Monday, October 22, 2012

Sanskrit Poem (श्रीदुर्गा-पञ्चकम्) 'Sri-Durga-Panchakam': Dr.Harekrishna Meher

Sanskrit Poem 'Sri-Durga-Panchakam' 
By : Dr. Harekrishna Meher 

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श्रीदुर्गा-पञ्चकम्
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मात-र्नमस्ते  जगदम्बिके शिवे !
         दुर्गा सदा दुर्गतिनाशिनीश्वरी ।  
त्वमादिशक्ति-र्भुवनेषु कीर्त्तिता
          ब्राह्मी भवानी च विभासि वैष्णवी  ॥ (१)

संहारणं त्वं  कुरु सिंहवाहना
          हिंसापराणां  महिषादि-रक्षसाम् ।
संसार-सन्मार्ग-विधौ कृपामयी                    
          काली समेषां दह पाप-कल्मषम्  ॥ (२) 

आयाहि दुर्गे ! वरदा महायुधा   
          हे दुष्ट-विध्वंसिनि ! धर्मधारिणी ।  
गङ्गाधरार्धाड्गि ! निधेहि मङ्गलं       
          तवानुकम्पा  हृदयं पुनातु नः  ॥ (३)

अस्माकमन्तःकरण-प्रदूषणं
          भस्मीकुरु त्वं  तमसां निरासिनी । 
शर्वाणि ! सर्वाणि  पवित्रय स्वयं
          प्रसार्य पर्यावरणं सुनिर्मलम्  ॥ (४)

त्वं सर्वभूते जननी विराजिता 
          जैत्री सुगात्री  गिरिराज-नन्दिनी ।
स्वान्ते जनानां  भव शान्ति-सौख्यदा
          पादारविन्दे तव नः सुवन्दनम्  ॥ (५)

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रचयिता :
डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः
स्नातकोत्तर-संस्कृत-विभागः,
गङ्गाधरमेहेर-स्वयंशासित-महाविद्यालयः,
सम्बलपुरम्, ओड़िशा  


(This Poem as 'Aavahani' has been published in 
'Bartikaa' (Famous Oriya Literary Quarterly)
Dashahara Special Issue,
October-December 2012, Jajpur, Orissa.)

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