Saturday, October 30, 2010

Utkal-Gaurav Madhusudan Das : Harekrishna Meher

Utkal-Gaurav Madhusudan Das : Ek Swaabhimaani Vyaktitva
Hindi Article By : Dr. Harekrishna Meher
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उत्कल-गौरव मधुसूदन दास : एक स्वाभिमानी व्यक्तित्व
* डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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भारतवर्ष में ओड़िआ-भाषा-आन्दोलन की भित्ति पर स्वतन्त्र ओड़िशा राज्य का गठन हुआ १ अप्रैल १९३६ को । अंग्रेज शासन में पराधीन अञ्चलों में ओड़िआ भाषा का अस्तित्व जब संकट में था, उसी समय कुछ महानुभाव व्यक्तियों के निःस्वार्थ उद्यमों से ओड़िशा राज्य को स्वतन्त्र रूप से अपना कलेवर प्राप्त हुआ । अंग्रेज-शासन में बंगाल, बिहार, केन्द्र प्रदेश और मद्रास के भीतर खण्ड-विखण्डित होकर ओड़िशा विपर्यस्त अवस्था में थी । ओड़िआ-भाषी लोगों को एकत्र करके एक स्वतन्त्र प्रदेश निर्माण के लिये अनेक चिन्तक, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक एवं देशभक्त व्यक्तियों ने बहुत प्रयत्‍न किये । उन नमस्य महान् व्यक्तियों में उत्कल-गौरव मधुसूदन दास अन्यतम हैं । वे ‘मधुबाबु’ नाम से सर्वत्र लोकादृत हैं । 

पूर्व भारत के अधिवासियों की राजनयिक, सामाजिक , आर्थनीतिक एवं सांस्कृतिक प्रगति हेतु मधुबाबु सदैव तत्पर रहे । विशेष रूप से ओड़िशा-गगन में पूर्व क्षितिज पर नवोदित सूर्य समान मधुबाबु ने ओड़िआ लोगों के मन से नैराश्य- अन्धकार को दूर करके नूतन आशा और उत्साह का सञ्चार किया । उनके नेतृत्व में ओड़िआ भाषा एवं ओड़िशा प्रदेश दोनों की प्राण-प्रतिष्ठा हुई । उस समय कुछ चक्रान्तकारी बंगाली लोग कहते थे –‘उड़िया एक स्वन्त्र भाषा नय; उड़िया बांग्लार एक उपभाषा ।‘ परन्तु ओड़िशा के विशिष्ट लोगों की सफल प्रचेष्टा से ओड़िआ एक स्वतन्त्र भाषा के रूप में मान्यता-प्राप्त हुई । फलस्वरूप भारत में भाषा-भित्तिक सर्वप्रथम प्रदेश बनकर ओड़िशा उभर आयी । 

ओड़िआ भाषा की सुरक्षा एवं स्वतन्त्र ओड़िशा प्रदेश गठन हेतु मधुबाबु ने उत्कल-सम्मिलनी की प्रतिष्ठा की । इसमें खल्लिकोट-राजा हरिहर मर्दराज, पारला-महाराज कृष्णचन्द्र गजपति, कर्मवीर गौरीशंकर राय, कविवर राधानाथ राय, भक्तकवि मधुसूदन राव, पल्लीकवि नन्दकिशोर बल, स्वभावकवि गंगाधर मेहेर और कई विशिष्ट व्यक्तिगणों का सक्रिय योगदान सतत स्मरणीय रहेगा । मधुबाबु ने उत्कल सम्मिलनी में योगदान के लिये अपनी कविता में लोगों का आह्वान किया था :- 

‘एहि सम्मिळनी जाति-प्राण-सिन्धु कोटि प्राण -बिन्दु धरे,
तोर प्राण-बिन्दु मिशाइ दे भाइ डेइँ पड़ि सिन्धु-नीरे ॥'
‘तात्पर्य है : यह उत्कल सम्मिलनी है जाति-प्राण का सिन्धु, जो कोटि प्राण-बिन्दुओं को धारण करती है । उस सिन्धु-जल में कुद कर, अरे भाई ! तेरा प्राण-बिन्दु को मिला ले । अपनी मातृभूमि-प्रीति अनल्प है मधुबाबु की । स्वार्थ त्याग कर मातृभूमि की सेवा में अपनेको नियोजित करने उनकी उत्साहमयी कविता थी :- 

‘जाति-नन्दिघोष चळिब कि भाइ स्वार्थकु सारथि कले,
टाणे कि रे गाड़ि दानार तोबड़ा घोड़ा- मुहेँ बन्धा थिले ॥‘
तात्पर्य है - जाति-रूप नन्दिघोष रथ कैसे चलेगा भाई, अगर स्वार्थ को सारथि बना दिया जाये ? घोड़े के मुहँ पर दाना की भरी थैली यदि बन्धी है, तो घोड़ा गाड़ी खींचता है क्या ? 

१९०३ में मधुबाबु द्वारा प्रतिष्ठित उत्कल सम्मिलनी से ओड़िआ-आन्दोलन आगे बढ़ा । उसी वर्ष वे कांग्रेस छोड़कर ओड़िआ-आन्दोलन में स्वयंको नियोजित किया । उसी समय श्रेय जाता है अंग्रेज शासक सर स्टाफोर्ड नर्थ को जिन्होंने ओड़िशा और असम को बंगाल से पृथक् करने हेतु १८६८ में सरकार को प्रस्ताव दिया । इस विषय से मधुबाबु को बहुत प्रेरणा मिली और ओड़िआ-आन्दोलन का सूत्रपात हुआ । उन्नीसवीं सदी के अन्तिम भाग में तत्कालीन आयुक्त मि. कूक के प्रस्ताव से सम्बलपुर और गञ्जाम ओड़िशा-खण्ड में सम्मिश्रित हुए । ओड़िआ-भाषी अंचलों को एकत्र करके उत्कल सभाका आयोजन किया गया । मयूरभञ्ज महाराज सभापति बने और मधुबाबु सम्पादक । उत्कल सभा की ओर से मधुबाबु सितम्बर १८९७ को लन्दन गये । अंग्रेज सरकार के आगे दावा किया कि ओड़िआ-भाषी सारे अंचल एक शासन के अधीन रहें । ओड़िआ लोगों की दुर्दशा दूर करने फिर अंग्रेजों के समर्थन पाने १९०७ में इंग्लण्ड यात्रा की । बाद में बिहार-ओड़िशा प्रदेश १ अप्रैल १९१२ को गठित हुआ । मधुबाबु बिहार-ओड़िशा बिधान परिषद के एक मन्त्री बने जनवरी १९२१ को और ओड़िशा के निर्विवादीय नेता के रूप में उनको बहुत प्रतिष्ठा मिली । 

मधुबाबु स्वाभिमान एवं आत्ममर्यादा को विशेष प्राधान्य देते थे । धन-सम्पत्ति भले ही नष्ट हो जाये, परवाय नहीं, परन्तु आत्म-सम्मान सदा अक्षुण्ण बना रहे । उनका कहना था :
'आलो सखि ! आपणा महत आपे रखि ।'
इसका अर्थ है - अरी सखी ! अपने सम्मान की रक्षा स्वयं ही करनी चाहिये । एक सच्चे राष्ट्रीयतावादी नेता के रूप में मधुबाबु ने बहुत आदर एवं सम्मान प्राप्त किये । 

कटक जिल्ला के सत्यभामापुर गाँव में मधुबाबु का जन्म हुआ था २८ अप्रैल १८४८ में । उनके पूज्य पिता थे चौधरी रघुनाथ दास और माता पार्वती देवी । प्राय ८६ वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ ४ फरवरी १९३४ को । विधि का विधान कौन भला टाल सकता ? बहुत दुःख की बात है कि ओड़िआ माटी के ये सुपुत्र मधुबाबु १९३६ में गठित स्वतन्त्र ओड़िशा प्रदेश को अपना चाक्षुष करने नहीं रहे । मधुबाबु प्रथम ओड़िआ हैं कलकत्ता से एम्.ए. डिग्री और बी.एल्. (बार् एट् ल’) प्राप्त करने । वे विधान परिषद के सदस्य होने में भी प्रथम ओड़िआ हैं । वे अपनी वकालत (बैरिष्टरी) के कारण ओड़िशा में “मधु बारिष्टर” के नाम से सुपरिचित हैं । इस विषय पर ओड़िआ में एक लोकोक्ति प्रचलित है :
“पाठ पढ़िबि, काळिआ घोड़ारे चढ़िबि,
मधु बारिष्टर संगे लढ़िबि ॥“
(तात्पर्य है - पाठ पढ़ूँगा, काले घोड़े पर चढ़ूँगा , मधु बारिष्टर के साथ लड़ूँगा ।) 

अपनी देशभक्ति, सच्चे नीति-संपन्न नेतृत्व एवं स्वाभिमानी मर्यादा-सम्पन्न गुणों के कारण बारिष्टर श्री मधुसूदन दास सदैव स्मरणीय हैं । कटक–स्थित मधुसूदन आइन् महाविद्यालय उनके नाम से नामित हुआ है । उनकी जन्मतिथि २८ अप्रैल को समग्र ओड़िशा राज्य में ‘वकील दिवस’ एवं 'स्वाभिमान दिवस' के रूप में पालन की जाती है । वे महान् व्यक्तित्व सभीके नमस्य हैं ।
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Ref : Hindi E-Magazine Srijangatha :
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