Thursday, October 25, 2012

Raghuvamsha Canto-2 : Oriya Version Part-2/ Dr.Harekrishna Meher

 Raghuvamsha - Mahakavya - Canto-II.

Original Sanskrit Epic By : Mahakavi  Kalidasa

Oriya Metrical Translation By : Dr. Harekrishna Meher.
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My Oriya Metrical Translation
of Raghuvamsha - Canto-2
has been completely published in 
‘Bartika’,Literary Quarterly, 
Dashahara Special Issue,
October-December 2002
of Dasharathapur, Jajpur, Orissa.

This Total Translation is presented as follows.

For  Introduction  and  Part - 1 (Verses 1- 41)   
Link : 

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Part-2  (Verses  42-75 End) is presented here.

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रघुवंश द्वितीय सर्ग
मूल संस्कृत काव्य : महाकवि कालिदास 
*
ओड़िआ पद्यानुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
(राग- बंगळाश्री)
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(द्वितीय भाग : श्लोक ४२-७५)
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(४२)
शिब प्रति बज्र        क्षेपणे उद्यत
थिले दिने पुरुहूत,
त्रिलोचनङ्कर        निरीक्षण मात्रे
इन्द्र हेले स्तम्भीभूत ।
तादृश ए दशा      लभिले दिलीप
य़ोचि न पारिले शर,
रुद्ध-हस्त राजा   केशरीकि लक्षि
सत्वर देले उत्तर  ॥
*
(४३)
मृगेन्द्र ! बिअर्थ     हेला मो उद्यम
लाखि रहिबारु हस्त,
उपहसनीय           होइब निश्चय
मोर बचन समस्त ।
अशेष प्राणीङ्क      अन्तर्गत कथा
गोचर  सबु तुम्भरे,
सेथिपाइँ किछि    ब्यकत करुछि
मुहिँ तब सम्मुखरे  ॥
*
(४४)
प्रभु मृत्युञ्जय        मोर  पूजनीय,
से त निखिळ बिश्वर,
स्थाबर जङ्गम      सकळ प्राणीङ्क
सृष्टि-स्थिति-नाशकर ।
अग्निहोत्री गुरु         महर्षिङ्क एहि
अभीष्ट गोधन एबे,
निज नेत्र आगे       नष्ट हेबा देखि
सहि न पारिबि केबे ॥
*
(४५)
ए सकाशुँ तुमे         गाभी परिबर्त्ते
भक्षि मोर कळेबर,
प्रसन्न मानसे               उदर पूराइ
क्षुधा निबारण कर ।
किन्तु मृगराज !       छाड़िदिअ बेगे
गुरुङ्क ए गाभी-धन,
सन्ध्या हेबा जाणि   बाळबत्सा ताङ्क
हेउथिब ब्यग्र-मन ॥
*
(४६)
राजाङ्क एभळि    बाक्य शुणि तीक्ष्ण
दन्त-तेजरे निजरि,
गिरिगुहा-गत         तिमिर-राशिकि
बेगे खण्ड खण्ड करि ।
महेश्वरङ्कर              पारुश-सेबक
मृगराज स्मित-मुखे,
प्रकाशिला बाणी        पुनर्बार नृप
दिलीपङ्कर सम्मुखे  ॥
*
(४७)
बिशाळ महीर        तुमे एकच्छत्र
अधिपति हे राजन !
कळेबर तब          दिब्य कमनीय
बहिछ नब य़ौबन ।
अळप निमित्त     बहु किछि त्याग
करिबाकु बळे मति,
मो मते निश्चय       लोप पाइअछि
तुम बिचार-शकति ॥
*
(४८)
जीबे दया बहि       एते त्याग य़दि
कर ए धेनु निमन्ते,
तुमकु भक्षिले       केबळ ए गाभी
बञ्चिब तुमरि अन्ते ।
प्रजानाथ ! तुमे       जीबित रहिले
चिरदिन हेब हित,
पिता परि सर्ब     प्रजाङ्कु बिपदुँ
रक्षा करिब निश्चित ॥
*
(४९)
ए गाभीर स्वामी    अनळ-प्रतिम
गुरुदेबङ्कर  प्रति,
अपराध हेब         बोलि तुमे य़दि
डरुछ हे नरपति !
ता हेले पृथुळ       स्तनभार-नता
दुग्धबती कोटि गाई,
समर्पि गुरुङ्क        क्रोध हरि तुमे
पारिब ताङ्कु मनाइँ ॥
*
(५०)
ए हेतु अनेक        मङ्गल-राशिर
प्रिय उपभोगकारी,
महाबली एहि          कळेबर तब
रक्षा कर दण्डधारी ।
ज्ञानीमते मर्त्त्ये    समृद्ध राज्य हिँ
स्वर्गपुर  इन्द्र-पद,
केबळ भूतळ-       स्परश मातर
रहिछि एहार भेद  ॥
*
(५१)
दिलीप छामुरे       कहि एहिपरि
केशरी होइला तुनि,
शइळ-कन्दर       भेदि ता बचन
प्रकाशिला प्रतिध्वनि ।
महीपति प्रति          मुदित-हृदये
सते अबा गिरिबर,
सिंहर बाणीकि     समर्थन कला
उच्च शबदे सत्वर  ॥
*
(५२)
महाराजा एणे      पशुराज-कथा
श्रबण कले कर्ण्णरे,
अपर  पारुशे      देखिले, केशरी
बसिछि नन्दिनी परे ।
कातर नयने       चाहिँछन्ति धेनु
लक्ष्य करि नृपतिङ्कि,
दया-परबशे      सिंह आगे राजा
निबेदिले भारतीकि  ॥
*
(५३)
आहे मृगराज !     क्षत्रिय शबद
संसाररे सुबिदित,
क्षतरु अन्यकु      त्राण करे बोलि
क्षत्रिय अर्थ निश्चित ।
तार बिपरीत        आचरण  कले
राज्ये किस प्रयोजन ?
किस हेब अबा      घेनि अपय़शे
कळङ्कमय जीबन ?
*
(५४)
अन्य दुग्धबती           बहु धेनु देइ
महामुनि गुरुङ्कर,
कोपशान्ति अबा   कि रूपे सम्भब
हेब आहे सिंहबर ?
सुरभिङ्क ठारु         कउणसि रूपे
ऊणा नुहन्ति ए जाण,
शम्भु-तेजे सिना       ताङ्करि उपरे
कल तुमे आक्रमण ॥
*
(५५)
ए सकाशुँ मुहिँ   नन्दिनीङ्कु निज
शरीर बिनिमयरे,
तुम कबळरु           मुकत करिबि
उचित ए समयरे ।
एपरि कले त           तुमरि पारणा
भङ्ग कदापि नोहिब,
महर्षि गुरुङ्क           य़ज्ञादि करमे
बाधा आउ न घटिब ॥
*
(५६)
मृगेन्द्र ! तुमे बि        अट पराधीन
तुमकु एहा गोचर,
बहु य़तनरे             रक्षा करुअछ
ए देबदारु बृक्षर ।
य़ाहा रक्षा लागि    भृत्य नियोजित
से य़ेबे बिनाश य़िब,
भृत्य बञ्चि रहि     स्वामी सम्मुखरे
केह्ने मुख देखाइब ?
*
(५७)
हिंसार भाजन       नुहेँ मुहिँ य़दि
सिंह ! तुमरि बिचारे,
तेबे मोर कीर्त्ति-      कळेबर प्रति
सुकरुणा कर बारे ।
पञ्चभूते गढ़ा      भङ्गुर अनित्य
अटइ पार्थिब गात्र,
एपरि पिण्डरे      मो परि लोकङ्क
आस्था नाहिँ तिळे मात्र ॥
*
(५८)
कथा आळापरे      सम्बन्ध हुअइ
बोलि कहिथान्ति जने,
परस्पर तेबे         मित्र हेलुँ आम्भे
मिलन्ते ए घोर बने ।
एथिलागि मोर         अनुरोध एते
हे शङ्कर-अनुचर !
मित्रर  प्रार्थना      उपेक्षा करिबा
उचित नुहे तुमर ॥
*
(५९)
राजाङ्क कथारे   “ताहा हेउ बोलि
केशरी कला ब्यकत,
एकाळे राजाङ्क       अबरुद्ध  हस्त
सहसा हेला मुकत ।
नरेश दिलीप        स्वकीय सकळ
आयुध बरजि बेगे,
मांस-पिण्ड परि       कळेबर निज
अर्पिदेले सिंह आगे ॥
*
(६०)
आपणार मुख       नत करि राजा
भाबुथिले स्वहृदये,
एबे मो उपरे         पराक्रमी सिंह
झाम्पि बसिब निश्चये ।
सेकाळे सकळ-    परजा-पाळक
नृप उपरे तत्क्षण,
बिद्याधर-बृन्द    आकाशुँ आनन्दे
कले कुसुम बर्षण  ॥
*
(६१)
उठ बत्स ! बोलि    इतिमध्ये ताङ्क
श्रबणे सुधा पराय,
मधुर बचन            शुभिबारु  धीरे
उठिले से नरराय ।
बिलोकिले राजा       सम्मुखे निजर
स्नेहमयी माता भळि,
पयस्विनी गाभी     रहिछन्ति किन्तु
नाहिँ सिंह महाबळी ॥
*
(६२)
चकित लोचने        चाहिँले नरेश
नन्दिनी भाषिले तहिँ,
हे साधु राजन !    माया रचि तब
परीक्षा करिलि मुहिँ ।
मुनिङ्क प्रभाबे        य़म मध्य मोते
करिबाकु आक्रमण,
समर्थ नुहन्ति,      किस बा करिबे
अन्य हिंस्र जन्तुगण ?
*
(६३)
गुरु प्रति दृढ़          भकति तुमरि
अशेष दया मो पाशे,
हे बत्स ! प्रसन्न       हेलि तुम ठारे
बर माग ए सकाशे ।
जाणि रख मुहिँ     क्षीर-प्रदायिनी
नुहेँ गाभी साधारण,
मोहरि प्रसादे      सर्ब मनोबाञ्छा
अचिरे हुए पूरण ॥
*
(६४)
बीर शबद य़े       अरजि अछन्ति
भुजबळरे निजर,
य़ाचक-इष्टद        राजा कर य़ोड़ि
मागिले ईप्सित बर ।
सुदक्षिणा-गर्भुँ       जात हेउ मोर
तनय सौभाग्यबान,
बंशर  करता       हेउ  से अशेष-
य़शोराशि-दीप्तिमान ॥
*
(६५)
सन्तान निमन्ते       य़ाचना करन्ते
दिलीप अबनीश्वर,
तथास्तु उच्चारि       बर देले तोषे
सुकन्या सुरभिङ्कर ।
ऋषि-होमधेनु       नन्दिनी आदेश
प्रदानिले ए अन्तरे,
पुत्र ! पत्र-पुटे       क्षीर दुहिँ मोर
पान कर सुचित्तरे ॥
*
(६६)
बोइले दिलीप,    मात ! तुम बत्सा
पान करिबा उत्तारे,
होम क्रियाबिधि-      शेषे य़ेते क्षीर
बळिब, गुरु-आज्ञारे ।
से सबु सेबन         करिबि आनन्दे
अभिळाष ए मोहर,
पृथिबी पाळन        करि घेने मुहिँ
य़ेपरि षष्ठांश कर ॥
*
(67)
एहि परकारे          दिलीप नरेश
कले तहिँ निबेदन,
सुरभि-तनुजा     ताहा शुणि हेले
अतिशय  परसन्न ।
महीपतिङ्कर           सहित महर्षि
बशिष्ठङ्क धेनु सुखे,
हिमाद्रि-गुहारु      फेरिले ता परे
निजाश्रम अभिमुखे ॥
*
(६८)
नृप-शिरोमणि      दिलीपङ्क शुभ्र
बिमळ चन्द्र-मुखर,
आनन्द-चिह्नरु      अनुमित थिला
नन्दिनीङ्क  कृपा-बर ।
से कथा गुरुङ्क    आगे बर्ण्णिबारु
हेला पुनरुक्ति परि,
पश्चाते प्रेयसी-         पाशे नरेश्वर
जणाइले मोद भरि ॥
*
(६९)
बत्सा क्षीर पिइ     सारन्ते आहुरि
होमक्रिया बिधि शेषे,
साधुजन-प्रिय         सुप्रशंसनीय
दिलीप गुरु-आदेशे ।
नन्दिनीङ्क  क्षीर     पान कले तोषे
तृषातुर प्राये भूप,
सते शुभ्र य़श        मूर्त्तिमन्त होइ
बहिअछि  क्षीर रूप ॥
*
(७०)
दिलीपङ्क ब्रत      पारणा समाप्त
हेबा परे  बिधिमते,
राजकुळ-गुरु       संय़मी बशिष्ठ
अन्य दिबस प्रभाते ।
आशीर्बाद देले     राज-दम्पतिङ्कि
पथे कल्याण निमित्ते,
तदुत्तारे ताङ्क       राजधानी प्रति
प्रेरित कले सुचित्ते  ॥
*
(७१)
राजा होमकुण्डे     आहुति-प्रापत
अग्निङ्कु भकतिभरे,
प्रदक्षिण कले,     गुरु बशिष्ठङ्कु
अरुन्धतीङ्कु तापरे ।
नन्दिनीङ्कु बत्सा   सङ्गे प्रदक्षिण
करि चळिले से नृप,
सुमङ्गळाचारे        बढ़िला आहुरि
बळ ताङ्क अनुरूप ॥
*
(७२)
सहनशीळ से        दिलीप भूपति
सङ्गे घेनि धर्मपत्नी,
रथे बसिय़ान्ते          श्रबण-य़ुगळ
रञ्जिला घर्घर ध्वनि ।
बाधा न थिबारु    सुख से लभिले
न पाइले क्लेश-लेश,
सते बा सफळ        मनोरथे चढ़ि
पथ बाहिले नरेश ॥
*
(७३)
बहुदिनुँ राज-         दर्शन न पाइ
ब्यग्र थिले सर्ब जन,
पुत्रलाभ-ब्रत        आचरि राजाङ्क
क्षीण थिला अपघन ।
अतृप्त नयने       प्रजागण ताङ्कु
अनाइले समुत्सुके,
नबोदित चन्द्र        प्रति बारम्बार
निरेखन्ति य़था लोके ॥
*
(७४)
महेन्द्र समान        श्रीमन्त दिलीप
अय़ोध्यारे हेले उभा,
स्वागत निमन्ते      बहु ध्वजा उड़ि
उच्चे पाउथिले शोभा ।
प्रजाङ्क आदर        लभि राजा पुरे
परबेशि पुनर्बार,
नागराज सम        महाबळी भुजे
बहिले भूमिर भार ॥
*
(७५)
अत्रि-नेत्र-जात    ज्योति चन्द्रमाङ्कु
बहिला य़था गगन,
अग्नि-क्षिप्त रुद्र-        तेजकु बहिले
सुर-सरिता य़ेसन ।
दिलीप-बंशर           ऐश्वर्य्य़ निमित्त
सुदक्षिणा  सेहिपरि,
लोकपाळ-अंशे        तेजस्वी गरभ
धारण कले सुन्दरी ॥
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(७६)
कबिकुळगुरु        काळिदास-कृत
रघुबंश  महाकाब्य,
द्वितीय सरग             समापत हेला
सहृदय-जन-भाब्य ।
राजा दिलीपङ्क         गोसेबा बर्णित
रम्य पञ्चस्तरी पदे,
मेहेर-श्रीहरे-           कृष्ण-बिरचित
ओड़िआ पद्यानुबादे  ॥

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(Here ends  Dr. Harekrishna Meher’s
Oriya Translation
of Raghuvamsha Mahakavya - Canto-2.)
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