतरे,
नाइँ थिपे, एन्ति कथा
नुहे आलो सुन्द्‌रि ! ॥
*
[113]
हिमालयर् जेन् पबन् देबदारु गछर्,
नूआँ कअँल् पतर् टिपि भेदिकरि तर्‌तर् ।
सेतार् रसर् झरे निजे
बास्‌ना महकेइ,
दक्षिन् दिगे बहि जाएसि
धीरे खुसि देइ ।
भाब्‌सिँ मुइँ हेइ पबन् आसिछे,
गुन्‌मति गो ! केते आगुन्
तोर् देहिके छुइँ ।
हेतिर् गुने मोर् हातके लमेइ,
पोटालि करि धर्‌सिँ ताके
प्रेम्- रसे मुइँ ॥
*
[114]
केन् उपाय् कर्‌के बड़ा लमापहर् राति,
छोट् हेइकरि छनेक् परा जल्‌दि जाएता बिति ।
इ दिन् घले सबुबेल्‌के
केन्ता उपै कले,
अलप् अलप् खरा धीरे
दउथिता भले ।
एन्ता सिने भाबुथिसि मन मोर्,
आगो चंचल्- आँखि गोरि !
इच्छा नाइँ पूरे ।
मन् अनाथ हेइ जाएसि निराशे,
तोर् बिरह सतेइ देसि
मते बहुत् दूरे ॥
*
[115]
निज्‌के मुइँ दम् देइकरि बहुत् भालि भालि,
इ अप्‌नार् परान्‌के त रखिछेँ सँभालि ।
कल्यानि गो ! हेतिर् लागि
सेने तुइ पुनि,
अति बिकल् नेइँ हेबु
मोर् कथाके गुनि ।
किए मजा करुथिसि सुखे त,
आरु किए दुखे बुड़ि
करुथिसि चिन्ता ।
इ सँसारे प्रानीमन्‌कर् अबस्था,
केभे तल् केभे उपर्
चका-किन्द्‌रा जेन्ता ॥
*
[116]
उठ्ले निदुन् नाग-शयन् महापर्भु हरि,
मुक्ति मके मिल्‌बा तेने शाएप् जिबा सरि ।
चाएर् मास रहेला आरु
सेत्‌कि दिन् पते,
आएँख् मुजि कटेइ देबु
समिआँ केन्‌सि मते ।
तार् पछे त मिश्‌मा आमे दुइ जन्,
शरत् रुतुर् जन्-उकिआ
उजल् मधुर् राति ।
बिरह बेले जेन् जेन्‌टा भाबिछुँ,
से से इच्छा पूरन् कर्‌मा
प्रेम्- सुखे माति ॥’
*
[117]
फेर् कहिछन् तमर् बर् मोर् मुहेँ इ कथा,
‘गलामाली ! मोर् गलाके भिड़ि जुरेइ मथा ।
आनन्द् मने थरे शेजे
निदे थिलु शुइ,
मातर् जल्‌दि उठ्लु चेति
सुस्कि करि तुइ ।
मुइँ बार्‌बार् तेन्‌के तके पचार्‌लिँ,
मन् भित्‌रे हँसि करि
उत्तर् देलु आप्‌टि,
‘सप्‌ने मुइँ देख्‌लिँ सते रसिछ,
दुस्‌रा गुटे धांग्‌री संगे
तमे बड़ा कप्‌टी !’ ॥
*
[118]
जनेइ देलिँ एन्ति भाबे तके सन्तक् सबु,
आश्रम्‌ने मुइँ रहिछेँ कुशल् मंगल् जान्‌बु ।
मोर् ठाने गो ! लोक्‌मन्‌कर्
असत् निन्दा धरि,
तुइ अपर्ते नाइँ कर्‌बु
कलिआ-आँखि सुन्द्‌‍रि !
भिने भिने हेइथिले बिरहे
सरि जाएसि सेनेह आरु नेइँ रहे,
एन्ति कथा लोक् कहेसन्
मातर् सत नाइँसे ।
भोग् नाइँ हेइ बलि करि त
सेनेह सबु रस्-भर्ति बहुत,
प्रेम् रूपे जमा हेसि
प्रिय जनर् पासे ॥’
*
[119]
तोर् सखीके दम् धराबु कहि करि एन्ता,
से पहेला बिरह-दुखे करुथिबा चिन्ता ।
शिबर् षँड् कोड़िछे जार्
शुर्ङ्गे खुरा मारि,
से कएलास् गिरिनुँ तुइ
जल्‌दि आएबु फिरि ।
प्रिया-लगुन् किछु सन्तक् संगे तार्,
कुशल् खबर् आनि करि
दर्-मरा मोर् परान् ।
रख्या कर्‌बु बादल् भाइ ! इ जीबन्,
शिथिल् आए सकाल् बेलार्
कुन्द फुल समान् ॥
*
[120]
सुन्दर् बादल् भाइ रे ! तोर् बन्धु मुइँ आएँ,
कहेलिँ जाहा सते मोर् इ कारज् कर्‌बु काएँ ?
तोर्‌नुँ उत्तर् सुन्‌ले एका
अछे तोर् इच्छा,
इ कथा मुइँ नाइँ भाबेँ
तुइ त बड़ा सच्चा ।
चातक्‌माने माग्‌ले तके केभे बि,
कथा किछि नाइँ कहु
पाएन् देसु मातर् ।
पूरन् हेले माग्‌बा लोकर् पार्थना,
सेटा आए साधु लोकर्
बिना-बचन् उत्तर् ॥
*
[121]
बन्धु भाबे हउ नेहेले बिरही बलि मके,
नेहेले तुइ मोर् पर्ति कुर्पा करि टिके ।
मोर् प्रिय इ कारज् निश्‍चे
कर्‌बु सुबिचारि,
य़दर्पि मोर् नाइँसे उचित्
कलिँ जेन् गुहारि ।
बर्‌षा काले धरि सुन्दर् चेहेरा,
मन् इच्छा तुइ बुलुथाआ
देशे देशे जाइ ।
तोर् सजनी बिज्‌ली ठानुँ छने बि,
केभेहेले तोर् बिच्छेद्
नाइँ हउ रे भाइ !” ॥

* * *
( उपसंहार - Translator's Conclusion)
[122]
मेघदूत काब्य इने समापत हेला,
संस्कुरुतुन् कोस्‌ली भासार् अनुबाद पहेला ।
महाकबि कालिदासर्
लेखनीथि प्रेम-रसर्
पस्‌रा मेलि अछे जुगल्
मिलनर् शोभा ।
प्रकुर्ति आर् मुन्‌स भित्‌रे
गभीर् भाब काब्य-चित्‌रे
देखेइछन् कबि-गुरु
केते मन्-लोभा ।
मेघर् मुहेँ जख्य जुआन् प्रिया पाखे खबर्,
पठेइथिला दुखी मने केते प्रेम् भाबर् ।
से कथाके जानि करि मुकति,
देले ताके अभिशापुँन्
जक्ष-रजा कुबेर् ।
कोश्‌ली गीत छन्दे सुन्दर् मेघदूत्,
लेख्‌ला सरस् मधुर् काब्य
हरेकृष्ण मेहेर् ॥
= = = = = = = = = = =


(इति कोशली मेघदूत सम्पूर्ण)
*
Here ends KOSHALI MEGHADUTA
of
Dr. HAREKRISHNA MEHER

= = = = = = =